rankersnotes.com

उद्योग एवं औद्योगिक विकास

पारंपरिक उद्योग

  • उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भरता में पारंपरिक उद्योगों व कुटीर शिल्पों का हमेशा से महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
  • ये पारंपरिक उद्योग पूरी तरह से स्थानीय स्तर पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों, वनस्पतियों और प्राचीन कलात्मक कौशल पर आधारित हैं।
  • राज्य में ऊनी वस्त्र उद्योग सबसे प्रमुख पारंपरिक उद्योगों में से एक है, जो मुख्य रूप से भोटिया जनजाति द्वारा संचालित किया जाता है।
  • पिथौरागढ़, चमोली और उत्तरकाशी के उच्च हिमालई क्षेत्रों में भेड़ों और याक के ऊन से उच्च गुणवत्ता वाले वस्त्र तैयार किए जाते हैं।
  • भोटिया कारीगरों द्वारा बनाए जाने वाले थुलमा (कंबल), चुटका, पंखी, आसन और दन (कालीन) अपनी गर्माहट और मजबूती के लिए प्रसिद्ध हैं।
  • रिंगाल (एक प्रकार का पहाड़ी बांस) शिल्प उत्तराखंड का एक अन्य अत्यंत महत्वपूर्ण और व्यापक घरेलू कुटीर उद्योग है।
  • चमोली, रुद्रप्रयाग और उत्तरकाशी जिलों में रिंगाल से टोकरियाँ (कंडी), चटाई, मोस्टा, हॉट-केस और कई कलात्मक सामग्रियां बनाई जाती हैं।
  • रिंगाल उद्योग से जुड़े स्थानीय कारीगरों को पारंपरिक रूप से ‘रुड़िया’ कहा जाता है, जो इस पर्यावरण-अनुकूल कला को जीवित रखे हुए हैं।
  • ताम्र शिल्प (तांबे के बर्तन बनाना) अल्मोड़ा जिले का एक ऐतिहासिक पारंपरिक उद्योग है, जिसके कारण अल्मोड़ा को ‘ताम्र नगरी’ भी कहा जाता है।
  • यहाँ के शिल्पकारों द्वारा बनाए जाने वाले तांबे के पारंपरिक बर्तन जैसे गागर, तौले और पारंपरिक वाद्ययंत्र (तुरही, रणसिंगा) बहुत प्रसिद्ध हैं।
  • काष्ठ कला (लकड़ी पर नक्काशी) उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर है, जो प्राचीन मंदिरों और घरों के दरवाजों व खिड़कियों (खोली) पर दिखाई देती है।
  • पहाड़ी क्षेत्रों में कूट, थूनेर और जटामांसी जैसी औषधीय वनस्पतियों पर आधारित जड़ी-बूटी उद्योग भी स्थानीय आजीविका का बड़ा साधन है।
  • भांग के रेशों (सेला) से कुमाऊं और गढ़वाल के ग्रामीण इलाकों में मजबूत रस्सियां, दरी, बोरे और पारंपरिक चप्पलें बनाई जाती हैं।
  • राज्य में पारंपरिक रूप से चर्म उद्योग (लोहार और चर्मशिल्प) भी स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ग्रामीण स्तर पर संचालित होता रहा है।
  • इसके अतिरिक्त, पहाड़ी क्षेत्रों में स्थानीय अनाजों और फलों से पारंपरिक जैम, जेली, चटनी और जूस बनाने का खाद्य प्रसंस्करण उद्योग बढ़ रहा है।
  • आधुनिक मशीनीकरण, सस्ते सिंथेटिक उत्पादों की उपलब्धता और कच्चे माल की कमी के कारण ये पारंपरिक उद्योग वर्तमान में संकट का सामना कर रहे हैं।
  • इन शिल्पों को बचाने के लिए राज्य सरकार द्वारा ‘एक जनपद दो उत्पाद’ (ODTP) जैसी योजनाओं के तहत वित्तीय और तकनीकी सहायता दी जा रही है।
  • उत्तराखंड खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड और ‘हिमाद्रि’ ब्रांड के माध्यम से इन पारंपरिक उत्पादों को राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बाजार उपलब्ध कराया जा रहा है।
  • इन कुटीर उद्योगों का विकास न केवल पहाड़ों से होने वाले पलायन को रोकने में मददगार है, बल्कि यह पर्यावरण के अनुकूल सतत विकास को भी बढ़ावा देता है।
  • संक्षेप में, उत्तराखंड के पारंपरिक उद्योग यहाँ की सांस्कृतिक पहचान और ग्रामीण कारीगरों के आर्थिक सशक्तिकरण के अमूल्य स्तंभ हैं।

