उत्तराखंड भारत के उत्तर-पश्चिम हिस्से में स्थित एक बेहद खूबसूरत और पहाड़ी राज्य है।
इस राज्य की स्थापना 9 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग होकर भारत के 27वें राज्य के रूप में हुई थी।
प्रारंभ में इस राज्य का नाम ‘उत्तरांचल’ रखा गया था, जिसे वर्ष 2007 में बदलकर ‘उत्तराखंड’ कर दिया गया।
हिंदू धर्मग्रंथों और प्राचीन पौराणिक कथाओं में इस पावन भूमि को ‘देवभूमि’ यानी देवताओं की भूमि कहा गया है।
भौगोलिक दृष्टि से उत्तराखंड का कुल क्षेत्रफल लगभग 53,483 वर्ग किलोमीटर है।
इस राज्य की अंतरराष्ट्रीय सीमाएं उत्तर में चीन (तिब्बत) और पूर्व में नेपाल देश से मिलती हैं।
इसके अलावा, यह राज्य घरेलू स्तर पर हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश के साथ अपनी सीमाएं साझा करता है।
उत्तराखंड को प्रशासनिक और सांस्कृतिक रूप से दो मुख्य मंडलों—गढ़वाल और कुमाऊं में विभाजित किया गया है।
इस राज्य में कुल 13 जिले शामिल हैं, जो अपनी अनूठी सांस्कृतिक विविधता के लिए जाने जाते हैं।
देहरादून इस राज्य की शीतकालीन राजधानी है, जबकि गैरसैंण (भरारीसैंण) को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाया गया है।
राज्य का उच्च न्यायालय (हाई कोर्ट) प्रसिद्ध पर्यटन स्थल नैनीताल में स्थित है।
उत्तराखंड की लगभग 86 प्रतिशत भूमि पहाड़ी है और इसके 45 प्रतिशत से अधिक हिस्से पर घने जंगल फैले हैं।
भारत की दो सबसे पवित्र नदियां—गंगा और यमुना—यहीं के गंगोत्री और यमुनोत्री ग्लेशियरों से निकलती हैं।
नंदा देवी (7,817 मीटर) उत्तराखंड की सबसे ऊंची पर्वत चोटी है, जो पूरी तरह भारत के भीतर स्थित है।
इस राज्य में ‘छोटा चार धाम’ (केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री) जैसे प्रमुख हिंदू तीर्थस्थल स्थित हैं।
यहाँ का जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क भारत का सबसे पहला और सबसे पुराना राष्ट्रीय उद्यान है।
उत्तराखंड में फूलों की घाटी (वैली ऑफ फ्लावर्स) और नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान जैसे यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल मौजूद हैं।
राज्य की आधिकारिक भाषा हिंदी है, और यह संस्कृत को दूसरी आधिकारिक भाषा का दर्जा देने वाला देश का पहला राज्य है।
स्थानीय स्तर पर यहाँ मुख्य रूप से गढ़वाली, कुमाऊँनी और जौनसारी बोलियाँ बड़े पैमाने पर बोली जाती हैं।
अपनी प्राकृतिक सुंदरता, समृद्ध लोक संस्कृति और आध्यात्मिक महत्व के कारण उत्तराखंड दुनिया भर के पर्यटकों को आकर्षित करता है।
उत्तराखंड की प्रशासनिक इकाइयाँ
उत्तराखंड राज्य का प्रशासन सुशासन और प्रभावी जनसेवाएँ सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न स्तरों पर विभाजित है।
यह प्रशासनिक विवरण विशेष रूप से उत्तराखंड पीसीएस (प्रीलिम्स और मेन्स) परीक्षाओं के दृष्टिकोण से अत्यधिक उपयोगी है।
संपूर्ण उत्तराखंड राज्य को मुख्य रूप से दो प्रमुख प्रशासनिक मंडलों (संभागों) में विभाजित किया गया है।
राज्य का पहला मंडल ‘गढ़वाल मंडल’ है, जिसका प्रशासनिक मुख्यालय पौड़ी में स्थित है।
राज्य का दूसरा मंडल ‘कुमाऊं मंडल’ है, और इसका प्रशासनिक मुख्यालय नैनीताल में बनाया गया है।
इन दोनों मंडलों को आगे प्रशासनिक सुगमता के लिए कुल 13 जिलों में विभाजित किया गया है।
गढ़वाल मंडल के अंतर्गत कुल 7 जिले आते हैं, जिनमें राज्य की राजधानी देहरादून और धार्मिक केंद्र हरिद्वार शामिल हैं।
गढ़वाल मंडल के अन्य जिले पौड़ी गढ़वाल, टिहरी गढ़वाल, उत्तरकाशी, चमोली और रुद्रप्रयाग हैं।
