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मुस्लिम लीग की स्थापना (Establishment of Muslim League)
- शिमला शिष्टमंडल (1906): आगा खान के नेतृत्व में मुस्लिम शिष्टमंडल ने वायसराय लॉर्ड मिंटो से मिलकर राजनीतिक अधिकारों की मांग की।
- मुस्लिम लीग का गठन: 30 दिसंबर 1906 को ढाका में नवाब सलीमुल्लाह की अध्यक्षता वाले सम्मेलन में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग बनी।
- प्रथम अध्यक्ष एवं मुख्यालय: आगा खान इसके पहले स्थायी अध्यक्ष चुने गए और इस राजनीतिक संगठन का स्थायी मुख्यालय लखनऊ में बनाया गया।
- मुस्लिम लीग का मुख्य उद्देश्य: ब्रिटिश सरकार के प्रति निष्ठा बढ़ाना और मुस्लिम समुदाय के राजनीतिक अधिकारों व हितों की रक्षा करना था।
- कांग्रेस का विरोध: लीग ने शुरुआत में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के स्वदेशी आंदोलन और ब्रिटिश विरोधी प्रदर्शनों का कड़ा विरोध किया।
मार्ले-मिंटो सुधार / भारतीय परिषद अधिनियम 1909 (Morley-Minto Reforms)
- पृष्ठभूमि और नामकरण: तत्कालीन भारत सचिव जॉन मार्ले और वायसराय लॉर्ड मिंटो के नाम पर इस सुधार अधिनियम का नाम रखा गया।
- सुधारों का मुख्य उद्देश्य: उग्रवादी राष्ट्रवाद को दबाना, मुसलमानों को संतुष्ट करना और उदारवादियों को कांग्रेस से अलग-थलग करना था।
- केंद्रीय विधान परिषद का विस्तार: केंद्रीय परिषद में अतिरिक्त सदस्यों की संख्या 16 से बढ़ाकर 60 तक कर दी गई।
- प्रांतीय परिषदों का आकार बढ़ा: प्रांतीय विधान परिषदों में सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई; गैर-सरकारी सदस्यों का बहुमत स्वीकार किया गया।
- पूरक प्रश्न पूछने का अधिकार: सदस्यों को बजट पर चर्चा करने, प्रस्ताव पेश करने और पूरक प्रश्न (Supplementary Questions) पूछने की अनुमति मिली।
- बजट पर मतदान का सीमित अधिकार: यद्यपि सदस्यों को प्रश्न पूछने की छूट मिली, लेकिन पूरे बजट पर मतदान का अधिकार नहीं दिया गया।
- कार्यकारिणी परिषद में भारतीय: वायसराय की एग्जीक्यूटिव काउंसिल में शामिल होने वाले सत्येंद्र प्रसाद सिन्हा पहले भारतीय बने (विधि सदस्य)।
- भारत सचिव की परिषद में भारतीय: लंदन स्थित भारत सचिव की परिषद में के.जी. गुप्ता और सैयद हुसैन बिलग्रामी को नियुक्त किया गया।
पृथक निर्वाचन और इसके प्रभाव (Separate Electorates & Impact)
- पृथक निर्वाचन प्रणाली: 1909 के अधिनियम द्वारा मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र (Separate Electorates) की व्यवस्था शुरू की गई।
- मुस्लिम प्रतिनिधियों का चयन: इस व्यवस्था के तहत मुस्लिम प्रतिनिधियों का चुनाव केवल मुस्लिम मतदाता ही कर सकते थे।
- साम्प्रदायिकता का वैधीकरण: इस कानून ने भारत में धर्म के आधार पर साम्प्रदायिकता को पहली बार वैधानिक दर्जा प्रदान किया।
- लॉर्ड मिंटो की टिप्पणी: मिंटो ने मार्ले को लिखा— “हम नाग के दांत बो रहे हैं, जिसकी फसल बहुत कड़वी होगी।”
- ‘साम्प्रदायिक निर्वाचन के जनक‘: पृथक निर्वाचन प्रणाली द्वारा साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने के कारण लॉर्ड मिंटो को इसका जनक कहा गया।
- उदारवादियों में निराशा: संवैधानिक सुधारों की आड़ में साम्प्रदायिक विभाजन देखकर उदारवादी नेताओं का ब्रिटिश न्यायप्रियता से मोहभंग हो गया।
- ऐतिहासिक दुष्परिणाम: इस अधिनियम ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में विभाजन के बीज बोए, जो अंततः 1947 में भारत के विभाजन का कारण बना।
