मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा पर आक्रमण करने वाले विदेशी शासकों में इंडो-ग्रीक (हिन्द-यूनानी) सबसे पहले थे।
इन यूनानी शासकों को भारतीय इतिहास और समकालीन साहित्य में ‘यवन’ के नाम से भी जाना जाता है।
ये मूल रूप से बैक्ट्रिया (आधुनिक उत्तरी अफगानिस्तान और मध्य एशिया का क्षेत्र) के निवासी थे, जो पहले सेल्यूसिड साम्राज्य के अधीन थे।
लगभग 250 ईसा पूर्व में डियोडोटस प्रथम ने सेल्यूसिड सत्ता के खिलाफ विद्रोह करके बैक्ट्रिया में एक स्वतंत्र यूनानी राज्य की स्थापना की थी।
समय बीतने के साथ, मध्य एशियाई कबीलों (जैसे शक) के बढ़ते दबाव के कारण इन यूनानियों ने हिंदूकुश पर्वत पार कर भारत का रुख किया।
भारत पर पहला सफल यूनानी आक्रमण 180 ईसा पूर्व के आसपास बैक्ट्रियन राजा डेमेट्रियस प्रथम के नेतृत्व में हुआ था।
डेमेट्रियस प्रथम ने एक विशाल सेना के साथ पंजाब और सिंध के क्षेत्रों को जीतकर भारत में ‘इंडो-ग्रीक राजवंश’ की नींव रखी।
इंडो-ग्रीक राजाओं ने अपनी प्रशासनिक सुगमता के लिए ‘साकल’ (आधुनिक सियालकोट, पंजाब) को अपनी मुख्य राजधानी बनाया।
इतिहास के अनुसार, इस पूरे कालखंड के दौरान उत्तर-पश्चिमी भारत में लगभग 30 से अधिक हठधर्मी और स्वतंत्र यूनानी राजाओं ने शासन किया।
इन सभी हिन्द-यूनानी शासकों में सबसे प्रसिद्ध, योग्य और लोक-प्रिय राजा ‘मेनान्डर प्रथम’ (Milinda) सिद्ध हुआ।
मेनान्डर का साम्राज्य अत्यंत विशाल था, जो पश्चिम में काबुल से लेकर पूर्व में मथुरा और मध्य भारत तक फैला हुआ था।
मेनान्डर ने प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु नागसेन (नागार्जुन) से प्रभावित होकर बौद्ध धर्म को पूरी तरह से अंगीकार कर लिया था।
बौद्ध भिक्षु नागसेन और राजा मिलिंद के बीच हुए दार्शनिक संवादों को ‘मिलिन्दपन्हो’ (मिलिंद के प्रश्न) नामक प्रसिद्ध ग्रंथ में संकलित किया गया है।
इंडो-ग्रीक शासकों का भारतीय मुद्रा प्रणाली में ऐतिहासिक योगदान है; वे भारत में सोने के सिक्के जारी करने वाले पहले शासक थे।
उन्होंने ऐसे द्विभाषी सिक्के चलाए जिन पर एक तरफ ग्रीक भाषा और दूसरी तरफ प्राकृत भाषा (खरोष्ठी लिपि) अंकित होती थी।
इन राजाओं के सिक्कों की अनूठी विशेषता यह थी कि उन पर राजा का नाम, उनका चित्र और उनके कालक्रम का स्पष्ट विवरण होता था।
कला के क्षेत्र में उन्होंने भारतीय और यूनानी शैलियों के मिश्रण से ‘हेलेनिस्टिक आर्ट’ को जन्म दिया, जिससे आगे चलकर ‘गांधार कला शैली’ का विकास हुआ।
हिन्द-यूनानी राजाओं के समय ही भारत में खगोल विज्ञान, ज्योतिष, नाटक (यवनिका या पर्दा प्रथा) और चिकित्सा के क्षेत्र में नए यूनानी प्रभाव आए।
इस वंश के एक अन्य राजा एंटियालकीडास के राजदूत हेलियोडोरस ने विदिशा में प्रसिद्ध ‘गरुड़ स्तंभ’ बनवाकर भागवत (हिंदू) धर्म के प्रति अपनी आस्था प्रकट की थी।
अंततः 10 ईस्वी के आसपास मध्य एशिया से आए शक (Indo-Scythians) और पार्थियन आक्रमणकारियों ने भारत से इंडो-ग्रीक शासन का पूरी तरह अंत कर दिया।
‘शक राजवंश‘
