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सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930–1934), भारत छोड़ो आंदोलन (1942)

सविनय अवज्ञा आंदोलन, जिसे ‘नमक सत्याग्रह’ के नाम से भी जाना जाता है, महात्मा गांधी द्वारा 6 अप्रैल 1930 को प्रसिद्ध दांडी यात्रा के बाद शुरू किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश नमक कानून का विरोध करना और भारत के लिए पूर्ण स्वराज (पूर्ण स्वतंत्रता) की मांग करना था।

  1. मुख्य कारण (Causes)

  • भारतीय मांगों की अनदेखी: ब्रिटिश सरकार ने नेहरू रिपोर्ट और गांधीजी की 11-सूत्रीय मांगों को सिरे से खारिज कर दिया, जिससे भारतीयों के पास आंदोलन के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा।
  • अन्यायपूर्ण नमक कानून: नमक जैसी बुनियादी और जीवन-रक्षक वस्तु पर अंग्रेजों ने भारी कर लगा दिया था और इसके उत्पादन पर अपना एकाधिकार स्थापित कर लिया था, जिससे गरीब जनता पर आर्थिक बोझ पड़ा।

  1. मुख्य नेता (Main Leaders)

  • महात्मा गांधी: आंदोलन के मुख्य सूत्रधार, जिन्होंने साबरमती आश्रम से दांडी तक 240 मील की ऐतिहासिक यात्रा का नेतृत्व किया और नमक कानून तोड़ा।
  • जवाहरलाल नेहरू: युवा वर्ग को संगठित किया और लाहौर अधिवेशन (1929) में ‘पूर्ण स्वराज’ के लक्ष्य को देश के सामने रखा।
  • सी. राजगोपालाचारी: तमिलनाडु में वेदारण्यम नमक यात्रा का सफल नेतृत्व किया और दक्षिण भारत में आंदोलन की मशाल जलाई।
  • सरोजिनी नायडू: धरासणा नमक कारखाने पर हुए ऐतिहासिक अहिंसक विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किया, जिसमें महिलाओं की अभूतपूर्व भागीदारी रही।
  1. आंदोलन का स्वरूप (Nature of the Movement)

  • कानूनों का उल्लंघन: केवल ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार ही नहीं किया गया, बल्कि अन्यायपूर्ण कानूनों (जैसे नमक कानून, वन कानून) को सविनय (विनम्रतापूर्वक) तोड़ा गया।
  • महिलाओं की व्यापक भागीदारी: पहली बार बड़ी संख्या में महिलाओं ने सार्वजनिक रूप से शराब और विदेशी कपड़ों की दुकानों पर धरना दिया।
  1. परिणाम एवं प्रभाव (Outcome & Impact)

  • समुद्री जल से नमक बनाना: गांधीजी द्वारा दांडी में नमक बनाने के बाद देश भर के तटीय क्षेत्रों में लोगों ने स्वयं नमक बनाकर कानून तोड़ा।
  • अहिंसक विरोध और दमन: जनता ने पुलिस की लाठियों और अत्याचारों का सामना अत्यंत धैर्य व अहिंसा के साथ किया, जिससे ब्रिटिश शासन की क्रूरता दुनिया के सामने उजागर हुई।
  • नेताओं और जनता की गिरफ्तारियां: गांधीजी, नेहरूजी सहित 90,000 से अधिक आंदोलनकारियों को जेल में डाल दिया गया।
  • गांधी-इरविन समझौता (1931): आंदोलन के दबाव में आकर ब्रिटिश सरकार को वार्ता के लिए मजबूर होना पड़ा, जिसके परिणामस्वरूप गांधी-इरविन समझौता हुआ और गोलमेज सम्मेलन का मार्ग प्रशस्त हुआ।

दांडी यात्रा और गांधी-इरविन समझौता

सविनय अवज्ञा आंदोलन के दो सबसे महत्वपूर्ण पहलू दांडी मार्च का ऐतिहासिक मार्ग और उसके बाद हुआ राजनीतिक समझौता थे:

दांडी यात्रा का विवरण (12 मार्च – 6 अप्रैल 1930):

  • यात्रा की शुरुआत: गांधीजी ने अपने 78 चुने हुए अनुयायियों के साथ अहमदाबाद के साबरमती आश्रम से दांडी के तटीय गांव के लिए पैदल यात्रा शुरू की।
  • मार्ग और दूरी: यह यात्रा लगभग 240 मील (385 किमी) लंबी थी, जिसे 24 दिनों में पूरा किया गया। रास्ते में गांधीजी ने जहां भी विश्राम किया, वहां हजारों की संख्या में लोग उन्हें सुनने और सत्याग्रह से जुड़ने पहुंचे।
  • कानून का उल्लंघन: 6 अप्रैल 1930 की सुबह गांधीजी ने दांडी के तट पर मुट्ठी भर नमक उठाकर ब्रिटिश साम्राज्य के नमक कानून को औपचारिक रूप से तोड़ दिया।

