द्वैध शासन संरचना: संघीय प्रणाली के तहत केंद्र और राज्य दो स्तरों पर सरकारें काम करती हैं, जो अपने-अपने अधिकार क्षेत्रों में स्वतंत्र रूप से कार्य करती हैं।
शक्तियों का स्पष्ट विभाजन: संविधान की सातवीं अनुसूची में संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची द्वारा विधायी एवं प्रशासनिक शक्तियों का स्पष्ट विभाजन किया गया है।
संविधान की सर्वोच्चता: संघीय व्यवस्था में संविधान सर्वोच्च कानून होता है; केंद्र या राज्य का कोई भी कानून संविधान के विरुद्ध नहीं हो सकता।
लिखित और कठोर संविधान: संघ और इकाइयों के अधिकारों की रक्षा हेतु संविधान लिखित है और इसके संघीय प्रावधानों में संशोधन के लिए विशेष प्रक्रिया अनिवार्य है।
स्वतंत्र न्यायपालिका की भूमिका: केंद्र और राज्यों के बीच किसी भी विवाद की स्थिति में सर्वोच्च न्यायालय एक निष्पक्ष मध्यस्थ और संविधान संरक्षक के रूप में कार्य करता है।
द्विसदनीय विधायिका: संसद में लोकसभा (जनता का प्रतिनिधित्व) और राज्यसभा (राज्यों का प्रतिनिधित्व) के रूप में द्विसदनीय व्यवस्था संघीय संतुलन को बनाए रखती है।
नाममात्र व वास्तविक कार्यपालिका: संसदीय प्रणाली में राष्ट्रपति राज्य का औपचारिक/संवैधानिक प्रमुख होता है, जबकि प्रधानमंत्री वास्तविक शासन प्रमुख के रूप में कार्य करता है।
विधायिका और कार्यपालिका का समन्वय: संसदीय व्यवस्था में मंत्रिपरिषद के सभी सदस्य विधायिका के भी सदस्य होते हैं, जिससे दोनों अंगों में घनिष्ठ सामंजस्य रहता है।
सामूहिक उत्तरदायित्व: मंत्रिपरिषद अपने प्रत्येक निर्णय और नीति के लिए संसद के निचले सदन (लोकसभा) के प्रति सामूहिक रूप से सीधे जवाबदेह होती है।
बहुमत दल का शासन: संसदीय प्रणाली में लोकसभा के आम चुनाव में बहुमत प्राप्त करने वाले राजनीतिक दल या गठबंधन को ही सरकार बनाने का अधिकार मिलता है।
प्रधानमंत्री का नेतृत्व: प्रधानमंत्री मंत्रिमंडल का मुखिया, संसद का नेता और सरकार का मुख्य नीति-निर्धारक होता है, जो संपूर्ण प्रशासन को दिशा देता है।
सदन के विघटन की शक्ति: प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति कार्यकाल समाप्त होने से पूर्व भी लोकसभा को भंग करके नए चुनाव का आदेश दे सकता है।
मंत्रियों की गोपनीयता: मंत्री पदभार ग्रहण करने से पूर्व गोपनीयता की शपथ लेते हैं, जिससे कैबिनेट की बैठकों और रणनीतियों की गोपनीयता बनी रहती है।
अर्ध-संघीय स्वरूप: प्रोफेसर के. सी. व्हेयर ने भारत को ‘अर्ध-संघीय’ कहा है, क्योंकि इसमें संघीय लक्षणों के साथ केंद्र को सशक्त बनाने वाले मजबूत एकात्मक तत्व हैं।
संसदीय संप्रभुता पर सीमाएं: भारत की संसद संप्रभु होते हुए भी लिखित संविधान, मौलिक अधिकारों और न्यायिक समीक्षा के दायरे में रहकर ही कानून बना सकती है।