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भारत में ब्रिटिश शासन

  • वर्ष 1757 के प्लासी के युद्ध में रॉबर्ट क्लाइव ने बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को हराकर भारत में ब्रिटिश सत्ता की पहली राजनीतिक नींव रखी।
  • इसके बाद 1764 के बक्सर के युद्ध में अंग्रेजों ने बंगाल, अवध के नवाबों और मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेना को पराजित किया।
  • बक्सर की ऐतिहासिक जीत ने अंग्रेजों को भारत की सर्वोच्च सैन्य शक्ति बना दिया और उनकी राजनीतिक संप्रभुता को स्थापित किया।
  • युद्ध के बाद रॉबर्ट क्लाइव ने 1765 में बंगाल में द्वैध शासन (Diarchy) लागू किया, जिसने प्रशासनिक अराजकता को जन्म दिया।
  • इस व्यवस्था के तहत अंग्रेजों ने राजस्व वसूलने का अधिकार (दीवानी) अपने पास रखा, जबकि शासन का खोखला उत्तरदायित्व नवाब पर छोड़ दिया।
  • ब्रिटिश साम्राज्य के तेजी से विस्तार के लिए लॉर्ड वेलेजली ने सहायक संधि (Subsidiary Alliance) की नीति शुरू की।
  • इस संधि को स्वीकार करने वाले भारतीय राज्यों को अपने खर्च पर ब्रिटिश सेना रखनी पड़ती थी और उनकी विदेश नीति अंग्रेजों के अधीन हो जाती थी।
  • हैदराबाद, मैसूर और मराठों जैसे प्रमुख राज्यों ने इस दमनकारी सहायक संधि को स्वीकार कर अपनी स्वतंत्रता खो दी।
  • इसके बाद लॉर्ड डलहौजी ने साम्राज्य विस्तार के लिए व्यपगत का सिद्धांत (Doctrine of Lapse / हड़प नीति) लागू किया।
  • इस नीति के तहत यदि किसी भारतीय शासक का कोई कानूनी वारिस (पुत्र) नहीं होता था, तो उसके राज्य को जबरन ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया जाता था।
  • डलहौजी की इस हड़प नीति के कारण सतारा, संभलपुर, झांसी और नागपुर जैसे समृद्ध राज्यों का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय कर दिया गया।
  • भारत से अधिकतम राजस्व वसूलने के लिए अंग्रेजों ने तीन प्रमुख भू-राजस्व व्यवस्थाएं (Land Revenue Systems) लागू कीं।
  • लॉर्ड कॉर्नवॉलिस ने 1793 में बंगाल, बिहार और ओडिशा में स्थायी बंदोबस्त (Permanent Settlement) लागू कर जमींदारों को भूमि का मालिक बनाया।
  • दक्षिण और पश्चिम भारत में थॉमस मुनरो ने रैयतवाड़ी व्यवस्था शुरू की, जहाँ सीधे किसानों (रैयत) से कर वसूला जाता था।
  • उत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत में महालवाड़ी व्यवस्था लागू की गई, जिसमें पूरे गाँव या महाल को राजस्व की इकाई माना गया।
  • इन तीनों भू-राजस्व प्रणालियों में कर की दरें अत्यधिक ऊंची थीं, जिन्हें सूखा या अकाल पड़ने पर भी बेरहमी से वसूला जाता था।
  • अत्यधिक कर और साहूकारों के कर्ज के जाल के कारण भारतीय किसानों की स्थिति बदतर हो गई और वे अपनी ही जमीन पर मजदूर बन गए।
  • अंग्रेजों की भेदभावपूर्ण व्यापारिक नीतियों और इंग्लैंड से आने वाले मशीनी कपड़ों के कारण भारत का पारंपरिक सूती वस्त्र उद्योग पूरी तरह नष्ट हो गया।
  • इस वि-औद्योगिकीकरण (De-industrialization) ने लाखों स्थानीय कारीगरों और बुनकरों को बेरोजगार कर भुखमरी की कगार पर धकेल दिया।
  • अंततः, इन दमनकारी राजनीतिक, प्रशासनिक और आर्थिक नीतियों के कारण भारतीय समाज में गहरा असंतोष पनपा, जो 1857 की महान क्रांति का मुख्य कारण बना।