गांधी-इरविन समझौता (5 मार्च 1931)

आंदोलन के व्यापक प्रभाव और देशव्यापी दबाव के कारण ब्रिटिश सरकार को समझ आ गया कि वे भारतीयों की उपेक्षा करके शासन नहीं चला सकते। तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन ने गांधीजी को वार्ता के लिए आमंत्रित किया:

मुख्य शर्तें और समझौते:

  • आंदोलन का स्थगन: गांधीजी सविनय अवज्ञा आंदोलन को अस्थायी रूप से स्थगित करने पर सहमत हुए।
  • कैदियों की रिहाई: ब्रिटिश सरकार हिंसा में शामिल न होने वाले सभी राजनीतिक बंदियों को तुरंत रिहा करने पर राजी हुई।
  • नमक बनाने का अधिकार: तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को अपने व्यक्तिगत उपयोग के लिए बिना किसी कर के नमक बनाने की अनुमति दी गई।
  • द्वितीय गोलमेज सम्मेलन: गांधीजी लंदन में आयोजित होने वाले ‘द्वितीय गोलमेज सम्मेलन’ (Second Round Table Conference) में कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में भाग लेने के लिए तैयार हुए।

समझौते का प्रभाव:

  • इस समझौते ने पहली बार ब्रिटिश हुकूमत और भारतीय नेतृत्व (कांग्रेस) को बराबरी के स्तर पर लाकर खड़ा कर दिया।
  • हालांकि, सम्मेलन में पूर्ण स्वराज पर कोई सहमति न बनने के कारण गांधीजी खाली हाथ लौटे और 1932 में आंदोलन को पुनः शुरू किया गया, जो 1934 में जाकर पूरी तरह समाप्त हुआ।

भारत छोड़ो आंदोलन (1942)

भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement), जिसे ‘अगस्त क्रांति’ के नाम से भी जाना जाता है, महात्मा गांधी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा अगस्त 1942 में शुरू किया गया था। इसका स्पष्ट संदेश था—अंग्रेज तुरंत भारत छोड़कर जाएं। गांधीजी ने इस आंदोलन के दौरान देश को करो या मरो” (Do or Die) का ऐतिहासिक नारा दिया।

  1. मुख्य कारण (Causes)

  • स्वतंत्रता का लंबा इंतजार और क्रिप्स मिशन की विफलता: भारतीय लंबे समय से स्वराज की मांग कर रहे थे। 1942 में आए क्रिप्स मिशन ने भारत को पूर्ण स्वतंत्रता देने के बजाय केवल ‘डोमिनियन स्टेटस’ का प्रस्ताव दिया, जिसे सभी राजनीतिक दलों ने खारिज कर दिया।
  • द्वितीय विश्व युद्ध की परिस्थितियां: द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों ने भारतीयों की सहमति के बिना भारत को युद्ध में झोंक दिया था। युद्ध के कारण देश में आर्थिक संकट, आवश्यक वस्तुओं की किल्लत और महंगाई चरम पर पहुंच गई थी।
  • जापान के आक्रमण का खतरा: द्वितीय विश्व युद्ध में जापान दक्षिण-पूर्व एशिया में तेजी से आगे बढ़ रहा था। गांधीजी का मानना था कि भारत में ब्रिटिश उपस्थिति के कारण ही देश पर जापानी आक्रमण का खतरा मंडरा रहा है।

  1. मुख्य नेता (Main Leaders)

  • महात्मा गांधी: आंदोलन के मुख्य प्रेरणास्रोत, जिन्होंने बॉम्बे के ‘ग्वालिया टैंक मैदान’ से आंदोलन का शंखनाद किया।
  • जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल: कांग्रेस के शीर्ष रणनीतिकार, जिन्होंने गांधीजी के आह्वान को पूरे देश में जन-जन तक पहुंचाया।
  • अग्रभूमि के अन्य नेता: अरुणा आसफ अली (जिन्होंने पुलिस की सतर्कता के बावजूद बॉम्बे में तिरंगा फहराया), जयप्रकाश नारायण, डॉ. राममनोहर लोहिया और उषा मेहता (जिन्होंने भूमिगत रेडियो स्टेशन संचालित किया)।
  1. परिणाम एवं प्रभाव (Outcome & Impact)