मौर्योत्तर काल में हिंद-यूनानियों (इंडो-ग्रीक्स) के बाद भारत पर आक्रमण करने वाले विदेशी शासकों में ‘शक’ सबसे महत्वपूर्ण थे।
शकों को प्राचीन ग्रीक और भारतीय साहित्य में मूल रूप से ‘सिथियन’ (Scythians) के नाम से भी संबोधित किया गया है।
ये मूल रूप से मध्य एशिया की एक खानाबदोश और चरवाहा जनजाति थे, जो यू-ची (Yuezhi) कबीले के दबाव के कारण विस्थापित हुए थे।
मध्य एशिया से आगे बढ़ते हुए शकों ने पहले बैक्ट्रिया और फिर पार्थिया (ईरान) के क्षेत्रों पर अपना नियंत्रण स्थापित किया।
इसके बाद, पहली शताब्दी ईसा पूर्व के दौरान शकों ने बोलन दर्रे को पार कर भारत के उत्तर-पश्चिमी हिस्सों में प्रवेश किया।
भारत में पहले शक साम्राज्य की स्थापना करने वाले प्रतापी राजा का नाम ‘माउस’ (Maues या मोगा) था।
राजा माउस ने गांधार, पंजाब और सिंध के क्षेत्रों को जीतकर अपनी सत्ता का केंद्र ‘तक्षशिला’ को बनाया था।
भारत में शासन की सुगमता के लिए शकों ने स्वयं को पांच अलग-अलग शाखाओं में विभाजित कर लिया था।
शकों की ये पांच शाखाएं क्रमशः अफगानिस्तान, पंजाब, मथुरा, ऊपरी दक्कन और पश्चिमी भारत (गुजरात व मालवा) में स्थापित हुईं।
शक राजा अपने प्रांतीय गवर्नरों को ‘क्षत्रप’ कहते थे, जिसके कारण उनके शासन को ‘क्षत्रप प्रणाली’ कहा गया।
पंजाब और मथुरा के शक शासकों को ‘उत्तरी क्षत्रप’ तथा पश्चिमी भारत व दक्कन के शासकों को ‘पश्चिमी क्षत्रप’ कहा जाता है।
58 ईसा पूर्व में उज्जैन के एक स्थानीय राजा ने शकों को पराजित कर ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि ली और ‘विक्रम संवत’ की शुरुआत की।
शकों के सभी पांचों राजवंशों में सबसे शक्तिशाली और प्रसिद्ध शाखा पश्चिमी भारत के ‘कार्दमक वंश’ की सिद्ध हुई।
पश्चिमी भारत के शक शासकों में सबसे महान, प्रतापी और लोकप्रिय राजा ‘रुद्रदामन प्रथम’ (130-150 ईस्वी) थे।
रुद्रदामन प्रथम का साम्राज्य गुजरात, सिंध, कोंकण, नर्मदा घाटी, मालवा और काठियावाड़ के बहुत बड़े हिस्से पर फैला हुआ था।
रुद्रदामन प्रथम ने संस्कृत भाषा के प्रति अगाध प्रेम दिखाते हुए प्रसिद्ध ‘जूनागढ़ शिलालेख’ (गिरनार) को पूरी तरह शुद्ध संस्कृत में उत्कीर्ण कराया।
इसी जूनागढ़ अभिलेख से पता चलता है कि रुद्रदामन ने मौर्यकालीन प्रसिद्ध ‘सुदर्शन झील’ का अपने व्यक्तिगत खर्च पर जीर्णोद्धार (मरम्मत) कराया था।
भारत में रहते हुए शकों ने बौद्ध और शैव (हिंदू) धर्म को पूरी तरह अपनाकर भारतीय संस्कृति में अपना पूर्ण विलय कर लिया।
शकों ने बड़ी मात्रा में चांदी के उच्च गुणवत्ता वाले सिक्के जारी किए, जो व्यापार और प्रशासनिक लेन-देन की रीढ़ बने।
अंततः चौथी शताब्दी ईस्वी के अंत में, गुप्त वंश के महान सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) ने अंतिम शक राजा रुद्रसिंह तृतीय को पराजित कर भारत से शक शासन का सदा के लिए अंत कर दिया।
‘कुषाण राजवंश‘
मौर्योत्तर काल में भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा पर आक्रमण करने वाले विदेशी राजवंशों में ‘कुषाण’ सबसे शक्तिशाली और प्रसिद्ध सिद्ध हुए।
