हर्षवर्धन और उसका साम्राज्य
- गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद उत्तर भारत की राजनीतिक अस्थिरता के बीच पुष्यभूति वंश के हर्षवर्धन का उदय हुआ।
- हर्षवर्धन का शासनकाल 606 ईस्वी से 647 ईस्वी तक रहा, जिसे भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण संक्रमण काल माना जाता है।
- पुष्यभूति वंश (या वर्धन वंश) की स्थापना पुष्यभूति ने 5वीं या 6वीं शताब्दी में थानेश्वर (हरियाणा) में की थी।
- हर्ष के पिता प्रभाकर वर्धन एक शक्तिशाली राजा थे, जिन्होंने ‘महाराजाधिराज’ की उपाधि धारण की और हूणों को पराजित किया।
- अपने बड़े भाई राज्यवर्धन की मृत्यु के बाद हर्षवर्धन मात्र 16 वर्ष की अल्पायु में 606 ईस्वी में थानेश्वर की गद्दी पर बैठा।
- इतिहास और अभिलेखों में हर्षवर्धन को ‘शिलादित्य’ के नाम से भी संबोधित किया गया है।
- गद्दी पर बैठने के बाद हर्ष ने अपनी राजधानी को थानेश्वर से बदलकर कन्नौज स्थानांतरित कर दिया था।
- कन्नौज को राजधानी बनाने के बाद यह नगर उत्तर भारत की राजनीतिक शक्ति का एक नया और प्रमुख केंद्र बन गया।
- हर्षवर्धन का साम्राज्य विस्तार पश्चिम में पंजाब से लेकर पूर्व में बंगाल और उड़ीसा की सीमाओं तक फैला हुआ था।
- भौगोलिक रूप से उसका नियंत्रण उत्तर में हिमालय की तराई से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी के तट तक स्थापित था।
- हर्ष ने अपने भाई की हत्या का बदला लेने और कन्नौज पर पूर्ण अधिकार के लिए गौड़ा नरेश शशांक को पराजित किया।
- उसने गुजरात के वल्लभी (मैत्रक वंश) और मगध के उत्तर-गुप्त शासकों पर भी अपना कूटनीतिक व सैन्य नियंत्रण स्थापित किया।
- जब हर्ष ने दक्षिण भारत की ओर विस्तार करना चाहा, तब चालुक्य वंश के प्रतापी शासक पुलकेशिन द्वितीय ने उसे रोक दिया।
- पुलकेशिन द्वितीय ने नर्मदा नदी के तट पर हुए एक भीषण युद्ध में हर्षवर्धन को पराजित कर उसके विजय रथ को थामा।
- इस ऐतिहासिक युद्ध और हर्ष की पराजय की प्रामाणिक जानकारी पुलकेशिन द्वितीय के ‘ऐहोल अभिलेख’ से प्राप्त होती है।
- हर्षवर्धन का प्रशासन गुप्तों की तुलना में कहीं अधिक सामंतवादी और विकेन्द्रीकृत प्रकृति का था।
- सम्राट प्रशासन में सर्वोच्च शक्ति था और उसने ‘परमभट्टारक’ तथा ‘महाराजाधिराज’ जैसी भव्य उपाधियाँ धारण की थीं।
- राजा को प्रशासनिक और कूटनीतिक मामलों में सलाह देने के लिए एक सुव्यवस्थित मंत्रिपरिषद की व्यवस्था थी।
- इस प्रशासनिक व्यवस्था में युद्ध और शांति के मंत्री को ‘अवंति’ नाम के प्रमुख अधिकारी के रूप में जाना जाता था।
संक्षेप में, हर्षवर्धन ने अपनी सैन्य कुशलता से गुप्तोत्तर काल के खंडित उत्तर भारत को पुनः एक सूत्र में पिरोने का काम किया।
पल्लव वंश
- पल्लव राजवंश दक्षिण भारत का एक अत्यंत शक्तिशाली और प्रभावशाली साम्राज्य था।
- इस वंश ने लगभग चौथी शताब्दी से नौवीं शताब्दी ईस्वी तक दक्षिण के एक बड़े हिस्से पर शासन किया।
- पल्लवों की राजधानी ‘कांची’ (कांचीपुरम) थी, जो शिक्षा और कला का एक प्रमुख केंद्र मानी जाती थी।
- इस राजवंश के उदय के साथ ही दक्षिण भारत में राजनीतिक और सांस्कृतिक स्थिरता का एक नया युग शुरू हुआ।
- पल्लव शासक अपनी उत्कृष्ट वास्तुकला, मंदिरों के निर्माण और अद्वितीय मूर्तिकला के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं।
- सिंहविष्णु को इस वंश का पहला महान और प्रतापी शासक माना जाता है, जिसने पल्लव सत्ता को पुनर्जीवित किया।
- महेंद्रवर्मन प्रथम एक प्रसिद्ध विद्वान और संगीत प्रेमी राजा था, जिसने ‘मत्तविलास प्रहसन’ नामक नाटक लिखा था।
