महात्मा गांधी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने ब्रिटिश शासन के विरोध में 1920 में असहयोग आंदोलन की शुरुआत की थी। इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य अहिंसक तरीकों से ब्रिटिश सरकार का बहिष्कार करना और स्वदेशी को बढ़ावा देना था।
मुख्य कारण (Causes)
- जलियांवाला बाग हत्याकांड (1919): अमृतसर में निर्दोष और निहत्थे लोगों पर ब्रिटिश सेना द्वारा की गई अंधाधुंध गोलीबारी ने पूरे देश में आक्रोश पैदा कर दिया।
- अन्यायपूर्ण कानून (रोलेट एक्ट): इस कानून के तहत ब्रिटिश सरकार को बिना मुकदमा चलाए किसी भी व्यक्ति को जेल में डालने का अधिकार मिल गया था, जिससे लोगों में गहरा असंतोष था।
- प्रथम विश्व युद्ध के बाद गरीबी और महंगाई: युद्ध के कारण भारत की अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई। करों में वृद्धि, भुखमरी और बढ़ती महंगाई से सामान्य जनता अत्यंत त्रस्त थी।
मुख्य नेता (Main Leaders)
- महात्मा गांधी: आंदोलन के मुख्य सूत्रधार और वैचारिक मार्गदर्शक, जिन्होंने सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलकर ब्रिटिश शासन का विरोध करने का आह्वान किया।
- सरदार वल्लभभाई पटेल: गुजरात और अन्य क्षेत्रों में किसानों तथा आम जनता को एकजुट कर आंदोलन को मजबूत आधार प्रदान किया।
- डॉ. राजेंद्र प्रसाद: बिहार में आंदोलन का नेतृत्व करते हुए वकालत छोड़ी और विद्यार्थियों व युवाओं को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा।
- अन्य प्रमुख नेता: चित्तरंजन दास, मोतीलाल नेहरू और जवाहरलाल नेहरू जैसे नेताओं ने भी इस आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई।
आंदोलन का स्वरूप (Nature of the Movement)
- सरकारी संस्थानों का बहिष्कार: भारतीयों ने ब्रिटिश स्कूलों, कॉलेजों, अदालतों और सरकारी नौकरियों का त्याग किया।
- विदेशी वस्तुओं का त्याग: विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई और स्वदेशी वस्तुओं, विशेषकर खादी और चरखे को अपनाया गया।
परिणाम एवं प्रभाव (Outcome & Impact)
- ब्रिटिश संस्थाओं से दूरी: छात्रों ने सरकारी स्कूल-कॉलेज छोड़े, वकीलों ने अदालतों का बहिष्कार किया और कर्मचारियों ने सरकारी दफ्तरों से दूरी बनाई।
- जन-एकता का निर्माण: इस आंदोलन ने पहली बार समाज के सभी वर्गों—किसानों, मजदूरों, छात्रों, महिलाओं और व्यापारियों—को एक साथ लाकर देशव्यापी जन-आंदोलन का रूप दिया।
- राष्ट्रीय चेतना का विकास: इसने भारतीयों के मन से ब्रिटिश शासन का डर समाप्त किया और स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा दी।
चौरी-चौरा कांड और आंदोलन की समाप्ति (End of the Movement)
असहयोग आंदोलन अपने चरम पर था और पूरे देश में अभूतपूर्व जन-उत्साह देखने को मिल रहा था। हालांकि, फ़रवरी 1922 में घटी एक हिंसक घटना ने इस पूरे आंदोलन का रुख बदल दिया:
- चौरी-चौरा की घटना (5 फ़रवरी 1922): उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा नामक स्थान पर प्रदर्शनकारियों की एक भीड़ पर पुलिस ने गोलीबारी कर दी। इससे आक्रोशित होकर भीड़ ने पुलिस थाने को घेरकर आग लगा दी, जिसमें 22 पुलिसकर्मी मारे गए।
- गांधीजी द्वारा आंदोलन वापस लेना: महात्मा गांधी अहिंसा के सिद्धांत के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध थे। चौरी-चौरा की हिंसक घटना से वे अत्यधिक दुखी हुए। उनका मानना था कि देश की जनता अभी पूर्ण अहिंसक आंदोलन के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है। इसीलिए 12 फ़रवरी 1922 को उन्होंने असहयोग आंदोलन को अचानक समाप्त करने की घोषणा कर दी।
- नेताओं की प्रतिक्रिया: आंदोलन के अचानक वापस लिए जाने से कांग्रेस के कई शीर्ष नेता—जैसे जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस और चित्तरंजन दास—असमंजस और निराशा में पड़ गए, क्योंकि आंदोलन अपने लक्ष्य के बेहद करीब लग रहा था।
असहयोग आंदोलन का ऐतिहासिक महत्व (Historical Significance)
भले ही यह आंदोलन अपने मुख्य लक्ष्य (एक वर्ष में स्वराज) को तुरंत हासिल नहीं कर सका, लेकिन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में इसका महत्व अतुलनीय है:
- मास मूवमेंट (जन-आंदोलन) की शुरुआत: इससे पहले तक स्वतंत्रता संग्राम मुख्य रूप से बुद्धिजीवियों और शहरी मध्यम वर्ग तक सीमित था। असहयोग आंदोलन ने इसमें ग्रामीण किसानों, मजदूरों और आम जनता की व्यापक भागीदारी दर्ज की।
- आत्मनिर्भरता की भावना: स्वदेशी, चरखा और खादी के प्रयोग ने भारतीयों में स्वदेशी उत्पादों के प्रति गर्व और आर्थिक आत्मनिर्भरता का भाव जगाया।
- कांग्रेस का पुनर्गठन: इस आंदोलन ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को केवल याचिकाएं देने वाली संस्था के बजाय एक सक्रिय, क्रांतिकारी और जनाधार वाले संगठन में बदल दिया।