प्रारंभिक क्रांतिकारी आंदोलन
भारत में गुप्त क्रांतिकारी संगठन (Secret Societies in India)
- व्यायाम मंडल (1896-97): चापेकर भाइयों द्वारा पुणे में स्थापित; इन्होंने अत्याचारी प्लेग कमिश्नर रैंड की हत्या कर सशस्त्र क्रांति का बीजारोपण किया।
- अनुशीलन समिति (1902): सतीश चंद्र बसु, प्रमथनाथ मित्र और बरिंद्र घोष द्वारा बंगाल में स्थापित प्रमुख गुप्त क्रांतिकारी संस्था थी।
- अभिनव भारत (1904): विनायक दामोदर सावरकर द्वारा नासिक में स्थापित ‘मित्र मेला’ आगे चलकर ‘अभिनव भारत’ गुप्त समाज में परिवर्तित हुआ।
- अनुशीलन समिति ढाका: पुलिन दास के नेतृत्व में स्थापित; इसने बंगाल में उग्रवादी गतिविधियों और राजनीतिक डकैतियों का संचालन किया।
- युगांतर समूह (1906): बरिंद्र कुमार घोष और भूपेंद्रनाथ दत्त द्वारा गठित; ‘युगांतर’ पत्र के जरिए युवाओं को सशस्त्र क्रांति हेतु प्रेरित किया।
- मुजफ्फरपुर बम कांड (1908): खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने जज किंग्सफोर्ड पर बम फेंका; खुदीराम सबसे कम उम्र में शहीद हुए।
- अलीनगर/अलीपुर षड़यंत्र केस (1908): अवैध हथियार निर्माण के आरोप में अरबिंदो घोष और बरिंद्र घोष सहित कई क्रांतिकारियों पर मुकदमा चला।
- दिल्ली षड़यंत्र केस (1912): रास बिहारी बोस और सचिन सान्याल की योजना के तहत वायसराय लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंका गया।
विदेशों में क्रांतिकारी गतिविधियां और मैडम कामा (Revolutionary Activities Abroad)
- इंडिया हाउस (1905): श्यामजी कृष्ण वर्मा द्वारा लंदन में स्थापित केंद्र; इसने भारतीय छात्रों को छात्रवृत्ति और क्रांतिकारी मंच दिया।
- मदन लाल ढींगरा (1909): लंदन में कर्जन वायली की गोली मारकर हत्या की; यह विदेश में पहली बड़ी राजनीतिक हत्या थी।
- मैडम भीकाजी कामा: “भारतीय क्रांति की मां”; इन्होंने 1907 में श्टुटगार्ट (जर्मनी) में पहली बार भारत का राष्ट्रीय ध्वज फहराया।
- पेरिस इंडियन सोसाइटी: मैडम कामा, एस.आर. राणा और मुंचेरशाह गोदरेज द्वारा पेरिस में गठित; विदेश से क्रांति का प्रसार किया।
गदर आंदोलन और कामागाटामारू घटना (Ghadar Movement & Komagata Maru)
- गदर पार्टी की स्थापना (1913): लाला हरदयाल, सोहन सिंह भकना और भाई परमानंद ने सैन फ्रांसिस्को (अमेरिका) में इसका गठन किया।
- गदर अखबार: पार्टी द्वारा बहुभाषी ‘गदर’ पत्र निकाला गया, जिसका मुख्य नारा ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन का सशस्त्र तख्तापलट करना था।
- कामागाटामारू घटना (1914): बाबा गुरदित्त सिंह द्वारा किराए पर लिए जापानी जहाज के भारतीय यात्रियों को कनाडा ने तट पर उतरने से रोका।
- बज बज (बज-बज) संघर्ष: कोलकाता के बज-बज बंदरगाह पर कामागाटामारू यात्रियों और ब्रिटिश पुलिस के बीच हिंसक झड़प में 18 यात्री मारे गए।
- प्रथम विश्व युद्ध और गदर विद्रोह: प्रथम विश्व युद्ध का लाभ उठाकर गदर क्रांतिकारियों ने 1915 में भारत में सशस्त्र विद्रोह की योजना बनाई।
- विद्रोह की विफलता: भेद खुलने और गद्दारी के कारण पंजाब में गदर योजना विफल रही; कई क्रांतिकारियों को फांसी और देशनिकाला मिला।
बाघा जतिन और जर्मन षड़यंत्र (Bagha Jatin & Indo-German Plot)
- जिम्मरमैन योजना (Zimmermann Plan): प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जर्मन विदेश कार्यालय की मदद से भारत में हथियार भेजने की गुप्त रणनीति।
