मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद मगध की गद्दी पर जिस नए राजवंश का उदय हुआ, उसे इतिहास में ‘शुंग राजवंश’ कहा जाता है।
इस राजवंश की स्थापना 185 ईसा पूर्व में मौर्य सेना के प्रधान सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने अंतिम मौर्य सम्राट वृहद्रथ की हत्या करके की थी।
शुंग राजवंश के उदय को भारतीय इतिहास में ‘ब्राह्मण साम्राज्य’ के उदय या वैदिक संस्कृति के पुनरुत्थान के रूप में देखा जाता है।
पुष्यमित्र शुंग एक कट्टर रूढ़िवादी ब्राह्मण थे, जिन्होंने मौर्य काल के बाद फिर से वैदिक यज्ञों और कर्मकांडों को जीवित किया।
शुंग साम्राज्य की मुख्य राजधानी मगध की पुरानी राजधानी ‘पाटलिपुत्र’ थी, जबकि ‘विदिशा’ (मध्य प्रदेश) को इसकी उप-राजधानी बनाया गया था।
पुष्यमित्र शुंग के शासनकाल की सबसे बड़ी चुनौती उत्तर-पश्चिम सीमा से होने वाले यवन (बैक्टीरियन ग्रीक) आक्रमण थे।
प्रसिद्ध व्याकरण विद्वान पतंजलि के लेखों के अनुसार, पुष्यमित्र ने इन यवन आक्रमणकारियों को युद्ध में सफलतापूर्वक पराजित किया था।
अपनी इन महान सैन्य विजयों और साम्राज्य की स्थिरता के उपलक्ष्य में पुष्यमित्र शुंग ने दो बार ‘अश्वमेध यज्ञ’ का सफल आयोजन किया।
पुष्यमित्र शुंग द्वारा किए गए इन दोनों अश्वमेध यज्ञों के मुख्य पुरोहित महान संस्कृत विद्वान ‘महर्षि पतंजलि’ स्वयं थे।
कुछ प्राचीन बौद्ध ग्रंथ पुष्यमित्र को बौद्ध धर्म का उत्पीड़क बताते हैं, जिसने स्तूपों और मठों को नुकसान पहुँचाया था।
हालांकि, पुरातात्विक साक्ष्य यह दर्शाते हैं कि शुंग काल में ही प्रसिद्ध ‘भरहुत स्तूप’ की विशाल पाषाण वेदिका (रैलिंग) का निर्माण कराया गया था।
इसी काल में सांची के महास्तूप के चारों ओर की लकड़ी की चारदीवारी को हटाकर उसे पत्थर के सुंदर ऊंचे घेरे से बदला गया था।
पुष्यमित्र शुंग की मृत्यु के बाद उनका योग्य पुत्र ‘अग्निमित्र’ शुंग वंश का अगला प्रतापी राजा बना।
महान कवि कालिदास के प्रसिद्ध संस्कृत नाटक ‘मालविकाग्निमित्रम्’ के मुख्य नायक यही शुंग राजा अग्निमित्र हैं।
शुंग वंश के नौवें राजा भागभद्र (भागवत) के शासनकाल में विदिशा में ‘हेलियोडोरस का गरुड़ स्तंभ’ स्थापित किया गया था।
तक्षशिला के यवन राजा अंतलिखितस के राजदूत हेलियोडोरस ने भागवत धर्म अपनाकर विदिशा में भगवान विष्णु को समर्पित यह स्तंभ बनवाया था।
कला और साहित्य की दृष्टि से शुंग काल में संस्कृत भाषा को पुनः राजकीय सम्मान मिला और हिंदू धर्म के कई प्रमुख ग्रंथों को नया रूप दिया गया।
इस काल की कला शैली की मुख्य विशेषता लोक जीवन का सजीव चित्रण और पत्थरों पर की गई बारीक नक्काशी (Relief carvings) है।
शुंग राजवंश ने लगभग 112 वर्षों (185 ईसा पूर्व से 73 ईसा पूर्व) तक शासन किया, लेकिन इसके अंतिम शासक बेहद कमजोर सिद्ध हुए।
अंततः 73 ईसा पूर्व में शुंग वंश के अंतिम राजा ‘देवभूति’ की हत्या उन्हीं के मंत्री वासुदेव ने कर दी और ‘कण्व राजवंश’ की स्थापना की।
कण्व वंश
शुंग वंश के पतन के बाद मगध साम्राज्य की गद्दी पर जिस नए राजवंश का शासन स्थापित हुआ, उसे इतिहास में ‘कण्व राजवंश’ कहा जाता है।