- पल्लवों और बादामी के चालुक्यों के बीच सत्ता के संघर्ष का एक लंबा दौर चला, जो कई पीढ़ियों तक जारी रहा।
- नरसिंहवर्मन प्रथम, जिन्हें ‘महामल्ल’ भी कहा जाता है, इस वंश के सबसे शक्तिशाली और विजयी सम्राट थे।
- उन्होंने चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितीय को पराजित कर ‘वातापीकोंड’ (वातापी का विजेता) की उपाधि धारण की थी।
- प्रसिद्ध महाबलीपुरम (मामल्लपुरम) नगर की स्थापना और वहां के रथ मंदिरों का निर्माण नरसिंहवर्मन प्रथम ने ही करवाया था।
- पल्लवों के शासनकाल में ही दक्षिण भारत में भव्य ‘द्रविड़ वास्तुकला’ शैली की नींव पड़ी और विकास हुआ।
- पल्लव मंदिरों को चार मुख्य शैलियों में बांटा गया है: महेंद्र, मामल्ल, राजसिंह और नंदीवर्मन शैली।
- कांचीपुरम का प्रसिद्ध ‘कैलाशनाथ मंदिर’ राजसिंह शैली की वास्तुकला का एक अद्भुत और भव्य उदाहरण है।
- पल्लव काल में संस्कृत और तमिल दोनों भाषाओं को अत्यधिक सम्मान मिला और साहित्य का भरपूर विकास हुआ।
- महान संस्कृत कवि ‘भारवि’ (किरातार्जुनीयम् के लेखक) और ‘दंडी’ ने पल्लव दरबार की शोभा बढ़ाई थी।
- पल्लव राजाओं ने हिंदू धर्म के साथ-साथ बौद्ध और जैन धर्मों को भी अपने संरक्षण में फलने-फूलने का मौका दिया।
- इसी काल के दौरान दक्षिण भारत में नयनार और अलवार संतों के नेतृत्व में भक्ति आंदोलन का उदय हुआ।
- नौवीं शताब्दी के अंत में चोल शासक आदित्य प्रथम ने अंतिम पल्लव राजा अपराजित को हराकर इस वंश का अंत किया।
- अंततः, पल्लवों की विरासत आज भी महाबलीपुरम के पत्थरों और दक्षिण के मंदिरों में जीवंत रूप से दिखाई देती है।
चालुक्य वंश
- चालुक्य राजवंश छठी से बारहवीं शताब्दी के बीच दक्षिण और मध्य भारत का एक अत्यंत शक्तिशाली राजवंश था।
- इस वंश की तीन अलग-अलग शाखाएं थीं, जिनमें ‘बादामी के चालुक्य’ सबसे प्राचीन और प्रतापी माने जाते हैं।
- जयसिंह को बादामी के चालुक्य वंश का संस्थापक माना जाता है, जिन्होंने इस साम्राज्य की नींव रखी थी।
- इस वंश के वास्तविक सुदृढ़ीकरण का श्रेय पुलकेशिन प्रथम को जाता है, जिन्होंने वातापी को अपनी राजधानी बनाया।
- चालुक्यों की यह राजधानी ‘वातापी’ या ‘बादामी’ वर्तमान समय में कर्नाटक के बागलकोट जिले में स्थित है।
- पुलकेशिन प्रथम ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए अश्वमेध यज्ञ और वाजपेय यज्ञ का आयोजन किया था।
- कीर्तिवर्मन प्रथम ने साम्राज्य का विस्तार किया और कोंकण के मौर्यों तथा कदंबों को पराजित कर अधीन किया।
- मंगलेश ने अपने भाई कीर्तिवर्मन की मृत्यु के बाद संरक्षण के रूप में शासन संभाला और बादामी की गुफाओं का निर्माण कराया।
- पुलकेशिन द्वितीय (610-642 ईस्वी) इस पूरे चालुक्य राजवंश के सबसे महान और शक्तिशाली सम्राट साबित हुए।
- पुलकेशिन द्वितीय की सैन्य विजयों और उपलब्धियों की विस्तृत जानकारी उनके दरबारी कवि रविकीर्ति द्वारा रचित ‘ऐहोल अभिलेख’ से मिलती है।
- पुलकेशिन द्वितीय ने उत्तर भारत के प्रतापी सम्राट हर्षवर्धन को नर्मदा नदी के तट पर एक ऐतिहासिक युद्ध में पराजित किया था।
- इस शानदार विजय के बाद पुलकेशिन द्वितीय ने ‘परमेश्वर’ और ‘दक्षिणापथेश्वर’ जैसी भव्य उपाधियाँ धारण की थीं।
- चालुक्यों का सुदूर दक्षिण के पल्लव राजवंश के साथ एक लंबा और विनाशकारी सत्ता संघर्ष चला जो कई पीढ़ियों तक जारी रहा।
- पल्लव शासक नरसिंहवर्मन प्रथम ने पुलकेशिन द्वितीय को पराजित कर मार डाला और वातापी पर अधिकार कर लिया।
