जनवरी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने के बाद महात्मा गांधी ने सत्य और अहिंसा पर आधारित ‘सत्याग्रह’ को अपना मुख्य हथियार बनाया।
भारत में गांधी जी का पहला सफल आंदोलन 1917 का चम्पारण सत्याग्रह था, जहाँ उन्होंने बिहार के तिनकठिया प्रथा (जबरन नील की खेती) के खिलाफ किसानों को न्याय दिलाया।
वर्ष 1918 में गुजरात के खेड़ा सत्याग्रह के दौरान फसल नष्ट होने के बावजूद अंग्रेजों द्वारा वसूले जा रहे अवैध लगान के खिलाफ गांधी जी ने सफल मोर्चा संभाला।
इसी वर्ष (1918) गांधी जी ने अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन में प्लेग बोनस को लेकर पहली बार ‘भूख हड़ताल’ का प्रयोग किया और मजदूरों को उनका हक दिलाया।
रोलट एक्ट और जलियांवाला बाग हत्याकांड (1919) के क्रूर विरोध में गांधी जी ने 1920 ईस्वी में देशव्यापी असहयोग आंदोलन (Non-Cooperation Movement) शुरू किया।
इस आंदोलन के तहत सरकारी उपाधियों, अदालतों, विदेशी कपड़ों और शिक्षण संस्थानों का पूरे देश में अभूतपूर्व बहिष्कार किया गया।
फरवरी 1922 में गोरखपुर के ‘चौरी-चौरा’ नामक स्थान पर प्रदर्शनकारियों द्वारा एक पुलिस थाने को आग लगाने की हिंसक घटना से दुखी होकर गांधी जी ने आंदोलन वापस ले लिया।
वर्ष 1930 में गांधी जी ने ब्रिटिश सरकार के नमक एकाधिकार के कानून को तोड़ने के लिए ऐतिहासिक सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement) की घोषणा की।
इसके लिए उन्होंने साबरमती आश्रम से दांडी तक 24 दिनों की प्रसिद्ध ‘दांडी मार्च‘ यात्रा की और 6 अप्रैल 1930 को समुद्र तट पर नमक बनाकर कानून तोड़ा।
सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान पूरे देश में नमक बनाने, कर न देने और विदेशी वस्तुओं की दुकानों पर धरने देने की लहर दौड़ गई।
भारत के संवैधानिक भविष्य और साइमन कमीशन की रिपोर्ट पर चर्चा के लिए लंदन में तीन गोलमेज सम्मेलनों (Round Table Conferences) का आयोजन किया गया था।
वर्ष 1931 में हुए ‘गांधी-इरविन समझौते’ के बाद गांधी जी ने कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में ‘द्वितीय गोलमेज सम्मेलन’ में भाग लिया।
ब्रिटिश सरकार द्वारा अछूतों के लिए अलग निर्वाचन प्रणाली की घोषणा के खिलाफ गांधी जी ने जेल में आमरण अनशन किया, जिसके बाद 1932 में ऐतिहासिक ‘पूना पैक्ट‘ हुआ।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान क्रिप्स मिशन की विफलता के बाद गांधी जी ने 8 अगस्त 1942 को बम्बई के ग्वालिया टैंक मैदान से भारत छोड़ो आंदोलन का शंखनाद किया।
इस ऐतिहासिक आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी ने देशवासियों को अपनी अंतिम लड़ाई के रूप में “करो या मरो” (Do or Die) का अमर नारा दिया।
आंदोलन घोषित होते ही ‘ऑपरेशन थंडरबोल्ट’ के तहत अंग्रेजों ने गांधी जी सहित कांग्रेस के सभी शीर्ष नेताओं को रातों-रात गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया।
नेतृत्वविहीन होने के बाद भी यह आंदोलन पूरे भारत में स्वतः स्फूर्त रूप से फैल गया और जनता ने रेलवे स्टेशनों तथा डाकघरों पर अधिकार कर लिया।
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान देश के कई हिस्सों जैसे बलिया, तामलुक और सतारा में ब्रितानी हुकूमत को उखाड़कर ‘समानांतर सरकारें’ बनाई गईं।
इस व्यापक और उग्र जन-आंदोलन ने ब्रिटिश सरकार को यह पूरी तरह अहसास करा दिया कि अब वे भारत पर अधिक समय तक जबरन शासन नहीं कर सकते।
