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ऐतिहासिक अध्ययन

प्रागैतिहासिक काल

  • उत्तराखंड का प्रागैतिहासिक काल मानव सभ्यता के शुरुआती विकास और आदिमानवों की गतिविधियों को प्रदर्शित करता है।
  • इस काल के अध्ययन के लिए मुख्य रूप से पुरातात्विक साक्ष्य जैसे शैलचित्र, गुफाएं, पत्थर के उपकरण और प्राचीन मृदभांड आधार हैं।
  • उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में स्थित ‘लाखू उडियार’ प्रागैतिहासिक काल के शैलचित्रों का सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण केंद्र है।
  • लाखू उडियार की खोज वर्ष 1968 में डॉ. एम.पी. जोशी द्वारा सुयाल नदी के तट पर की गई थी।
  • इस गुफा में आदिमानवों द्वारा खींचे गए मानवों, जानवरों और विभिन्न ज्यामितीय आकृतियों के सुंदर चित्र मिलते हैं।
  • इन शैलचित्रों में मुख्य रूप से लाल, काले और सफेद रंगों का प्रयोग किया गया है जो उस समय की कलात्मक समझ को दर्शाते हैं।
  • अल्मोड़ा के ही ‘फड़कादौली’ और ‘पेटशाल’ नामक स्थानों से भी प्राचीन काल के कई महत्वपूर्ण शैलचित्र प्राप्त हुए हैं।
  • चमोली जिले के अलकनंदा घाटी में स्थित ‘गोरख्या उडियार’ (डुंगरी गांव) एक अन्य अत्यंत महत्वपूर्ण प्रागैतिहासिक स्थल है।
  • गोरख्या उडियार के शैलचित्र लाखू उडियार की तुलना में अधिक चमकीले हैं, जिनमें मनुष्यों को जानवरों को खदेड़ते हुए दिखाया गया है।
  • चमोली के ‘किमनी गांव’ से सफेद रंग से चित्रित हथियार और पशुओं के दुर्लभ शैलचित्र पुरातात्विक खोज में मिले हैं।
  • चमोली जिले का ‘मलारी गांव’ अपनी प्राचीन कब्रगाहों और अनोखी पुरातात्विक खोजों के लिए इतिहास में बेहद प्रसिद्ध है।
  • गढ़वाल विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने वर्ष 1956 और उसके बाद मलारी गांव में व्यापक उत्खनन (खुदाई) कार्य किया था।
  • मलारी गांव से वर्ष 2002 में एक मानव कंकाल के साथ 2 किलोग्राम का एक शुद्ध सोने का मुखौटा (Mask) मिला था।
  • इसके अतिरिक्त, मलारी से मिट्टी के खूबसूरत बर्तन और जानवरों के अवशेष भी मिले हैं, जिनका संबंध महापाषाण काल से है।
  • उत्तरकाशी जिले में यमुना घाटी में स्थित ‘हुडली’ नामक स्थान से नीले रंग के प्रयोग वाले दुर्लभ शैलचित्र प्राप्त हुए हैं।
  • पिथौरागढ़ जिले के ‘बनकोट’ क्षेत्र से तांबे की 8 मानव आकृतियाँ (Copper Anthropomorphs) मिली हैं, जो ताम्र संस्कृति की गवाह हैं।
  • अल्मोड़ा के ‘ल्वेथाप’ नामक स्थान से प्राप्त शैलचित्रों में मानव को हाथों में हाथ डालकर नृत्य करते हुए दिखाया गया है।
  • रामगंगा घाटी के कफनकोट क्षेत्र से भी पाषाण काल के अवशेष और प्राचीन मानव बस्तियों के साक्ष्य मिले हैं।
  • ये सभी पुरातात्विक खोजें प्रमाणित करती हैं कि प्राचीन काल में उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र आदिमानवों के प्रमुख निवास स्थान थे।
  • उत्तराखंड का प्रागैतिहासिक काल यहाँ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और मानव इतिहास की निरंतरता का एक जीवंत दस्तावेज है।

