उत्तराखंड को न केवल “देवभूमि” बल्कि यहां के युवाओं के अदम्य साहस और देशप्रेम के कारण “वीरभूमि” भी कहा जाता है।
भारतीय सेना में उत्तराखंड के सैन्य योगदान का एक लंबा और अत्यंत गौरवशाली इतिहास रहा है, जिसने देश को कई महान सैनिक दिए हैं।
राज्य की सैन्य परंपरा मुख्य रूप से दो प्रसिद्ध इन्फैंट्री रेजिमेंटों—कुमाऊं रेजिमेंट और गढ़वाल राइफल्स के इर्द-गिर्द केंद्रित है।
कुमाऊं रेजिमेंट की आधिकारिक स्थापना वर्ष 1945 में हुई थी, जिसका मुख्यालय वर्तमान में रानीखेत (अल्मोड़ा) में स्थित है।
कुमाऊं रेजिमेंट के जांबाज सैनिकों ने 1947 के भारत-पाक युद्ध, 1962 के भारत-चीन युद्ध और रेजांग ला के ऐतिहासिक युद्ध में बेमिसाल वीरता दिखाई थी।
भारत का प्रथम सर्वोच्च सैन्य सम्मान “परमवीर चक्र” कुमाऊं रेजिमेंट के मेजर सोमनाथ शर्मा को मरणोपरांत (1947 के युद्ध के लिए) दिया गया था।
मेजर सोमनाथ शर्मा ने श्रीनगर हवाई अड्डे की रक्षा करते हुए कबाली हमलावरों के खिलाफ लड़ते हुए अपने प्राणों की आहुति दी थी।
कुमाऊं रेजिमेंट के ही मेजर शैतान सिंह को 1962 के भारत-चीन युद्ध में लद्दाख के चुशुल सेक्टर में अदम्य साहस के लिए परमवीर चक्र से नवाजा गया था।
दूसरी ओर, गढ़वाल राइफल्स की स्थापना 5 मई 1887 को अल्मोड़ा में हुई थी, जिसे बाद में कालोंडांडा (वर्तमान लैंसडाउन) स्थानांतरित किया गया।
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान फ्रांस के मोर्चे पर अदम्य वीरता दिखाने के लिए नायक दरवान सिंह नेगी को उत्तराखंड का पहला “विक्टोरिया क्रॉस” मिला था।
प्रथम विश्व युद्ध में ही राइफलमैन गब्बर सिंह नेगी को भी मरणोपरांत ब्रिटिश साम्राज्य के सर्वोच्च सैन्य सम्मान विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित किया गया।
वर्ष 1930 के ऐतिहासिक ‘पेशावर कांड’ के महानायक वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली भी इसी विख्यात गढ़वाल राइफल्स के वीर सैनिक थे।
वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध में नूरानंग (अरुणाचल प्रदेश) के मोर्चे पर अकेले 300 चीनी सैनिकों को ढेर करने वाले बाबा जसवंत सिंह रावत गढ़वाल राइफल्स के ही नायक थे।
जसवंत सिंह रावत को उनकी अद्वितीय और अविश्वसनीय बहादुरी के लिए मरणोपरांत “महावीर चक्र” से सम्मानित किया गया था।
वर्ष 1999 के कारगिल युद्ध (ऑपरेशन विजय) में उत्तराखंड के वीर सपूतों ने अपनी वीरता का परचम लहराते हुए महत्वपूर्ण चोटियों को मुक्त कराया।
कारगिल युद्ध में अदम्य साहस का परिचय देने वाले पौड़ी गढ़वाल के कैप्टन विक्रम बत्रा को सेना के सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था।
उत्तराखंड देश को जनरल बिपिन रावत के रूप में भारत का पहला ‘चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ’ (CDS) देने का गौरव भी रखता है।
वर्तमान में भी राज्य का प्रत्येक तीसरा या चौथा परिवार किसी न किसी रूप में भारतीय सशस्त्र बलों से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ है।
सैन्य सेवा में शहादत देने वाले सैनिकों की स्मृति में राज्य के विभिन्न जनपदों में युद्ध स्मारक और सैन्य संग्रहालय स्थापित हैं।
निष्कर्षतः, अपनी इसी अटूट देशभक्ति, शौर्य गाथाओं और सर्वोच्च बलिदानों के दम पर उत्तराखंड की सैन्य परंपरा भारत माता का गौरव बढ़ा रही है।
खेल और खिलाड़ी
उत्तराखंड की भौगोलिक संरचना और पर्वतीय जलवायु यहाँ के युवाओं को स्वाभाविक रूप से शारीरिक रूप से सुदृढ़ और खेल के अनुकूल बनाती है।
