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मिट्टी के प्रकार
- उत्तराखंड की मिट्टी यहाँ की भौगोलिक संरचना, जलवायु और वनस्पतियों से गहराई से प्रभावित है।
- राज्य की विविध भौगोलिक परिस्थितियाँ अलग-अलग प्रकार की मृदाओं को जन्म देती हैं।
- नदी घाटियों और तराई क्षेत्रों की मिट्टी आमतौर पर बहुत अधिक उपजाऊ होती है।
- इसके विपरीत, पर्वतीय ढलानों की मिट्टी कम उपजाऊ और कटाव के प्रति संवेदनशील होती है।
- पर्वतीय या वनीय मिट्टी राज्य के अधिकांश पहाड़ी ढलानों पर 900 से 2500 मीटर की ऊंचाई पर मिलती है।
- यह मिट्टी हल्की, छिद्रपूर्ण और जैविक पदार्थों (ह्यूमस) से भरपूर होती है जो चाय और सेब के लिए उपयुक्त है।
- लाल और पीली मिट्टी कम ऊंचाई वाले पहाड़ी ढलानों पर चट्टानों के अपक्षय से बनती है।
- इसमें लौह ऑक्साइड अधिक होता है, लेकिन नाइट्रोजन, फास्फोरस और ह्यूमस की कमी के कारण यह कम उपजाऊ है।
- तराई मिट्टी भाबर के दक्षिण में स्थित मैदानी क्षेत्र में पाई जाती है।
- यह महीन कणों वाली दलदली मिट्टी है, जिसमें नाइट्रोजन प्रचुर मात्रा में होता है और यह धान व गन्ने के लिए उत्तम है।
- भाबर मिट्टी शिवालिक की तलहटी में एक संकरी पट्टी के रूप में पाई जाती है।
- यह अत्यधिक छिद्रपूर्ण, कंकड़-पत्थरों और मोटे बालू वाली होती है, इसलिए कृषि के लिए कम उपयुक्त है।
- दून घाटी की मिट्टी मुख्य रूप से शिवालिक और मध्य हिमालय के बीच देहरादून जैसी घाटियों में मिलती है।
- यह जलोढ़ और दोमट प्रकार की उपजाऊ मिट्टी है, जो बासमती चावल, लीची और चाय के लिए प्रसिद्ध है।
- बुग्याल या अल्पाइन चरागाह मिट्टी 3000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाई जाती है।
- यह मिट्टी पतली और अम्लीय होती है, जो मुख्य रूप से घास और औषधीय पौधों के विकास में सहायक है।
- भूरी या पोडजोलिक मिट्टी ओक और शंकुधारी शीतोष्ण कटिबंधीय वनों के नीचे पाई जाती है।
- यह अम्लीय प्रकृति की होती है और आलू व सेब जैसे समशीतोष्ण फलों की खेती के लिए अच्छी मानी जाती है।
- जलोढ़ मिट्टी नदियों द्वारा लाए गए अवसादों से मैदानी भागों और नदी घाटियों में बनती है।
- मिट्टी का कटाव यहाँ की प्रमुख समस्या है, जिससे निपटने के लिए राज्य सरकार जैविक खेती को बढ़ावा दे रही है।
फसलें और कृषि पद्धतियाँ
- उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था में कृषि का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है जो ग्रामीण आबादी की आजीविका का मुख्य साधन है।
- राज्य की विविध जलवायु और स्थलाकृति के कारण इसे 8 कृषि पारिस्थितिक क्षेत्रों में विभाजित किया गया है।
- यहाँ की कृषि मुख्य रूप से वर्षा पर आधारित है, हालांकि सिंचाई सुविधाओं का भी धीरे-धीरे विस्तार हो रहा है।
- उत्तराखंड में मुख्य रूप से तीन प्रकार की फसल ऋतुएँ—रबी, खरीफ और जायद पाई जाती हैं।
- रबी फसलों की बुवाई अक्टूबर-नवंबर में होती है, जिसमें गेहूँ, जौ, चना, मटर और सरसों प्रमुख हैं।
- गेहूँ उत्तराखंड की सबसे प्रमुख खाद्यान्न फसल है, जिसका सर्वाधिक उत्पादन मैदानी और तराई जिलों में होता है।
- खरीफ फसलों की बुवाई जून-जुलाई में की जाती है, जिनमें धान, मक्का, मंडुवा और झंगोरा शामिल हैं।
- धान यहाँ की दूसरी सबसे प्रमुख खाद्यान्न फसल है और देहरादून का बासमती चावल इसके लिए काफी प्रसिद्ध है।