- बाघा जतिन (जतींद्रनाथ मुखर्जी): ओडिशा के बूढ़ी बालंग नदी तट पर अंग्रेजों से वीरतापूर्वक लड़ते हुए जतींद्रनाथ मुखर्जी (बाघा जतिन) शहीद हुए।
होम रूल लीग आंदोलन और लखनऊ समझौता (1916)
होम रूल लीग आंदोलन की पृष्ठभूमि और स्थापना (Home Rule Leagues)
- आंदोलन की पृष्ठभूमि: प्रथम विश्व युद्ध से उत्पन्न आर्थिक कठिनाइयों और राजनीतिक शून्यता को भरने के लिए स्वशासन की मांग उठी।
- तिलक की होम रूल लीग (अप्रैल 1916): बाल गंगाधर तिलक ने बेलगाम (कर्नाटक) में अपनी लीग की स्थापना की और स्वराज्य का संदेश दिया।
- तिलक का कार्यक्षेत्र: तिलक की लीग महाराष्ट्र (बॉम्बे को छोड़कर), कर्नाटक, मध्य प्रांत और बरार तक सीमित थी।
- एनी बेसेंट की होम रूल लीग (सितंबर 1916): एनी बेसेंट ने अड़यार (मद्रास) में अपनी लीग शुरू की और शेष भारत को संभाला।
- तिलक का प्रसिद्ध नारा: “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा” का नारा देकर जन-जागरण फैलाया।
- प्रचार के माध्यम: तिलक ने ‘मराठा’ व ‘केसरी’ और बेसेंट ने ‘न्यू इंडिया’ व ‘कॉमनवील’ पत्रों के माध्यम से विचार फैलाए।
- अखिल भारतीय स्वरूप: इस आंदोलन ने पहली बार देश के विभिन्न भागों को एक संगठित राजनीतिक सूत्र में पिरोने का काम किया।
- एनी बेसेंट की गिरफ्तारी (1917): ब्रिटिश सरकार द्वारा बेसेंट की गिरफ्तारी के विरोध में सर एस. सुब्रमण्यम अय्यर ने ‘नाइटहुड’ उपाधि लौटा दी।
- मॉन्टेग्यू की घोषणा (अगस्त 1917): भारत सचिव मॉन्टेग्यू ने भारत में क्रमिक रूप से उत्तरदायी सरकार की स्थापना का आश्वासन दिया।
- आंदोलन की समाप्ति: अगस्त घोषणा के बाद बेसेंट ने आंदोलन वापस ले लिया और तिलक शिरोल केस के सिलसिले में इंग्लैंड चले गए।
कांग्रेस में उग्रवादियों का पुनः प्रवेश (Readmission of Extremists)
- सूरत विभाजन की समाप्ति: 1907 में निष्कासित उग्रवादी धड़े को 9 साल बाद पुनः कांग्रेस में शामिल किया गया।
- फिरोजशाह मेहता का निधन: उग्रवादियों के कड़े विरोधी फिरोजशाह मेहता और गोखले के निधन से वापसी का मार्ग प्रशस्त हुआ।
- एनी बेसेंट और तिलक के प्रयास: बेसेंट और तिलक की मध्यस्थता से उदारवादियों और उग्रवादियों के बीच पुरानी कड़वाहट खत्म हुई।
- राष्ट्रीय आंदोलन को मजबूती: उग्रवादियों की वापसी से कांग्रेस एक मजबूत और एकजुट राष्ट्रीय मंच बनकर सामने आई।
लखनऊ समझौता 1916 (Lucknow Pact)
- ऐतिहासिक अधिवेशन: 1916 का लखनऊ अधिवेशन (अध्यक्ष: अम्बिका चरण मजूमदार) राष्ट्रीय एकता का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र बिंदु बना।
- INC-मुस्लिम लीग एकता: कांग्रेस और अखिल भारतीय मुस्लिम लीग ने मिलकर सरकार के सामने साझी संवैधानिक मांगें प्रस्तुत कीं।
- जिन्ना और तिलक की भूमिका: मोहम्मद अली जिन्ना और तिलक ने समझौते को अमलीजामा पहनाया; जिन्ना ‘हिंदू-मुस्लिम एकता के राजदूत’ कहलाए।
- पृथक निर्वाचन की स्वीकृति: कांग्रेस ने मुस्लिम लीग की मुसलमानों के लिए ‘पृथक निर्वाचन प्रणाली’ की मांग को औपचारिक रूप से स्वीकार किया।
- संवैधानिक मांगों का ज्ञापन: दोनों दलों ने प्रांतीय स्वायत्तता, परिषदों के विस्तार और कार्यपालिका-न्यायपालिका के पृथक्करण की संयुक्त मांग रखी।
- ऐतिहासिक मूल्यांकन: समझौते ने अल्पकालिक एकता तो बनाई, लेकिन पृथक निर्वाचन स्वीकार करने से साम्प्रदायिकता को भी बढ़ावा मिला।
