सम्राट अशोक मौर्य वंश के तीसरे और प्राचीन भारतीय इतिहास के सबसे महान शासकों में से एक थे।
अपने शासनकाल के शुरुआती वर्षों में वे एक आक्रामक नीति का पालन करते हुए साम्राज्य विस्तार में व्यस्त थे।
उनके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ 261 ईसा पूर्व में लड़ा गया भीषण ‘कलिंग युद्ध’ सिद्ध हुआ।
इस युद्ध में एक लाख से अधिक लोग मारे गए और डेढ़ लाख से अधिक लोग बेघर एवं बंदी बना लिए गए।
युद्ध के इस भयानक नरसंहार और मानवीय पीड़ा को देखकर अशोक का हृदय पूरी तरह ग्लानि और शोक से भर गया।
इस गहरे आत्म-पश्चाताप के बाद उन्होंने सदा के लिए युद्ध और हिंसा के मार्ग (‘भेरीघोष’) का त्याग कर दिया।
शांति की खोज में सम्राट अशोक ने बौद्ध भिक्षु उपगुप्त के प्रभाव में आकर बौद्ध धर्म को अपना लिया।
बौद्ध धर्म अपनाने के बाद उन्होंने राज्य की नीति के रूप में ‘धम्म’ (धर्म) और अहिंसा के मार्ग को चुना।
अशोक ने बौद्ध धर्म को केवल व्यक्तिगत रूप से नहीं अपनाया, बल्कि इसे राजकीय संरक्षण देकर एक वैश्विक धर्म बना दिया।
उन्होंने साम्राज्य में बौद्ध सिद्धांतों और नैतिक आचरण को बढ़ावा देने के लिए ‘धम्म महामात्य’ नामक विशेष अधिकारियों की नियुक्ति की।
अशोक ने जनता तक अपने संदेश पहुँचाने के लिए चट्टानों और विशाल पत्थरों के स्तंभों (Pillars) पर शिलालेख खुदवाए।
ये शिलालेख आम जनता की समझ के लिए मुख्यतः प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में लिखे गए थे।
बौद्ध धर्म के इतिहास को सुव्यवस्थित करने के लिए अशोक ने अपनी राजधानी पाटलिपुत्र में ‘तृतीय बौद्ध संगीति’ (परिषद) का आयोजन कराया।
इस बौद्ध संगीति की अध्यक्षता प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु मोग्गलिपुत्त तिस्स ने की थी, जहाँ बौद्ध ग्रंथों को शुद्ध और संकलित किया गया।
इस परिषद के बाद अशोक ने भारत की सीमाओं के बाहर अन्य देशों में बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए धार्मिक मिशन भेजे।
उन्होंने अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए विशेष रूप से श्रीलंका (सिंहल द्वीप) भेजा।
इसके अलावा उन्होंने सीरिया, मिस्र, ग्रीस (यूनान), म्यांमार और नेपाल जैसे देशों में भी अपने दूत और धर्म प्रचारक भेजे।
अशोक ने महात्मा बुद्ध से जुड़े पवित्र स्थानों जैसे लुम्बिनी, बोधगया, सारनाथ और कुशीनगर की स्वयं धार्मिक यात्राएं (धम्म यात्राएं) कीं।
उन्होंने बौद्ध भिक्षुओं के रहने के लिए हजारों स्तूपों (जैसे सांची का स्तूप) और अनेक विहारों व मठों का निर्माण करवाया।
संक्षेप में, कलिंग युद्ध की त्रासदी से उपजे सम्राट अशोक के इस प्रयास ने बौद्ध धर्म को एक क्षेत्रीय संप्रदाय से उठाकर एक महान अंतरराष्ट्रीय धर्म के रूप में स्थापित कर दिया।
प्रशासन और समाज
मौर्य काल का प्रशासन भारतीय इतिहास के सबसे कुशल, सुव्यवस्थित और अत्यधिक केंद्रीकृत प्रशासनिक ढांचों में से एक था।