औद्योगिक विकास योजनाएँ 

  • उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था को गति देने और रोजगार के अवसरों को बढ़ाने के लिए राज्य सरकार द्वारा विभिन्न औद्योगिक विकास कार्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं।
  • वर्ष 2000 में राज्य के गठन के समय उत्तराखंड में औद्योगिक बुनियादी ढांचा बेहद सीमित था, जो मुख्य रूप से पारंपरिक और लघु उद्योगों तक ही केंद्रित था।
  • राज्य में औद्योगिक क्रांति लाने के उद्देश्य से वर्ष 2002 में ‘राज्य औद्योगिक विकास निगम उत्तराखंड लिमिटेड’ (SIDCUL) की स्थापना की गई।
  • सिडकुल का मुख्य कार्य राज्य में अत्याधुनिक औद्योगिक आस्थानों (Industrial Estates) का निर्माण, प्रबंधन और निवेशकों को बुनियादी सुविधाएं प्रदान करना है।
  • केंद्र सरकार द्वारा वर्ष 2003 में घोषित विशेष औद्योगिक पैकेज (कर अवकाश और कर रियायतें) ने राज्य में निजी निवेश को आकर्षित करने में गेम-चेंजर की भूमिका निभाई।
  • इसके परिणाम स्वरूप ऊधम सिंह नगर जिले में स्थित पंतनगर औद्योगिक आस्थान राज्य के सबसे बड़े और आधुनिक एकीकृत औद्योगिक केंद्रों के रूप में उभरा।
  • हरिद्वार एकीकृत औद्योगिक आस्थान एक अन्य प्रमुख केंद्र है, जहाँ ऑटोमोबाइल, एफएमसीजी (FMCG) और इलेक्ट्रॉनिक्स से जुड़ी सैकड़ों बड़ी कंपनियाँ स्थापित हैं।
  • सितारगंज (ऊधम सिंह नगर) और सेलाकुई (देहरादून) में भी सिडकुल द्वारा बड़े पैमाने पर फार्मास्यूटिकल्स, सूचना प्रौद्योगिकी और विनिर्माण उद्योगों को विकसित किया गया है।
  • पौड़ी गढ़वाल के कोटद्वार में स्थित ‘सिडकुल सिग्नेडी’ पर्वतीय क्षेत्र में औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
  • उत्तराखंड सरकार ने पहाड़ी और मैदानी क्षेत्रों के बीच औद्योगिक असंतुलन को दूर करने के लिए विशेष ‘एमएसएमई (MSME) नीति 2015’ लागू की थी।
  • इस एमएसएमई नीति के तहत पर्वतीय क्षेत्रों (जैसे श्रेणी-A और श्रेणी-B के दुर्गम जिलों) में उद्योग लगाने पर भारी वित्तीय पूंजीगत सब्सिडी दी जाती है।
  • राज्य की विषम भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए पर्यावरण-अनुकूल उद्योगों जैसे आईटी, खाद्य प्रसंस्करण, हर्बल और पैकेजिंग उद्योगों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
  • बागवानी उत्पादों को आर्थिक लाभ में बदलने के लिए पंतनगर और सितारगंज में विशेष ‘मेगा फूड पार्क’ और शीत गृहों (Cold Storages) की स्थापना की गई है।
  • स्थानीय युवाओं को उद्योग जगत की मांग के अनुरूप तैयार करने और कुशल बनाने के लिए ‘उत्तराखंड कौशल विकास मिशन’ उद्योगों के साथ मिलकर काम कर रहा है।
  • निवेशकों की सुविधा और लालफीताशाही को समाप्त करने के लिए राज्य में ‘सिंगल विंडो क्लियरेंस सिस्टम’ (एकल खिड़की सुगमता अधिनियम) लागू किया गया है।
  • इस डिजिटल प्रणाली के माध्यम से उद्यमियों को विभिन्न विभागों से मिलने वाली अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) और स्वीकृतियां एक ही स्थान पर समयबद्ध तरीके से मिल जाती हैं।
  • उत्तराखंड में उद्योगों के तेजी से फलने-फूलने का एक मुख्य कारण यहाँ उपलब्ध देश की सबसे सस्ती और निरंतर मिलने वाली बिजली दरें (ऊर्जा प्रदेश) भी हैं।
  • इन ढांचागत विकास कार्यक्रमों के फलस्वरूप वर्तमान में राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) में द्वितीयक यानी औद्योगिक क्षेत्र का योगदान उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है।
  • इस तेजी के बावजूद, मैदानी जिलों की तुलना में सुदूर पर्वतीय क्षेत्रों में सड़क संपर्क और कच्चे माल की उपलब्धता आज भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
  • निष्कर्षतः, बुनियादी ढांचे के निरंतर सुदृढ़ीकरण और टिकाऊ नीतियों के माध्यम से उत्तराखंड आज देश के प्रमुख निवेश अनुकूल राज्यों में अपनी पहचान बना चुका है।

Leave a Comment