चमोली जिला बद्रीनाथ और फूलों की घाटी के लिए तथा रुद्रप्रयाग जिला केदारनाथ धाम के लिए प्रसिद्ध है।
कुमाऊं मंडल के अंतर्गत कुल 6 जिले आते हैं, जिनमें मुख्यालय नैनीताल और सांस्कृतिक राजधानी अल्मोड़ा शामिल हैं।
कुमाऊं के अन्य जिले ऊधम सिंह नगर, पिथौरागढ़, बागेश्वर और चंपावत हैं।
पिथौरागढ़ जिला राज्य की पूर्वी सीमा पर स्थित है, जो कैलाश मानसरोवर यात्रा का प्रमुख मार्ग है।
चंपावत जिला भौगोलिक क्षेत्रफल की दृष्टि से उत्तराखंड का सबसे छोटा जिला है।
ऊधम सिंह नगर जिला राज्य के प्रमुख औद्योगिक और कृषि क्षेत्रों के रूप में अपनी पहचान रखता है।
प्रशासनिक व्यवस्था को और छोटा करने के लिए राज्य को 110 तहसीलों (उप-जिलों) में बांटा गया है।
स्थानीय विकास कार्यों को सुचारू रूप से चलाने के लिए राज्य में कुल 95 विकास खंड (ब्लॉक) क्रियाशील हैं।
ग्रामीण स्तर पर स्थानीय प्रशासन की सबसे निचली इकाई के रूप में लगभग 7,791 ग्राम पंचायतें मौजूद हैं।
उत्तराखंड की अपनी विशिष्ट विधायी संरचना है, जिसके तहत देहरादून को राज्य की शीतकालीन राजधानी का दर्जा प्राप्त है।
गैरसैंण (भराड़ीसैंण) को 4 मार्च 2020 को आधिकारिक रूप से राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किया गया था।
यह त्रि-स्तरीय प्रशासनिक ढांचा देवभूमि उत्तराखंड के सुदूर पहाड़ी क्षेत्रों तक सरकारी नीतियों को पहुंचाने में मदद करता है।
राज्यपाल, मुख्यमंत्री और मंत्रिमंडल
उत्तराखंड राज्य में राज्यपाल, मुख्यमंत्री और मंत्रिमंडल राज्य की कार्यपालिका और प्रशासन के शीर्ष स्तंभ के रूप में कार्य करते हैं।
यह प्रशासनिक विवरण विशेष रूप से उत्तराखंड पीसीएस (प्रीलिम्स और मेन्स) परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों के लिए अत्यधिक उपयोगी है।
भारतीय संविधान के भाग 6 के अंतर्गत अनुच्छेद 153 से 167 तक राज्य कार्यपालिका की संरचना और शक्तियों का उल्लेख किया गया है।
संविधान के अनुच्छेद 153 के प्रावधानों के अनुसार, भारत के प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल की नियुक्ति अनिवार्य है।
राज्यपाल राज्य का संवैधानिक (नाममात्र का) प्रमुख होता है और वह राज्य में केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है।
राज्यपाल की नियुक्ति सीधे भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और उनका सामान्य कार्यकाल 5 वर्षों का होता है।
राज्यपाल बनने के लिए व्यक्ति का भारत का नागरिक होना और कम से कम 35 वर्ष की आयु पूर्ण करना अनिवार्य योग्यता है।
अनुच्छेद 154 के तहत राज्य की समस्त कार्यकारी शक्तियाँ राज्यपाल में निहित होती हैं और सभी सरकारी कार्य उन्हीं के नाम पर किए जाते हैं।
राज्यपाल मुख्यमंत्री, अन्य मंत्रियों, महाधिवक्ता और राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति करते हैं।
विधायी शक्तियों के तहत राज्यपाल को राज्य विधानमंडल के सत्र को बुलाने, सत्रावसान करने और विधानसभा को विघटित करने का अधिकार है।
अनुच्छेद 213 के अंतर्गत राज्यपाल को उस समय अध्यादेश (अस्थायी कानून) जारी करने की विशेष शक्ति प्राप्त है जब विधानमंडल सत्र में न हो।
राज्य का बजट (वार्षिक वित्तीय विवरण) राज्यपाल की अनुमति से ही विधानमंडल के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है।
मुख्यमंत्री राज्य का वास्तविक (वास्तविक कार्यकारी) प्रमुख होता है, जो सरकार की नीतियों और प्रशासन का संचालन करता है।
विधानसभा चुनावों में स्पष्ट बहुमत प्राप्त दल के नेता को राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री के रूप में नियुक्त किया जाता है।
