राजपूत राज्य
- राजपूत शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के ‘राजपुत्र‘ से हुई है, जिसका अर्थ राजा का बेटा होता है।
- प्राचीन भारत में हर्षवर्धन के साम्राज्य के पतन के बाद उत्तर और मध्य भारत में राजपूत राजवंशों का उदय हुआ।
- भारतीय इतिहास में 7वीं शताब्दी से लेकर 12वीं शताब्दी तक के काल को मुख्य रूप से राजपूत काल कहा जाता है।
- राजपूतों की उत्पत्ति को लेकर इतिहासकारों में कई मत हैं, जिनमें अग्निकुंड सिद्धांत और सूर्यवंशी-चंद्रवंशी वंश मुख्य हैं।
- पृथ्वीराज रासो के अनुसार, माउंट आबू पर ऋषियों के यज्ञ के अग्निकुंड से चार प्रमुख राजपूत वंशों का जन्म हुआ था।
- इन चार प्रमुख वंशों में प्रतिहार (परिहार), चौहान, चालुक्य (सोलंकी) और परमार शामिल थे।
- प्रतिहार राजवंश ने उत्तर भारत में एक विशाल साम्राज्य स्थापित किया और लंबे समय तक विदेशी आक्रमणों को रोका।
- चौहान वंश के सबसे प्रसिद्ध शासक पृथ्वीराज चौहान (तृतीय) थे, जिन्होंने दिल्ली और अजमेर पर शासन किया।
- पृथ्वीराज चौहान ने तराइन के प्रथम युद्ध (1191 ई.) में मोहम्मद गोरी को बुरी तरह पराजित किया था।
- मालवा के परमार वंश में राजा भोज सबसे महान शासक थे, जो अपनी वीरता के साथ-साथ विद्वता के लिए भी जाने जाते थे।
- गुजरात के सोलंकी या चालुक्य राजाओं ने कला और वास्तुकला को बहुत बढ़ावा दिया, जिसका उदाहरण प्रसिद्ध दिलवाड़ा मंदिर है।
- बुंडेलखंड के चंदेल शासकों ने खजुराहो के विश्व प्रसिद्ध मंदिरों का निर्माण करवाया, जो स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना हैं।
- मेवाड़ का गुहिल या सिसोदिया राजवंश अपनी अटूट देशभक्ति और महाराणा प्रताप जैसे वीर योद्धाओं के लिए इतिहास में अमर है।
- राजपूत शासक अपनी वीरता, युद्ध कौशल, अटूट साहस और शरणागत की रक्षा के सिद्धांतों के लिए प्रसिद्ध थे।
- इस काल में राजपूत महिलाओं की वीरता भी अद्वितीय थी, जो संकट के समय स्वाभिमान की रक्षा के लिए ‘जौहर‘ (अग्नि समाधि) कर लेती थीं।
- राजपूत काल के दौरान कला, साहित्य, और वास्तुकला के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति और विकास देखने को मिला।
- राजपूत राजाओं ने भव्य किलों, महलों और जलाशयों का निर्माण करवाया, जो आज भी भारत की शान हैं।
- निरंतर आपसी संघर्ष और राजनीतिक एकता की कमी के कारण ये राज्य विदेशी मुस्लिम आक्रमणकारियों के सामने कमजोर पड़ गए।
- 12वीं शताब्दी के अंत में तराइन के दूसरे युद्ध के बाद भारत में धीरे-धीरे दिल्ली सल्तनत की स्थापना का रास्ता साफ हुआ।
- आंतरिक मतभेदों के बावजूद, राजपूत राज्यों ने भारतीय संस्कृति, सनातन धर्म और कलात्मक विरासत को अक्षुण्ण बनाए रखने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई।
पाल वंश
- हर्षवर्धन के साम्राज्य के पतन के बाद फैली राजनीतिक अस्थिरता के बीच पूर्वी भारत में पाल वंश का उदय हुआ।
- पाल वंश ने लगभग 8वीं शताब्दी ईस्वी से लेकर 12वीं शताब्दी ईस्वी तक बंगाल और बिहार के क्षेत्रों पर शासन किया।
