- मध्यकाल में व्यापारिक मार्गों पर तुर्कों के नियंत्रण के बाद यूरोपीय देशों ने भारत के लिए नए समुद्री मार्ग की खोज शुरू की।
- इस क्रम में 1498 ईस्वी में पुर्तगाली नाविक वास्को डी गामा ने उत्तमाशा अंतरीप (Cape of Good Hope) होते हुए भारत के कालीकट का नया समुद्री मार्ग खोजा।
- भारत आने वाली पहली यूरोपीय शक्ति पुर्तगाली थे, जिन्होंने कोचीन में अपनी पहली व्यापारिक कोठी (फैक्ट्री) स्थापित की।
- पुर्तगालियों के बाद 1602 ईस्वी में डच (हॉलैंड/नीदरलैंड के निवासी) भारत आए और उन्होंने मसूलीपट्टनम में अपनी पहली कोठी खोली।
- डच मुख्य रूप से मसालों के बजाय भारतीय कपड़ों (Textiles) के निर्यात को वैश्विक बाजार में बढ़ावा देने के लिए जाने जाते हैं।
- वर्ष 1600 ईस्वी में महारानी एलिजाबेथ प्रथम के चार्टर द्वारा ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना हुई, जो कालान्तर में सबसे शक्तिशाली बनी।
- ब्रिटिश दूत हॉकिन्स ने जहांगीर के दरबार में आकर व्यापारिक रियायतें मांगीं और अंग्रेजों ने सूरत में अपनी पहली स्थायी फैक्ट्री स्थापित की।
- इन शक्तियों के बाद 1616 ईस्वी में डेनिश (डेनमार्क के निवासी) भारत आए, जिन्होंने तंजौर के ट्रांकेबार में अपना केंद्र बनाया।
- डेनिश भारत में व्यापारिक रूप से अधिक सफल नहीं रहे और वे अपनी सभी फैक्ट्रियां अंग्रेजों को बेचकर वापस चले गए।
- भारत आने वाली अंतिम प्रमुख यूरोपीय शक्ति फ्रांसीसी (French) थे, जिनकी कंपनी की स्थापना 1664 में कोल्बर्ट के प्रयासों से हुई थी।
- फ्रांसीसियों ने सूरत में अपनी पहली फैक्ट्री खोली और पांडिचेरी को भारत में अपना मुख्य प्रशासनिक केंद्र बनाया।
- भारत के व्यापार और राजनीति पर वर्चस्व स्थापित करने के लिए अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच तीन प्रसिद्ध ‘कर्नाटक युद्ध’ (Carnatic Wars) हुए।
- इन युद्धों में ब्रिटिश कमांडर रॉबर्ट क्लाइव की कूटनीति और वांडीवाश के युद्ध (1760) में जीत से फ्रांसीसियों की शक्ति पूरी तरह समाप्त हो गई।
- यूरोपीय प्रतिद्वंद्वियों को हराने के बाद अंग्रेजों ने भारतीय शासकों को कमजोर कर अपने नियंत्रण की स्थापना शुरू की।
- वर्ष 1757 के ऐतिहासिक ‘प्लासी के युद्ध’ में रॉबर्ट क्लाइव ने बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को धोखे से हराकर ब्रिटिश शासन की नींव रखी।
- इसके बाद 1764 के ‘बक्सर के युद्ध’ में अंग्रेजों ने बंगाल के नवाब, अवध के नवाब और मुगल सम्राट की संयुक्त सेना को पराजित किया।
- बक्सर की जीत के बाद 1765 की ‘इलाहाबाद की संधि’ द्वारा अंग्रेजों को बंगाल, बिहार और ओडिशा की वास्तविक दीवानी (राजस्व अधिकार) मिल गई।
- दक्षिण भारत में अपने नियंत्रण के लिए अंग्रेजों ने चार ‘आंग्ल-मैसूर युद्ध’ लड़े और 1799 में वीर टीपू सुल्तान को हराकर मैसूर पर अधिकार किया।
- तीन ‘आंग्ल-मराठा युद्धों’ (1775-1818) के माध्यम से अंग्रेजों ने भारत की सबसे बड़ी चुनौती, मराठा महासंघ को भी पूरी तरह छिन्न-भिन्न कर दिया।
- इस प्रकार वेलेजली की सहायक संधि और डलहौजी की हड़प नीति द्वारा अंग्रेजों ने संपूर्ण भारत पर ब्रिटिश औपनिवेशिक नियंत्रण स्थापित कर लिया।