कुषाण मूल रूप से चीन के उत्तर-पश्चिमी सीमांत क्षेत्र में रहने वाले ‘यू-ची’ (Yuezhi) कबीले की पांच शाखाओं में से एक थे।
भारत में कुषाण वंश की नींव पहली शताब्दी ईस्वी में ‘कुजुल कडफिसेस’ (Kujula Kadphises) नामक प्रतापी राजा ने रखी थी।
कुजुल कडफिसेस ने रोमन सिक्कों की नकल करके बड़ी मात्रा में तांबे के सिक्के जारी किए और काबुल घाटी पर अधिकार किया।
उनके बाद उनके पुत्र ‘विम कडफिसेस’ अगले शासक बने, जिन्होंने भारत के पंजाब, सिंध और उत्तर-पश्चिम क्षेत्रों में साम्राज्य का विस्तार किया।
विम कडफिसेस भारत में बड़े पैमाने पर सोने के सिक्के (Gold coins) जारी करने वाले पहले कुषाण शासक थे।
विम कडफिसेस भगवान शिव के परम भक्त थे, जिसके कारण उनके सिक्कों पर त्रिशूल, नंदी और ‘माहेश्वर’ की उपाधि मिलती है।
इस राजवंश के सबसे महान, प्रतापी और विश्व प्रसिद्ध सम्राट ‘कनिष्क प्रथम’ थे, जो 78 ईस्वी में सिंहासन पर बैठे।
कनिष्क ने अपने राज्यारोहण के उपलक्ष्य में 78 ईस्वी में ‘शक संवत’ (Shaka Samvat) की शुरुआत की, जो आज भारत का राष्ट्रीय पंचांग है।
कुषाण साम्राज्य की मुख्य राजधानी ‘पुरुषपुर’ (आधुनिक पेशावर) थी, जबकि ‘मथुरा’ को उनकी दूसरी बड़ी राजधानी बनाया गया था।
कनिष्क का साम्राज्य अत्यंत विशाल था, जो मध्य एशिया (बुखारा, यारकंद) से लेकर उत्तर भारत में सारनाथ और पाटलिपुत्र तक फैला हुआ था।
कनिष्क बौद्ध धर्म के महायान संप्रदाय के बहुत बड़े संरक्षक थे, जिसके कारण उन्हें ‘द्वितीय अशोक’ भी कहा जाता है।
कनिष्क के शासनकाल में ही कश्मीर के कुंडलवन में प्रसिद्ध ‘चतुर्थ बौद्ध संगीति’ (चौथी बौद्ध परिषद) का भव्य आयोजन हुआ था।
इस बौद्ध संगीति की अध्यक्षता प्रसिद्ध विद्वान वसुमित्र ने की थी और महाकवि अश्वघोष इसके उपाध्यक्ष थे।
कनिष्क के दरबार में अश्वघोष (बुद्धचरित के लेखक), नागार्जुन (शून्यवाद के जनक) और चरक (महान आयुर्वेद चिकित्सक) जैसे रत्न शामिल थे।
कुषाण काल में ही मूर्तिकला की दो अत्यंत प्रसिद्ध शैलियों—’गांधार कला’ (ग्रीक-बौद्ध शैली) और ‘मथुरा कला’ का जन्म और विकास हुआ।
गांधार और मथुरा कला शैलियों के तहत ही इतिहास में पहली बार महात्मा बुद्ध की सुंदर मानव रूपी मूर्तियों का निर्माण शुरू हुआ।
कुषाणों ने प्रसिद्ध ‘सिल्क रूट’ (रेशम मार्ग) के तीन मुख्य मार्गों पर अपना कड़ा नियंत्रण स्थापित कर व्यापार से भारी समृद्धि अर्जित की।
इस काल के सोने के सिक्के अपनी शुद्धता के लिए जाने जाते हैं, जो कुषाण साम्राज्य की सुदृढ़ और समृद्ध अर्थव्यवस्था को दर्शाते हैं।
कनिष्क के बाद हुविष्क और वासुदेव जैसे राजाओं ने शासन किया, और अंततः तीसरी शताब्दी ईस्वी के मध्य में गुप्तों और स्थानीय शक्तियों के उदय से इस विशाल साम्राज्य का अंत हो गया।
कुषाणों का सांस्कृतिक प्रभाव
मौर्योत्तर काल में, विशेषकर कुषाण सम्राट कनिष्क के शासनकाल के दौरान, भारत में मूर्तिकला के क्षेत्र में अभूतपूर्व सांस्कृतिक विकास हुआ।