- इस प्रसिद्ध राजवंश की स्थापना लगभग 750 ईस्वी में गोपाल नामक शासक द्वारा की गई थी।
- बंगाल में व्याप्त अराजकता और ‘मत्स्यन्याय‘ (जंगलराज) को समाप्त करने के लिए जनता ने स्वयं गोपाल को राजा चुना था।
- संस्थापक गोपाल ने बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया और बिहार के ओदंतपुरी में एक प्रसिद्ध बौद्ध मठ का निर्माण करवाया।
- गोपाल के बाद उसका पुत्र धर्मपाल (770-810 ईस्वी) गद्दी पर बैठा, जो इस वंश का सबसे महान और शक्तिशाली शासक था।
- धर्मपाल ने कन्नौज पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए राष्ट्रकूटों और प्रतिहारों के साथ हुए प्रसिद्ध ‘त्रिपक्षीय संघर्ष‘ में भाग लिया।
- धर्मपाल शिक्षा का बड़ा संरक्षक था; उसने बिहार में प्रसिद्ध विक्रमशिला विश्वविद्यालय और सोमपुरी महाविहार की स्थापना की।
- उसने शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए तत्कालीन विख्यात नालंदा विश्वविद्यालय को 200 गाँवों का राजस्व दान में दिया था।
- धर्मपाल के बाद उसका योग्य पुत्र देवपाल (810-850 ईस्वी) राजा बना, जिसने साम्राज्य का विस्तार असम और उड़ीसा तक किया।
- देवपाल ने अपनी प्रशासनिक और सैन्य गतिविधियों को सुचारू रूप से चलाने के लिए बिहार के मुंगेर को अपनी नई राजधानी बनाया।
- देवपाल के शासनकाल में जावा (इंडोनेशिया) के शैलेंद्र वंशीय राजा बालपुत्रदेव ने नालंदा में एक बौद्ध विहार का निर्माण करवाया था।
- देवपाल के बाद पाल साम्राज्य कमजोर होने लगा, लेकिन बाद में महिपाल प्रथम (988-1038 ईस्वी) ने इसकी खोई हुई शक्ति को पुनर्जीवित किया।
- महिपाल प्रथम को पाल साम्राज्य को बिखरने से बचाने और उसे सुदृढ़ करने के कारण इस वंश का ‘द्वितीय संस्थापक‘ कहा जाता है।
- रामपाल (1077-1130 ईस्वी) पाल वंश का अंतिम महत्वपूर्ण शासक था, जिसने कामरूप (असम) और उड़ीसा पर पुनः नियंत्रण स्थापित किया।
- पाल शासकों की प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह राजतंत्रात्मक थी, जहाँ राजा ‘महाराजाधिराज‘ और ‘परमेश्वर‘ जैसी भव्य उपाधियाँ धारण करते थे।
- साम्राज्य के सुचारू संचालन के लिए इसे विभिन्न प्रशासनिक इकाइयों जैसे ‘भुक्ति‘ (प्रांत), ‘विषय‘ (जिले) और ‘मंडला‘ में विभाजित किया गया था।
- राज्य की आय का मुख्य स्रोत भू-राजस्व (कृषि कर) था और ग्राम प्रशासन की सबसे छोटी तथा महत्वपूर्ण इकाई हुआ करती थी।
- पाल राजा बौद्ध धर्म के वज्रयान संप्रदाय के महान अनुयायी थे, जिन्होंने बौद्ध कला, मूर्तिकला और शिक्षा को वैश्विक पहचान दिलाई।
- 12वीं शताब्दी के आते-आते आंतरिक विद्रोहों और सेन वंश के उदय के कारण इस गौरवशाली पाल साम्राज्य का पूरी तरह अंत हो गया।
प्रतिहार
- हर्षवर्धन के साम्राज्य के पतन के बाद, 8वीं से 11वीं शताब्दी ईस्वी तक उत्तर और पश्चिमी भारत में गुर्जर-प्रतिहार वंश का शासन रहा।
- प्रतिहारों ने कन्नौज पर नियंत्रण के लिए पाल और राष्ट्रकूट वंश के साथ हुए प्रसिद्ध ‘त्रिपक्षीय संघर्ष‘ में मुख्य भूमिका निभाई थी।
