Skip to content
- औरंगजेब की मृत्यु के बाद उसके पुत्रों के बीच हुए खूनी उत्तराधिकार के युद्ध में विजयी होकर उसका दूसरा पुत्र मुअज्जम गद्दी पर बैठा।
- मुअज्जम ने 63 वर्ष की वृद्ध आयु में ‘बहादुर शाह प्रथम’ (शाह आलम प्रथम) के नाम से मुगल सिंहासन संभाला।
- वृद्ध होने और अत्यधिक उदार स्वभाव के कारण उसे इतिहास में ‘शाह-ए-बेखबर’ के उपनाम से भी जाना जाता है।
- गद्दी पर बैठते ही उसने औरंगजेब की अनुदार और कट्टर धार्मिक नीतियों को बदलकर मेल-मिलाप की नीति अपनाई।
- बहादुर शाह प्रथम ने हिंदुओं से औरंगजेब द्वारा लगाया गया दमनकारी ‘जजिया कर’ व्यावहारिक रूप से वसूलना बंद कर दिया था।
- उसने मराठों के साथ शांति स्थापित करने के लिए छत्रपति शिवाजी महाराज के पोते शाहू जी को मुगल कैद से मुक्त किया।
- हालांकि, उसने मराठों को दक्कन की ‘चौथ’ वसूलने का अधिकार तो दे दिया, लेकिन ‘सरदेशमुखी’ का अधिकार देने से मना कर दिया।
- उसने राजपूत राज्यों (मारवाड़ और आमेर) के आंतरिक मामलों में शुरुआत में हस्तक्षेप किया, लेकिन बाद में उनसे समझौता कर लिया।
- बहादुर शाह ने आमेर के राजा जयसिंह के स्थान पर विजयसिंह को और मारवाड़ के अजीत सिंह को राजा के रूप में मान्यता दी।
- सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह जी के साथ बहादुर शाह प्रथम के संबंध अत्यंत सौहार्दपूर्ण और शांतिपूर्ण थे।
- उसने गुरु गोविंद सिंह जी को एक उच्च मनसब (पद) प्रदान किया था और वे मुगलों के सैन्य अभियानों में साथ भी गए थे।
- वर्ष 1708 ईस्वी में गुरु गोविंद सिंह जी की मृत्यु के बाद सिखों का नेतृत्व प्रतापी बंदा सिंह बहादुर के हाथों में आया।
- बंदा सिंह बहादुर ने पंजाब में मुगलों के खिलाफ एक भीषण और हिंसक विद्रोह शुरू कर दिया, जिससे शांति व्यवस्था भंग हो गई।
- बंदा बहादुर के नेतृत्व में सिखों ने मुगलों के सरहिंद सूबे पर अधिकार कर लिया और वहां अपने स्वतंत्र सिक्के जारी किए।
- सिखों के इस बढ़ते विद्रोह को दबाने के लिए बहादुर शाह प्रथम को स्वयं पंजाब की ओर सैन्य अभियान का नेतृत्व करना पड़ा।
- मुगल सेना ने सिखों को पीछे धकेल दिया और उनके प्रमुख गढ़ ‘लोहगढ़’ के किले पर दोबारा अधिकार कर लिया।
- बहादुर शाह प्रथम के दरबार में 1711 ईस्वी में जोशुआ केटलायर के नेतृत्व में एक डच (Dutch) शिष्टमंडल भी आया था।
- राजकीय कार्यों में अत्यधिक लापरवाही और सरदारों को जागीरें बांटने के कारण उसके समय में शाही खजाना पूरी तरह खाली हो गया।
- फरवरी 1712 ईस्वी में बंदा बहादुर के खिलाफ सैन्य अभियान के दौरान लाहौर में बहादुर शाह प्रथम की अचानक मृत्यु हो गई।
- उसकी मृत्यु के बाद उसके शव को दिल्ली लाया गया और महरौली में कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह के पास मोती मस्जिद परिसर में दफनाया गया।
उत्तर-मुगल काल (Later Mughal Period)
- बहादुर शाह प्रथम की मृत्यु के बाद उसका अयोग्य पुत्र जहांदार शाह (1712-1713 ई.) जुल्फिकार खान की मदद से गद्दी पर बैठा।
- उसने अपने शासनकाल में जजिया कर को पूरी तरह समाप्त कर दिया और इतिहास में उसे ‘लंपट मूर्ख’ कहा गया है।
- जहांदार शाह पर उसकी पसंदीदा नर्तकी ‘लाल कुंवर’ का अत्यधिक प्रभाव था, जिसने प्रशासनिक व्यवस्था को कमजोर किया।
- इसके बाद फर्रुख़सियर (1713-1719 ई.) ‘सैयद बंधुओं’ (किंग मेकर्स) की सहायता से जहांदार शाह की हत्या कर सुल्तान बना।
- फर्रुख़सियर के समय ही 1716 ईस्वी में सिख नेता बंदा सिंह बहादुर को मुगलों द्वारा बंदी बनाकर मार दिया गया था।
- वर्ष 1717 में फर्रुख़सियर ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को व्यापारिक छूट का एक शाही फरमान (मैग्नाकार्टा) जारी किया था।
- सैयद बंधुओं ने मराठा पेशवा बालाजी विश्वनाथ की मदद से 1719 में फर्रुख़सियर को अंधा करके उसकी हत्या करवा दी।
- फर्रुख़सियर के बाद रफी उल-दरजात गद्दी पर बैठा, जो सबसे कम समय (मात्र 3 महीने से कुछ अधिक) तक शासन करने वाला मुगल राजा था।
- तपेदिक (टीबी) के कारण रफी उल-दरजात की मृत्यु के बाद उसका भाई रफ़ी उद-दौलत ‘शाहजहाँ द्वितीय’ की उपाधि के साथ गद्दी पर बैठा।
- रफ़ी उद-दौलत भी पेचिश की बीमारी के कारण मात्र साढ़े तीन महीने शासन करने के बाद मृत्यु को प्राप्त हुआ।
- इसके बाद सैयद बंधुओं ने रोशन अख्तर को मुहम्मद शाह ‘रंगीला‘ (1719-1748 ई.) के नाम से मुगल सिंहासन पर बिठाया।
- मुहम्मद शाह ने निजाम-उल-मुल्क की मदद से ‘सैयद बंधुओं’ के आतंक और प्रभाव का पूरी तरह अंत कर दिया।
- विलासितापूर्ण जीवन और प्रशासनिक लापरवाही के कारण उसे ‘रंगीला’ कहा गया, जिसके समय अवध, बंगाल और हैदराबाद स्वतंत्र हो गए।
- रंगीला के काल में ही 1739 ईस्वी में ईरान के नेपोलियन ‘नादिर शाह’ ने दिल्ली पर आक्रमण कर मयूर सिंहासन और कोहिनूर हीरा लूटा।
- आगे चलकर शाह आलम द्वितीय (1759-1806 ई.) राजा बना, जिसके समय पानीपत का तीसरा युद्ध (1761) और बक्सर का युद्ध (1764) हुआ था।
- बक्सर के युद्ध में हार के बाद 1765 की ‘इलाहाबाद की संधि’ के तहत शाह आलम द्वितीय अंग्रेजों का पहला पेंशनभोगी शासक बना।
- उसके बाद अकबर शाह द्वितीय (1806-1837 ई.) गद्दी पर बैठा, जिसका शासनकाल पूरी तरह अंग्रेजों के संरक्षण और लाल किले तक सीमित था।
- अकबर शाह द्वितीय ने ही समाज सुधारक राममोहन राय को उनकी पेंशन के सिलसिले में इंग्लैंड भेजते समय ‘राजा’ की उपाधि दी थी।
- अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फर (1837-1858 ई.) थे, जो ‘ज़फर’ उपनाम से प्रसिद्ध उर्दू शायरी लिखते थे।
- उन्होंने 1857 की क्रांति में विद्रोहियों का नेतृत्व किया, जिसके बाद अंग्रेजों ने उन्हें रंगून (म्यांमार) निर्वासित कर दिया जहाँ इस राजवंश का अंत हुआ।
मुगल साम्राज्य का पतन
- वर्ष 1707 ईस्वी में औरंगजेब की मृत्यु के बाद महान और शक्तिशाली मुगलों का युग समाप्त हो गया और साम्राज्य का पतन तेजी से हुआ।
- पतन का एक प्रमुख कारण औरंगजेब की धार्मिक कट्टरता और अनुदार नीति थी, जिसने बहुसंख्यक हिंदू जनता को साम्राज्य के खिलाफ कर दिया।
- औरंगजेब द्वारा दोबारा लगाए गए ‘जजिया कर’ और मंदिरों को तोड़े जाने के कारण राजपूत, सिख, जाट और मराठे मुगलों के कट्टर शत्रु बन गए।
- औरंगजेब की ‘दक्कन नीति’ (दक्षिण अभियान) मुगल साम्राज्य के लिए एक नासूर सिद्ध हुई, जिसने शाही खजाने और सेना को पूरी तरह तबाह कर दिया।
- औरंगजेब के बाद गद्दी पर बैठने वाले ‘उत्तर-मुगल शासक’ (Later Mughals) अत्यधिक अयोग्य, विलासी और अदूरदर्शी थे।
- बहादुर शाह प्रथम, जहांदार शाह और मुहम्मद शाह ‘रंगीला’ जैसे शासक विशाल साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था को संभालने में पूरी तरह अक्षम रहे।
- मुगलों में उत्तराधिकार का कोई निश्चित कानून नहीं था, जिससे प्रत्येक सम्राट की मृत्यु के बाद शहजादों के बीच खूनी गृहयुद्ध शुरू हो जाता था।
- इन आंतरिक युद्धों ने मुगल सेना को कमजोर किया और शाही दरबार को गुटबाजी तथा राजनीतिक साज़िशों का केंद्र बना दिया।
- विदेशी तुरानी, ईरानी और अफगानी अमीरों (सरदारों) के आपसी संघर्ष ने मुगल सल्तनत की केंद्रीय शक्ति की जड़ें हिला दीं।
- ‘सैयद बंधु’ जैसे शक्तिशाली वजीरों ने अपनी मर्तबा बढ़ाने के लिए सम्राटों को कठपुतली बना दिया और उनकी मर्जी से राजा बदलने लगे।
- लगातार युद्धों, जागीरदारी संकट और शासकों की फिजूलखर्ची के कारण साम्राज्य की आर्थिक स्थिति पूरी तरह दिवालिया हो गई।
- मुगलों ने अपनी सेना के आधुनिकीकरण पर ध्यान नहीं दिया; उनकी सेना अंग्रेजों और मराठों की तुलना में पुरानी युद्ध तकनीकों पर निर्भर थी।
- केंद्रीय सत्ता के कमजोर होते ही बंगाल, अवध, हैदराबाद और मैसूर जैसे समृद्ध प्रांतों ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया।
- इन स्वतंत्र राज्यों के गठन से दिल्ली सल्तनत का भौगोलिक आकार बहुत छोटा हो गया और राजस्व का मुख्य जरिया भी खत्म हो गया।
- इसी कमजोर दौर में दक्षिण भारत में ‘मराठा साम्राज्य’ का तेजी से उदय हुआ, जिसने मुगलों की राजनीतिक सर्वोच्चता को समाप्त कर दिया।
- वर्ष 1739 ईस्वी में फारस के क्रूर शासक ‘नादिर शाह’ के आक्रमण ने दिल्ली को लूटा और मुगलों के सैन्य गौरव को मटियामेट कर दिया।
- नादिर शाह अपने साथ मयूर सिंहासन और कोहिनूर हीरा ले गया, जिससे मुगलों की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को भारी ठेस पहुँची।
- इसके बाद अफगान शासक अहमद शाह अब्दाली के बार-बार होने वाले आक्रमणों ने बचे-खुचे मुगल साम्राज्य को पूरी तरह खोखला कर दिया।
- इस राजनीतिक शून्यता और आंतरिक कमजोरी का पूरा लाभ उठाकर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में कदम जमाना शुरू कर दिया।
- अंततः, बक्सर के युद्ध (1764) और 1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजों ने अंतिम मुगल बादशाह को हटाकर इस महान राजवंश का हमेशा के लिए अंत कर दिया।