इस स्वर्ण काल में मूर्तिकला की दो अत्यंत प्रसिद्ध और विशिष्ट शैलियों का जन्म हुआ, जिन्हें ‘गांधार कला’ और ‘मथुरा कला’ कहा जाता है।
गांधार कला शैली का विकास भारत के पश्चिमोत्तर क्षेत्र (आधुनिक पाकिस्तान और पूर्वी अफगानिस्तान के गांधार क्षेत्र) में हुआ था।
इस शैली पर ग्रीक (यूनानी) और रोमन कला का गहरा प्रभाव था, इसलिए इसे ‘इंडो-ग्रीक’ या ‘ग्रीको-बुद्धिस्ट’ कला भी कहा जाता है।
गांधार कला की सबसे मुख्य विशेषता यह थी कि इसमें विदेशी यूनानी तकनीक का उपयोग करके विशुद्ध भारतीय (बौद्ध) विषयों को उकेरा गया था।
गांधार शैली की मूर्तियों के निर्माण में मुख्य रूप से सलेटी या नीले-धूसर बलुआ पत्थर (Schist stone) का बड़े पैमाने पर उपयोग किया गया था।
इस शैली में निर्मित महात्मा बुद्ध की मूर्तियों में उन्हें यूनानी देवता ‘अकेलो’ या ‘अपोलो’ के समान सुंदर और शारीरिक सौष्ठव के साथ दिखाया गया है।
इन बुद्ध मूर्तियों की शारीरिक बनावट में लहराते हुए घुंघराले बाल, मूंछें, मस्तक पर अंजलि और शरीर पर रोमन शैली के महीन वस्त्र दिखाई देते हैं।
इसके विपरीत, ‘मथुरा कला शैली’ का विकास पूरी तरह से स्वदेशी परंपराओं के आधार पर उत्तर प्रदेश के पवित्र मथुरा क्षेत्र में हुआ था।
मथुरा कला शैली पर किसी भी प्रकार का कोई विदेशी प्रभाव नहीं था; यह पूरी तरह से भारतीय कलात्मक तत्वों और कल्पनाओं पर आधारित थी।
मथुरा शैली की मूर्तियों के निर्माण में मुख्य रूप से सीकरी के ‘चित्तीदार लाल बलुआ पत्थर’ (Spotted Red Sandstone) का प्रचुरता से उपयोग किया गया था।
धार्मिक दृष्टिकोण से जहाँ गांधार कला मुख्य रूप से केवल बौद्ध धर्म तक सीमित थी, वहीं मथुरा कला का स्वरूप अत्यधिक व्यापक था।
मथुरा कला के अंतर्गत बौद्ध धर्म के साथ-साथ जैन धर्म (तीर्थंकरों की मूर्तियां) और हिंदू धर्म (शिव, विष्णु, सूर्य, दुर्गा) की सुंदर मूर्तियां भी बनाई गईं।
मथुरा शैली में बनी बुद्ध की मूर्तियां अत्यधिक आध्यात्मिक, शांत, मुस्कुराते हुए चेहरे और चेहरे पर दिव्य तेज (आभामंडल) से युक्त दिखाई देती हैं।
इन स्वदेशी मूर्तियों में बुद्ध के बाल सीधे या मुंडे हुए, दाहिना हाथ अभय मुद्रा में और उनका दाहिना कंधा वस्त्र से मुक्त (उघड़ा हुआ) दिखाया गया है।
मथुरा कला के कलाकारों ने न केवल धार्मिक बल्कि धर्मनिरपेक्ष मूर्तियां भी बनाईं, जैसे राजा कनिष्क की सिरविहीन विशाल पाषाण प्रतिमा।
इस काल में यक्ष, यक्षिणियों, अप्सराओं और नृत्य करती हुई स्त्रियों की सुंदर मूर्तियां भी मथुरा शैली की अनूठी कलात्मकता को दर्शाती हैं।
जहाँ गांधार कला यथार्थवाद, शारीरिक बनावट और वस्त्रों की सिलवटों पर ध्यान देती थी, वहीं मथुरा कला आंतरिक भावना और आध्यात्मिकता पर जोर देती थी।
कुषाण शासकों द्वारा दिए गए उदार राजकीय संरक्षण और आर्थिक सहयोग के कारण ही ये दोनों कला केंद्र सदियों तक फलते-फूलते रहे।
संक्षेप में, गांधार और मथुरा कला शैलियों के इस क्रमिक विकास ने ही भारतीय उपमहाद्वीप में भावी मूर्तिकला और वास्तुकला की एक बहुत मजबूत नींव रखी।