- मंडुवा और झंगोरा पर्वतीय क्षेत्रों के पारंपरिक और अत्यंत पौष्टिक मोटे अनाज (मिलेट्स) हैं।
- जायद फसलों के अंतर्गत मार्च से जुलाई के बीच तरबूज, खरबूजा, खीरा, ककड़ी और सब्जियाँ उगाई जाती हैं।
- नकदी फसलों में गन्ना तराई-भाबर क्षेत्रों में और आलू पर्वतीय व मैदानी दोनों क्षेत्रों में उगाया जाता है।
- यह राज्य अपने शीतोष्ण फलों जैसे हरसिल के सेब, नाशपाती, आड़ू, खुबानी और देहरादून की लीची के लिए प्रसिद्ध है।
- पर्वतीय ढलानों पर मृदा अपरदन को रोकने और जल संरक्षण के लिए ‘सीढ़ीदार खेती’ सबसे प्रमुख पद्धति है।
- ढलान के विपरीत समोच्च रेखाओं के समानांतर जुताई करके यहाँ ‘कंटूर खेती’ भी की जाती है।
- ‘मिश्रित खेती’ के अंतर्गत फसल उत्पादन के साथ-साथ पशुपालन को भी आय बढ़ाने के लिए अपनाया जाता है।
- कम भूमि पर उन्नत बीजों और उर्वरकों के उपयोग से अधिकतम उत्पादन के लिए ‘सघन खेती’ की जाती है।
- पर्यावरण अनुकूल कृषि के लिए राज्य सरकार ने ‘उत्तराखंड जैविक कृषि अधिनियम 2019’ पारित कर जैविक खेती को बढ़ावा दिया है।
- आदिम प्रकार की ‘झूम या स्थानान्तरीय खेती’ अब केवल कुछ जनजातीय क्षेत्रों तक सीमित है और इसे हतोत्साहित किया जा रहा है।
- सिंचाई और जल प्रबंधन के लिए आज भी गूल (छोटी नहरें), नौला और धारा जैसी पारंपरिक प्रणालियों का उपयोग होता है।
- पर्वतीय क्षेत्रों की विषम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण छोटी और बिखरी हुई जोतें यहाँ कृषि विकास की एक प्रमुख चुनौती हैं।
पशुपालन
- उत्तराखंड की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पशुपालन एक बेहद महत्वपूर्ण और अभिन्न हिस्सा माना जाता है।
- राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में कृषि के साथ-साथ पशुपालन आजीविका का मुख्य साधन है।
- उत्तराखंड की लगभग 70 प्रतिशत ग्रामीण आबादी अपनी आय के लिए किसी न किसी रूप में पशुधन पर निर्भर है।
- पशुपालन विभाग राज्य में पशुओं के स्वास्थ्य, नस्ल सुधार और उनके विकास के लिए लगातार काम करता है।
- राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में पशुपालन क्षेत्र का योगदान लगभग 3 से 4 प्रतिशत तक है।
- उत्तराखंड की विषम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण मैदानी और पहाड़ी इलाकों में अलग-अलग तरह से पशुपालन होता है।
- हरिद्वार और उधम सिंह नगर जैसे मैदानी जिलों में मुख्य रूप से भैंस और गाय का पालन किया जाता है।
- उत्तरकाशी, चमोली, पिथौरागढ़ और अल्मोड़ा जैसे पहाड़ी जिलों में भेड़ और बकरियों का पालन अधिक लोकप्रिय है।
- राज्य के ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में गर्मियों के दौरान पशुओं को पारंपरिक रूप से ‘बुग्याल’ (हरे-भरे घास के मैदानों) में चराने ले जाया जाता है।
- पशुधन जनगणना के अनुसार उत्तराखंड में कुल पशुओं की संख्या लगभग 30 लाख के आसपास है।
- राज्य में कुल पशुधन में गायों (मवेशियों) की संख्या सबसे अधिक है, जो लगभग 13-14 लाख है।
- भैंसों की संख्या करीब 8-9 लाख है, जो दूध उत्पादन का एक बड़ा और मुख्य जरिया हैं।
- पर्वतीय इलाकों की महिलाओं के लिए पशुपालन रोजगार और महिला सशक्तिकरण का सबसे बड़ा माध्यम है।
- पशुधन से न केवल दूध और मांस मिलता है, बल्कि जैविक खेती के लिए बहुमूल्य खाद (गोबर) भी प्राप्त होती है।
- उत्तराखंड सरकार द्वारा पशुपालकों की मदद के लिए ‘मुख्यमंत्री राज्य पशुधन मिशन’ जैसी कई योजनाएं चलाई जा रही हैं।
