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राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 (States Reorganisation Act of 1956)

संवैधानिक पृष्ठभूमि और राज्यों के चार वर्गों का उन्मूलन

  • पृष्ठभूमि: फ़ज़ल अली आयोग (1953) की सिफारिशों को लागू करने हेतु संसद द्वारा राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 पारित किया गया।
  • 7वां संविधान संशोधन (1956): इस ऐतिहासिक अधिनियम को प्रभावी बनाने के लिए 7वां संवैधानिक संशोधन अधिनियम 1956 पारित किया गया।
  • चार-स्तरीय वर्गीकरण का अंत: संविधान में मौजूद राज्यों के जटिल वर्गीकरण (भाग A, B, C और D) को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया।
  • भाग ‘A’ और ‘B’ का विलय: पूर्व ब्रिटिश प्रांतों (भाग A) और देशी रियासतों (भाग B) के बीच का संवैधानिक अंतर खत्म किया गया।
  • भाग ‘C’ और ‘D’ का पुनर्गठन: छोटे मुख्य आयुक्त क्षेत्रों और द्वीप क्षेत्रों को मिलाकर केंद्र शासित प्रदेशों में परिवर्तित किया गया।

14 राज्यों और 6 केंद्र शासित प्रदेशों (UTs) का सृजन

  • 14 नए राज्य बनाए गए: 1 नवंबर 1956 को देश में 14 पुनर्गठित राज्यों की स्थापना की गई, जिनमें भाषाई समरूपता का ध्यान रखा गया।
  • 14 राज्यों की सूची: आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, बॉम्बे, जम्मू और कश्मीर, केरल, मध्य प्रदेश, मद्रास, मयूर (मैसूर), उड़ीसा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल।
  • 6 केंद्र शासित प्रदेश (UTs): दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, तथा लकादीव-मिनीकॉय-अमीनदीवी द्वीप।
  • आंध्र प्रदेश का विस्तार: हैदराबाद रियासत के तेलुगु भाषी क्षेत्रों को पुराने आंध्र राज्य में मिलाकर विशाल ‘आंध्र प्रदेश’ का गठन किया गया।
  • केरल का गठन: त्रावणकोर-कोचीन और मद्रास के मालाबार क्षेत्र को मिलाकर मलयालम भाषी राज्य ‘केरल’ का निर्माण हुआ।
  • मैसूर राज्य (कर्नाटक): बीजापुर, धारवाड़ और कन्नड़ भाषी क्षेत्रों को मैसूर रियासत में शामिल कर नया कन्नड़ राज्य बनाया गया।
  • द्विभाषी बॉम्बे राज्य: विवाद टालने हेतु मराठी और गुजराती भाषी क्षेत्रों को मिलाकर एक बड़ा ‘बॉम्बे राज्य’ बनाया गया।

भारतीय संघवाद और राजनीति पर दीर्घकालिक प्रभाव (Long-term Impact)

  • क्षेत्रीय भाषाई पहचान को मान्यता: अधिनियम ने भारत में भाषा और क्षेत्रीय जन-आकांक्षाओं को पहली बार संवैधानिक मान्यता प्रदान की।
  • संघीय व्यवस्था की मजबूती: भाषा आधारित राज्य बनने से केंद्र-राज्य संबंधों में स्थिरता आई और अलगाववादी भावनाएं काफी हद तक कम हुईं।
  • प्रशासनिक और राजनीतिक सुगमता: आम जनता की मातृभाषा में सरकारी कामकाज होने से लोकतंत्र जमीनी स्तर तक गहरा और सुलभ हुआ।
  • क्षेत्रीय दलों का अभ्युदय: भाषाई राज्यों के पुनर्गठन ने भविष्य में मजबूत क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के उदय का मार्ग प्रशस्त किया।
  • क्षेत्रीय विषमता व नए राज्यों की मांग: पुनर्गठन के बावजूद अंतर-राज्यीय सीमा विवाद (जैसे बेलगाम) और नए राज्यों की मांगें पूरी तरह नहीं थमीं।
  • आंचलिक परिषदों (Zonal Councils) का गठन: अंतर-राज्यीय सहयोग बढ़ाने के लिए अधिनियम द्वारा 5 क्षेत्रीय (आंचलिक) परिषदों की स्थापना की गई।
  • एकता में विविधता का साकार रूप: इसने सिद्ध किया कि भाषा के आधार पर पुनर्गठन से देश टूटा नहीं, बल्कि भारत की अखंडता और मजबूत हुई।
  • आधुनिक भारतीय मानचित्र की नींव: इस अधिनियम ने आधुनिक भारत के राजनीतिक मानचित्र और सहयोगात्मक संघवाद (Cooperative Federalism) की मजबूत नींव रखी।

पश्चवर्ती राज्य पुनर्गठन (Subsequent State Reorganisations)

बॉम्बे राज्य का विभाजन (Maharashtra & Gujarat – 1960)