इस प्रशासनिक व्यवस्था का मुख्य केंद्र बिंदु राजा होता था, जिसके पास कानून बनाने, न्याय करने और सेना के संचालन की सर्वोच्च शक्तियां थीं।
राजा की सहायता के लिए एक उच्च स्तरीय ‘मंत्रिपरिषद’ होती थी, जिसके सदस्यों को अमात्य या महापात्र कहा जाता था।
पूरे मौर्य साम्राज्य को प्रशासनिक सुगमता के लिए मुख्य रूप से पांच बड़े प्रांतों (जैसे उत्तरापथ, अवंतीराष्ट्र, दक्षिणापथ) में विभाजित किया गया था।
इन प्रांतों का शासन आमतौर पर शाही परिवार के राजकुमारों (कुमार या आर्यपुत्र) द्वारा वायसराय के रूप में चलाया जाता था।
प्रांतीय प्रशासन के नीचे जिला स्तर की व्यवस्था होती थी, जिसके प्रमुख अधिकारी को ‘राजुक’ कहा जाता था।
प्रशासन की सबसे छोटी और जमीनी इकाई ‘ग्राम’ (गांव) थी, जिसका नेतृत्व ‘ग्रामिक’ नामक अधिकारी करता था।
राजधानी पाटलिपुत्र के नगर प्रशासन को संभालने के लिए 30 सदस्यों का एक नगर बोर्ड था, जो 6 अलग-अलग समितियों में बंटा था।
मौर्य साम्राज्य के पास एक विशाल और शक्तिशाली स्थायी सेना थी, जिसमें पैदल सैनिक, घुड़सवार, रथ और लड़ाकू हाथी शामिल थे।
सैन्य मामलों की देखरेख भी 30 सदस्यों का एक विशेष बोर्ड करता था, जो पांच-पांच सदस्यों की 6 अलग-अलग समितियों में विभाजित था।
साम्राज्य में आंतरिक सुरक्षा बनाए रखने और दुश्मनों पर नजर रखने के लिए एक बहुत ही जटिल और विस्तृत गुप्तचर विभाग (Spy system) सक्रिय था।
कौटिल्य के अनुसार राज्य की आय का मुख्य स्रोत भूमि राजस्व (Tax) था, जो सामान्यतः कुल कृषि उपज का 1/4 से 1/6 हिस्सा होता था।
इस काल का समाज मुख्य रूप से पारंपरिक चार वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) की व्यवस्था पर आधारित था।
हालांकि, यूनानी लेखक मेगस्थनीज ने अपनी पुस्तक ‘इंडिका’ में मौर्यकालीन समाज को आर्थिक और व्यावसायिक आधार पर सात जातियों में विभाजित बताया है।
मेगस्थनीज द्वारा बताई गई इन सात श्रेणियों में दार्शनिक, किसान, चरवाहे, कारीगर, सैनिक, निरीक्षक और सलाहकार शामिल थे।
समाज का मुख्य आधार कृषि था, लेकिन वस्त्र निर्माण, धातु कर्म और जहाज निर्माण जैसे उद्योग भी तेजी से फल-फूल रहे थे।
व्यापारिक लेनदेन और प्रशासनिक भुगतानों को सुगम बनाने के लिए ‘पण’ नामक चांदी के आहत सिक्कों का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता था।
मौर्य समाज में महिलाओं की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर थी; उन्हें शिक्षा, पुनर्विवाह और प्रशासनिक पदों पर (जैसे अंगरक्षिका) कार्य करने का अधिकार था।
सम्राट अशोक के कल्याणकारी और धम्म सिद्धांतों के प्रभाव से समाज में नैतिक आचरण, सहिष्णुता और आपसी भाईचारे की भावना का बहुत विस्तार हुआ।
संक्षेप में, मौर्य काल का यह सुदृढ़ प्रशासन और संगठित समाज ही इस विशाल साम्राज्य के लंबे समय तक टिके रहने का मुख्य आधार था।
मौर्य साम्राज्य का पतन
लगभग 137 वर्षों तक भारत पर एकछत्र राज करने वाले महान मौर्य साम्राज्य का अंत 185 ईसा पूर्व में हो गया।
