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प्रारंभिक राजनीतिक संगठन और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना (1885)

कांग्रेस-पूर्व राजनीतिक संगठन (Pre-INC Organizations)

  • बंगभाषा प्रकाशिका सभा (1836): राजा राममोहन राय के सहयोगियों द्वारा गठित; यह प्रशासनिक सुधारों की मांग करने वाली भारत की पहली राजनीतिक संस्था थी।
  • लैंडहोल्डर्स सोसाइटी (1838): द्वारकानाथ टैगोर द्वारा कलकत्ता में स्थापित; इसका मुख्य उद्देश्य जमींदारों के कानूनी और आर्थिक हितों की रक्षा करना था।
  • ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी (1839): विलियम आदम द्वारा लंदन में गठित; इसका उद्देश्य ब्रिटिश जनता को भारत की दयनीय स्थिति से अवगत कराना था।
  • बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी (1843): जॉर्ज थॉम्पसन की अध्यक्षता में स्थापित; इसने भारतीय प्रजा के अधिकारों और कल्याण की वकालत की।
  • ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन (1851): लैंडहोल्डर्स सोसाइटी और बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी को मिलाकर बनी; इसने लेजिस्लेटिव कौंसिल में भारतीयों की मांग रखी।
  • बॉम्बे एसोसिएशन (1852): दादाभाई नौरोजी और जगन्नाथ शंकर सेठ द्वारा गठित; इसने सरकार के सामने स्थानीय शिकायतों और सुधारों के ज्ञापन सौंपे।
  • ईस्ट इंडिया एसोसिएशन (1866): दादाभाई नौरोजी द्वारा लंदन में स्थापित; इसने ब्रिटिश संसद में भारतीय मामलों पर सही जानकारी प्रस्तुत की।
  • पुना सार्वजनिक सभा (1870): एम.जी. रानाडे और जी.वी. जोशी द्वारा गठित; इसने जनता और ब्रिटिश सरकार के बीच मध्यस्थ के रूप में कार्य किया।
  • इंडियन एसोसिएशन ऑफ कलकत्ता (1876): सुरेन्द्रनाथ बनर्जी और आनंदमोहन बोस द्वारा स्थापित; इसने सिविल सर्विसेज आयु सीमा घटाने के खिलाफ आंदोलन चलाया।
  • मद्रास महाजन सभा (1884): एम. वीर राघवाचारी और जी. सुब्रमण्यम अय्यर द्वारा गठित; इसने स्थानीय समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने में मदद की।
  • बॉम्बे प्रेसिडेंसी एसोसिएशन (1885): फिरोजशाह मेहता, के.टी. तैलंग और बदरुद्दीन तैयबजी द्वारा स्थापित; इसने बॉम्बे में राजनीतिक चेतना को काफी बढ़ावा दिया।

ए.ओ. ह्यूम की भूमिका और INC की स्थापना (Role of A.O. Hume & Formation of INC)

  • ए.ओ. ह्यूम की पहल: सेवानिवृत्त ब्रिटिश सिविल सेवक ए.ओ. ह्यूम ने भारतीय शिक्षित वर्ग को एक संगठित राजनीतिक मंच देने की पहल की।
  • कोलकाता विश्वविद्यालय को पत्र: ह्यूम ने 1883 में विश्वविद्यालय के स्नातकों को पत्र लिखकर देश सेवा और संगठन निर्माण के लिए आगे आने को कहा।
  • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना: 28 दिसंबर 1885 को बॉम्बे के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज में कांग्रेस का पहला अधिवेशन आयोजित हुआ।
  • प्रथम अध्यक्ष और प्रतिनिधि: व्योमेश चंद्र बनर्जी इसके पहले अध्यक्ष बने और देश भर से आए 72 प्रतिनिधियों ने इसमें भाग लिया।

सेफ्टी-वॉल्व बनाम तड़ित चालक सिद्धांत (Safety-Valve vs. Lightning-Conductor Theory)

  • सेफ्टी-वॉल्व सिद्धांत (Safety-Valve): लाला लाजपत राय और वामपंथियों के अनुसार, अंग्रेजों ने भारतीय जन-असंतोष और संभावित जन-विद्रोह को रोकने के लिए कांग्रेस का गठन किया।
  • लॉर्ड डफरिन की भूमिका: इस सिद्धांत का दावा है कि ह्यूम ने तत्कालीन वायसराय लॉर्ड डफरिन की सहमति से कांग्रेस को ‘बचाव वाल्व’ बनाया।
  • तड़ित चालक सिद्धांत (Lightning-Conductor): गोपाल कृष्ण गोखले के अनुसार, शुरुआती भारतीय नेताओं ने ब्रिटिश दमन से बचने के लिए ह्यूम को तड़ित चालक की तरह इस्तेमाल किया।
  • राष्ट्रवादियों की दूरदर्शिता: भारतीय नेताओं को पता था कि यदि कोई भारतीय संगठन बनाता तो ब्रिटिश सरकार उसे तुरंत दबा देती।
  • निष्कर्ष: सेफ्टी-वॉल्व की अवधारणा अतिरंजित है; कांग्रेस वस्तुतः बढ़ते भारतीय राष्ट्रवाद की स्वाभाविक अभिव्यक्ति का परिणाम थी।