- इन्होंने तीन शताब्दियों तक पश्चिमी सीमा से होने वाले अरब आक्रमणकारियों को रोककर भारत के ‘द्वारपाल‘ के रूप में कार्य किया।
- इस राजवंश की स्थापना लगभग 730 ईस्वी में नागभट्ट प्रथम द्वारा की गई थी, जिसने अरब सेनाओं को परास्त किया था।
- प्रतिहार साम्राज्य की प्रारंभिक राजधानी अवन्ति (उज्जैन) थी, जिसे बाद में शक्तिशाली शासकों द्वारा कन्नौज स्थानांतरित कर दिया गया।
- वत्सराज को प्रतिहार साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक माना जाता है, जिसने त्रिपक्षीय संघर्ष की शुरुआत की और पाल शासक धर्मपाल को हराया।
- वत्सराज के पुत्र नागभट्ट द्वितीय ने कन्नौज पर पुनः अधिकार किया और अरबों द्वारा नष्ट किए गए सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया।
- मिहिरभोज (भोज प्रथम) इस वंश के सबसे प्रतापी राजा थे, जिन्होंने गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश तक साम्राज्य विस्तार किया।
- मिहिरभोज भगवान विष्णु के अनन्य भक्त थे, जिस कारण उन्होंने ‘आदिवराह‘ और ‘प्रभास‘ जैसी भव्य उपाधियाँ धारण की थीं।
- मिहिरभोज के काल में आए अरब यात्री सुलेमान ने प्रतिहार साम्राज्य की विशाल और शक्तिशाली घुड़सवार सेना की अत्यधिक प्रशंसा की थी।
- मिहिरभोज के पुत्र महेंद्रपाल प्रथम के दरबार में प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान और कवि राजशेखर निवास करते थे।
- राजशेखर ने प्रतिहार संरक्षण में ‘काव्यमीमांसा‘, ‘कर्पूरमंजरी‘, ‘बाल रामायण‘ और ‘बाल भारत‘ जैसे प्रसिद्ध ग्रंथों की रचना की थी।
- प्रतिहारों की प्रशासनिक व्यवस्था राजतंत्रात्मक थी, जहाँ राजा ‘महाराजाधिराज‘ और ‘परमभट्टारक‘ जैसी उपाधियाँ धारण करते थे।
- सुचारू शासन के लिए संपूर्ण प्रतिहार साम्राज्य विभिन्न इकाइयों जैसे ‘भुक्ति‘ (प्रांत), ‘विषय‘ (जिले) और ‘ग्राम‘ में बंटा हुआ था।
- प्रतिहार शासकों ने मंदिर निर्माण की ‘नागर शैली‘ को बढ़ावा दिया, जिसके उदाहरण आज भी राजस्थान और मध्य प्रदेश में दिखते हैं।
- ग्वालियर किले का प्रसिद्ध ‘तेली का मंदिर‘ और ओसियां (राजस्थान) का सूर्य मंदिर प्रतिहार स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूने हैं।
- प्रतिहार राजा मुख्य रूप से सनातन धर्म के वैष्णव संप्रदाय के अनुयायी थे, लेकिन वे जैन धर्म के प्रति भी अत्यधिक सहिष्णु थे।
- लगातार चलने वाले त्रिपक्षीय संघर्ष और राष्ट्रकूटों के हमलों ने समय के साथ प्रतिहारों की सैन्य और आर्थिक शक्ति को कमजोर कर दिया।
- 10वीं शताब्दी के अंत में केंद्रीय सत्ता कमजोर होने पर इनके सामंतों (चौहान, चंदेल, परमार) ने खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया।
- अंततः, 1018 ईस्वी में महमूद गजनवी के आक्रमण ने इस कमजोर साम्राज्य को ध्वस्त कर दिया और यशपाल इस वंश के अंतिम राजा रहे।
राष्ट्रकूट वंश
- गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद, 8वीं से 10वीं शताब्दी ईस्वी तक दक्षिण भारत और दक्कन क्षेत्र में राष्ट्रकूट वंश एक प्रमुख शक्ति के रूप में उभरा।