1857 का विद्रोह

  • वर्ष 1857 का विद्रोह भारतीय इतिहास की एक युगांतरकारी घटना थी, जिसने भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की नींव हिला दी थी।
  • इस विद्रोह का कोई एक कारण नहीं था, बल्कि यह अंग्रेजों की सदियों पुरानी दमनकारी नीतियों के खिलाफ संचित जन-आक्रोश का परिणाम था।
  • राजनैतिक कारणों में डलहौजी की हड़प नीति (व्यपगत सिद्धांत) और वेलेजली की सहायक संधि से भारतीय शासकों में भारी असंतोष था।
  • आर्थिक कारणों में अत्यधिक भू-राजस्व दरों और भेदभावपूर्ण नीतियों ने किसानों व पारंपरिक कारीगरों को पूरी तरह कंगाल कर दिया था।
  • सामाजिक-धार्मिक कारणों में ईसाई मिशनरियों की गतिविधियां और सती प्रथा उन्मूलन जैसे सुधारों को भारतीयों ने अपने धर्म में हस्तक्षेप माना।
  • सैन्य कारणों में भारतीय सैनिकों के साथ होने वाला नस्लीय भेदभाव, कम वेतन और जबरन समुद्र पार भेजना प्रमुख कारण थे।
  • इस विद्रोह का तत्कालिक कारण सेना में ‘एनफील्ड राइफल’ का शामिल होना था, जिसके कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी का प्रयोग होता था।
  • इन विवादित कारतूसों को दांतों से काटना पड़ता था, जिससे हिंदू और मुस्लिम दोनों ही सैनिकों की धार्मिक भावनाएं आहत हुईं।
  • विद्रोह की पहली चिंगारी 29 मार्च 1857 को बैरकपुर छावनी में फूटी, जहाँ वीर सैनिक मंगल पांडे ने चर्बी वाले कारतूसों का विरोध करते हुए ब्रिटिश अधिकारी पर गोली चला दी।
  • मेरठ छावनी के सैनिकों ने 10 मई 1857 को खुला विद्रोह कर दिया और दिल्ली की ओर कूच कर अगले ही दिन उस पर अधिकार कर लिया।
  • विद्रोहियों ने अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फर को पुनः भारत का सम्राट घोषित कर क्रांति का नेतृत्व सौंप दिया।
  • देखते ही देखते यह विद्रोह उत्तर और मध्य भारत के एक बड़े हिस्से में फैल गया, जिसमें समाज के हर वर्ग ने बढ़-चढ़कर भाग लिया।
  • विभिन्न केंद्रों पर योग्य नेतृत्व उभरा; जैसे कानपुर में नाना साहब व तात्या टोपे, झांसी में रानी लक्ष्मीबाई और बिहार में कुंवर सिंह ने कमान संभाली।
  • अवध के क्षेत्र में बेगम हजरत महल और फैजाबाद में मौलवी अहमदउल्लाह ने ब्रिटिश सेना को कड़ी और ऐतिहासिक चुनौती दी।
  • हालांकि, केंद्रीय संगठन, आधुनिक हथियारों की कमी और कई भारतीय राजाओं के असहयोग के कारण अंग्रेज इस विद्रोह को दबाने में सफल रहे।
  • इस विद्रोह के दूरगामी प्रभाव के रूप में भारत में 150 साल पुराने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन का हमेशा के लिए अंत हो गया।
  • ब्रिटिश संसद ने ‘भारत सरकार अधिनियम 1858’ पारित कर भारत का प्रत्यक्ष शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन (महारानी विक्टोरिया) के हाथों में सौंप दिया।
  • महारानी की घोषणा के तहत भारत के गवर्नर-जनरल को अब ‘वायसराय’ कहा जाने लगा और लॉर्ड कैनिंग भारत के पहले वायसराय बने।
  • प्रशासनिक स्तर पर अंग्रेजों ने अपनी विस्तारवादी नीति (राज्यों को हड़पना) छोड़ दी और सेना के पुनर्गठन में ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपनाई।
  • अंततः, भले ही यह विद्रोह सैन्य रूप से विफल रहा, लेकिन इसने भावी राष्ट्रीय आंदोलन के लिए स्वतंत्रता की एक अमर चेतना जगा दी।