प्राचीन काल : ऐतिहासिक, पुरातात्विक और साहित्यिक स्रोत

  • उत्तराखंड का प्राचीन काल प्रागैतिहासिक काल के बाद का वह समय है, जिसकी जानकारी पुरातात्विक साक्ष्यों के साथ-साथ पौराणिक ग्रंथों से मिलती है।
  • वर्ष 1877 में रिबेट कार्नक द्वारा द्वाराहाट (चंपावत) के पास से महाश्म संस्कृति (Megalithic Culture) से संबंधित लगभग 200 कपमार्क्स खोजे गए।
  • उत्तराखंड में पश्चिमी रामगंगा घाटी के नौलाग्राम से डॉ. यशोधर मठपाल ने ऐतिहासिक महत्व के 73 कपमार्क्स (ओखली) खोजे।
  • हरिद्वार के बहादराबाद से वर्ष 1951 और 1953 की खुदाई में प्राचीन ताम्र उपकरण, पाषाण उपकरण और मृदभांड प्राप्त हुए हैं।
  • पिथौरागढ़ के बनकोट से वर्ष 1989 में 8 ताम्र उपकरण मिले, जिन्हें वर्तमान में अल्मोड़ा के राजकीय संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है।
  • अलकनंदा घाटी के थापली और यमुना घाटी के पुरोला से महाभारतकालीन माने जाने वाले चित्रित धूसर मृदभांड (PGW) के साक्ष्य मिले हैं।
  • अल्मोड़ा के प्रसिद्ध कसार देवी शैलाश्रय से आदिमानवों या प्राचीन मनुष्यों के 14 नर्तकों का एक बेहद सुंदर चित्रण प्राप्त होता है।
  • उत्तरकाशी के देवल गाँव (यमुना घाटी) से एक भैंसामुखी चतुर्भुज मानव प्रतिमा मिली है, जिसे इतिहासकारों ने सिंधु घाटी सभ्यता के समकालीन माना है।
  • उत्तराखंड का सबसे पहला साहित्यिक उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है, जहाँ इस पावन क्षेत्र को ‘देवभूमि’ और ‘मनीषियों की पूर्ण भूमि’ कहा गया है।
  • ऐतरेय ब्राह्मण ग्रंथ में उत्तराखंड के भू-भाग के लिए ‘उत्तर-कुरु’ शब्द का विशेष रूप से प्रयोग किया गया है।
  • स्कंद पुराण में हिमालय के पांच खंडों का वर्णन है, जिसमें से ‘केदारखंड’ गढ़वाल क्षेत्र को और ‘मानसखंड’ कुमाऊं क्षेत्र को दर्शाता है।
  • पुराणों में केदारखंड और मानसखंड के संयुक्त क्षेत्र को संयुक्त रूप से ब्रह्मपुर, खसदेश, इलावर्त और उत्तर-खंड नाम दिया गया है।
  • बौद्ध साहित्य के पालि भाषा के ग्रंथों में उत्तराखंड क्षेत्र के लिए भौगोलिक रूप से ‘हिमवंत’ शब्द का प्रयोग किया गया है।
  • महाभारत के वन पर्व के अनुसार, प्राचीन काल में गढ़वाल क्षेत्र पर शक्तिशाली पुलिंद (कुणिंद) और किरात जातियों का आधिपत्य था।
  • महाभारत काल में पुलिंद राजा सुबाहु की राजधानी श्रीनगर (गढ़वाल) थी, जिसने युद्ध में पांडवों की ओर से भाग लिया था।
  • रामायण काल में असुर राजा बाणासुर का राज्य गढ़वाल क्षेत्र में विस्तृत था और उसकी राजधानी ज्योतिषपुर यानी आधुनिक जोशीमठ थी।
  • कालिदास के प्रसिद्ध महाकाव्य ‘रघुवंश’ में भी यहाँ की प्राचीन किरात जाति और गढ़वाल हिमालय के लिए ‘गौरी-गुरु’ शब्द का उल्लेख मिलता है।
  • इतिहासकारों के अनुसार, उत्तराखंड में निवास करने वाली सबसे पहली और प्राचीनतम मानव प्रजाति ‘कोल’ (मुंड या शबर) थी।
  • कोल प्रजाति के लोग मुख्य रूप से प्रकृति प्रेमी थे जो नाग पूजा के साथ-साथ लिंग पूजा भी किया करते थे।
  • कोल प्रजाति के पश्चात उत्तराखंड की धरती पर किरात (किन्नर या कीर) और खस प्रजातियों के आधिपत्य व निवास के ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं।

