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देशी रियासतों का एकीकरण और विलय (Integration and Accession of Princely States)

पटेल व मेनन की भूमिका और नीतिगत ढाँचा (Role of Patel & Menon)

  • रियासती विभाग का गठन: जुलाई 1947 में सरदार वल्लभभाई पटेल के नेतृत्व में वी.पी. मेनन के साथ रियासती विभाग गठित हुआ।
  • सरदार पटेल का दूरदर्शी नेतृत्व: ‘भारत के लौह पुरुष’ पटेल ने कूटनीति, दृढ़ता और सैन्य शक्ति के संयोजन से रियासतों को एकीकृत किया।
  • वी.पी. मेनन का प्रशासनिक कौशल: रियासती विभाग के सचिव मेनन ने विलय के विधिक दस्तावेजों के प्रारूप तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • गाजर और छड़ीकी नीति: पटेल ने रियासतों को सम्मानजनक ‘प्रिवी पर्स’ (Privy Purse) का लालच और सैन्य कार्रवाई की चेतावनी दी।
  • 3 जून की योजना का असर: 500 से अधिक रियासतों को भारत या पाकिस्तान में शामिल होने अथवा स्वतंत्र रहने का विकल्प दिया गया।
  • विलय पत्र (Instrument of Accession): शासकों को केवल रक्षा, विदेश नीति और संचार विषय भारत को सौंपकर विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने थे।
  • अधिकांश रियासतों का विलय: 15 अगस्त 1947 से पहले भौगोलिक रूप से भारत से जुड़ी अधिकांश रियासतों ने भारत में विलय स्वीकार कर लिया।

कठिन मामला 1: जूनागढ़ का विलय (Junagadh)

  • पाकिस्तान में विलय का निर्णय: जूनागढ़ के नवाब ने बहुसंख्यक हिंदू आबादी के बावजूद अगस्त 1947 में पाकिस्तान में विलय की घोषणा की।
  • जन-विद्रोह और आरजी हुकुमत: नवाब के फैसले के खिलाफ जूनागढ़ की जनता ने विद्रोह कर दिया और श्यामलदास गांधी के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी।
  • नवाब का पलायन: भारी जनाक्रोश और भारतीय आर्थिक नाकाबंदी के कारण जूनागढ़ का नवाब अपना खजाना लेकर कराची भाग गया।
  • जनमत संग्रह (Plebiscite): फरवरी 1948 में कराए गए जनमत संग्रह में 99% से अधिक जनता ने भारत में विलय के पक्ष में वोट दिया।

कठिन मामला 2: हैदराबाद का विलय (Hyderabad)

  • निजाम की स्वतंत्रता की जिद: हैदराबाद के निजाम उस्मान अली खान ने भारत में शामिल होने से इनकार कर स्वतंत्र रहने की घोषणा की।
  • यथास्थिति समझौता (Standstill Agreement): नवंबर 1947 में भारत और हैदराबाद के बीच एक वर्ष के लिए यथास्थिति बनाए रखने का समझौता हुआ।
  • रजाकारों का अत्याचार: कासिम रिजवी के नेतृत्व में रजाकार नामक कट्टरपंथी उग्रवादियों ने स्थानीय जनता और हिंदुओं पर भारी अत्याचार किए।
  • ऑपरेशन पोलो (सितंबर 1948): रजाकारों की हिंसा रोकने हेतु भारतीय सेना ने 13 सितंबर 1948 को ‘ऑपरेशन पोलो’ (सैन्य कार्रवाई) शुरू किया।
  • हैदराबाद का भारत में विलय: 5 दिनों की पुलिस कार्रवाई के बाद निजाम ने आत्मसमर्पण किया और नवंबर 1948 में हैदराबाद भारत में मिला।

कठिन मामला 3: जम्मू व कश्मीर का विलय (Jammu & Kashmir)

  • राजा हरि सिंह का रुख: महाराजा हरि सिंह ने भारत या पाकिस्तान किसी में न शामिल होकर स्वतंत्र रहने का फैसला किया।
  • पाकिस्तानी कबाइलियों का आक्रमण: अक्टूबर 1947 में पाकिस्तानी सेना समर्थित कबाइलियों (घुसपैठियों) ने कश्मीर पर अचानक सशस्त्र हमला कर दिया।
  • विलय पत्र पर हस्ताक्षर: कबाइलियों के श्रीनगर के पास पहुंचने पर महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को भारत के साथ विलय पत्र पर दस्तखत किए।
  • भारतीय सेना का प्रवेश व विवाद: भारतीय सेना ने घुसपैठियों को खदेड़ा; यह मामला संयुक्त राष्ट्र संघ पहुँचा, जिससे LoC और विवाद की स्थिति बनी।

