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उत्तराखंड का आधुनिक इतिहास

  • उत्तराखंड का आधुनिक इतिहास मुख्य रूप से गोरखा शासन के अंत, ब्रिटिश काल के आगमन और टिहरी रियासत के घटनाक्रमों पर आधारित है।
  • वर्ष 1814 से 1816 के बीच ईस्ट इंडिया कंपनी और गोरखाओं के विस्तारवादी रवैये के कारण आंग्ल-नेपाल युद्ध हुआ था।
  • लॉर्ड हेस्टिंग्स ने 1 नवंबर 1814 को गोरखाओं के खिलाफ आधिकारिक रूप से युद्ध की घोषणा की थी।
  • इस युद्ध के दौरान देहरादून के नालापानी (कलंगा) किले पर हुए हमले में ब्रिटिश सेनापति जिलेस्पी मारा गया था।
  • अंततः 2 दिसंबर 1815 को कर्नल ब्रेदशॉ और गजराज मिश्र के बीच ऐतिहासिक सुगौली (संगोली) की संधि पर हस्ताक्षर हुए।
  • नेपाल सरकार द्वारा 4 मार्च 1816 को इस संधि को स्वीकार करने के बाद उत्तराखंड में गोरखा शासन का अंत हो गया।
  • सुगौली की संधि के बाद अलकनंदा नदी के पूर्वी हिस्से को ब्रिटिश कुमाऊँ और पश्चिमी हिस्से को टिहरी रियासत बनाया गया।
  • एडवर्ड गार्डनर को मई 1815 ईस्वी में ब्रिटिश कुमाऊँ का पहला कमिश्नर (प्रशासक) नियुक्त किया गया था।
  • दूसरे कमिश्नर विलियम ट्रेल (1816-1835) को कुमाऊँ में ब्रिटिश शासन का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।
  • कमिश्नर ट्रेल ने प्रशासनिक सुधार के तहत कुमाऊँ को 26 परगनों में बांटा और वर्ष 1823 में प्रसिद्ध ‘अस्सी साला भूमि बंदोबस्त’ कराया।
  • ट्रेल ने सामाजिक सुधारों के अंतर्गत वर्ष 1824 में दास-दासी प्रथा और 1829 में सती प्रथा पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया था।
  • सर हेनरी रैम्जे (1856-1884) को कुमाऊँ का ‘बेताज बादशाह’ कहा जाता है, जो 1857 के विद्रोह के समय यहाँ के कमिश्नर थे।
  • हेनरी रैम्जे के कार्यकाल में वर्ष 1874 में उत्तराखंड में प्रसिद्ध ‘राजस्व पुलिस व्यवस्था’ की शुरुआत की गई थी।
  • अंग्रेजों ने शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 1840 में श्रीनगर में पहले ‘एलिमेंटरी वर्नाक्यूलर स्कूल’ की स्थापना की थी।
  • वनों के वैज्ञानिक प्रबंधन के लिए ब्रिटिश सरकार ने वर्ष 1864 में जर्मन विशेषज्ञों की मदद से वन विभाग का गठन किया।
  • उत्तराखंड में चाय उत्पादन की शुरुआत सर्वप्रथम वर्ष 1830 में हुई और 1844 में देहरादून में सरकारी चाय बागान बनाया गया।
  • गोरखाओं की पराजय के बाद राजा सुदर्शन शाह ने 28 दिसंबर 1815 को गढ़वाल में ‘टिहरी रियासत’ की स्थापना की।
  • राजा सुदर्शन शाह एक महान कला प्रेमी थे, जिन्होंने ब्रजभाषा में प्रसिद्ध ‘सभासार’ ग्रंथ की रचना की थी।
  • ब्रिटिश काल के दौरान कुमाऊँ संभाग में कुल 23 ब्रिटिश कमिश्नर और आजादी के समय 1 भारतीय कमिश्नर (के.एल. मेहता) हुए।
  • यह संपूर्ण आधुनिक कालखंड उत्तराखंड के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक ढांचे में बड़े बदलावों का गवाह रहा है।