मुगल पतन और क्षेत्रीय राज्यों का उदय
- औरंगजेब की मृत्यु (1707 ई.) के बाद केंद्रीय सत्ता के कमजोर होते ही विशाल मुगल साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह बिखरने लगा।
- कमजोर केंद्रीय प्रशासन, अयोग्य शासकों और आर्थिक दिवालियेपन के कारण देश में कई स्वतंत्र और अर्ध-स्वतंत्र क्षेत्रीय राज्यों का उदय हुआ।
- मुगलों के पतन से उत्पन्न राजनीतिक शून्यता को भरने में दक्षिण के मराठा साम्राज्य का उदय सबसे महत्वपूर्ण और शक्तिशाली घटना थी।
- छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा बोया गया स्वराज्य का बीज पेशवाओं के काल में एक अखिल भारतीय महाशक्ति के रूप में विकसित हुआ।
- उत्तर-पश्चिम में बंदा सिंह बहादुर के बलिदान के बाद दमन का सामना करते हुए सिखों ने खुद को ‘मिसलों’ (सैन्य गुटों) में संगठित किया।
- कालान्तर में महाराजा रणजीत सिंह ने इन मिसलों को एकजुट कर पंजाब में एक अत्यंत शक्तिशाली और आधुनिक सिख साम्राज्य की स्थापना की।
- पूर्वी भारत में सुप्रसिद्ध मुगल सूबेदार मुर्शिद कुली खान ने स्वतंत्र नीति अपनाते हुए बंगाल के स्वतंत्र नवाबों के वंश की नींव रखी।
- बंगाल अपनी उपजाऊ भूमि और विदेशी व्यापार के कारण तत्कालीन भारत का सबसे समृद्ध और आर्थिक रूप से संपन्न क्षेत्रीय राज्य बन गया था।
- नवाब अलीवर्दी खान के समय बंगाल का मुगलों से संबंध पूरी तरह टूट गया, जिसे बाद में अंग्रेजों ने प्लासी के युद्ध (1757) में हथिया लिया।
- दिल्ली के निकट गंगा-यमुना दोआब के समृद्ध क्षेत्र में सादत खान (बुर्हान-उल-मुल्क) ने अवध के स्वायत्त राज्य की स्थापना की।
- अवध के नवाबों ने अपनी राजधानी लखनऊ को कला, वास्तुकला, तहजीब और समृद्ध सांस्कृतिक गतिविधियों का एक बड़ा केंद्र बनाया।
- दक्षिण के दक्कन क्षेत्र में मुगल वजीर चिन किलिच खान (निजाम-उल-मुल्क) ने 1724 ईस्वी में हैदराबाद राज्य की नींव रखी।
- हैदराबाद के निजामों ने मुगलों की संप्रभुता को नाममात्र के लिए स्वीकार किया, लेकिन उनका आंतरिक प्रशासन पूरी तरह स्वतंत्र था।
- इन प्रमुख राज्यों के अलावा दक्षिण भारत में हैदर अली और टीपू सुल्तान के नेतृत्व में मैसूर राज्य एक बड़ी सैन्य ताकत बनकर उभरा।
- मैसूर ने अपनी सेना का यूरोपीय तर्ज पर आधुनिकीकरण किया और व्यापार पर राजकीय नियंत्रण स्थापित कर अंग्रेजों को कड़ी टक्कर दी।
- राजपूताना में भी जयपुर के सवाई राजा जयसिंह जैसे शासकों ने खगोल विज्ञान और कला को बढ़ावा देते हुए अपनी स्थिति मजबूत की।
- इन क्षेत्रीय राज्यों के उदय को ‘मुगल व्यवस्था के पूर्ण विनाश’ के बजाय ‘प्रशासनिक शक्तियों के विकेंद्रीकरण’ के रूप में देखा जाता है।
- हालांकि इन राज्यों में स्थानीय स्तर पर आर्थिक और सांस्कृतिक प्रगति हुई, लेकिन इनमें आपसी एकता और अखिल भारतीय दृष्टि का सर्वथा अभाव था।
- ये नवोदित राज्य आपस में ही सीमा और राजस्व के लिए लगातार लड़ते रहे, जिससे देश की आंतरिक सुरक्षा और सैन्य ढांचा बेहद कमजोर हो गया।
अंततः, क्षेत्रीय राज्यों की इसी आपसी फूट और बिखराव का पूरा लाभ उठाकर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने पूरे भारत पर अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया।