व्यापारिक मार्ग की खोज: 1453 में कुस्तुनतुनिया (Constantinople) पर उस्मानी तुर्कों के कब्जे के कारण यूरोप-भारत का पुराना व्यापारिक मार्ग बंद हो गया।
नए समुद्री मार्ग की आवश्यकता: मसालों के व्यापार पर एकाधिकार और मुनाफा कमाने के लिए यूरोपीय देशों ने भारत के लिए नए मार्ग खोजे।
पुर्तगालियों का आगमन (1498): वास्को डी गामा 1498 में केप ऑफ गुड होप होते हुए भारत के कालीकट तट पर पहुँचने वाला पहला पुर्तगाली था।
जमोरिन का स्वागत: कालीकट के स्थानीय हिंदू शासक जमोरिन ने वास्को डी गामा का स्वागत किया, जिससे अरब व्यापारी काफी नाराज हुए।
प्रथम पुर्तगाली फैक्ट्री (1503): पुर्तगालियों ने भारत में व्यापारिक हितों की सुरक्षा के लिए कोचीन में अपनी पहली व्यापारिक फैक्ट्री स्थापित की।
फ्रांसिस्को डी अल्मीडा (1505): अल्मीडा भारत में पहला पुर्तगाली वायसराय बना, जिसने समुद्र पर नियंत्रण के लिए ‘ब्लू वॉटर पॉलिसी’ लागू की।
अल्फांसो डी अल्बुकर्क (1509): अल्बुकर्क को भारत में पुर्तगाली साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक माना जाता है, जिसने आक्रामक क्षेत्रीय नीतियां अपनाईं।
गोवा पर विजय (1510): अल्बुकर्क ने 1510 में बीजापुर के सुल्तान से समृद्ध गोवा को जीतकर पुर्तगाली शासन का केंद्र बनाया।
नीनो डी कुन्हा (1529): वायसराय नीनो डी कुन्हा ने पुर्तगाली सरकार का मुख्यालय कोचीन से बदलकर पूरी तरह गोवा स्थानांतरित कर दिया।
कार्टाज़ प्रणाली (Cartaz System): पुर्तगालियों ने हिंद महासागर में व्यापार को नियंत्रित करने के लिए जबरन परमिट या सुरक्षा कर व्यवस्था लागू की।
पुर्तगाली पतन के कारण: धार्मिक असहिष्णुता, ब्राजील की खोज और अन्य यूरोपीय ताकतों से सैन्य प्रतिस्पर्धा के कारण पुर्तगाली कमजोर हो गए।
डचों का आगमन (1596): पुर्तगालियों के बाद हॉलैंड (नीदरलैंड) के डच नागरिक कार्नेलिस डी हाउटमैन के नेतृत्व में भारत आए।
डच ईस्ट इंडिया कंपनी (1602): डच संसद के प्रस्ताव द्वारा कई व्यापारिक कंपनियों को मिलाकर ‘वीओसी’ (VOC) कंपनी का गठन किया गया।
प्रथम डच फैक्ट्री (1605): डचों ने आंध्र प्रदेश के मसूलीपट्टनम में अपनी पहली व्यापारिक कोठी या फैक्ट्री की नींव रखी।
डच व्यापार का केंद्र: डचों का मुख्य ध्यान भारत के सूती वस्त्रों और इंडोनेशिया के मसाला द्वीप समूह के व्यापार पर केंद्रित था।
वेदारा का युद्ध (1759): इस निर्णायक युद्ध में ब्रिटिश सेना ने डचों को बुरी तरह पराजित कर भारत से उनका प्रभाव खत्म किया।
अंग्रेजों का आगमन (1599): जॉन मिल्डेनहॉल नामक ब्रिटिश यात्री थल मार्ग से भारत आने वाला सबसे पहला अंग्रेज नागरिक था।
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी (1600): महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने 31 दिसंबर 1600 को कंपनी को पूर्व में व्यापार का एकाधिकार पत्र दिया।
कैप्टन हॉकिंस (1608): हॉकिंस हेक्टर नामक जहाज से जहांगीर के दरबार में व्यापारिक रियायतें और अनुमति मांगने के लिए पहुंचा।
सूरत फैक्ट्री (1613): शाही फरमान मिलने के बाद अंग्रेजों ने पश्चिमी तट पर सूरत में अपनी पहली स्थायी फैक्ट्री स्थापित की।
सर थॉमस रो (1615): सम्राट जेम्स प्रथम के दूत थॉमस रो ने जहांगीर से पूरे मुगल साम्राज्य में व्यापार की अनुमति ली।
स्वैली का युद्ध (1612): अंग्रेजों ने कैप्टन बेस्ट के नेतृत्व में पुर्तगाली बेड़े को हराकर मुगलों को अपनी नौसैनिक शक्ति दिखाई।
मद्रास की स्थापना (1639): फ्रांसिस डे ने चंद्रगिरि के राजा से मद्रास पट्टे पर लेकर वहां ‘फोर्ट सेंट जॉर्ज’ किला बनवाया।
बंबई की प्राप्ति (1661): ब्रिटिश राजकुमार चार्ल्स द्वितीय को पुर्तगाली राजकुमारी कैथरीन से विवाह के बदले बंबई दहेज में मिला।
कलकत्ता की नींव (1690): जॉब चार्नोक ने सूतानाती, कलिकता और गोविंदपुर गांवों को मिलाकर आधुनिक कलकत्ता शहर की स्थापना की थी।
फोर्ट विलियम (1700): कलकत्ता की किलेबंद बस्ती को फोर्ट विलियम नाम दिया गया, जो बाद में ब्रिटिश सत्ता का मुख्य केंद्र बना।
फारुखसियर का फरमान (1717): मुगल सम्राट फारुखसियर ने कंपनी को बंगाल में ₹3000 वार्षिक के बदले टैक्स-फ्री व्यापार का ‘मैग्नाकार्टा’ दिया।
डेनिस का आगमन (1616): डेनमार्क के डेनिस व्यापारियों ने भारत आकर व्यापार शुरू किया, लेकिन वे ज्यादा प्रभाव नहीं छोड़ पाए।
डेनिस की फैक्ट्रियां: डेनिसों ने तंजौर के ट्रांकेबार (1620) और बंगाल के सेरामपुर (1676) में अपनी प्रमुख व्यापारिक बस्तियां बसाईं।
डेनिस का प्रस्थान (1845): व्यावसायिक विफलता के कारण डेनिसों ने अपनी सभी भारतीय संपत्तियां ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को बेच दीं।
फ्रांसीसियों का आगमन (1664): फ्रांस के राजा लुई चौदहवें के मंत्री कोल्बर्ट के प्रयासों से ‘कंपनी देस इन्देस ओरिएंटलेस’ बनी।
सरकारी कंपनी: फ्रांसीसी कंपनी पूरी तरह सरकारी नियंत्रण और धन पर निर्भर थी, जो इसकी सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुई।
प्रथम फ्रांसीसी फैक्ट्री (1667): फ्रैंकोइस कैरॉन के नेतृत्व में फ्रांसीसियों ने भारत के सूरत शहर में अपनी पहली फैक्ट्री स्थापित की।
पांडिचेरी की स्थापना (1673): फ्रैंकोइस मार्टिन ने पांडिचेरी की स्थापना की, जो भारत में फ्रांसीसी संस्कृति और सत्ता का केंद्र बना।
आंग्ल-फ्रांसीसी संघर्ष: भारत और अमेरिका में वर्चस्व को लेकर अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच तीन प्रसिद्ध ‘कर्नाटक युद्ध’ लड़े गए।
जोसफ डुप्ले (1742): फ्रांसीसी गवर्नर डुप्ले ने भारतीय राजाओं के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने की ‘सहायक संधि’ नीति शुरू की।
वांडिवाश का युद्ध (1760): ब्रिटिश जनरल आयरकूट ने फ्रांसीसी सेना को हराकर भारत में उनके साम्राज्यवादी सपनों को हमेशा के लिए तोड़ दिया।
यूरोपीय सफलता के कारण: यूरोपीय शक्तियों के पास उन्नत हथियार, अनुशासित सेना, मजबूत नौसेना और बेहतर वित्तीय प्रबंधन प्रणाली मौजूद थी।
भारतीय शासकों की कमजोरी: भारतीय राज्यों में आपसी एकता का अभाव, पुराना सैन्य तंत्र और राजनीतिक दूरदर्शिता की भारी कमी थी।
ब्रिटिश सर्वोच्चता: अंततः सभी यूरोपीय और भारतीय प्रतिद्वंद्वियों को हराकर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी भारत की सर्वोच्च राजनीतिक शक्ति बनी।
1857 से पहले हुए जन-प्रतिरोध (नागरिक, आदिवासी और किसान विद्रोह):
प्रतिरोध का कारण: ब्रिटिश आर्थिक शोषण, अत्यधिक भूमि राजस्व, जबरन वसूली और स्थानीय परंपराओं में हस्तक्षेप ने जन-विद्रोहों को जन्म दिया।
सन्यासी विद्रोह (1763-1800): बंगाल में अकाल और तीर्थयात्राओं पर ब्रिटिश प्रतिबंधों के खिलाफ सन्यासी और फकीरों ने हिंसक संघर्ष शुरू किया।
आनंदमठ का संदर्भ: सन्यासी विद्रोह बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ का मुख्य आधार और प्रेरणा स्रोत बना।
पाइक विद्रोह (1817): ओडिशा में बख्शी जगबंधु के नेतृत्व में पाइक सैनिकों ने ब्रिटिश शासन और दमनकारी भूमि नीतियों के खिलाफ विद्रोह किया।
अहोम विद्रोह (1828): असम में अंग्रेजों द्वारा प्रथम आंग्ल-बर्मा युद्ध के बाद किए वादे से मुकरने पर गोमधर कोंवर ने विद्रोह किया।
पागलपंथी विद्रोह (1825-1835): करम शाह और टीटू मीर के पुत्र करम शाह द्वारा स्थापित धार्मिक अर्ध-पंथ ने बंगाल के जमींदारों का विरोध किया।
फराजी आंदोलन (1838-1857): हाजी शरीअतुल्लाह द्वारा स्थापित इस आंदोलन ने बंगाल में काश्तकारों के अधिकारों और धार्मिक सुधारों की वकालत की।
वहाबी आंदोलन (1820-1870): रायबरेली के सैयद अहमद के नेतृत्व में यह ब्रिटिश विरोधी और इस्लामी पुनरुत्थानवादी आंदोलन भारत में फैला।
कोल विद्रोह (1831-1832): छोटानागपुर क्षेत्र में बुद्धू भगत के नेतृत्व में कोल आदिवासियों ने अपनी जमीनों पर बाहरी नियंत्रण का कड़ा विरोध किया।
संथाल हुल (1855-1856): सिद्धू और कान्हू के नेतृत्व में संथालों ने महाजनों और ब्रिटिश राज के खिलाफ एक व्यापक और हिंसक विद्रोह किया।
खोंड विद्रोह (1837-1856): चक्र बिसोई के नेतृत्व में खोंड जनजाति ने अपनी ‘मरियाह’ (मानव बलि) प्रथा पर ब्रिटिश प्रतिबंध का विरोध किया।
भील विद्रोह (1817-1819): खानदेश (महाराष्ट्र) क्षेत्र में भील आदिवासियों ने कृषि संबंधी परेशानियों और नए ब्रिटिश शासन के खिलाफ हथियार उठाए।
कट्टबोम्मन का विद्रोह (1792-1799): तमिलनाडु के पालेगार (Poligar) वीरपांड्या कट्टबोम्मन ने अंग्रेजों को संप्रभुता और अत्यधिक कर देने से साफ इनकार कर दिया।
दीवान वेलु थम्पी (1808-1809): त्रावणकोर के दीवान वेलु थम्पी ने सहायक संधि के जबरन वित्तीय बोझ के खिलाफ ब्रिटिश सेना के विरुद्ध विद्रोह किया।
रामोसी विद्रोह (1822): पश्चिमी घाट के रामोसी आदिवासियों ने चित्तूर सिंह के नेतृत्व में अकाल और ब्रिटिश दमन के विरुद्ध संघर्ष किया।
खासी विद्रोह (1829): तीरत सिंह के नेतृत्व में खासी जनजातियों ने अपनी पहाड़ियों में ब्रिटिश सड़क निर्माण योजना का हिंसक विरोध किया।
कित्तूर चेनम्मा विद्रोह (1824): रानी चेनम्मा ने अंग्रेजों की ‘हड़प नीति’ का विरोध करते हुए कित्तूर (कर्नाटक) की स्वतंत्रता के लिए युद्ध लड़ा।
किसान आंदोलनों का स्वरूप: शुरुआती किसान विद्रोह मुख्य रूप से स्थानीय जमींदारों, साहूकारों और अंग्रेजों के साझा गठबंधन के खिलाफ केंद्रित थे।
धार्मिक-राजनैतिक नेतृत्व: 1857 से पहले के अधिकांश नागरिक विद्रोहों का नेतृत्व बेदखल शासकों, धार्मिक नेताओं या असंतुष्ट जमींदारों ने किया।
विद्रोहों की विफलता: आधुनिक हथियारों की कमी, सीमित भौगोलिक विस्तार और आपसी समन्वय न होने के कारण ब्रिटिश सेना ने इन्हें दबा दिया।