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शिक्षा, भाषा, साहित्य, पुस्तकें एवं पत्र-पत्रिकाएँ

उत्तराखंड में शिक्षा का विकास

  • उत्तराखंड में शिक्षा का इतिहास अत्यंत समृद्ध है, जहाँ प्राचीन काल से ही कुटीर, आश्रमों और पारंपरिक पाठशालाओं के माध्यम से ज्ञान का प्रसार होता रहा है।
  • ब्रिटिश काल के दौरान पर्वतीय क्षेत्र की जलवायु से प्रभावित होकर अंग्रेजों ने देहरादून, मसूरी और नैनीताल जैसे शहरों को प्रमुख स्कूली शिक्षा केंद्रों के रूप में विकसित किया।
  • स्वतंत्रता के बाद उत्तर प्रदेश का हिस्सा रहते हुए और सन 2000 में अलग राज्य बनने के बाद यहाँ के शैक्षिक ढांचे में व्यापक गुणात्मक व ढांचागत सुधार हुए हैं।
  • वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, उत्तराखंड की कुल साक्षरता दर 82 प्रतिशत दर्ज की गई है, जो राष्ट्रीय औसत से काफी बेहतर है।
  • राज्य में पुरुषों की साक्षरता दर 40 प्रतिशत है, जबकि महिलाओं की साक्षरता दर 70.01 प्रतिशत आंकी गई है।
  • जिलावार आंकड़ों के दृष्टिकोण से देहरादून राज्य का सर्वाधिक साक्षर जिला है, जबकि ऊधम सिंह नगर की साक्षरता दर सबसे कम है।
  • उत्तराखंड में स्कूली शिक्षा के प्रशासनिक नियंत्रण के लिए प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा के अलग-अलग निदेशालय कार्यरत हैं।
  • राज्य के राजकीय विद्यालयों में पाठ्यक्रम के निर्धारण और बोर्ड परीक्षाओं के सफल संचालन के लिए ‘उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा परिषद’ (UBSE) रामनगर (नैनीताल) में स्थापित है।
  • शिक्षकों के प्रशिक्षण और शैक्षिक अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (SCERT) देहरादून में सक्रिय है।
  • उत्तराखंड उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी एक प्रमुख केंद्र है, जहाँ कई केंद्रीय, राज्य स्तरीय और निजी विश्वविद्यालय ज्ञान का प्रसार कर रहे हैं।
  • श्रीनगर (पौड़ी गढ़वाल) में स्थित ‘हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय’ राज्य का एकमात्र केंद्रीय विश्वविद्यालय है।
  • कुमाऊं क्षेत्र की उच्च शिक्षा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए नैनीताल में ‘कुमाऊं विश्वविद्यालय’ और अल्मोड़ा में ‘सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय’ कार्यरत हैं।
  • ऊधम सिंह नगर के पंतनगर में स्थापित ‘गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय’ (1960) भारत का पहला कृषि विश्वविद्यालय है, जिसे हरित क्रांति का अग्रदूत माना जाता है।
  • रुड़की में स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT Roorkee) एशिया का सबसे पुराना इंजीनियरिंग कॉलेज है, जिसकी स्थापना 1847 में थॉमसन कॉलेज ऑफ सिविल इंजीनियरिंग के रूप में हुई थी।
  • इसके अतिरिक्त, चिकित्सा और तकनीकी शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए राज्य में वीर चंद्र सिंह गढ़वाली आयुर्विज्ञान संस्थान (श्रीनगर) और उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय (देहरादून) संचालित हैं।
  • सुदूर पर्वतीय क्षेत्रों के छात्रों तक उच्च शिक्षा सुलभ कराने के लिए हल्द्वानी में ‘उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय’ (UOU) मुक्त एवं दूरस्थ शिक्षा प्रदान कर रहा है।
  • राज्य सरकार द्वारा प्राथमिक स्तर से ही आधुनिक शिक्षा देने के लिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 को प्राथमिक स्तर (बालवाटिका) पर लागू करने वाला उत्तराखंड देश का पहला राज्य बना है।
  • मेधावी और निर्धन छात्रों की सहायता के लिए सरकार द्वारा अटल उत्कृष्ट विद्यालय, कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय और विभिन्न छात्रवृत्ति योजनाएं चलाई जा रही हैं।
  • इस प्रगति के बावजूद, सुदूर ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों के विद्यालयों में शिक्षकों की कमी, बुनियादी सुविधाओं का अभाव और छात्रों का कम नामांकन कुछ मुख्य चिंताएं हैं।
  • अंततः, इन चुनौतियों का समाधान कर और डिजिटल तकनीकों को अपनाकर उत्तराखंड देश के एक अग्रणी शिक्षा हब के रूप में निरंतर आगे बढ़ रहा है।