मुख्यमंत्री की सलाह पर ही राज्यपाल मंत्रिमंडल के अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करते हैं और उन्हें विभागों का आवंटन करते हैं।
मुख्यमंत्री राज्यपाल और मंत्रिमंडल के बीच संवाद की मुख्य कड़ी (सेतु) के रूप में कार्य करते हैं।
राज्य का मंत्रिमंडल सामूहिक रूप से राज्य की विधानसभा के प्रति जवाबदेह और उत्तरदायी होता है।
मंत्रिमंडल का मुख्य कार्य राज्य के विकास के लिए नीतियां बनाना, बजट तैयार करना और कानून व्यवस्था बनाए रखना है।
मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में ही मंत्रिमंडल की बैठकें होती हैं, जिनमें राज्य से जुड़े महत्वपूर्ण और बड़े निर्णय लिए जाते हैं।
राज्यपाल, मुख्यमंत्री और मंत्रिमंडल का यह सह-अस्तित्व उत्तराखंड राज्य में लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाता है।
उत्तराखंड की विधायिका
उत्तराखंड की विधायिका को ‘उत्तराखंड विधानसभा’ के नाम से जाना जाता है, जो राज्य में कानून बनाने वाली सर्वोच्च संस्था है।
यह विवरण मुख्य रूप से उत्तराखंड पीसीएस (प्रारंभिक और मुख्य) परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों के लिए तैयार किया गया है।
राज्य विधायिका के संगठन, कार्यकाल, अधिकारियों, प्रक्रियाओं और शक्तियों से संबंधित प्रावधान भारतीय संविधान के भाग 6 में दिए गए हैं।
संविधान के अनुच्छेद 168 से 212 तक राज्यों के विधानमंडल की संरचना और उसके कामकाज का विस्तृत उल्लेख किया गया है।
विशेष रूप से संविधान का अनुच्छेद 168 भारत के राज्यों में विधानमंडल के गठन का वैधानिक प्रावधान करता है।
उत्तराखंड में ‘एकसदनीय विधानमंडल’ की व्यवस्था है, जिसका अर्थ है कि यहाँ केवल एक ही सदन यानी विधानसभा कार्यरत है।
भारत के कुछ राज्यों में द्विसदनीय व्यवस्था (विधानसभा और विधान परिषद) है, लेकिन उत्तराखंड इस सूची में शामिल नहीं है।
उत्तराखंड की विधानसभा में लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत कुल 70 निर्वाचित सदस्य (विधायक) शामिल होते हैं।
पहले विधानसभा में एंग्लो-इंडियन समुदाय से राज्यपाल द्वारा 1 सदस्य को मनोनीत करने का संवैधानिक प्रावधान भी था।
हालांकि, भारतीय संसद के 104वें संविधान संशोधन अधिनियम 2019 के द्वारा इस मनोनीत सदस्य की व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया।
विधानसभा के सभी सदस्यों का चुनाव सीधे राज्य के नागरिकों द्वारा प्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली के माध्यम से किया जाता है।
इस चुनाव प्रक्रिया को संपन्न कराने के लिए संपूर्ण उत्तराखंड राज्य को कुल 70 क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित किया गया है।
राज्य में विधानसभा के चुनाव पूरी तरह से वयस्क मताधिकार (18 वर्ष या उससे अधिक आयु) के आधार पर संचालित होते हैं।
सामान्य परिस्थितियों में उत्तराखंड विधानसभा का कार्यकाल इसके पहले सत्र की तारीख से कुल 5 वर्षों का होता है।
विधानसभा को उसका कार्यकाल पूरा होने से पहले भी राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री की सलाह पर भंग (विघटित) किया जा सकता है।
राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352) के दौरान संसद कानून बनाकर विधानसभा के कार्यकाल को एक बार में एक वर्ष के लिए बढ़ा सकती है।
आपातकाल हटने के बाद किसी भी परिस्थिति में विधानसभा का बढ़ाया गया कार्यकाल 6 महीने की अवधि से अधिक नहीं हो सकता।
संविधान के अनुच्छेद 173 के अनुसार, उत्तराखंड विधानसभा का सदस्य बनने के लिए न्यूनतम आयु 25 वर्ष होना अनिवार्य है।