जनजातीय और किसान आंदोलन

  • ब्रिटिश शासन की शोषक आर्थिक नीतियों और उनकी जल-जंगल-जमीन हड़पने की प्रवृत्ति के खिलाफ देश में कई उग्र जनजातीय और किसान आंदोलन हुए।
  • सिद्धू और कान्हू के नेतृत्व में 1855-56 में हुआ संथाल विद्रोह बिहार-झारखंड के ‘दामन-ए-कोह’ क्षेत्र में जमींदारों और अंग्रेजों के खिलाफ एक ऐतिहासिक सशस्त्र संघर्ष था।
  • पश्चिमी घाट और खानदेश क्षेत्र में भील विद्रोह (1817-19) अंग्रेजों की नई कृषि नीति और उनके जंगलों में प्रवेश के खिलाफ शुरू हुआ था।
  • ओडिशा के पहाड़ी क्षेत्रों में कोंड विद्रोह (1837-56) चक्र बिसोई के नेतृत्व में हुआ, जिसका तात्कालिक कारण अंग्रेजों द्वारा उनकी पारंपरिक ‘नरबलि प्रथा’ पर प्रतिबंध लगाना था।
  • झारखंड के छोटानागपुर क्षेत्र में बिरसा मुंडा के नेतृत्व में महान मुंडा विद्रोह (1899-1900) हुआ, जिसे ‘उलगुलान’ (महान हलचल) भी कहा जाता है।
  • बिरसा मुंडा ने अपनी पारंपरिक सामूहिक खेती व्यवस्था (खूंटकट्टी) को बचाने और ‘मुंडा राज’ स्थापित करने के लिए धार्मिक और सैन्य रूप से लोगों को एकजुट किया।
  • छोटानागपुर क्षेत्र में ही बुद्धू भगत के नेतृत्व में 1831-32 का कोल विद्रोह हुआ, जो बाहरी लोगों (दिकुओं) को जमीनें सौंपने के विरोध में भड़का था।
  • उत्तर-पूर्व में नागा विद्रोह (1879-80) अंग्रेजों की जबरन कर वसूली और उनके पारंपरिक अधिकारों में हस्तक्षेप के कारण असम पहाड़ियों में हुआ।
  • आंध्र प्रदेश के गोदावरी पहाड़ी क्षेत्र में अल्लूरी सीताराम राजू के नेतृत्व में रम्पा विद्रोह (1922-24) हुआ, जिसमें आदिवासियों ने गोरिल्ला युद्ध पद्धति अपनाई थी।
  • किसानों के आंदोलनों में 1859-60 का बंगाल का नील विद्रोह (Indigo Revolt) सबसे संगठित था, जिसका नेतृत्व दिगंबर और बिष्णु बिस्वास ने किया।
  • किसानों ने यूरोपीय बागान मालिकों द्वारा जबरन नील की खेती कराने और क्रूरता बरतने के विरोध में हड़ताल की, जिसे ‘नील दर्पण’ नाटक में दर्शाया गया है।
  • बंगाल के ही यूसुफशाही परगने में 1873-76 के दौरान पावना विद्रोह हुआ, जहाँ किसानों ने जमींदारों द्वारा बढ़ाए गए अवैध लगान के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ी।
  • महाराष्ट्र के पुणे और अहमदनगर जिलों में 1875 में भयंकर डेक्कन दंगे हुए, जहाँ कपास की गिरती कीमतों और साहूकारों के कर्ज के जाल से तंग आकर किसानों ने विद्रोह किया।
  • दक्कन के किसानों ने मुख्य रूप से गुजराती और मारवाड़ी साहूकारों के बही-खातों और ऋण-दस्तावेजों को निशाना बनाकर उन्हें आग के हवाले कर दिया था।
  • छोटानागपुर क्षेत्र के पलामू में चेरो जनजाति द्वारा किया गया महुआ विद्रोह (1800-1802) कर्नल जोन्स की दमनकारी नीतियों और राजा के खिलाफ एक बड़ा संघर्ष था।
  • बंगाल के समृद्ध वर्धमान क्षेत्र में हुआ बर्धमान किसान विद्रोह राजा और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा थोपे गए अत्यधिक राजस्व और शोषण के खिलाफ किसानों का कड़ा प्रतिशोध था।
  • इन सभी जनजातीय आंदोलनों का एक मुख्य कारण ‘दिकू’ (बाहरी ठेकेदार, महाजन और साहूकार) थे, जिन्होंने आदिवासियों की सदियों पुरानी स्वायत्तता छीन ली थी।
  • आदिवासियों ने आधुनिक हथियारों से लैस ब्रिटिश सेना का मुकाबला अपने पारंपरिक धनुष-बाण, भालों और अदम्य साहस के बल पर किया।
  • इन आंदोलनों की मुख्य विशेषता यह थी कि ये स्थानीय स्तर पर बेहद उग्र थे, लेकिन इनमें राष्ट्रीय स्तर पर आपसी समन्वय और दीर्घकालिक नेतृत्व की कमी थी।
  • अंततः, भले ही इन विद्रोहों को अंग्रेजों ने बेरहमी से कुचल दिया, लेकिन इन्होंने औपनिवेशिक शोषण के खिलाफ ग्रामीण और जनजातीय भारत में क्रांति की एक अमर चेतना जगा दी।