  • द्विभाषी बॉम्बे का असंतोष: 1956 में निर्मित द्विभाषी बॉम्बे राज्य में गुजराती और मराठी भाषी समुदायों के बीच लगातार तनाव बना रहा।
  • महागुजरात और संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन: गुजराती हेतु महागुजरात सीमा समिति और मराठी हेतु संयुक्त महाराष्ट्र समिति ने नए राज्यों की पुरजोर मांग की।
  • बॉम्बे पुनर्गठन अधिनियम 1960: मई 1960 में संसद ने द्विभाषी बॉम्बे राज्य को दो अलग-अलग राज्यों में विभाजित कर दिया।
  • महाराष्ट्र और गुजरात का गठन: मराठी भाषियों हेतु ‘महाराष्ट्र’ (बॉम्बे राजधानी) और गुजराती भाषियों हेतु ‘गुजरात’ (15वाँ राज्य) का निर्माण हुआ।
  • नागालैंड का गठन (1963): नागा आंदोलनकारियों की मांग पर 1963 में असम के नागा पहाड़ियों को अलग कर नागालैंड (16वाँ राज्य) बना।

पंजाब पुनर्गठन अधिनियम (Punjab Reorganisation Act – 1966)

  • पंजाबी सूबा आंदोलन: मास्टर तारा सिंह और संत फतेह सिंह के नेतृत्व में पंजाबी भाषियों हेतु अलग राज्य की मांग उठी।
  • शाह आयोग (1966): पंजाब के भाषाई पुनर्गठन और सीमा निर्धारण हेतु न्यायमूर्ति जे.सी. शाह की अध्यक्षता में आयोग गठित किया गया।
  • पंजाब का पुनर्गठन: शाह आयोग की सिफारिशों पर संसद ने ‘पंजाब पुनर्गठन अधिनियम 1966’ पारित कर बहु-भाषी पंजाब का विभाजन किया।
  • पंजाब और हरियाणा का सृजन: पंजाबी भाषी क्षेत्र को ‘पंजाब’ तथा हिंदी भाषी क्षेत्र को अलग कर 17वाँ राज्य ‘हरियाणा’ बनाया गया।
  • हिमाचल प्रदेश का विस्तार: पंजाब के पहाड़ी क्षेत्रों (कांगड़ा, शिमला) को मिलाकर तत्कालीन केंद्र शासित प्रदेश हिमाचल प्रदेश का विस्तार किया गया।
  • चंडीगढ़ (संयुक्त राजधानी व UT): चंडीगढ़ को पंजाब और हरियाणा दोनों की संयुक्त राजधानी बनाया गया तथा इसे केंद्र शासित प्रदेश घोषित किया गया।
  • हिमाचल प्रदेश को पूर्ण राज्यत्व (1971): 1971 में हिमाचल प्रदेश को केंद्र शासित प्रदेश से उन्नत कर भारत का 18वाँ राज्य बनाया गया।

उत्तर-पूर्वी क्षेत्र पुनर्गठन अधिनियम (North-Eastern Areas Reorganisation Act – 1971)

  • उत्तर-पूर्व का राजनीतिक पुनर्गठन: पूर्वोत्तर में जनजातीय आकांक्षाओं और सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए 1971 में यह ऐतिहासिक अधिनियम पारित हुआ।
  • मेघालय को पूर्ण राज्यत्व (19वाँ राज्य): असम के भीतर स्वायत्त राज्य रहे ‘मेघालय’ को 1972 में पूर्ण राज्य का संवैधानिक दर्जा दिया गया।
  • मणिपुर और त्रिपुरा को राज्यत्व: केंद्र शासित प्रदेश रहे ‘मणिपुर’ (20वाँ राज्य) और ‘त्रिपुरा’ (21वाँ राज्य) को 1972 में पूर्ण राज्य बनाया गया।
  • मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश (UTs): असम के पूर्वोत्तर सीमांत एजेंसी (NEFA) को ‘अरुणाचल प्रदेश’ और मिजो पहाड़ियों को ‘मिजोरम’ UT बनाया गया।
  • उत्तर-पूर्वी परिषद (NEC) का गठन: पूर्वोत्तर राज्यों में आर्थिक और सुरक्षात्मक समन्वय हेतु 1971 के अधिनियम द्वारा ‘उत्तर-पूर्वी परिषद’ बनाई गई।
  • सिक्किम का भारत में विलय (1975): 36वें संविधान संशोधन 1975 द्वारा चोग्याल शासन समाप्त कर सिक्किम को भारत का 22वाँ राज्य बनाया गया।
  • मिजोरम और अरुणाचल को राज्यत्व (1987): मिज़ो शांति समझौते के बाद मिजोरम (23वाँ) और अरुणाचल प्रदेश (24वाँ) को 1987 में पूर्ण राज्य का दर्जा मिला।
  • गोवा को पूर्ण राज्यत्व (1987): मई 1987 में गोवा को दमन और दीव से अलग कर भारत का 25वाँ पूर्ण राज्य घोषित किया गया।

21वीं सदी में नए राज्यों का निर्माण (Creation of New States in the 21st Century)

वर्ष 2000 में तीन नए राज्यों का गठन (Chhattisgarh, Uttarakhand, Jharkhand)