उदारवादी चरण और आर्थिक राष्ट्रवाद (1885–1905)

उदारवादी चरण की विशेषताएं और नेतृत्व (Moderate Phase Features)

  • कालखंड और विचारधारा: 1885 से 1905 के काल को उदारवादी चरण कहा जाता है; इसके नेता कानून के दायरे में सुधारों के पक्षधर थे।
  • प्रमुख उदारवादी नेता: दादाभाई नौरोजी, गोपाल कृष्ण गोखले, फिरोजशाह मेहता, सुरेंद्रनाथ बनर्जी और आर.सी. दत्त इस चरण के मुख्य स्तंभ थे।
  • ब्रिटिश न्यायप्रियता में विश्वास: उदारवादियों को ब्रिटिश न्याय प्रणाली और लोकतंत्र में अटूट विश्वास था; वे अंग्रेजों को भारत हितैषी मानते थे।
  • राष्ट्रीय चेतना का निर्माण: इन्होंने विभिन्न क्षेत्रों के लोगों को एक मंच पर लाकर आधुनिक भारतीय राष्ट्रवाद और राजनीतिक चेतना की नींव रखी।
  • सीमित जनाधार: यह आंदोलन मुख्य रूप से शहरी शिक्षित मध्यम वर्ग (वकील, डॉक्टर, पत्रकार) तक सीमित था; आम जनता की भागीदारी कम थी।

कार्यप्रणाली: 3Ps विधि (Methods of 3Ps)

  • याचिका (Petitions): अपनी मांगों और समस्याओं को लिखित याचिकाओं के माध्यम से ब्रिटिश सरकार और अधिकारियों के सामने प्रस्तुत करना।
  • प्रांतों में प्रार्थना (Prayers): सौहार्दपूर्ण भाषा में निवेदन पत्र भेजकर प्रशासनिक और संवैधानिक सुधारों की लगातार वकालत करना।
  • विरोध प्रदर्शन (Protests): सरकार द्वारा मांगों को अनदेखा करने पर सभाओं, भाषणों और प्रस्तावों के माध्यम से संवैधानिक विरोध जताना।
  • ब्रिटिश जनमत को प्रभावित करना: लंदन में भारतीय मामलों पर जनमत तैयार करने हेतु 1889 में ‘इंडियन संसदीय समिति’ का गठन किया।
  • पत्र-पत्रिकाओं का प्रयोग: ‘द बंगाली’ और ‘इण्डिया’ जैसे समाचार पत्रों के जरिए राजनीतिक शिक्षा दी और जन-जागृति फैलाई।

संवैधानिक एवं प्रशासनिक सुधार (Constitutional & Administrative Reforms)

  • भारतीय परिषद अधिनियम 1892: उदारवादियों के दबाव के कारण विधान परिषदों का विस्तार हुआ और अप्रत्यक्ष निर्वाचन की शुरुआत हुई।
  • बजट पर चर्चा का अधिकार: 1892 के अधिनियम द्वारा गैर-सरकारी सदस्यों को बजट पर प्रश्न पूछने और बहस करने का सीमित अधिकार मिला।
  • बिना प्रतिनिधित्व कर नहीं”: उदारवादियों ने नारा दिया कि भारतीय करदाताओं की सहमति के बिना कोई नया कर न लगाया जाए।
  • सिविल सेवा सुधार: लंदन और भारत में एक साथ सिविल सेवा परीक्षा आयोजित करने तथा आयु सीमा बढ़ाने की पुरजोर मांग की।
  • प्रशासन का भारतीयकरण: उच्च प्रशासनिक पदों पर भारतीयों की नियुक्ति और न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करने की मांग रखी।

आर्थिक राष्ट्रवाद एवं धन निष्कासन सिद्धांत (Economic Nationalism & Drain of Wealth)

  • धन निष्कासन सिद्धांत (Drain of Wealth): दादाभाई नौरोजी ने ‘Poverty and Un-British Rule in India’ में भारत से ब्रिटेन धन प्रवाह को उजागर किया।
  • आर.सी. दत्त का योगदान: रमेश चंद्र दत्त ने ‘Economic History of India’ लिखकर ब्रिटिश औपनिवेशिक शोषण के आर्थिक ढाँचे की पोल खोली।
  • गोपाल कृष्ण गोखले की भूमिका: गोखले ने बजट बहसों के दौरान ब्रिटिश सैन्य खर्चों और अत्यधिक कर-प्रणाली का डेटा के साथ विरोध किया।
  • अकाल और कृषि संकट: उदारवादियों ने सिद्ध किया कि औपनिवेशिक नीतियों, भू-राजस्व और हस्तशिल्प पतन से ही भारत में बार-बार अकाल पड़े।
  • आर्थिक राष्ट्रवाद की देन: इसने औपनिवेशिक शासन के “कल्याणकारी” मुखौटे को उतारकर भारतीयों में स्वदेशी और आर्थिक स्वतंत्रता का बोध जगाया।