19वीं शताब्दी के सामाजिक-धार्मिक सुधार

  • आधुनिक भारत के निर्माता राजा राममोहन राय को भारतीय पुनर्जागरण का जनक और आधुनिक भारत का भोर का तारा कहा जाता है।
  • उन्होंने रूढ़िवादिता और अंधविश्वासों के खिलाफ लड़ते हुए 1828 ईस्वी में कलकत्ता में ब्रह्म समाज की स्थापना की थी।
  • राजा राममोहन राय के अथक और निरंतर प्रयासों के कारण ही लॉर्ड विलियम बैंटिक ने 1829 में सती प्रथा पर कानूनी रोक लगाई।
  • ब्रह्म समाज ने मुख्य रूप से एकेश्वरवाद (एक ईश्वर की पूजा), मूर्ति पूजा के विरोध और मानवीय गरिमा पर विशेष बल दिया।
  • राजा राममोहन राय ने महिलाओं की शिक्षा, उनके संपत्ति के अधिकारों और अंतर्जातीय विवाहों का पुरजोर समर्थन किया था।
  • पश्चिमी भारत में सुधारों की अलख जगाने के लिए 1867 ईस्वी में बंबई में प्रार्थना समाज की स्थापना की गई थी।
  • प्रार्थना समाज की स्थापना डॉ. आत्माराम पांडुरंग ने की थी, जिसे बाद में महादेव गोविंद रानाडे ने अत्यधिक प्रभावशाली बनाया।
  • इस समाज ने जाति प्रथा के उन्मूलन, बाल विवाह के विरोध, विधवा पुनर्विवाह और स्त्री शिक्षा को अपना मुख्य लक्ष्य बनाया।
  • उत्तर भारत में वैदिक धर्म के शुद्धिकरण के लिए स्वामी दयानंद सरस्वती ने 1875 ईस्वी में बंबई में आर्य समाज की स्थापना की।
  • स्वामी दयानंद सरस्वती के बचपन का नाम मूलशंकर था, जिन्होंने ज्ञान की खोज में अपना घर छोड़ दिया था।
  • उन्होंने हिंदू धर्म में आई बुराइयों पर चोट करते हुए देशवासियों को वेदों की ओर लौटों” (Back to the Vedas) का अमर संदेश दिया।
  • उनका मानना था कि वेद ज्ञान के सच्चे स्रोत हैं; उन्होंने अपने विचारों को अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में संकलित किया।
  • आर्य समाज ने बाल विवाह और छुआछूत का कड़ा विरोध किया तथा भटके हुए हिंदुओं के लिए ‘शुद्धि आंदोलन’ की शुरुआत की।
  • दयानंद सरस्वती देश में ‘स्वराज’ शब्द का प्रयोग करने वाले और ‘हिंदी’ को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार करने वाले पहले व्यक्ति थे।
  • शिक्षा के क्षेत्र में उनके अनुयायियों ने देश भर में दयानंद एंग्लो-वैदिक (DAV) स्कूलों और गुरुकुलों का एक बड़ा नेटवर्क स्थापित किया।
  • इसी दौर में अध्यात्म और आधुनिकता के अद्भुत प्रतीक बनकर स्वामी विवेकानंद भारतीय समाज के सामने उभरे।
  • वे महान संत रामकृष्ण परमहंस के सबसे प्रिय शिष्य थे, जिन्होंने गुरु के संदेशों को फैलाने के लिए 1897 में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की।
  • स्वामी विवेकानंद ने 1893 ईस्वी में अमेरिका के शिकागो में आयोजित ‘विश्व धर्म संसद’ में अपने भाषण से पूरी दुनिया को मंत्रमुग्ध कर दिया था।
  • उन्होंने युवाओं में राष्ट्रवाद और स्वाभिमान की भावना जगाते हुए “उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए” का नारा दिया।
  • अंततः, इन सुधार आंदोलनों ने भारतीयों को मानसिक गुलामी से मुक्त कर देश में आधुनिक राष्ट्रवाद और स्वतंत्रता संग्राम की मजबूत आधारशिला रखी।