भाषाएँ और साहित्य

  • उत्तराखंड की भाषाई और साहित्यिक विरासत यहाँ की भौगोलिक विविधताओं की तरह ही अत्यंत समृद्ध, जीवंत और प्राचीन है।
  • राज्य की आधिकारिक भाषा हिंदी है, जबकि संस्कृत को उत्तराखंड की द्वितीय राजभाषा का गौरव प्राप्त है।
  • लोक स्तर पर उत्तराखंड को मुख्य रूप से दो भाषाई क्षेत्रों—गढ़वाली और कुमाऊँनी में विभाजित किया गया है।
  • ये दोनों बोलियाँ भारोपीय भाषा परिवार की केंद्रीय पहाड़ी उपशाखा के अंतर्गत आती हैं, जिनकी उत्पत्ति शौरसेनी अपभ्रंश से मानी जाती है।
  • गढ़वाली बोली मुख्य रूप से गढ़वाल मंडल के सात जिलों में बोली जाती है और इसकी श्रीनगरी, राठी, सलाणी जैसी कई उप-बोलियाँ हैं।
  • कुमाऊँनी बोली कुमाऊं मंडल के छह जिलों में प्रचलित है, जिसकी खसपर्जिया, कुमय्या, चौभैंसी और पछाईं प्रमुख उप-बोलियाँ हैं।
  • राज्य के उत्तरी सीमांत क्षेत्रों में भोटिया जनजाति द्वारा अपनी विशिष्ट जनजातीय बोलियाँ (जैसे जाड़, मरछा, शौका) बोली जाती हैं।
  • देहरादून के जौनसार-बावर क्षेत्र में जौनसारी बोली का प्रचलन है, जिसका अपना एक समृद्ध लोक और मौखिक साहित्य है।
  • उत्तराखंड का प्रारंभिक साहित्य लिखित न होकर मौखिक (लोक साहित्य) रहा है, जो पीढ़ियों से गाथाओं के रूप में जीवित है।
  • लोक साहित्यों में ‘जागर’ (देवताओं को जगाने वाले गीत) और ‘पवाड़े’ (ऐतिहासिक वीरों की वीरगाथाएँ) यहाँ की संस्कृति के प्राण हैं।
  • कुमाऊँनी लिखित साहित्य की शुरुआत 18वीं-19वीं शताब्दी से मानी जाती है, जिसमें गुमानी पंत को आदि कवि का दर्जा प्राप्त है।
  • कृष्ण पांडेय, शिव दत्त सती और गौरदा (गौरी दत्त पांडे) कुमाऊँनी साहित्य के अन्य प्रमुख और जनप्रिय रचनाकार रहे हैं।
  • गढ़वाली साहित्य का इतिहास भी अत्यंत गौरवशाली है, जिसमें मौलाराम (प्रसिद्ध चित्रकार व कवि) और जनार्दन बलोदी के नाम उल्लेखनीय हैं।
  • आधुनिक गढ़वाली कविता और गद्य के विकास में सुदामा प्रसाद ‘प्रेमी’ और भजन सिंह ‘सिंह’ का योगदान मील का पत्थर माना जाता है।
  • हिंदी के महानतम छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत का जन्म कौसानी (उत्तराखंड) में हुआ था, जिन्हें उनकी कृति ‘चिदंबरा’ के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला।
  • हिंदी गद्य और कथा साहित्य में ‘उपन्यास सम्राट’ इलाचंद्र जोशी और प्रसिद्ध कहानीकार शेखर जोशी ने राष्ट्रीय स्तर पर विशिष्ट पहचान बनाई।
  • समकालीन हिंदी साहित्य को समृद्ध करने में मंगलेश डबराल, वीरेन डंगवाल और शैलेश मटियानी जैसे दिग्गजों की रचनाएँ अमूल्य धरोहर हैं।
  • उत्तराखंड के इस समृद्ध साहित्य में यहाँ के पहाड़ों का सौंदर्य, आम जनमानस का संघर्ष और प्रकृति के प्रति गहरा प्रेम स्पष्ट रूप से झलकता है।
  • वर्तमान डिजिटल युग में इन लोक बोलियों के संरक्षण और लुप्त प्राय विधाओं को बचाने के लिए कई साहित्यिक संस्थाएं सक्रिय हैं।
  • निष्कर्षतः, अपनी लोक बोलियों और महान साहित्यकारों के दम पर उत्तराखंड भारतीय साहित्य जगत में एक अत्यंत आदरणीय और विशिष्ट स्थान रखता है।