अंततः, गांधी जी के इन निरंतर जन-आंदोलनों और देशवासियों के अदम्य साहस के बल पर ही भारत को 15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश गुलामी से आजादी मिली।
क्रांतिकारी आंदोलन और स्वतंत्रता
भारत की आजादी में महात्मा गांधी के अहिंसक आंदोलनों के साथ-साथ क्रांतिकारी आंदोलन की सशस्त्र बगावत ने भी ब्रितानी हुकूमत की जड़ें हिला दी थीं।
इस उग्र राष्ट्रवादी धारा का मुख्य उद्देश्य बलपूर्वक ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकना और भारत को पूर्ण रूप से स्वतंत्र कराना था।
महान क्रांतिकारी भगत सिंह ने ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ (HSRA) के माध्यम से देश के युवाओं में इंकलाब की नई चेतना जगाई।
उन्होंने लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के लिए सांडर्स की हत्या की और ब्रिटिश बहरी सरकार को जगाने के लिए केंद्रीय असेंबली में बम फेंका।
मात्र 23 वर्ष की आयु में 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को लाहौर सेंट्रल जेल में हंसते-हंसते फांसी दे दी गई।
प्रतापी क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद ने प्रतिज्ञा की थी कि वे कभी भी अंग्रेजों के हाथ जिंदा नहीं आएंगे और उन्होंने हमेशा खुद को स्वतंत्र बनाए रखा।
फरवरी 1931 में इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में अंग्रेजों से घिर जाने पर उन्होंने अंतिम गोली खुद को मारकर अपनी ‘आजाद’ रहने की कसम पूरी की।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने विदेशों में रह रहे भारतीयों को एकजुट कर आजाद हिंद फौज (INA) की कमान संभाली।
नेताजी ने अपनी सेना को “दिल्ली चलो” और देशवासियों को “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा” का अमर और ओजस्वी नारा दिया था।
युद्ध में भारतीयों का सहयोग पाने के लिए ब्रिटिश सरकार ने 1942 ईस्वी में क्रिप्स मिशन भारत भेजा, जिसके प्रस्तावों को कांग्रेस ने खारिज कर दिया।
गांधी जी ने क्रिप्स मिशन के अप्रभावी प्रस्तावों को “दिवालिया बैंक का उत्तर-तिथि का चेक” (Post-dated cheque) कहकर उसकी तीखी आलोचना की थी।
युद्ध के बाद भारत के संवैधानिक ढांचे को तैयार करने और अंतरिम सरकार के गठन के लिए 1946 में ब्रिटिश सरकार ने कैबिनेट मिशन भेजा।
कैबिनेट मिशन के प्रस्तावों के तहत ही भारत की संविधान सभा का चुनाव हुआ, जिसने देश के आधुनिक संविधान का निर्माण शुरू किया।
हालांकि, मुस्लिम लीग द्वारा अलग पाकिस्तान की अड़ियल मांग के कारण देश में सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे और अंतरिम व्यवस्था पूरी तरह विफल हो गई।
इस गंभीर गतिरोध को सुलझाने के लिए अंतिम वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने 3 जून 1947 को अपनी ऐतिहासिक माउंटबेटन योजना पेश की।
इस योजना के तहत सांप्रदायिक आधार पर ब्रिटिश भारत को दो संप्रभु राष्ट्रों में विभाजित करने के क्रूर निर्णय को स्वीकार किया गया।
माउंटबेटन योजना के अमल में आते ही लाखों बेकसूर लोगों के विस्थापन और भीषण दंगों के साथ भारत का विभाजन (भारत और पाकिस्तान) हो गया।
इस विभाजन को कानूनी रूप देने के लिए ब्रिटिश संसद ने 18 जुलाई 1947 को ऐतिहासिक भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 पारित किया।
इस अधिनियम के तहत 15 अगस्त 1947 को भारत पर से ब्रिटिश क्राउन की संप्रभुता और शासन पूरी तरह से हमेशा के लिए समाप्त हो गया।
