विभाजन का निर्णय: वायसराय लॉर्ड कर्जन ने प्रशासनिक दक्षता का बहाना बनाकर बंगाल को दो हिस्सों—पूर्वी बंगाल और असम (मुस्लिम-बहुसंख्यक) तथा पश्चिमी बंगाल (हिंदू-बहुसंख्यक)—में बांटने की घोषणा की।
वास्तविक उद्देश्य: अंग्रेजों की इस नीति का मुख्य उद्देश्य “फूट डालो और राज करो” के जरिए भारतीय राष्ट्रीय एकता को कमजोर करना था।
आंदोलन के प्रमुख कारण:
बंगाल विभाजन का विरोध: अंग्रेजों के इस फैसले से भारतीयों में भारी आक्रोश पैदा हुआ और बंगाल विभाजन को तुरंत वापस लेने की मांग उठी।
आर्थिक आत्मनिर्भरता: ब्रिटिश आर्थिक शोषण का मुकाबला करने और भारतीय उत्पादों को बढ़ावा देकर विदेशी सामानों पर निर्भरता खत्म करने की जरूरत महसूस की गई।
मुख्य नेतृत्वकर्ता:
लाल-बाल-पाल की तिकड़ी: इस आंदोलन का नेतृत्व लाला लाजपत राय (पंजाब), बाल गंगाधर तिलक (महाराष्ट्र) और बिपिन चंद्र पाल (बंगाल) ने किया।
अन्य प्रमुख नेता:अरविंदो घोष और रवींद्रनाथ टैगोर ने भी इस आंदोलन को दिशा दी और इसे पूरे देश में फैलाने का काम किया।
मुख्य कार्य और परिणाम:
विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार: ब्रिटिश कपड़ों, चीनी और नमक का सार्वजनिक रूप से बहिष्कार किया गया और उनकी होली जलाई गई, जिससे ब्रिटिश व्यापार को भारी नुकसान पहुंचा।
स्वदेशी उद्योगों का उदय: भारतीय हथकरघा, कपड़ा मिलों, साबुन और माचिस कारखानों जैसे देशी उद्योगों को बढ़ावा मिला।
राष्ट्रीय शिक्षा की स्थापना: ब्रिटिश नियंत्रण वाले स्कूलों के बजाय भारतीय मूल्यों पर आधारित शिक्षण संस्थानों (जैसे बंगाल नेशनल कॉलेज) की स्थापना की गई।
सांस्कृतिक पुनर्जागरण: देशभक्ति के गीतों और साहित्य की रचना हुई; रवींद्रनाथ टैगोर ने ‘आमार शोनार बांला’ गीत लिखा, जो आज बांग्लादेश का राष्ट्रगान है।
आंदोलन का प्रभाव और महत्व:
बंगाल विभाजन का रद्द होना: जनता के जबरदस्त दबाव और विरोध के कारण अंग्रेजों को 1911 में बंगाल का विभाजन वापस लेना पड़ा।
भविष्य के आंदोलनों का आधार: बहिष्कार और स्वदेशी का यह तरीका आगे चलकर महात्मा गांधी के असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलनों की रीढ़ बना।
स्वदेशी आंदोलन के अन्य महत्वपूर्ण पहलू
सशक्त रणनीति और विरोध के नए तरीके:
राखी बंधन दिवस: रवींद्रनाथ टैगोर के आह्वान पर 16 अक्टूबर 1905 (विभाजन लागू होने का दिन) को रक्षाबंधन के रूप में मनाया गया। हिंदुओं और मुसलमानों ने एक-दूसरे की कलाई पर राखी बांधकर आपसी भाईचारे और अखंडता का संदेश दिया।
समितियों का गठन: जनता को संगठित करने के लिए विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों का गठन किया गया, जिनमें अश्विनी कुमार दत्त की ‘स्वदेश बांधव समिति’ सबसे प्रमुख थी।
महिलाओं और छात्रों की सक्रिय भागीदारी:
छात्रों की भूमिका: इस आंदोलन में छात्रों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। उन्होंने विदेशी सामान बेचने वाली दुकानों के बाहर धरने दिए और जुलूस निकाले।
महिलाओं का योगदान: पारंपरिक बंधनों को तोड़कर महिलाओं ने पहली बार सार्वजनिक आंदोलनों और विदेशी कपड़ों की होली जलाने में खुलकर हिस्सा लिया।
आंदोलन की सीमाएं:
कांग्रेस में विभाजन (1907): आंदोलन की भावी रणनीति को लेकर मतभेदों के कारण 1907 के सूरत अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस नरम दल और गरम दल में विभाजित हो गई, जिससे आंदोलन की गति धीमी पड़ गई।
सख्त ब्रिटिश दमन: अंग्रेजों ने लाठीचार्ज, गिरफ्तारी, समाचार पत्रों पर प्रतिबंध और तिलक जैसे प्रमुख नेताओं को जेल (मांडले जेल) भेजकर आंदोलन को दबाने का प्रयास किया।
ऐतिहासिक प्रभाव:
स्वदेशी आंदोलन ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को पहली बार केवल राजनीतिक मांगों से उठाकर आर्थिक स्वावलंबन और सांस्कृतिक गौरव के साथ जोड़ा।