भाषाई पुनर्गठन समितियां (Linguistic Reorganization Committees)

धर आयोग (S.K. Dhar Commission – 1948)

  • आयोग का गठन: जून 1948 में संविधान सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद ने एस.के. धर की अध्यक्षता में आयोग गठित किया।
  • मूल जनादेश: दक्षिण भारत में भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की उठती मांग की औचित्यता की जांच करना इसका उद्देश्य था।
  • सिफारिश का आधार: आयोग ने राज्यों के पुनर्गठन हेतु भाषाई आधार के बजाय प्रशासनिक सुविधा को प्राथमिक मानदंड मानने की सलाह दी।
  • अन्य महत्वपूर्ण मानदंड: राष्ट्रीय वित्तीय आत्मनिर्भरता, भौगोलिक अखंडता और विकास की संभावनाओं को पुनर्गठन का आधार बनाने पर बल दिया।
  • भाषाई आधार का विरोध: आयोग ने चेतावनी दी कि केवल भाषाई आधार पर राज्य बनाने से राष्ट्रीय एकता और अखंडता को खतरा होगा।
  • रिपोर्ट की प्रतिक्रिया: धर आयोग की रिपोर्ट (दिसंबर 1948) से देश भर में, खासकर दक्षिण भारत में, भारी असंतोष और विरोध फैला।

जेवीपी समिति (JVP Committee – 1949)

  • समिति का गठन: दिसंबर 1948 में जयपुर कांग्रेस अधिवेशन के दौरान धर आयोग की सिफारिशों पर पुनर्विचार हेतु समिति बनी।
  • सदस्यता (JVP): इस तीन-सदस्यीय समिति में जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल और पट्टाभि सीतारामैया शामिल थे।
  • भाषाई पुनर्गठन की अस्वीकृति: अप्रैल 1949 में प्रस्तुत रिपोर्ट में समिति ने तत्कालीन समय में भाषाई आधार पर पुनर्गठन को खारिज कर दिया।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा पर ध्यान: समिति ने माना कि देश की सुरक्षा, एकता और आर्थिक स्थिरता इस समय भाषा से अधिक महत्वपूर्ण हैं।
  • लचीला दृष्टिकोण: समिति ने स्वीकार किया कि यदि जनमत अत्यधिक उग्र हो, तो प्रशासनिक शर्तों के साथ विचार किया जा सकता है।

आंध्र राज्य का गठन और मोड़ (Formation of Andhra State – 1953)

  • पोट्टी श्रीरामुलु का अनशन: मद्रास राज्य से अलग तेलुगु भाषियों हेतु पोट्टी श्रीरामुलु ने 56 दिनों का आमरण अनशन किया।
  • श्रीरामुलु का निधन: दिसंबर 1952 में अनशन के दौरान श्रीरामुलु के निधन से पूरे आंध्र क्षेत्र में हिंसक आंदोलन भड़क उठा।
  • पहला भाषाई राज्य (1953): जन-आक्रोश के दबाव में अक्टूबर 1953 में मद्रास से अलग कर प्रथम भाषाई राज्य ‘आंध्र प्रदेश’ बना।

फ़ज़ल अली राज्य पुनर्गठन आयोग (Fazal Ali Commission – 1953)

  • आयोग की स्थापना: आंध्र के गठन के बाद दिसंबर 1953 में फ़ज़ल अली की अध्यक्षता में 3-सदस्यीय आयोग गठित किया गया।
  • अन्य दो सदस्य: इस आयोग में फ़ज़ल अली के अलावा के.एम. पणिक्कर और एच.एन. कुंज़रू को सदस्यों के रूप में शामिल किया गया।
  • भाषाई आधार की स्वीकृति: आयोग ने सितंबर 1955 की रिपोर्ट में राज्यों के पुनर्गठन में भाषा को मुख्य आधार स्वीकार किया।
  • एक भाषा, एक राज्य” का खंडन: आयोग ने ‘एक भाषा-एक राज्य’ के सिद्धांत को खारिज कर राष्ट्रीय एकता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी।
  • चार भागों का उन्मूलन: संविधान में मौजूद राज्यों के वर्गीकरण (भाग A, B, C, D) को पूरी तरह समाप्त करने की सिफारिश की।
  • 16 राज्य और 3 UT का सुझाव: आयोग ने पूरे देश को 16 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों में पुनर्गठित करने का प्रस्ताव रखा।

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