उत्तराखंड का स्वतंत्रता संग्राम में योगदान

  • भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उत्तराखंड के निवासियों ने अद्वितीय शौर्य, त्याग और अटूट देशभक्ति का परिचय दिया।
  • उत्तराखंड की इस वीर भूमि ने देश को अनेक महान स्वतंत्रता सेनानी दिए जिन्होंने राष्ट्रीय आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी की।
  • वर्ष 1930 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में शुरू हुए ऐतिहासिक डांडी मार्च में उत्तराखंड के तीन सत्याग्रहियों ने भाग लिया था।
  • इस साबरमती से डांडी की पदयात्रा में उत्तराखंड से ज्योतिराम कांडपाल, भैरव दत्त जोशी और गोरख वीर खड़ग बहादुर शामिल थे।
  • डांडी मार्च के पश्चात ज्योतिराम कांडपाल ने अल्मोड़ा के देघाट में ‘उद्योग मंदिर आश्रम’ की स्थापना की थी।
  • राष्ट्रीय स्तर पर नमक सत्याग्रह शुरू होने के बाद गढ़वाल क्षेत्र में इसका नेतृत्व प्रताप सिंह नेगी को सौंपा गया।
  • कुमाऊं क्षेत्र में नमक सत्याग्रह का सफल नेतृत्व देश के भावी गृहमंत्री पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने किया था।
  • गोविंद बल्लभ पंत ने 23 मई 1930 को नैनीताल के मल्लीताल रामलीला मैदान में नमक कानून तोड़ने की घोषणा की थी।
  • नैनीताल क्षेत्र में ही 27 मई 1930 को प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी बद्रीदत्त पांडे ने सार्वजनिक रूप से नमक बेचा था।
  • अल्मोड़ा के प्रसिद्ध नंदादेवी प्रांगण में 4 मई 1930 को मोहन जोशी के नेतृत्व में विशाल ‘झंडा सत्याग्रह’ आयोजित हुआ।
  • गढ़वाल के जहरीखाल (पौड़ी) स्कूल में 28 अगस्त 1930 को जयानंद भारती और उनके साथियों ने तिरंगा झंडा फहराया था।
  • सविनय अवज्ञा आंदोलन और नमक सत्याग्रह का प्रभाव कुमाऊं और गढ़वाल दोनों ही पर्वतीय क्षेत्रों में व्यापक रूप से फैला था।
  • राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अल्मोड़ा के सल्ट क्षेत्र को वहाँ की जनक्रांति से प्रभावित होकर ‘कुमाऊं का बारदोली’ कहा था।
  • वर्ष 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उत्तराखंड के देघाट, सालम और खुमाड़ नामक स्थानों पर प्रमुख जन-घटनाएँ हुईं।
  • ब्रिटिश दमन चक्र के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए खुमाड़ और देघाट में अनेक स्थानीय देशभक्तों ने अपने प्राणों की आहुति दी।
  • उत्तराखंड के पर्वतीय समाज की महिलाओं ने भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर स्वतंत्रता संग्राम में अभूतपूर्व योगदान दिया।
  • नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा गठित ‘आजाद हिंद फौज’ (INA) में उत्तराखंड के सैनिकों की बहुत बड़ी संख्या में भागीदारी थी।
  • भारत की आजादी के आंदोलनों के समानांतर ही टिहरी रियासत में ‘प्रजामंडल आंदोलन’ का बिगुल फूंका गया था।
  • प्रजामंडल आंदोलन के माध्यम से क्रांतिकारियों ने स्थानीय राजशाही और उसके दमनकारी शासन के विरुद्ध कड़ा संघर्ष किया।
  • इन विभिन्न जनांदोलनों, कुर्बानियों और राष्ट्रभक्ति के प्रयासों के कारण देश की आजादी में उत्तराखंड का नाम सदैव स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है।