इस राजवंश की स्थापना 73 ईसा पूर्व में ‘वासुदेव कण्व’ द्वारा की गई थी, जिन्होंने लगभग 45 वर्षों तक यानी 28 ईसा पूर्व तक शासन किया।
वासुदेव कण्व मूल रूप से शुंग वंश के अंतिम और विलासी सम्राट ‘देवभूति’ के एक विश्वसनीय ब्राह्मण अमात्य (मंत्री) थे।
साम्राज्य में फैली राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाकर वासुदेव ने एक षड्यंत्र के तहत देवभूति की हत्या कर दी और मगध के सिंहासन पर अधिकार कर लिया।
अपने पूर्ववर्तियों (शुंग शासकों) की तरह कण्व राजवंश के शासक भी मूल रूप से ब्राह्मण थे और उनका गोत्र ‘कण्व’ था।
पुराणों और ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार इस लघु राजवंश में कुल चार राजाओं ने मगध साम्राज्य की कमान संभाली थी।
इस वंश के पहले राजा और संस्थापक वासुदेव कण्व थे, जिन्होंने लगभग 9 वर्षों (73-64 ईसा पूर्व) तक शासन किया।
वासुदेव की मृत्यु के बाद उनके पुत्र ‘भूमिमित्र’ अगले शासक बने, जिन्होंने 14 वर्षों (64-50 ईसा पूर्व) तक सफलतापूर्वक राज किया।
भूमिमित्र के शासनकाल के तांबे के सिक्के आधुनिक पांचाल, विदिशा और कौशाम्बी क्षेत्रों से बड़ी मात्रा में प्राप्त हुए हैं।
भूमिमित्र के बाद उनके पुत्र ‘नारायण’ ने सत्ता संभाली और उन्होंने लगभग 12 वर्षों (50-38 ईसा पूर्व) तक शासन की बागडोर अपने हाथों में रखी।
इस राजवंश के चौथे और अंतिम सम्राट नारायण के पुत्र ‘सुशर्मा’ (या सुशर्मन) थे, जिन्होंने 10 वर्षों (38-28 ईसा पूर्व) तक शासन किया।
कण्व शासकों के समय मगध साम्राज्य का भौगोलिक आकार पहले के मौर्य या प्रारंभिक शुंग काल की तुलना में काफी छोटा हो गया था।
इस काल में मगध के शासकों की मुख्य राजधानी ‘पाटलिपुत्र’ थी, जबकि मध्य भारत का ‘विदिशा’ शहर उनका दूसरा बड़ा प्रशासनिक केंद्र था।
ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार कण्व राजाओं ने अपनी विस्तारवादी सैन्य नीतियों के बजाय मुख्य रूप से रक्षात्मक राजनीतिक रणनीति अपनाई।
इस दौर में राजाओं ने किसी नए राज्य को जीतने के बजाय साम्राज्य की आंतरिक स्थिरता और प्रशासनिक निरंतरता बनाए रखने पर अधिक ध्यान दिया।
धार्मिक दृष्टि से यह राजवंश वैदिक हिंदू परंपराओं का समर्थक था, लेकिन इसके शासनकाल में बौद्ध और जैन धर्म को भी बिना किसी दमन के फलने-फूलने का अवसर मिला।
कण्व शासकों को कला, साहित्य और विद्वानों का संरक्षक माना जाता है, और उनके काल में संस्कृत भाषा को विशेष महत्व मिलना जारी रहा।
इस काल में समाज पारंपरिक वर्ण व्यवस्था पर आधारित था तथा उपजाऊ गंगा के मैदानों में होने वाली कृषि ही अर्थव्यवस्था की मुख्य रीढ़ थी।
28 ईसा पूर्व के आसपास दक्षिण के शक्तिशाली ‘सातवाहन राजवंश’ (आंध्र वंश) के राजा सिमुक (या उनके उत्तराधिकारी) ने अंतिम कण्व राजा सुशर्मा को युद्ध में पराजित कर मार डाला।
सुशर्मा की इस मृत्यु के साथ ही मगध से कण्व राजवंश का अंत हो गया और पाटलिपुत्र तथा मध्य भारत के क्षेत्रों पर सातवाहनों और स्थानीय मित्र राजवंशों का नियंत्रण स्थापित हो गया।