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ताम्रपाषाण युग (Chalcolithic Age) की विशेषताएं और महत्व

ताम्रपाषाण युग का अर्थ:

ताम्रपाषाण युग पाषाण और धातु के संयोजन का काल है, जिसमें मानव ने पहली बार पत्थर के साथ तांबे के उपकरणों का उपयोग किया था।

काल-निर्धारण:

भारत में यह संस्कृति मुख्य रूप से लगभग 2000 ईसा पूर्व से 700 ईसा पूर्व के बीच फली-फूल, जो कि नवपाषाण और कांस्य युग की संक्रमणकालीन अवस्था है।

संस्कृति का क्षेत्रीय नामकरण:

इस काल की संस्कृतियों का नामकरण उनके मूल स्थलों के आधार पर किया गया, जैसे राजस्थान में बनास या आहार और मध्य प्रदेश में कायथा संस्कृति।

हड़प्पा सभ्यता से संबंध:

यह ताम्रपाषाण संस्कृति कई क्षेत्रों में हड़प्पा-पूर्व काल की रही, जबकि कुछ क्षेत्रों में यह हड़प्पा सभ्यता के समकालीन और पश्चात् काल में भी विद्यमान थी।

प्रमुख संस्कृतियों का विस्तार:

भारतीय उपमहाद्वीप में आहार (बनास), कायथा, मालवा और जोरवे जैसी प्रमुख क्षेत्रीय ताम्रपाषाण संस्कृतियां विकसित हुईं, जिनकी अपनी अनूठी जीवनशैली और विशेषताएं थीं।

आहार (बनास) संस्कृति:

यह राजस्थान की शुरुआती ताम्रपाषाण संस्कृतियों में से एक थी, जिसके अधिकांश स्थल बनास घाटी या मेवाड़ क्षेत्र में केंद्रित पाए गए हैं।

तांबे की आपूर्ति:

आहार संस्कृति के स्थल खनिज संसाधनों से समृद्ध थे और ऐसा माना जाता है कि ये हड़प्पा स्थलों को तांबे की आपूर्ति का प्रमुख केंद्र थे।

बालाथल का महत्व:

बालाथल आहार संस्कृति का सबसे अधिक अध्ययन किया जाने वाला स्थल है, जहां तीसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व से 1500 ईसा पूर्व तक के सांस्कृतिक अवशेष मिले हैं।

आवास और बस्तियां:

इस काल के लोग पत्थर, मिट्टी और कच्ची ईंटों से बने घरों में रहते थे, और कुछ स्थलों पर सुरक्षा के लिए बस्तियों की घेराबंदी भी की गई थी।

मिश्रित अर्थव्यवस्था:

ताम्रपाषाण समाज की अर्थव्यवस्था कृषि, पशुपालन, शिकार और संग्रहण का एक मिला-जुला रूप थी, जिसमें विभिन्न खाद्यान्नों का उत्पादन किया जाता था।

कृषि और खाद्यान्न:

इन संस्कृतियों के लोग चावल, गेहूं, जौ, बाजरा, ज्वार और विभिन्न प्रकार की दालों व तिलहनों की खेती करते थे, जो उनके आहार का मुख्य हिस्सा थे।

कायथा संस्कृति की पहचान:

मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले में चंबल की सहायक नदियों के पास स्थित कायथा संस्कृति अपने विशिष्ट मृदभांड और तांबे-पत्थर के उपकरणों के लिए प्रसिद्ध है।

मालवा संस्कृति का प्रभाव:

मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के क्षेत्रों में फैली मालवा संस्कृति अपने उत्कृष्ट मृदभांड, विशेष ब्लेड उद्योग और बहुमंजिला चौकोर-गोल घरों के लिए जानी जाती है।

जोरवे संस्कृति का विस्तार:

महाराष्ट्र में तापी, गोदावरी और भीमा घाटियों में फैली जोरवे संस्कृति सबसे महत्वपूर्ण ताम्रपाषाण संस्कृति थी, जिसके प्रकाश, दायमाबाद और इनामगांव जैसे प्रमुख केंद्र थे।

बर्तन और मृदभांड तकनीक:

इस काल के लोग विभिन्न प्रकार के बर्तन बनाते थे, जिसमें चाक पर बने और हाथ से गढ़े हुए लाल, काले और विशिष्ट चित्रित मृदभांड शामिल थे।

धातु और औजार तकनीक:

तांबे के अलावा इस काल में लोग कम गुणवत्ता वाले कांस्य का भी उपयोग करते थे और पत्थर के ब्लेड व खुरचनी बनाने की उन्नत तकनीक विकसित की थी।

धार्मिक विश्वास और कला:

मृण्मूर्ति (टेराकोटा) मूर्तियां, सांड की आकृतियां और चित्रित पुरुष व महिला मूर्तियां इन समुदायों की धार्मिक मान्यताओं और कलात्मक अभिव्यक्ति को दर्शाती हैं।

अग्नि पूजा और वेदी:

मालवा और अन्य संस्कृतियों के कई स्थलों पर अग्नि पूजा के साक्ष्य मिले हैं, जिसके तहत विशेष अग्नि वेदियां और पूजा स्थल खोजे गए हैं।

अनोखी दफन प्रथाएं:

ताम्रपाषाण समाजों में मृतकों को अलग-अलग तरीकों से दफनाया जाता था, जैसे बच्चों को urn (कलश) में और वयस्कों के पैरों के निचले हिस्से को काटकर दफनाना।

शिल्प और उद्योग:

इस काल में धातु कर्म, मनके बनाने का उद्योग (कीमती पत्थरों से), और मिट्टी के बर्तन निर्माण जैसे विभिन्न प्रकार के औद्योगिक कार्य बड़े पैमाने पर होते थे।

ग्रामीण बस्तियों का स्वरूप:

ताम्रपाषाण बस्तियां आमतौर पर छोटे गांवों और बस्तियों के रूप में थीं, हालांकि इनामगांव और दायमाबाद जैसे कुछ बड़े क्षेत्रीय केंद्र भी स्थापित हो चुके थे।

पर्यावरणीय और जलवायु परिवर्तन:

दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व के अंत में प्रतिकूल जलवायु परिस्थितियों और शुष्कता के कारण इन समृद्ध कृषक संस्कृतियों का धीरे-धीरे पतन होने लगा।

ओसीपी (OCHR) संस्कृति:

उत्तर भारत में गंगा-यमुना दोआब क्षेत्र में गेरुआ रंग के मृदभांड (OCP) संस्कृति का विकास हुआ, जो कई स्थानों पर तांबे के होर्ड्स (Copper Hoards) से जुड़ी है।

पेंटेड ग्रे वेयर (PGW) संस्कृति:

उत्तर भारत में बाद के चरणों में चित्रित धूसर पात्र (PGW) संस्कृति का उदय हुआ, जिसमें लोहे के औजारों का उपयोग शुरू हुआ और द्वितीय शहरीकरण की नींव पड़ी।

ऐतिहासिक महत्व:

ताम्रपाषाण युग ने पाषाण काल और पूर्ण धातु युग के बीच एक महत्वपूर्ण सेतू का काम किया, जिसने भारतीय उपमहाद्वीप में प्रारंभिक ग्रामीण बस्तियों और कृषि परंपराओं को स्थायित्व दिया।

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