उत्तराखंड राज्य के प्रमुख आंदोलन

  • उत्तराखंड के इतिहास में हुए विभिन्न आंदोलनों ने पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक सुधार, लोकतांत्रिक अधिकारों और जन चेतना में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
  • ब्रिटिश शासन के दौरान प्रचलित एक अत्यंत शोषणकारी प्रथा के खिलाफ राज्य में ‘कुली बेगार आंदोलन’ चलाया गया था।
  • कुली बेगार प्रथा के तहत स्थानीय लोगों से बिना मजदूरी के ब्रिटिश अधिकारियों का सामान उठवाया जाता था और मुफ्त राशन लिया जाता था।
  • कमिश्नर विलियम ट्रेल ने वर्ष 1822 में इस कुली बेगार प्रथा को खत्म करने के उद्देश्य से एक विशेष खच्चर सेना को विकसित करने का प्रयास किया था।
  • इस शोषण के खिलाफ पहली संगठित घटना 1 जनवरी 1921 को कत्यूर के चामी नामक स्थान पर हुई, जहाँ लोगों ने कुली उतार न देने की शपथ ली।
  • कुली बेगार आंदोलन की मुख्य परिणति 13-14 जनवरी 1921 को बागेश्वर में सरयू नदी के तट पर उत्तरायणी मेले के पावन अवसर पर हुई थी।
  • बद्रीदत्त पांडे, हरगोविंद पंत और चिरंजीलाल के नेतृत्व में लगभग 40 हजार लोगों ने बेगार न करने की शपथ लेकर इससे जुड़े सारे रजिस्टर सरयू नदी में बहा दिए।
  • राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कुली बेगार प्रथा के इस सफल और शांतिपूर्ण अंत को ऐतिहासिक रूप से “रक्तहीन क्रांति” की संज्ञा दी थी।
  • वनों की अंधाधुंध व्यावसायिक कटाई को रोकने और स्थानीय वन अधिकारों की रक्षा के लिए 1970 के दशक में प्रसिद्ध ‘चिपको आंदोलन’ शुरू हुआ था।
  • चिपको आंदोलन की शुरुआत उत्तराखंड के चमोली जिले से हुई थी, जहाँ स्थानीय ग्रामीण महिलाएँ पेड़ों को कटने से बचाने के लिए उनसे चिपक जाती थीं।
  • महान पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा ने इस आंदोलन को वैश्विक पहचान दिलाई और “हिमालय बचाओ, देश बचाओ” का ऐतिहासिक नारा दिया था।
  • चमोली के रेणी गाँव में वर्ष 1974 में महिलाओं के एक साहसी समूह का नेतृत्व गौरा देवी ने किया था, जिन्होंने ठेकेदारों को पेड़ काटने से पूरी तरह रोका।
  • चंडी प्रसाद भट्ट को चिपको आंदोलन का वास्तविक जनक माना जाता है, जिन्हें पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उनके कार्यों के लिए 1982 में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार मिला।
  • पर्यावरण संरक्षण को विवाह जैसे सामाजिक रीति-रिवाजों से जोड़ने वाला एक बेहद अनूठा ‘मैती आंदोलन’ वर्ष 1994 में चमोली के ग्वालदम से शुरू हुआ था।
  • मैती आंदोलन के प्रणेता कल्याण सिंह रावत हैं, जिसके तहत विवाह के समय दूल्हा-दुल्हन द्वारा मायके के आंगन में एक स्मृति पौधा लगाया जाता है।
  • टिहरी रियासत की दमनकारी राजशाही के खिलाफ लोकतांत्रिक अधिकारों की बहाली के लिए 23 जनवरी 1939 को देहरादून में ‘टिहरी राज्य प्रजामंडल’ का गठन हुआ।
  • प्रजामंडल के अग्रणी नेता श्रीदेव सुमन ने जेल में राजशाही के खिलाफ संघर्ष करते हुए 84 दिनों की लंबी भूख हड़ताल के बाद 25 जुलाई 1944 को प्राण त्याग दिए।
  • टिहरी रियासत में ही 30 मई 1930 को वन अधिकारों के लिए जुटे किसानों पर गोलीबारी की गई, जिसे ‘तिलाड़ी कांड’ या उत्तराखंड का जलियांवाला बाग कहा जाता है।
  • दलित शिल्पकारों को विवाह के अवसर पर डोला-पालकी में बैठने का सामाजिक अधिकार दिलाने के लिए जयानंद भारती ने 1930 के दशक में ‘डोला-पालकी आंदोलन’ चलाया।
  • जल संरक्षण और पारंपरिक जल स्रोतों के पुनरुद्धार के लिए 1980 के दशक में पौड़ी गढ़वाल के उप्रेखाल में सच्चिदानंद भारती के नेतृत्व में ‘पानी राखो आंदोलन’ चलाया गया।

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