राष्ट्रीयता का उदय

  • आधुनिक शिक्षा, समाचार पत्रों और ब्रिटिश औपनिवेशिक शोषण के कारण 19वीं सदी के उत्तरार्ध में भारतीयों में राष्ट्रीयता का उदय हुआ।
  • इस राष्ट्रीय चेतना को एक संगठित मंच देने के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 28 दिसंबर 1885 को बॉम्बे में की गई थी।
  • कांग्रेस की स्थापना एक सेवानिवृत्त ब्रिटिश अधिकारी ए. ओ. ह्यूम के प्रयासों से हुई और इसके प्रथम अध्यक्ष व्योमेश चंद्र बनर्जी बने।
  • इसके बाद देश के अलग-अलग शहरों में वार्षिक अधिवेशन आयोजित कर राजनीतिक चेतना जगाने वाले कांग्रेस के महत्वपूर्ण सत्र शुरू हुए।
  • वर्ष 1906 के कलकत्ता सत्र में दादाभाई नौरोजी के नेतृत्व में कांग्रेस ने पहली बार आधिकारिक रूप से ‘स्वराज’ का लक्ष्य घोषित किया।
  • वर्ष 1907 का सूरत सत्र अत्यंत विवादास्पद रहा, जहाँ वैचारिक मतभेदों के कारण कांग्रेस का विभाजन दो धड़ों में हो गया।
  • लॉर्ड कर्जन ने राष्ट्रवाद की उभरती भावना को कुचलने के लिए 1905 ईस्वी में कूटनीति से बंगाल का विभाजन कर दिया।
  • अंग्रेजों ने विभाजन का कारण प्रशासनिक असुविधा बताया, लेकिन इसका वास्तविक उद्देश्य हिंदू-मुस्लिम एकता को तोड़ना था।
  • बंगाल विभाजन के विरोध में देशव्यापी आक्रोश पनपा, जिसने भारत के पहले बड़े जन-आंदोलन यानी स्वदेशी आंदोलन को जन्म दिया।
  • 7 अगस्त 1905 को कलकत्ता के टाउन हॉल से शुरू हुए इस आंदोलन में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का ऐतिहासिक संकल्प लिया गया।
  • स्वदेशी आंदोलन के दौरान लोगों ने विदेशी कपड़ों की होली जलाई, ब्रितानी नमक-चीनी का त्याग किया और भारतीय उद्योगों को बढ़ावा दिया।
  • इस दौर में आत्मनिर्भरता पर जोर देते हुए राष्ट्रीय शिक्षा परिषद् और स्वदेशी बैंकों व फैक्ट्रियों की स्थापना की गई।
  • कांग्रेस के शुरुआती दौर (1885-1905) में नरमपंथियों (उदारवादियों) का वर्चस्व था, जो संवैधानिक तरीकों में विश्वास रखते थे।
  • दादाभाई नौरोजी, गोपाल कृष्ण गोखले और फिरोजशाह मेहता जैसे नरमपंथी नेता याचिकाओं, भाषणों और प्रस्तावों के जरिए सुधार चाहते थे।
  • नरमपंथियों की इस ‘प्रार्थना और याचिका’ की नीति को युवा राष्ट्रवादियों ने ‘राजनीतिक भिक्षावृत्ति’ कहकर उसकी आलोचना की।
  • इसके विपरीत, 1905 के बाद कांग्रेस में उग्रपंथियों (गरमदल) का प्रभाव बढ़ा, जो पूर्ण स्वराज और सक्रिय संघर्ष के पक्षधर थे।
  • उग्रपंथी विचारधारा का नेतृत्व मुख्य रूप से ‘लाल-बाल-पाल’ यानी लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और विपिन चंद्र पाल ने किया।
  • तिलक ने जनता में राष्ट्रवाद की भावना कूट-कूट कर भरने के लिए ‘गणपति उत्सव’ और ‘शिवाजी महोत्सव’ जैसी सांस्कृतिक शुरुआत की।
  • लोकमान्य तिलक ने देशवासियों को ललकारते हुए अपना प्रसिद्ध नारा दिया—”स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।”
  • अंततः, इस शुरुआती दौर के वैचारिक मंथन और जन-आंदोलनों ने भारत के आगामी स्वतंत्रता संग्राम और गांधीवादी युग की मजबूत जमीन तैयार की।

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