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मौर्य और उत्तर-मौर्य काल

मौर्य साम्राज्य का परिचय

  • मौर्य साम्राज्य की स्थापना 322 ईसा पूर्व में चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा की गई थी, जो भारतीय इतिहास का पहला महान और अखिल भारतीय साम्राज्य था।
  • इस साम्राज्य ने मगध के क्रूर और अत्याचारी नंद वंश के अंतिम शासक घनानंद को पराजित कर सत्ता अपने हाथों में ली थी।
  • मौर्य साम्राज्य की स्थापना और सफलता के पीछे चंद्रगुप्त मौर्य के कुशल राजनीतिक गुरु और प्रधानमंत्री ‘चाणक्य’ (कौटिल्य) का सबसे बड़ा योगदान था।
  • चाणक्य द्वारा रचित प्रसिद्ध ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र’ से मौर्य काल की राजनीतिक, प्रशासनिक और आर्थिक व्यवस्था की व्यापक जानकारी मिलती है।
  • मौर्य इतिहास को जानने का दूसरा प्रमुख साहित्यिक स्रोत यूनानी राजदूत मेगस्थनीज की पुस्तक ‘इंडिका’ है, जिसने तत्कालीन समाज का सजीव वर्णन किया।
  • इसके अतिरिक्त विशाखदत्त का नाटक ‘मुद्राराक्षस’ और सम्राट अशोक के शिलालेख भी मौर्य वंश के प्रामाणिक और महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत हैं।
  • चंद्रगुप्त मौर्य ने यूनानी गवर्नर सेल्यूकस निकेटर को पराजित कर उत्तर-पश्चिम में अफगानिस्तान और बलूचिस्तान तक अपनी सीमा का विस्तार किया था।
  • अपने जीवन के अंतिम दिनों में चंद्रगुप्त मौर्य ने जैन धर्म अपना लिया और भद्रबाहु के साथ श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) जाकर संलेखना पद्धति से प्राण त्यागे।
  • चंद्रगुप्त के बाद उनका पुत्र बिंदुसार राजा बना, जिसे यूनानी लेखकों द्वारा ‘अमित्रघात’ (शत्रुओं का नाश करने वाला) कहा गया है।
  • बिंदुसार ने मौर्य साम्राज्य की सीमाओं को सुरक्षित रखा और सीरिया तथा मिस्र जैसे विदेशी राज्यों के साथ मजबूत राजनयिक संबंध बनाए रखे।
  • बिंदुसार के बाद 269 ईसा पूर्व में उनके महान पुत्र ‘अशोक’ मौर्य साम्राज्य के सिंहासन पर बैठे, जो इतिहास के सबसे प्रतापी राजा सिद्ध हुए।
  • सम्राट अशोक के शासनकाल की सबसे युगांतकारी घटना 261 ईसा पूर्व में लड़ा गया भीषण ‘कलिंग युद्ध’ (वर्तमान ओडिशा) था।
  • इस युद्ध में हुए भयानक नरसंहार और मानवीय पीड़ा को देखकर अशोक का हृदय पूरी तरह से परिवर्तित हो गया और उन्होंने सदा के लिए युद्ध का त्याग कर दिया।
  • युद्ध नीति (भेरीघोष) को त्याग कर अशोक ने सांस्कृतिक विजय और नैतिक आचरण की नीति यानी ‘धम्म विजय’ (धम्मघोष) को अपनाया।
  • अशोक ने अपनी प्रजा के नैतिक उत्थान के लिए लोकभाषाओं और ब्राह्मी लिपि में पत्थरों तथा स्तंभों पर अपने प्रसिद्ध शिलालेख खुदवाए।
  • मौर्य साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था अत्यधिक केंद्रीकृत थी, जिसमें राजा सर्वोच्च सत्ताधिकारी होता था और उसकी सहायता के लिए ‘मंत्रिपरिषद’ होती थी।
  • साम्राज्य की राजधानी ‘पाटलिपुत्र’ थी, और पूरे साम्राज्य को प्रशासनिक सुगमता के लिए पाँच प्रमुख प्रांतों (चक्रों) में विभाजित किया गया था।
  • इस काल में व्यापार, कृषि और लोक कल्याणकारी कार्यों को बढ़ावा देने के लिए एक बहुत ही सुव्यवस्थित टैक्स (कर) प्रणाली और कुशल गुप्तचर विभाग सक्रिय था।
  • वास्तुकला के क्षेत्र में मौर्य काल अपने एकाश्मक पत्थर के स्तंभों, सांची के स्तूपों और पत्थरों को तराश कर बनाई गई गुफाओं के लिए प्रसिद्ध है।
  • लगभग 137 वर्षों के गौरवशाली शासन के बाद, 185 ईसा पूर्व में अंतिम मौर्य शासक वृहद्रथ की हत्या उनके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने कर दी, जिससे इस महान साम्राज्य का अंत हुआ।