पत्र-पत्रिकाएँ और उनके संपादक

  • उत्तराखंड में पत्रकारिता और पत्र-पत्रिकाओं का इतिहास जन-जागरूकता, राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक सुधारों से गहराई से जुड़ा हुआ है।
  • राज्य में पत्रकारिता की शुरुआत ब्रिटिश काल में हुई, जिसका मुख्य उद्देश्य औपनिवेशिक नीतियों के खिलाफ आवाज उठाना था।
  • वर्ष 1842 में मसूरी से ‘द हिल्स’ (The Hills) नामक राज्य के पहले अंग्रेजी समाचार पत्र का प्रकाशन जॉन मैकिनन द्वारा किया गया था।
  • हिंदी और स्थानीय पत्रकारिता के इतिहास में वर्ष 1871 में अल्मोड़ा से शुरू हुआ ‘अल्मोड़ा अखबार’ एक अत्यंत महत्वपूर्ण मील का पत्थर था।
  • ‘अल्मोड़ा अखबार’ के संपादकों में बुद्धि बल्लभ पंत, मुंशी इम्तियाज अली, जीवाानंद जोशी और अंत में बद्री दत्त पांडे प्रमुख रहे।
  • वर्ष 1918 में ब्रिटिश सरकार द्वारा अल्मोड़ा अखबार पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद बद्री दत्त पांडे ने ‘शक्ति’ नामक साप्ताहिक पत्र शुरू किया।
  • गढ़वाल क्षेत्र में राजनीतिक और सामाजिक चेतना का प्रसार करने के लिए वर्ष 1902 में ‘गढ़वाल यूनियन’ द्वारा ‘गढ़वाली’ पत्र का संपादन शुरू हुआ।
  • ‘गढ़वाली’ समाचार पत्र के कुशल संपादन में पंडित गिरिजा दत्त नैथानी, तारा दत्त गैरोला और विशम्भर दत्त चंदोला ने मुख्य भूमिका निभाई।
  • पंडित गिरिजा दत्त नैथानी को गढ़वाल में पत्रकारिता का जनक माना जाता है, जिन्होंने ‘पुरुषार्थ’ नामक मासिक पत्रिका का भी संपादन किया था।
  • वर्ष 1913 में दुगड्डा (पौड़ी) से स्वामी विचारानंद सरस्वती द्वारा ‘अभय’ नामक देशभक्ति से ओत-प्रोत पत्र का प्रकाशन किया गया।
  • स्वतंत्रता सेनानी भक्त दर्शन और भैरव दत्त धूलिया ने वर्ष 1939 में लैंसडाउन से ऐतिहासिक ‘कर्मभूमि’ पत्र का संपादन और प्रकाशन शुरू किया।
  • देहरादून से वर्ष 1947 में युगल किशोर पेटशाली के संपादन में ‘युगवाणी’ पत्रिका की शुरुआत हुई, जिसने रियासत विरोधी आंदोलनों को स्वर दिया।
  • कुमाऊं के सीमावर्ती क्षेत्र से जन-आवाज को उठाने के लिए वर्ष 1930 में कृपाल राम त्रिपाठी द्वारा ‘स्वाधीन प्रजा’ पत्र निकाला गया।
  • स्वतंत्रता के बाद के दौर में राज्य की लोक संस्कृति और स्थानीय बोलियों के संरक्षण के लिए कई साहित्यिक पत्रिकाओं का संपादन हुआ।
  • नैनीताल से ‘पहाड़’ (PAHAR) नामक अत्यंत प्रसिद्ध समसामयिक और शोधपरक पत्रिका का संपादन डॉ. शेखर पाठक द्वारा किया जाता है।
  • ‘उत्तराखंड काव्य’ और ‘धाद’ जैसी संस्थाओं व पत्रिकाओं ने गढ़वाली और कुमाऊँनी बोलियों के संवर्धन में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
  • अलग उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन (1990 के दशक) के दौरान यहाँ के स्थानीय पत्रों ने जन-क्रांति को जगाने में मुख्य भूमिका निभाई।
  • लेख में वर्णित ये सभी पत्रिकाएं और समाचार पत्र केवल सूचना के माध्यम नहीं थे, बल्कि वे सामाजिक कुप्रथाओं के खिलाफ सशक्त हथियार थे।
  • वर्तमान समय में भी उत्तराखंड के विभिन्न जिलों से कई खोजी और साहित्यिक पत्रिकाएं निरंतर प्रकाशित होकर बौद्धिक विमर्श को जीवित रखे हुए हैं।
  • संक्षेप में, उत्तराखंड के गौरवशाली इतिहास, अस्मिता और वैचारिक चेतना को आकार देने में इन पत्र-पत्रिकाओं और कर्मठ संपादकों का योगदान अविस्मरणीय है।

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