राज्य में खेल गतिविधियों को व्यवस्थित रूप से बढ़ावा देने के लिए खेल निदेशालय और युवा कल्याण विभाग नोडल संस्था के रूप में कार्य करते हैं।
राज्य सरकार द्वारा खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करने के लिए ‘देवभूमि उत्तराखंड खेल रत्न पुरस्कार’ और ‘देवभूमि उत्तराखंड द्रोणाचार्य पुरस्कार’ दिए जाते हैं।
इसके अतिरिक्त, खेलों में जीवनभर के योगदान के लिए खिलाड़ियों और प्रशिक्षकों को ‘देवभूमि उत्तराखंड लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार’ से नवाजा जाता है।
राज्य के प्रतिभावान युवा खिलाड़ियों को वित्तीय संबल देने के लिए ‘मुख्यमंत्री उदीयमान खिलाड़ी उन्नयन योजना’ के तहत मासिक खेल छात्रवृत्ति दी जाती है।
क्रिकेट के क्षेत्र में अल्मोड़ा में जन्मे महेंद्र सिंह धोनी (भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान) का पैतृक संबंध उत्तराखंड से है।
वर्तमान भारतीय क्रिकेट टीम के स्टार विकेटकीपर-बल्लेबाज ऋषभ पंत का संबंध भी उत्तराखंड के रुड़की (हरिद्वार) से है।
घरेलू क्रिकेट के विकास के लिए ‘क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड’ (CAU) को बीसीसीआई द्वारा मान्यता प्रदान की गई है।
बैडमिंटन के क्षेत्र में अल्मोड़ा के लक्ष्य सेन ने कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदक और विश्व चैंपियनशिप में पदक जीतकर वैश्विक स्तर पर पहचान बनाई है।
लक्ष्य सेन के अलावा कुहू गर्ग और चिराग सेन ने भी बैडमिंटन में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राज्य का गौरव बढ़ाया है।
एथलेटिक्स (वॉक रेस) में चमोली के मनीष रावत ने रियो ओलंपिक 2016 में शानदार प्रदर्शन कर देश और राज्य का नाम रोशन किया था।
पौड़ी गढ़वाल की अंकिता ध्यानी और पिथौरागढ़ की चंदा बहादुर थापा ने राष्ट्रीय स्तर पर मध्यम दूरी की दौड़ में कई पदक जीते हैं।
निशानेबाजी (Shooting) में जसपाल राणा उत्तराखंड के सबसे प्रसिद्ध नाम हैं, जिन्हें भारत सरकार द्वारा ‘अर्जुन पुरस्कार’ से सम्मानित किया जा चुका है।
मुक्केबाजी (Boxing) के क्षेत्र में पद्म बहादुर मल्ल और राजेंद्र कुमार पूनेठा ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बेहतरीन प्रदर्शन किया है।
पर्वतारोहण में उत्तरकाशी की बछेंद्री पाल एवरेस्ट फतह करने वाली भारत की पहली महिला हैं, जो राज्य के साहसिक खेलों की सबसे बड़ी प्रतीक हैं।
बछेंद्री पाल के बाद शीतल राज और सविता कंसवाल जैसी युवा महिला पर्वतारोहियों ने भी कई दुर्गम चोटियों पर तिरंगा फहराया है।
देहरादून का महाराणा प्रताप स्पोर्ट्स कॉलेज और हल्द्वानी का स्पोर्ट्स स्टेडियम राज्य में खिलाड़ियों को आधुनिक प्रशिक्षण देने के प्रमुख केंद्र हैं।
चमोली जिले के औली को शीतकालीन खेलों (विशेषकर स्कीइंग) के एक अंतरराष्ट्रीय केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है।
बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए राज्य में विभिन्न खेल मैदानों और बहुउद्देशीय खेल हॉस्टलों का निर्माण तेजी से किया जा रहा है।
निष्कर्षतः, उचित मंच, आधुनिक सुविधाएं और नई खेल नीति के माध्यम से उत्तराखंड के खिलाड़ी वैश्विक पटल पर देवभूमि का मान लगातार बढ़ा रहे हैं।
पुरस्कार और सम्मान
उत्तराखंड की पावन भूमि ने कला, साहित्य, विज्ञान, समाज सेवा और वीरता के क्षेत्र में देश को कई असाधारण रत्न दिए हैं।
भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ प्राप्त करने वाले उत्तराखंड के एकमात्र व्यक्तित्व पंडित गोविंद बल्लभ पंत हैं।