मध्यकालीन इतिहास : ऐतिहासिक तथ्य

  • उत्तराखंड का मध्यकालीन इतिहास मुख्य रूप से 7वीं-8वीं शताब्दी ईस्वी से लेकर 19वीं शताब्दी ईस्वी के प्रारंभ तक विस्तृत है।
  • इस कालखंड में कार्तिकेयपुर (कत्यूरी), चंद और पंवार (परमार) जैसे प्रमुख राजवंशों ने उत्तराखंड की धरती पर शासन किया।
  • कार्तिकेयपुर राजवंश को उत्तराखंड या मध्य हिमालय का प्रथम ऐतिहासिक राजवंश माना जाता है।
  • इस गौरवशाली राजवंश का शासन काल लगभग 700 ईस्वी से लेकर 1050 ईस्वी तक माना गया है।
  • कत्यूरी राजवंश के प्रथम परिवार की स्थापना करने वाले आदि पुरुष या संस्थापक राजा ‘बसन्तदेव’ थे।
  • इस राजवंश की प्रारंभिक राजधानी जोशीमठ के दक्षिण में स्थित कार्तिकेयपुर नामक स्थान पर बनाई गई थी।
  • बाद के समय में इसकी राजधानी को अल्मोड़ा की कत्यूर घाटी में बैजनाथ के समीप स्थानांतरित किया गया।
  • कार्तिकेयपुर राजवंश के अंतर्गत कुल तीन परिवारों के 14 राजाओं ने लगभग 300 वर्षों तक शासन किया।
  • इतिहास की दृष्टि से इस राजवंश के अब तक 9 महत्वपूर्ण अभिलेख प्राप्त हुए हैं, जिनमें ‘कुटिला लिपि’ का प्रयोग है।
  • इस राजवंश की प्रशासनिक या राजभाषा ‘संस्कृत’ थी, जबकि जनसाधारण की लोकभाषा ‘पाली’ हुआ करती थी।
  • संस्थापक राजा बसन्तदेव ने ‘परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर’ की सर्वोच्च उपाधि धारण की थी।
  • राजा बसन्तदेव ने ही चमोली के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल जोशीमठ में ‘नृसिंह मंदिर’ का निर्माण करवाया था।
  • इस वंश के राजा इष्टगण देव प्रथम ऐसे शासक थे, जिन्होंने समस्त उत्तराखंड को एक राजनीतिक सूत्र में बांधने का प्रयास किया।
  • राजा इष्टगण देव ने सुप्रसिद्ध जागेश्वर धाम में नवदुर्गा, महिषमर्दिनी, लकुलीश और नटराज मंदिरों का निर्माण कराया था।
  • ‘ललितसूर देव’ को संपूर्ण कत्यूरी राजवंश का सबसे प्रतापी, शक्तिशाली और शौर्यवान राजा माना जाता है।
  • पांडुकेश्वर से प्राप्त ताम्रपत्र में ललितसूर देव की तुलना धरती का उद्धार करने वाले भगवान विष्णु के ‘वराह अवतार’ से की गई है।
  • ललितसूर देव के पुत्र राजा भूदेव बौद्ध धर्म के कड़े विरोधी थे और उन्होंने बैजनाथ मंदिर का भव्य निर्माण कराया था।
  • राजा सुभिक्षराजदेव सलोड़ादित्य वंश के अंतिम शासक और कार्तिकेयपुर साम्राज्य के 14वें व अंतिम राजा थे।
  • कार्तिकेयपुर राजवंश के शासनकाल के दौरान ही महान दार्शनिक आदि गुरु शंकराचार्य जी का उत्तराखंड आगमन हुआ था।
  • आदि गुरु शंकराचार्य जी ने हिंदू धर्म के पुनरुत्थान के बाद वर्ष 820 ईस्वी में केदारनाथ धाम में अपनी देह त्यागी थी।

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