चंद्रगुप्त मौर्य और कौटिल्य का अर्थशास्त्र

  • चंद्रगुप्त मौर्य प्राचीन भारत के एक महान सम्राट थे, जिन्होंने मौर्य राजवंश की स्थापना कर भारत को पहली बार एक राजनीतिक सूत्र में बांधा।
  • उनके इस महान साम्राज्य के निर्माण और सफलता में उनके गुरु, मार्गदर्शक और चतुर प्रधानमंत्री कौटिल्य (चाणक्य) का सबसे बड़ा योगदान था।
  • कौटिल्य तक्षशिला विश्वविद्यालय के एक प्रख्यात विद्वान और आचार्य थे, जिन्हें विष्णुगुप्त के नाम से भी जाना जाता है।
  • मगध के नंद वंश के अंतिम राजा घनानंद द्वारा किए गए अपमान का बदला लेने के लिए कौटिल्य ने चंद्रगुप्त मौर्य को तैयार किया था।
  • चाणक्य की राजनीतिक रणनीतियों और चंद्रगुप्त के सैन्य कौशल ने मिलकर 322 ईसा पूर्व में नंद वंश को समूल नष्ट कर दिया।
  • मगध की सत्ता संभालने के बाद, चंद्रगुप्त ने विदेशी यूनानी गवर्नर सेल्यूकस निकेटर को युद्ध में पराजित कर अपनी सैन्य शक्ति का लोहा मनवाया।
  • इस ऐतिहासिक संधि के बाद चंद्रगुप्त का साम्राज्य उत्तर-पश्चिम में हिंदूकुश पर्वतों से लेकर आधुनिक अफगानिस्तान और बलूचिस्तान तक फैल गया।
  • मौर्य काल के संपूर्ण शासन, राजनीति और प्रशासनिक सिद्धांतों को समझने का सबसे प्रामाणिक स्रोत कौटिल्य द्वारा रचित ‘अर्थशास्त्र’ ग्रंथ है।
  • अर्थशास्त्र संस्कृत भाषा में लिखा गया एक अद्वितीय ग्रंथ है, जो केवल अर्थ (धन) पर नहीं बल्कि मुख्य रूप से राजनीति और लोक प्रशासन पर आधारित है।
  • यह ग्रंथ कुल 15 अधिकरणों (भागों), 150 अध्यायों और लगभग 6000 श्लोकों या सूत्रों में सुव्यवस्थित रूप से विभाजित है।
  • कौटिल्य ने राज्य के सुचारू संचालन के लिए ‘सप्तांग सिद्धांत’ दिया, जिसमें राज्य के सात अंग—स्वामी (राजा), अमात्य (मंत्री), जनपद (क्षेत्र व जनता), दुर्ग (किला), कोष (खजाना), दंड (सेना) और मित्र शामिल हैं।
  • अर्थशास्त्र में राजा को एक ‘विजीगीषु’ यानी निरंतर विजय की इच्छा रखने वाला और प्रजा के कल्याण के लिए समर्पित रहने वाला बताया गया है।
  • ग्रंथ के अनुसार, प्रजा के सुख में ही राजा का सुख निहित होता है और प्रजा के कल्याण में ही उसका वास्तविक कल्याण होता है।
  • कौटिल्य ने साम्राज्य की आंतरिक सुरक्षा और दुश्मनों की योजनाओं को विफल करने के लिए एक बेहद जटिल और कुशल गुप्तचर व्यवस्था (Spies) का खाका खींचा।
  • विदेशी नीति और कूटनीति के सफल संचालन के लिए इस ग्रंथ में ‘मंडल सिद्धांत’ और ‘षाड्गुण्य नीति’ (छह नीतियां) का विस्तार से वर्णन है।
  • शासन को पारदर्शी और मजबूत बनाने के लिए अर्थशास्त्र में भ्रष्टाचार को रोकने के कड़े नियम और विभिन्न प्रकार के करों (Taxes) का संकलन है।
  • इस पुस्तक में न्याय व्यवस्था, नागरिक अधिकार, सैन्य संगठन और यहाँ तक कि कृषि तथा व्यापारिक नियमों को भी कानून के दायरे में रखा गया है।
  • चंद्रगुप्त मौर्य ने कौटिल्य के इन्हीं सिद्धांतों को व्यावहारिक रूप देकर एक बेहद मजबूत, केंद्रीकृत और लोक कल्याणकारी प्रशासनिक ढांचा खड़ा किया।
  • अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में, सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य ने जैन धर्म की दीक्षा ली और कर्नाटक के श्रवणबेलगोला में जाकर उपवास (संलेखना) द्वारा प्राण त्यागे।
  • संक्षेप में, चंद्रगुप्त की तलवार और कौटिल्य की कलम के इसी बेजोड़ संगम ने प्राचीन भारत को एक शक्तिशाली और समृद्ध स्वर्ण युग प्रदान किया।

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