उन्हें वर्ष 1957 में देश के गृहमंत्री के रूप में उनकी महान राष्ट्रीय सेवाओं के लिए इस सर्वोच्च नागरिक सम्मान से विभूषित किया गया था।
साहित्य के क्षेत्र में छायावाद के महान सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत को उनकी प्रसिद्ध कृति ‘चिदंबरा’ के लिए वर्ष 1968 में प्रतिष्ठित ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ मिला।
सुमित्रानंदन पंत यह सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान पाने वाले हिंदी भाषा के पहले प्रसिद्ध रचनाकार भी बने।
पर्यावरण संरक्षण और ‘चिपको आंदोलन’ को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए प्रसिद्ध समाज सुधारक चंडी प्रसाद भट्ट को वर्ष 1982 में ‘रमन मैग्सेसे पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया था।
चंडी प्रसाद भट्ट को पर्यावरण के क्षेत्र में अद्वितीय कार्यों के लिए भारत सरकार द्वारा ‘पद्म भूषण’ सम्मान भी प्रदान किया जा चुका है।
हिमालयी पर्यावरण के प्रति जन-जागरूकता फैलाने वाले प्रख्यात पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा को वर्ष 2009 में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म विभूषण’ से नवाजा गया।
साहसिक खेलों में उत्तरकाशी की वीर पर्वतारोही बछेंद्री पाल को वर्ष 1984 में एवरेस्ट फतह करने पर ‘पद्म श्री’ और बाद में ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया गया।
सैन्य और शौर्य परंपरा में देश का प्रथम सर्वोच्च सैन्य सम्मान ‘परमवीर चक्र’ कुमाऊं रेजिमेंट के जांबाज मेजर सोमनाथ शर्मा को मरणोपरांत (1947) दिया गया था।
वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध में लद्दाख के रेजांग ला मोर्चे पर अदम्य साहस दिखाने वाले मेजर शैतान सिंह को भी मरणोपरांत ‘परमवीर चक्र’ मिला।
कारगिल युद्ध (1999) के दौरान टाइगर हिल पर तिरंगा फहराने वाले कैप्टन विक्रम बत्रा को उनकी सर्वोच्च शहादत के लिए ‘परमवीर चक्र’ से सम्मानित किया गया।
प्रथम विश्व युद्ध के नायक दरवान सिंह नेगी और गब्बर सिंह नेगी को ब्रिटिश साम्राज्य का सर्वोच्च सैन्य सम्मान ‘विक्टोरिया क्रॉस’ प्राप्त होने का गौरव हासिल है।
विज्ञान के क्षेत्र में उल्लेखनीय अनुसंधान के लिए खगोल भौतिकीविद डॉ. अनिल प्रकाश जोशी को ग्रामीण विकास और पर्यावरण तकनीक के लिए ‘पद्म भूषण’ मिला है।
लोक कला और संस्कृति के क्षेत्र में उत्तराखंड की प्रसिद्ध लोक गायिका ‘गढ़ रत्न’ नरेंद्र सिंह नेगी और कुमाऊँनी गायक हीरा सिंह राणा को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
राज्य सरकार द्वारा खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करने के लिए ‘देवभूमि उत्तराखंड खेल रत्न पुरस्कार’ और उत्कृष्ट प्रशिक्षकों के लिए ‘द्रोणाचार्य पुरस्कार’ की स्थापना की गई है।
उत्तराखंड के प्रसिद्ध निशानेबाज जसपाल राणा को खेल के क्षेत्र में देश का प्रतिष्ठित ‘अर्जुन पुरस्कार’ और ‘पद्म श्री’ सम्मान मिल चुका है।
राज्य में महिलाओं और बालिकाओं के सशक्तिकरण व अदम्य साहस के लिए प्रतिवर्ष ‘तीलू रौतेली विशेष पेंशन व पुरस्कार’ प्रदान किया जाता है।
साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान देने वाले रचनाकारों को राजकीय स्तर पर ‘उत्तराखंड गौरव सम्मान’ से भी अलंकृत किया जाता है।
निष्कर्षतः, इन सभी राष्ट्रीय और राजकीय पुरस्कारों से सम्मानित विभूतियाँ उत्तराखंड की गौरवशाली अस्मिता और प्रगतिशील विरासत की सच्ची प्रतीक हैं।