- राष्ट्रकूट राजाओं ने मुख्य रूप से आधुनिक महाराष्ट्र और कर्नाटक के क्षेत्रों पर अपना विशाल साम्राज्य स्थापित किया था।
- इस शक्तिशाली राजवंश की स्थापना लगभग 735 ईस्वी में दंतिदुर्ग नामक शासक द्वारा की गई थी।
- दंतिदुर्ग ने बादामी के चालुक्य शासक कीर्तिवर्मन द्वितीय को पराजित करके दक्कन में एक स्वतंत्र राष्ट्रकूट सत्ता की नींव रखी।
- राष्ट्रकूटों की प्रारंभिक राजधानी मयूरखिंदी थी, जिसे बाद के शासकों द्वारा मान्यखेट (आधुनिक मालखेड़, कर्नाटक) स्थानांतरित कर दिया गया।
- संस्थापक दंतिदुर्ग के बाद उसका उत्तराधिकारी कृष्ण प्रथम गद्दी पर बैठा, जिसने चालुक्यों के बचे हुए प्रभुत्व को पूरी तरह समाप्त किया।
- राजा कृष्ण प्रथम ने वास्तुकला के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान देते हुए एलोरा में विश्व प्रसिद्ध कैलाशनाथ मंदिर का निर्माण करवाया।
- एलोरा का यह भव्य कैलाशनाथ मंदिर वास्तुकला की बेजोड़ मिसाल है, जिसे एक ही विशाल चट्टान को ऊपर से नीचे की ओर काटकर बनाया गया है।
- राजा ध्रुव राष्ट्रकूट वंश का पहला ऐसा शासक था जिसने कन्नौज पर अधिकार के लिए उत्तर भारत के ‘त्रिपक्षीय संघर्ष‘ में प्रवेश किया।
- ‘धारावर्ष‘ के नाम से प्रसिद्ध राजा ध्रुव ने त्रिपक्षीय संघर्ष में पाल शासक धर्मपाल और प्रतिहार शासक वत्सराज दोनों को पराजित किया था।
- ध्रुव के बाद गोविंद तृतीय ने गद्दी संभाली और उसने भी पालों तथा प्रतिहारों को हराकर दक्षिण में चोल, पांड्य और चेर राज्यों पर विजय प्राप्त की।
- अमोघवर्ष प्रथम इस वंश का सबसे लंबे समय तक शासन करने वाला राजा था, जो अपनी वीरता के साथ-साथ महान विद्वता के लिए जाना जाता है।
- अमोघवर्ष प्रथम ने कन्नड़ भाषा की पहली प्रसिद्ध काव्य कृति ‘कविराजमार्ग‘ की रचना की और उसने जैन धर्म को अपनाया था।
- अमोघवर्ष प्रथम के ही शासनकाल में प्रसिद्ध अरब यात्री सुलेमान ने भारत का दौरा किया था और राष्ट्रकूट साम्राज्य की समृद्धि का वर्णन किया था।
- कृष्ण तृतीय इस गौरवशाली राजवंश का अंतिम महान और प्रतापी शासक था, जिसने अपनी सैन्य कुशलता का परिचय दिया।
- राजा कृष्ण तृतीय ने चोल शासकों को ‘तक्कोलम के युद्ध‘ (949 ईस्वी) में करारी शिकस्त दी और दक्षिण में रामेश्वरम तक विजय स्तंभ स्थापित किया।
- राष्ट्रकूट शासकों ने धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनाई, जिसके तहत उन्होंने हिंदू धर्म (वैष्णव और शैव), जैन धर्म और बौद्ध धर्म तीनों को उदारतापूर्वक संरक्षण दिया।
- इनके काल में कन्नड़ और संस्कृत साहित्य का अत्यधिक विकास हुआ, जिसमें जिनसेन और साकटायन जैसे महान विद्वानों को राज्याश्रय मिला।
- स्थापत्य कला के क्षेत्र में एलोरा की गुफाओं के साथ-साथ मुंबई के निकट स्थित एलिफेंटा की प्रसिद्ध गुफाओं का निर्माण भी राष्ट्रकूटों के समय हुआ।
अंततः 10वीं शताब्दी के अंत में आंतरिक कमजोरियों का लाभ उठाकर कल्याणी के चालुक्य शासक तैलप द्वितीय ने राष्ट्रकूट साम्राज्य का अंत कर दिया।