- राज्य में बकरी पालन को बढ़ावा देने के लिए विशेष तौर पर ‘गोट वैली’ (Goat Valley) योजना पर काम हो रहा है।
- पहाड़ी क्षेत्रों में उच्च गुणवत्ता वाले दूध, घी और पारंपरिक डेयरी उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है।
- पशुओं के समय पर इलाज और टीकाकरण के लिए पूरे राज्य में सैकड़ों पशु चिकित्सालय और औषधालय काम कर रहे हैं।
- आधुनिक तकनीकों जैसे ‘सेक्स-सॉर्टेड सीमेन’ का उपयोग करके राज्य में गायों की बेहतर नस्लें तैयार की जा रही हैं।
- चारा संकट और पलायन जैसी चुनौतियों के बावजूद उत्तराखंड में आत्मनिर्भरता के लिए पशुपालन एक मजबूत स्तंभ है।
सिंचाई और जलविद्युत परियोजनाएँ
- उत्तराखंड अपनी प्रचुर जल संपदा और पर्वतीय स्थलाकृति के कारण सिंचाई और जलविद्युत उत्पादन दोनों के लिए महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
- राज्य की नदियाँ न केवल कृषि के लिए जीवनदायिनी हैं बल्कि ऊर्जा उत्पादन का भी एक प्रमुख स्रोत मानी जाती हैं।
- उत्तराखंड को भविष्य में “भारत का ऊर्जा प्रदेश” बनाने की महत्वपूर्ण परिकल्पना की गई है।
- राज्य में 2 से 25 मेगावाट तक की परियोजनाओं को लघु और इससे अधिक क्षमता वाली परियोजनाओं को बड़ी जलविद्युत परियोजना कहा जाता है।
- सिंचाई के लिए पारंपरिक तरीकों जैसे गूल, नौला, और धारा के साथ-साथ आधुनिक नहर प्रणालियों का भी व्यापक उपयोग किया जाता है।
- उत्तराखंड राज्य में 29 जनवरी 2008 को नवीकरणीय ऊर्जा नीति की आधिकारिक घोषणा की गई थी।
- इसके बाद, राज्य सरकार द्वारा 31 जनवरी 2015 को नई ‘लघु जल विद्युत परियोजना नीति 2015’ लागू की गई।
- राज्य को केंद्र या अन्य राज्यों द्वारा विकसित परियोजनाओं से रॉयल्टी के रूप में 12 प्रतिशत बिजली निःशुल्क प्राप्त होती है।
- टिहरी बाँध परियोजना राज्य की सबसे प्रमुख जलविद्युत परियोजना है जो भागीरथी और भिलंगना नदी के संगम पर स्थित है।
- टिहरी बाँध की कुल उत्पादन क्षमता 2400 मेगावाट है, जिसे तीन अलग-अलग चरणों में विभाजित किया गया है।
- यह बाँध 5 मीटर की ऊंचाई के साथ एशिया का सबसे ऊँचा और दुनिया का चौथा सबसे ऊँचा बाँध है।
- टिहरी बाँध परियोजना को इसकी विशालता और महत्व के कारण “राष्ट्र का गाँव” की संज्ञा भी दी गई है।
- इस ऐतिहासिक बाँध का निर्माण कार्य वर्ष 1978 में उत्तर प्रदेश के सिंचाई विभाग द्वारा प्रारंभ किया गया था।
- वर्ष 1988 में टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (THDC) का गठन कर 1989 में उसे यह कार्यभार सौंपा गया।
- टिहरी बाँध के विशाल जलाशय का आधिकारिक नाम स्वामी रामतीर्थ सागर और स्थानीय नाम सुमन सागर है।
- इस जलाशय का कुल क्षेत्रफल 42 वर्ग किलोमीटर है और इसके प्रथम चरण की शुरुआत 30 जुलाई 2006 को हुई थी।
- बाँध निर्माण के विरोध में वर्ष 1978 में विद्यासागर नौटियाल की अध्यक्षता में ‘बाँध विरोधी समिति’ बनाई गई थी।
- प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा ने भी टिहरी बाँध के विरोध प्रदर्शन में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
- उत्तरकाशी जनपद में भागीरथी नदी पर मनेरी भाली परियोजना संचालित है, जो दो चरणों में बंटी है।
- मनेरी भाली के प्रथम चरण की क्षमता 90 मेगावाट तथा द्वितीय चरण (धरासू पावर हाउस) की क्षमता 304 मेगावाट है।