  • शीर्ष नेताओं की तत्काल गिरफ्तारी: 9 अगस्त 1942 की सुबह ब्रिटिश सरकार ने ‘ऑपरेशन जीरो आवर’ चलाकर गांधीजी, नेहरू, पटेल सहित कांग्रेस के लगभग सभी बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया।
  • देशव्यापी जन-आंदोलन: नेतृत्वहीन होने के बावजूद आम जनता स्वतःस्फूर्त रूप से सड़कों पर उतर आई। रेल पटरियों को उखाड़ा गया, सरकारी इमारतों पर तिरंगा फहराया गया और कई स्थानों (जैसे बलिया, तामलुक) में समानांतर सरकारें स्थापित की गईं।
  • ब्रिटिश हुकूमत पर अभूतपूर्व दबाव: यद्यपि अंग्रेजों ने क्रूरता और दमनकारी नीतियों से आंदोलन को दबा दिया, लेकिन इस क्रांति ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत पर अब लंबे समय तक शासन करना असंभव है। इसने 1947 में भारत की अंतिम स्वतंत्रता की नींव रखी।

समानांतर सरकारें और भूमिगत रेडियो (Parallel Governments & Underground Radio)

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि शीर्ष नेताओं की गिरफ्तारी के बावजूद यह आंदोलन रुका नहीं। आम जनता और युवा नेताओं ने आंदोलन को जारी रखने के लिए नए और अनोखे तरीके अपनाए:

  • समानांतर सरकारों की स्थापना (Parallel Governments):

ब्रिटिश प्रशासन के पूरी तरह ठप्प पड़ जाने का लाभ उठाकर देश के कई हिस्सों में स्थानीय लोगों ने अपनी स्वायत्त सरकारें स्थापित कर लीं:

  • बलिया (उत्तर प्रदेश): चित्तू पांडे के नेतृत्व में भारत की पहली समानांतर सरकार बनी। उन्होंने स्थानीय प्रशासन को अपने हाथ में लिया और जेल में बंद सभी क्रांतिकारियों को रिहा करवा लिया।
  • तामलुक (बंगाल): यहाँ ‘ताम्रलिप्त जातीय सरकार’ का गठन हुआ, जिसने अपनी सशस्त्र विद्युत वाहिनी बनाई और चक्रवात राहत कार्यों के साथ-साथ पुलिस थानों को नियंत्रित किया।
  • सतारा (महाराष्ट्र): ‘प्रति सरकार’ नाम से जानी जाने वाली यह सरकार सबसे लंबे समय (1942 से 1946) तक चली। वाई. बी. चव्हाण और नाना पाटिल जैसे नेताओं ने यहाँ अपनी अदालतें, जन-संसद और कर-संग्रह प्रणाली स्थापित की।

भूमिगत रेडियो और प्रचार अभियान (Underground Congress Radio)

ब्रिटिश सरकार ने प्रेस पर कड़ा प्रतिबंध लगा दिया था और आंदोलन से जुड़ी सभी खबरों को सेंसर किया जा रहा था। इस दौर में ‘कांग्रेस रेडियो’ ने जन-जागरूकता फैलाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई:

  • उषा मेहता का योगदान: 22 वर्षीय छात्रा उषा मेहता और उनके सहयोगियों (बाबूभाई खाकर, विट्ठलदास कांत) ने बॉम्बे में गुप्त रूप से एक ट्रांसमीटर स्थापित किया और 27 अगस्त 1942 से प्रसारण शुरू किया।
  • सूचना प्रसार: यह रेडियो 34 मीटर की फ्रीक्वेंसी पर प्रसारित होता था। इसके माध्यम से गांधीजी के संदेश, पुलिस दमन की सच्ची खबरें और देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों की जानकारी आम जनता तक पहुँचाई जाती थी।
  • नेताओं का संबोधन: डॉ. राममनोहर लोहिया जैसे दिग्गज नेता भूमिगत होकर इस रेडियो के ज़रिए देशवासियों को संबोधित करते थे और उनका मनोबल बढ़ाते थे।
  • स्थान परिवर्तन: पुलिस की पकड़ से बचने के लिए रेडियो ट्रांसमीटर को लगातार एक गुप्त स्थान से दूसरे स्थान (जैसे अलग-अलग फ्लैटों) में स्थानांतरित किया जाता था, जब तक कि नवंबर 1942 में पुलिस ने इसे खोज नहीं निकाला।

आंदोलन का अंतिम प्रभाव

इन भूमिगत गतिविधियों और समानांतर सरकारों ने साबित कर दिया कि भारतीय जनता अब ब्रिटिश हुकूमत के आदेशों को मानने के लिए तैयार नहीं थी। यद्यपि 1943 तक आते-आते अंग्रेजों ने आंदोलन को बलपूर्वक दबा दिया, लेकिन इसने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत में अंग्रेजों के दिन अब गिने-चुने ही बचे हैं।

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