- विक्रमादित्य प्रथम ने पुनः चालुक्य सत्ता को स्थापित किया और पल्लवों से अपनी राजधानी वातापी को वापस मुक्त कराया।
- चालुक्य शासकों के संरक्षण में दक्षिण भारत में ‘वेसर शैली’ (नागर और द्रविड़ का मिश्रण) की वास्तुकला का विकास हुआ।
- ऐहोल, बादामी और पट्टदकल के भव्य मंदिर चालुक्य वास्तुकला और मूर्तिकला के बेजोड़ तथा जीवंत उदाहरण हैं।
- पट्टदकल का प्रसिद्ध विरूपाक्ष मंदिर चालुक्य रानी लोकमहादेवी द्वारा पल्लवों पर विजय के उपलक्ष्य में बनवाया गया था।
- इस वंश के अंतिम शासक कीर्तिवर्मन द्वितीय को राष्ट्रकूट वंश के संस्थापक दन्तिदुर्ग ने हराकर चालुक्य साम्राज्य का अंत किया।
- अंततः, राष्ट्रकूटों के उदय के साथ बादामी के चालुक्यों का पतन हुआ, लेकिन उनकी सांस्कृतिक और कलात्मक विरासत आज भी अमर है।
राष्ट्रकूट वंश
- राष्ट्रकूट राजवंश आठवीं से दसवीं शताब्दी के बीच दक्षिण और मध्य भारत का एक अत्यंत गौरवशाली साम्राज्य था।
- इस महान साम्राज्य की स्थापना लगभग 752 ईस्वी में दन्तिदुर्ग नामक एक प्रतापी शासक ने की थी।
- दन्तिदुर्ग ने बादामी के अंतिम चालुक्य शासक कीर्तिवर्मन द्वितीय को पराजित कर स्वतंत्र सत्ता स्थापित की थी।
- राष्ट्रकूटों ने कर्नाटक के गुलबर्गा जिले में स्थित ‘मान्यखेट’ (मालखेड) को अपनी साम्राज्यिक राजधानी बनाया।
- दन्तिदुर्ग के उत्तराधिकारी कृष्ण प्रथम इस वंश के एक और बेहद शक्तिशाली और कला प्रेमी शासक साबित हुए।
- कृष्ण प्रथम ने एलोरा की पहाड़ियों को कटवाकर विश्व प्रसिद्ध ‘कैलाशनाथ मंदिर’ का निर्माण करवाया था।
- यह मंदिर एकाश्म वास्तुकला (एक ही विशाल चट्टान को काटकर बनाया गया) का पूरी दुनिया में सबसे बेजोड़ उदाहरण है।
- राष्ट्रकूट शासक ध्रुव धारवर्ष ने उत्तर भारत की राजनीति में हस्तक्षेप कर ‘त्रिपक्षीय संघर्ष’ की शुरुआत की थी।
- उसने कन्नौज पर नियंत्रण के लिए प्रतिहार शासक वत्सराज और पाल शासक धर्मपाल दोनों को युद्ध में पराजित किया।
- गोविंद तृतीय इस वंश के सबसे महान सैन्य विजेताओं में से थे, जिनका प्रभाव हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक था।
- अमोघवर्ष प्रथम इस वंश के सबसे प्रसिद्ध शासक थे, जो अपनी धार्मिक सहिष्णुता, शांति और साहित्य प्रेम के लिए जाने जाते हैं।
- अमोघवर्ष स्वयं एक उच्च कोटि के लेखक थे, जिन्होंने कन्नड़ भाषा के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘कविराजमार्ग’ की रचना की थी।
- अमोघवर्ष के काल में जैन धर्म को बहुत बढ़ावा मिला और उनके दरबार में प्रसिद्ध जैन विद्वान जिनसेन निवास करते थे।
- इंद्र तृतीय और कृष्ण तृतीय के शासनकाल में राष्ट्रकूट सेनाओं ने दक्षिण के चोल शासकों को करारी शिकस्त दी थी।
- राष्ट्रकूटों के कुशल सैन्य और प्रशासनिक नियंत्रण के कारण अरब यात्री अल-मसूदी ने उन्हें दुनिया के चार महान राजाओं में गिना था।
- इस काल में कला की ‘द्रविड़ शैली’ का अत्यधिक विकास हुआ, जिसके जीवंत प्रमाण एलोरा और एलिफेंटा की गुफाएं हैं।
- धार्मिक दृष्टिकोण से राष्ट्रकूट राजा बहुत सहिष्णु थे; उन्होंने हिंदू, जैन और बौद्ध धर्मों को समान संरक्षण दिया।
- उन्होंने अपने तटीय क्षेत्रों में अरब व्यापारियों को बसने और इस्लाम धर्म का प्रचार करने की पूर्ण स्वतंत्रता दे रखी थी।
- इस वंश के अंतिम शक्तिशाली राजा कृष्ण तृतीय की मृत्यु के बाद केंद्रीय नियंत्रण धीरे-धीरे पूरी तरह कमजोर हो गया।
- अंततः, 973 ईस्वी में तैलप द्वितीय (कल्याणी के चालुक्य वंश के संस्थापक) ने अंतिम राष्ट्रकूट राजा को हराकर इस महान साम्राज्य का अंत किया।