  • छत्तीसगढ़ का गठन (26वाँ राज्य): 1 नवंबर 2000 को मध्य प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम द्वारा मध्य प्रदेश के दक्षिण-पूर्वी जनजातीय बहुल क्षेत्रों को अलग कर बनाया गया।
  • उत्तराखंड का गठन (27वाँ राज्य): 9 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश के पहाड़ी जिलों को अलग कर ‘उत्तरांचल’ (2007 में नाम उत्तराखंड) का निर्माण हुआ।
  • झारखंड का गठन (28वाँ राज्य): 15 नवंबर 2000 को बिहार पुनर्गठन अधिनियम द्वारा दक्षिणी बिहार के छोटानागपुर पठार क्षेत्र को पृथक कर बनाया गया।
  • बिरसा मुंडा की जयंती पर गठन: आदिवासियों के महान नायक भगवान बिरसा मुंडा की जयंती के सम्मान में 15 नवंबर को झारखंड राज्य की नींव रखी गई।
  • गठन का मूल उद्देश्य: इन तीनों राज्यों का गठन मुख्य रूप से प्रशासनिक सुगमता, भौगोलिक विषमता और जनजातीय/पहाड़ी विकास की उपेक्षा को दूर करने हेतु हुआ।
  • संविधान का अनुच्छेद 3: संसद ने संविधान के अनुच्छेद 3 का प्रयोग करते हुए साधारण बहुमत से बिना किसी बड़े संवैधानिक संशोधन के ये राज्य बनाए।

तेलंगाना का गठन – 2014 (Formation of Telangana)

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 1956 में आंध्र प्रदेश में मिलाए जाने के बाद से ही तेलंगाना क्षेत्र में सांस्कृतिक और आर्थिक विषमता पर आंदोलन जारी रहा।
  • के. चंद्रशेखर राव का नेतृत्व: तेलंगाना राष्ट्र समिति (TRS) और केसीआर के मरणव्रत ने आंदोलन को एक तीव्र जन-आंदोलन में बदल दिया।
  • श्रीकृष्ण समिति (2010): केंद्र सरकार द्वारा गठित श्रीकृष्ण समिति ने आंध्र प्रदेश के विभाजन और गैर-विभाजन के विभिन्न विकल्पों की समीक्षा की।
  • तेलंगाना का गठन (29वाँ राज्य): 2 जून 2014 को आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम 2014 के तहत तेलंगाना औपचारिक रूप से देश का 29वाँ राज्य बना।
  • संयुक्त राजधानी हैदराबाद: अधिनियम के तहत हैदराबाद को 10 वर्षों (2024 तक) के लिए दोनों राज्यों की साझा राजधानी घोषित किया गया था।
  • नदी जल और परिसंपत्ति विवाद: विभाजन के बाद कृष्णा और गोदावरी नदियों के जल बंटवारे तथा संपत्तियों को लेकर दोनों राज्यों में विवाद जारी रहा।

नए राज्यों की मांग के मुख्य मानदंड (Criteria for Statehood Demands)

  • आर्थिक पिछड़ापन और क्षेत्रीय असंतुलन: मूल राज्य के एक विशेष क्षेत्र का आर्थिक रूप से पिछड़ा रहना और विकास कोषों का असमान आवंटन।
  • विशिष्ट सांस्कृतिक व जनजातीय पहचान: विशिष्ट भाषाई, सांस्कृतिक, नृवंशविज्ञान (Ethnicity) और जनजातीय पहचान की रक्षा और संवर्धन की तीव्र आकांक्षा।
  • भौगोलिक विषमता और दूरी: राजधानी से सुदूर या दुर्गम (पहाड़ी/जंगली) क्षेत्रों की अत्यधिक दूरी, जिससे प्रशासनिक पहुँच कठिन हो जाती है।
  • प्रशासनिक दक्षता (Administrative Efficiency): अत्यधिक बड़े राज्यों (जैसे यूपी) में बेहतर शासन और त्वरित सार्वजनिक सेवा वितरण की मांग।
  • संसाधन दोहन बनाम लाभ: खनिज-समृद्ध क्षेत्रों का शोषण होना, लेकिन वहां के निवासियों को विकास और राजस्व का उचित लाभ न मिलना।
  • स्थानीय राजनीतिक आकांक्षाएं: स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व और उप-क्षेत्रीय अस्मिता (Sub-regional Identity) को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की चाह।

वर्तमान मांगें और भविष्य का परिदृश्य

  • वर्तमान में जारी मांगें: बोडोलैंड (असम), गोरखालैंड (पश्चिम बंगाल), विदर्भ (महाराष्ट्र) और हरित प्रदेश (पश्चिमी यूपी) की राज्यत्व मांगें प्रमुख हैं।
  • पुनर्गठन पर दृष्टिकोण: संघवाद में छोटे राज्यों से बेहतर शासन मिलता है, लेकिन वित्तीय व्यावहारिकता (Fiscal Viability) और राष्ट्रीय एकता को सर्वोपरि रखना आवश्यक है।

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