सम्राट अशोक की मृत्यु के बाद साम्राज्य का पतन बहुत तेजी से हुआ, जिसके पीछे कई आंतरिक और बाहरी कारण जिम्मेदार थे।
इतिहासकारों के अनुसार, पतन का सबसे पहला और प्रमुख कारण अशोक के बाद गद्दी पर बैठने वाले उत्तराधिकारियों का अत्यधिक कमजोर और अयोग्य होना था।
दशरथ, संप्रति और वृहद्रथ जैसे बाद के मौर्य राजा इतने विशाल और फैले हुए साम्राज्य को संभालने में पूरी तरह असमर्थ साबित हुए।
अशोक की मृत्यु के बाद साम्राज्य का दो भागों—पूर्वी और पश्चिमी मौर्य साम्राज्य में विभाजन हो गया, जिससे केंद्रीय सत्ता कमजोर पड़ गई।
साम्राज्य के इस विभाजन ने देश की राजनीतिक एकता को छिन्न-भिन्न कर दिया और प्रांतीय गवर्नरों की महत्वाकांक्षाएं बढ़ गईं।
दूसरा महत्वपूर्ण कारण मौर्य प्रशासन का अत्यधिक केंद्रीकृत (Centralized) होना था, जो केवल एक मजबूत राजा के होने पर ही सफल रह सकता था।
जैसे ही केंद्र में कमजोर शासक आए, दूर-दराज के प्रांतों पर नियंत्रण ढीला हो गया और वहां के अधिकारियों ने खुद को स्वतंत्र घोषित करना शुरू कर दिया।
कई प्रांतों में मौर्य कछारियों और नौकरशाहों द्वारा आम जनता का बेरहमी से आर्थिक शोषण किया जा रहा था, जिससे जनता में भारी असंतोष फैला।
बिंदुसार और अशोक के समय भी तक्षशिला जैसे सुदूर प्रांतों में अधिकारियों के अत्याचार के खिलाफ जनता द्वारा विद्रोह किए जाने के ऐतिहासिक साक्ष्य मिलते हैं।
साम्राज्य के पतन का एक और कारण आर्थिक संकट था, क्योंकि एक विशाल सेना और विशाल प्रशासनिक अमले को बनाए रखने में राजकोष खाली होने लगा था।
अशोक द्वारा बौद्ध भिक्षुओं को दिए गए अत्यधिक दान और हजारों स्तूपों के निर्माण ने भी मौर्य अर्थव्यवस्था पर बहुत भारी वित्तीय दबाव डाला।
कुछ इतिहासकारों (जैसे हरप्रसाद शास्त्री) का मानना है कि अशोक की बौद्ध समर्थक नीतियों के कारण ब्राह्मण समाज में एक प्रकार की धार्मिक प्रतिक्रिया या असंतोष था।
हालांकि, अधिकांश आधुनिक इतिहासकार इसे पूरी तरह सही नहीं मानते और प्रशासनिक व आर्थिक कमजोरियों को ही पतन का मुख्य आधार ठहराते हैं।
अशोक की अत्यधिक शांतिप्रिय और अहिंसक नीतियों के कारण मौर्य सेना का युद्ध कौशल और सैन्य सतर्कता भी समय के साथ धीरे-धीरे कम हो गई थी।
सैन्य रूप से कमजोर होने के कारण भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमाओं की सुरक्षा उपेक्षित हो गई, जिसका फायदा विदेशी ताकतों ने उठाया।
इस सुरक्षा चूक के कारण उत्तर-पश्चिम दिशा से ‘बैक्ट्रियन ग्रीक’ (यवन) के आक्रमण शुरू हो गए, जिसने मौर्य साम्राज्य को झकझोर कर रख दिया।
कलिंग और सातवाहन जैसे दूरस्थ राज्यों ने भी केंद्रीय कमजोरी का लाभ उठाकर स्वयं को मौर्य सत्ता के नियंत्रण से पूरी तरह मुक्त कर लिया।
अंततः, 185 ईसा पूर्व में अंतिम मौर्य सम्राट ‘वृहद्रथ’ की हत्या उन्हीं के ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने एक सैन्य निरीक्षण के दौरान कर दी।
वृहद्रथ की मृत्यु के साथ ही महान मौर्य राजवंश का हमेशा के लिए अंत हो गया और मगध की गद्दी पर ‘शुंग राजवंश’ की स्थापना हुई।