महात्मा गांधी का आगमन और सत्याग्रह के शुरुआती प्रयोग
गांधीजी का भारत आगमन और विचारधारा का विकास (Arrival & Philosophy)
- दक्षिण अफ्रीका से आगमन: 9 जनवरी 1915 को महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका में नस्लभेद के खिलाफ सफल संघर्ष के बाद भारत लौटे।
- प्रवासी भारतीय दिवस: गांधीजी के 9 जनवरी 1915 के ऐतिहासिक भारत आगमन की स्मृति में प्रतिवर्ष प्रवासी भारतीय दिवस मनाया जाता है।
- राजनीतिक गुरु गोखले: गोपाल कृष्ण गोखले की सलाह पर गांधीजी ने सक्रिय राजनीति से पूर्व एक वर्ष तक भारत भ्रमण किया।
- सत्याग्रह का मूल अर्थ: ‘सत्याग्रह’ का अर्थ है – सत्य के प्रति आग्रह; यह आत्मबल और नैतिक शक्ति पर आधारित विरोध प्रदर्शन है।
- अहिंसा की अवधारणा: अहिंसा गांधीजी का परम धर्म थी; उनके अनुसार अहिंसा का अर्थ कायरता नहीं बल्कि बुराई का प्रतिरोध करना है।
- साबरमती आश्रम की स्थापना: 1915 में अहमदाबाद में साबरमती नदी के तट पर आश्रम बनाया, जो उनके आंदोलनों का केंद्र बना।
चंपारण सत्याग्रह – 1917 (Champaran Satyagraha)
- भारत में पहला सत्याग्रह: बिहार के चंपारण में गांधीजी ने भारत में अपने पहले सविनय अवज्ञा (Civil Disobedience) आंदोलन का प्रयोग किया।
- राजकुमार शुक्ल का निमंत्रण: स्थानीय किसान राजकुमार शुक्ल के आग्रह पर गांधीजी चंपारण के नील किसानों की समस्याएं सुनने पहुंचे थे।
- तिनकठिया प्रथा का विरोध: यूरोपीय बागान मालिकों द्वारा जबरन 3/20 भाग (तीन-कठिया) पर नील की खेती कराने का कड़ा विरोध किया गया।
- सफलता एवं परिणाम: ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा; चंपारण कृषक अधिनियम द्वारा तिनकठिया प्रथा समाप्त हुई तथा 25% अवैध वसूली वापस मिली।
- ‘महात्मा‘ की उपाधि: चंपारण सत्याग्रह की अभूतपूर्व सफलता के बाद रवींद्रनाथ टैगोर ने मोहनदास करमचंद गांधी को ‘महात्मा’ उपाधि दी।
अहमदाबाद मिल हड़ताल – 1918 (Ahmedabad Mill Strike)
- पहला भूख हड़ताल का प्रयोग: अहमदाबाद के सूती वस्त्र मिल मजदूरों के अधिकारों के लिए गांधीजी ने भारत में पहली बार भूख हड़ताल की।
- प्लेग बोनस का विवाद: मिल मालिक प्लेग बोनस खत्म करना चाहते थे, जबकि मजदूर प्रथम विश्व युद्ध की महंगाई हेतु 50% वृद्धि मांग रहे थे।
- अनुसूया साराभाई का सहयोग: सामाजिक कार्यकर्ता अनुसूया साराभाई ने मिल मजदूरों को संगठित करने में गांधीजी का पूरा साथ दिया।
- पंचाट का निर्णय: ट्रिब्यूनल ने मजदूरों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए वेतन में 35% वृद्धि की मांग को स्वीकार कर लिया।
खेड़ा सत्याग्रह – 1918 (Kheda Satyagraha)
- पहला असहयोग आंदोलन: गुजरात के खेड़ा जिले में गांधीजी ने किसानों के समर्थन में पहला वास्तविक असहयोग (Non-Cooperation) आंदोलन चलाया।
- फसल बर्बादी और राजस्व: फसल बर्बाद होने के बावजूद ब्रिटिश अधिकारी राजस्व कानून के तहत कर वसूली में कोई छूट नहीं दे रहे थे।
- पटेल और याज्ञिक का सहयोग: सरदार वल्लभभाई पटेल और इंदुलाल याज्ञिक गांधीजी के साथ किसानों को लगान न देने हेतु एकजुट करने में जुटे।
- सरकारी सहमति: सरकार ने गुप्त आदेश जारी कर केवल सक्षम और समर्थ किसानों से ही लगान वसूलने का निर्णय लिया।
शुरुआती प्रयोगों का महत्व (Significance)
- जन-नेता के रूप में उदय: इन तीन आंदोलनों ने गांधीजी को आम जनता, किसानों और मजदूरों का सर्वमान्य राष्ट्रीय नेता बना दिया।