बंगाल विभाजन और स्वदेशी आंदोलन (1905–1908)

कर्जन की नीतियां और विभाजन के प्रशासनिक कारण (Lord Curzon’s Motives)

  • बंगाल विभाजन की घोषणा: लॉर्ड कर्जन ने 20 जुलाई 1905 को बंगाल विभाजन का निर्णय लिया, जो 16 अक्टूबर 1905 से लागू हुआ।
  • ब्रिटिश प्रशासनिक तर्क: अंग्रेजों ने तर्क दिया कि बंगाल एक बड़ा प्रांत है और कुशल शासन के लिए इसका पुनर्गठन आवश्यक है।
  • वास्तविक राजनीतिक मंशा: विभाजन का असली उद्देश्य बंगाली राष्ट्रवाद को कमजोर करना तथा हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक दरार डालना था।
  • धार्मिक आधार पर बंटवारा: पूर्वी बंगाल को मुस्लिम बहुल और पश्चिमी बंगाल को हिंदू बहुल बनाकर राष्ट्रीय एकता पर सीधा प्रहार किया गया।

स्वदेशी आंदोलन और बहिष्कार की रणनीति (Swadeshi & Boycott Movement)

  • रक्षाबंधन और शोक दिवस: 16 अक्टूबर 1905 को पूरे बंगाल में शोक दिवस मनाया गया तथा आपसी एकता दिखाने के लिए रक्षाबंधन दिवस मनाया।
  • विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार: मैनचेस्टर के कपड़े, लिवरपूल के नमक और ब्रिटिश सामानों की सार्वजनिक होली जलाकर बहिष्कार का आह्वान किया गया।
  • आत्मशक्ति और स्वदेशी उद्योग: आंदोलन ने देशी उद्योगों को बढ़ावा दिया; पी.सी. राय ने ‘बंगाल केमिकल्स’ और कई स्वदेशी स्टोर स्थापित किए।
  • राष्ट्रीय शिक्षा का विकास: 1906 में राष्ट्रीय शिक्षा परिषद की स्थापना हुई और रवींद्रनाथ टैगोर के मॉडल पर स्वदेशी स्कूल-कॉलेज खोले गए।
  • सांस्कृतिक राष्ट्रवाद: रवींद्रनाथ टैगोर ने ‘आमार सोनार बांला’ गीत लिखा और वंदे मातरम आंदोलन का मुख्य राष्ट्रीय नारा बन गया।
  • जन-भागीदारी और समितियां: स्वदेश बांधव समिति (अश्विनी कुमार दत्त) के माध्यम से छात्रों, महिलाओं और कारीगरों ने अभूतपूर्व भागीदारी निभाई।

उग्रवादी नेताओं का उदय (Rise of Extremist Leaders)

  • लाल-बाल-पाल की तिकड़ी: लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और विपिन चंद्र पाल ने निष्क्रिय प्रतिरोध का आह्वान कर आंदोलन की कमान संभाली।
  • अरबिंदो घोष का योगदान: अरबिंदो घोष ने ‘वंदे मातरम’ पत्र के माध्यम से पूर्ण स्वराज्य और औपनिवेशिक तंत्र के पूर्ण बहिष्कार की वकालत की।
  • तिलक का अखिल भारतीय विस्तार: बाल गंगाधर तिलक ने शिवाजी और गणेश उत्सवों के जरिए आंदोलन को महाराष्ट्र और देश भर में फैलाया।
  • आंदोलन का प्रसार: लाला लाजपत राय ने पंजाब में, चिदंबरम पिल्लई ने मद्रास में और विपिन चंद्र पाल ने बंगाल में कमान संभाली।

सूरत विभाजन और आंदोलन का दमन (Surat Split & Suppression)

  • उदारवादी बनाम उग्रवादी मतभेद: आंदोलन के विस्तार, विदेशी वस्तुओं के पूर्ण बहिष्कार और स्वराज्य की व्याख्या को लेकर दोनों गुटों में गहरा विवाद हुआ।
  • 1906 का कलकत्ता अधिवेशन: दादाभाई नौरोजी ने अध्यक्ष पद से पहली बार ‘स्वराज’ का प्रस्ताव पारित कर तात्कालिक विभाजन को टाल दिया।
  • सूरत विभाजन (1907): ताप्ती नदी के तट पर सूरत अधिवेशन (अध्यक्ष: रासबिहारी घोष) में कांग्रेस दो फाड़ होकर स्पष्ट रूप से विभाजित हो गई।
  • ब्रिटिश सरकार का दमन चक्र: सूरत विभाजन का फायदा उठाकर अंग्रेजों ने समाचार पत्र अधिनियमों और दमनकारी नीतियों के जरिए उग्रवादियों को निशाना बनाया।
  • नेताओं की गिरफ्तारी व निर्वासन: 1908 में तिलक को 6 साल की मांडले जेल, अरबिंदो का संन्यास और लाला लाजपत राय का विदेश जाना आंदोलन को थमा गया।
  • ऐतिहासिक महत्व: इस आंदोलन ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को जन-आंदोलन में बदला तथा विभाजन अंततः 1911 में रद्द करना पड़ा।

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