उम्मीदवार के लिए भारत का नागरिक होना और संसद द्वारा निर्धारित अन्य सभी योग्यताओं को पूरा करना आवश्यक शर्त है।
अनुच्छेद 191 के तहत यदि कोई सदस्य सरकार के अधीन लाभ का पद धारण करता है या मानसिक रूप से अस्वस्थ पाया जाता है, तो वह अयोग्य घोषित हो जाता है।
उत्तराखंड की न्यायपालिका
उत्तराखंड की न्यायपालिका राज्य में न्याय प्रशासन के लिए पूरी तरह जिम्मेदार है और यह भारतीय न्यायिक प्रणाली का एक अभिन्न अंग है।
यह न्यायपालिका सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) के अधीन कार्य करती है और इसके प्रावधान भारतीय संविधान के भाग 6 में दिए गए हैं।
संविधान के अनुच्छेद 214 से 237 तक राज्यों में उच्च न्यायालयों और उनके अधीनस्थ न्यायालयों की व्यवस्था का उल्लेख किया गया है।
विशेष रूप से संविधान का अनुच्छेद 214 यह वैधानिक प्रावधान करता है कि भारत के प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय होगा।
उत्तराखंड में एक एकीकृत न्यायिक प्रणाली है, जिसमें शीर्ष पर उच्च न्यायालय और उसके नीचे अधीनस्थ न्यायालयों का एक पदानुक्रम है।
उत्तराखंड उच्च न्यायालय राज्य का सर्वोच्च न्यायिक निकाय है, जिसकी स्थापना 9 नवंबर 2000 को राज्य गठन के साथ हुई थी।
यह देश के 20वें उच्च न्यायालय के रूप में स्थापित किया गया था और इसका मुख्य कार्यालय (पीठ) नैनीताल में स्थित है।
इस उच्च न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीश होते हैं, जिनकी संख्या समय-समय पर भारत के राष्ट्रपति तय करते हैं।
उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और राज्य के राज्यपाल से परामर्श के बाद की जाती है।
उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने के लिए व्यक्ति का भारत का नागरिक होना और कम से कम 10 वर्ष का न्यायिक या अधिवक्ता अनुभव होना अनिवार्य है।
उच्च न्यायालय के न्यायाधीश अधिकतम 62 वर्ष की आयु तक अपना पद धारण कर सकते हैं।
न्यायाधीशों को केवल साबित कदाचार या अक्षमता के आधार पर संसद के विशेष बहुमत द्वारा पारित प्रस्ताव के बाद राष्ट्रपति द्वारा ही हटाया जा सकता है।
न्यायमूर्ति अशोक ए. देसाई को 9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड उच्च न्यायालय के प्रथम मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया था।
अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय को व्यापक रिट क्षेत्राधिकार प्राप्त है, जिसके तहत वह मौलिक और अन्य कानूनी अधिकारों के लिए 5 तरह की रिट जारी कर सकता है।
उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार सर्वोच्च न्यायालय (अनुच्छेद 32) से अधिक व्यापक है, क्योंकि यह सामान्य कानूनी अधिकारों के लिए भी रिट जारी कर सकता है।
अनुच्छेद 227 के तहत उच्च न्यायालय को अपने अधिकार क्षेत्र के सभी अधीनस्थ न्यायालयों और न्यायाधिकरणों पर अधीक्षण (निरीक्षण) करने की शक्ति प्राप्त है।
अनुच्छेद 215 के अनुसार, उच्च न्यायालय एक ‘अभिलेख न्यायालय’ (Court of Record) है, जिसके निर्णय अधीनस्थ न्यायालयों के लिए बाध्यकारी होते हैं।
उच्च न्यायालय के अधीन जिला स्तर पर जिला न्यायालय होते हैं, जिसका प्रमुख जिला न्यायाधीश होता है जो दीवानी और आपराधिक दोनों मामले देखता है।
आपराधिक मामलों की सुनवाई करते समय जिला न्यायाधीश को ‘सत्र न्यायाधीश’ (Session Judge) के नाम से संबोधित किया जाता है।
अधीनस्थ न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति राज्य के राज्यपाल द्वारा उच्च न्यायालय और राज्य लोक सेवा आयोग के परामर्श से की जाती है।