अंततः, अनगिनत क्रांतिकारियों के बलिदान और स्वतंत्रता सेनानियों के लंबे संघर्ष के बाद 15 अगस्त 1947 की आधी रात को भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र बना।
स्वतंत्र भारत
15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता मिलने के बाद भारत के सामने एक सुदृढ़, अखंड और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के निर्माण की सबसे बड़ी चुनौती थी।
विभाजन के समय देश में ब्रिटिश प्रांतों के साथ-साथ कुल 562 अर्ध-स्वतंत्र देशी रियासतें (Princely States) मौजूद थीं।
लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ने अपनी कुशल कूटनीति और दृढ़ इच्छाशक्ति से रियासतों का ऐतिहासिक एकीकरण संभव बनाया।
अधिकांश रियासतें स्वेच्छा से भारत में शामिल हो गईं, लेकिन हैदराबाद, जूनागढ़ और कश्मीर मुद्दे ने देश को गंभीर संकट में डाल दिया।
जूनागढ़ के नवाब के पाकिस्तान भाग जाने के बाद, फरवरी 1948 में वहां जनमत संग्रह (Plebiscite) कराकर उसे भारत में मिला लिया गया।
हैदराबाद के निजाम द्वारा स्वतंत्र रहने या पाकिस्तान में मिलने की जिद पर, सितंबर 1948 में ‘ऑपरेशन पोलो’ (सैन्य कार्रवाई) के जरिए उसे भारत का हिस्सा बनाया गया।
जम्मू-कश्मीर पर जब पाकिस्तानी कबीलाइयों ने आक्रमण किया, तब वहां के राजा हरि सिंह ने भारत के साथ ‘विलय पत्र’ (Instrument of Accession) पर हस्ताक्षर किए।
आजादी के बाद देश के भीतर प्रशासनिक सुविधा के बजाय भाषा के आधार पर राज्यों के गठन की मांग तेजी से उठने लगी।
पोट्टी श्रीरामुलु के 56 दिनों के आमरण अनशन और मृत्यु के बाद, 1953 में ‘आंध्र प्रदेश’ भाषा के आधार पर बनने वाला पहला राज्य बना।
इस विवाद को पूरी तरह सुलझाने के लिए सरकार ने फजल अली की अध्यक्षता में ‘राज्य पुनर्गठन आयोग’ (SRC) की स्थापना की।
इस आयोग की सिफारिशों के आधार पर 1956 में राज्य पुनर्गठन अधिनियम पारित कर देश को 14 राज्यों और 6 केंद्र शासित प्रदेशों में बांटा गया।
भाषाई पुनर्गठन ने भारत की विविधता को स्वीकार कर अलगाववाद की भावना को कम किया और राष्ट्रीय एकता को अधिक मजबूत बनाया।
इसके बावजूद, स्वतंत्र भारत में अपने क्षेत्र के प्रति अत्यधिक लगाव और देश के हितों की अनदेखी करने वाली क्षेत्रीयता (Regionalism) की भावना पनपती रही।
क्षेत्रीयता का मुख्य कारण विभिन्न राज्यों के बीच असंतुलित आर्थिक विकास, संसाधनों का असमान वितरण और स्थानीय राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं थीं।
इस भावना के कारण देश में समय-समय पर नए राज्यों की मांग, अंतर-राज्यीय सीमा विवाद और नदी जल बंटवारे को लेकर टकराव होते रहे।
क्षेत्रीयता के साथ-साथ सांप्रदायिकता (Communalism) भी स्वतंत्र भारत के आंतरिक ताने-बाने के लिए सबसे बड़ा और खतरनाक खतरा बनकर उभरी।
सांप्रदायिकता का अर्थ अपनी धार्मिक पहचान को राष्ट्रहित से ऊपर रखना और दूसरे धर्मों के प्रति शत्रुता या संकीर्णता का भाव रखना है।
विभाजन की त्रासदी के जख्मों और तुष्टिकरण की राजनीति के कारण देश को कई बार भीषण सांप्रदायिक दंगों का सामना करना पड़ा।
इस धार्मिक कट्टरता ने समाज में अविश्वास की खाई को गहरा किया और देश की धर्मनिरपेक्ष (Secular) साख को समय-समय पर चोट पहुँचाई।
अंततः, इन तमाम जटिल आंतरिक चुनौतियों, क्षेत्रीय विवादों और सांप्रदायिक तनावों के बीच भी भारत अपनी लोकतांत्रिक जड़ों को मजबूत बनाए रखने में सफल रहा।