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खनिज सम्पदा

उत्तराखंड : खनिज संपदा 

  • उत्तराखंड राज्य अपनी विशिष्ट भूगर्भीय संरचना के कारण विभिन्न प्रकार के अधात्विक और औद्योगिक खनिजों से समृद्ध है।
  • राज्य की नाजुक हिमालयी पारिस्थितिकी को ध्यान में रखते हुए खनिजों का दोहन बेहद सीमित और नियंत्रित तरीके से किया जाता है।
  • उत्तराखंड के पहाड़ी और मैदानी क्षेत्रों को मिलाकर खनिजों की उपलब्धता की दृष्टि से तीन प्रमुख पेटियों (Belts) में विभाजित किया गया है।
  • राज्य में ‘चूना पत्थर’ (Limestone) का भंडार सबसे प्रमुख है, जो सीमेंट उद्योग और रासायनिक कार्यों के लिए रीढ़ की हड्डी माना जाता है।
  • देहरादून जिले की मंदारम और कालसी क्षेत्र की पहाड़ियाँ उत्तम कोटि के चूना पत्थर के भंडार के लिए पूरे राज्य में प्रसिद्ध हैं।
  • देहरादून के अतिरिक्त टिहरी गढ़वाल, पौड़ी और चमोली जिलों में भी उच्च गुणवत्ता वाले चूना पत्थर के विशाल निक्षेप पाए जाते हैं।
  • ‘मैग्नेसाइट’ (Magnesite) उत्तराखंड में पाया जाने वाला एक अन्य अत्यंत महत्वपूर्ण और मूल्यवान खनिज अयस्क है।
  • राज्य के अल्मोड़ा (झिरौली क्षेत्र) और पिथौरागढ़ (चंडाक क्षेत्र) जिलों में मैग्नेसाइट के देश के सबसे बड़े भंडारों में से एक स्थित हैं।
  • चमोली जिले के पोखरी और मंदाकिनी घाटी में भी मैग्नेसाइट की पट्टियाँ भूवैज्ञानिक सर्वेक्षणों में पाई गई हैं।
  • ‘सोपस्टोन’ या ‘टैल्क’ (Steatite/Soapstone) खनिज के उत्पादन में उत्तराखंड देश के अग्रणी राज्यों में अपनी पहचान रखता है।
  • सोपस्टोन का उपयोग मुख्य रूप से सौंदर्य प्रसाधन (टैल्कम पाउडर), कागज उद्योग और कीटनाशक बनाने में बड़े पैमाने पर होता है।
  • अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़ और चमोली जिले राज्य में सोपस्टोन के निष्कर्षण के प्रमुख केंद्र हैं।
  • उत्तराखंड के देहरादून (सहस्रधारा क्षेत्र) और टिहरी गढ़वाल जिलों में ‘फॉस्फोराइट’ (Phosphorite) के निक्षेप भी प्रचुर मात्रा में मिलते हैं।
  • ‘जिप्सम’ (Gypsum) का उपयोग सीमेंट और प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) बनाने में होता है, जिसके भंडार देहरादून, पौड़ी और नैनीताल में हैं।
  • धात्विक खनिजों की बात करें तो चमोली और पिथौरागढ़ जिलों के कुछ चुनिंदा क्षेत्रों में ‘तांबा’ (Copper) और ‘सीसा’ (Lead) के साक्ष्य मिलते हैं।
  • गढ़वाल की अलकनंदा, पिंडर और कुमाऊं की शारदा नदी के घाटों की रेत में सूक्ष्म मात्रा में ‘सोना’ (Gold) पाए जाने के ऐतिहासिक प्रमाण हैं।
  • राज्य के मैदानी और भाबर क्षेत्रों (जैसे हरिद्वार और ऊधम सिंह नगर) की नदियों से भारी मात्रा में उपखनिज जैसे उपला, रेत, बजरी और बोल्डर प्राप्त होते हैं।
  • ये उपखनिज राज्य के निर्माण उद्योग के लिए कच्चे माल की आपूर्ति करने के साथ-साथ राजस्व का एक बहुत बड़ा जरिया हैं।
  • उत्तराखंड सरकार ने अवैध खनन को रोकने और पर्यावरण सुरक्षा के लिए एक सुदृढ़ ‘राज्य खनन नीति’ लागू की है।
  • पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक लाभ के बीच संतुलन बनाकर ही उत्तराखंड में खनिज संपदा का वैज्ञानिक दोहन किया जा रहा है।

उत्तराखंड : खनन और पर्यावरण

  • उत्तराखंड एक पारिस्थितिक रूप से अत्यंत संवेदनशील हिमालयी राज्य है, जहाँ पर्यावरण और विकास में संतुलन बनाना बड़ी चुनौती है।
  • इस पर्वतीय राज्य में आर्थिक प्रगति के लिए खनिज संपदा का दोहन आवश्यक है, परंतु इसके गंभीर नकारात्मक पर्यावरणीय प्रभाव भी हैं।
  • राज्य की नाजुक भूगर्भीय संरचना के कारण यहाँ की जाने वाली खनन गतिविधियाँ प्रकृति के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं।
  • उत्तराखंड में होने वाला अवैध और अवैज्ञानिक खनन यहाँ की पर्यावरणीय समस्याओं को दिन-प्रतिदिन और अधिक गंभीर बना रहा है।
  • वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए राज्य में ‘सतत खनन’ (Sustainable Mining) की अवधारणा का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य है।
  • नदियों के तटीय क्षेत्रों में होने वाला ‘नदी तल खनन’ (रिवर बेड माइनिंग) वर्तमान में राज्य में गहरी पर्यावरणीय चिंताओं का मुख्य विषय है।
  • खनन पट्टों की मंजूरी और खनन क्षेत्रों तक मार्ग बनाने के लिए बड़े पैमाने पर होने वाली वनों की कटाई से मूल्यवान वन संपदा नष्ट हो रही है।
  • जंगलों के इस विनाश के कारण वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास छिन रहे हैं, जिससे क्षेत्रीय जैव विविधता पर गंभीर संकट खड़ा हो गया है।
  • पहाड़ी ढलानों पर खनन कार्यों और विस्फोटकों (ब्लास्टिंग) के अनियंत्रित उपयोग से भूमि की आंतरिक स्थिरता कमजोर हो जाती है।
  • भूमि के अस्थिर होने से वर्षा ऋतु के दौरान संवेदनशील पहाड़ी क्षेत्रों में विनाशकारी भूस्खलन (Landslides) का खतरा बहुत बढ़ जाता है।
  • वनस्पति आवरण हटने के कारण मृदा अपरदन (मिट्टी का कटाव) तेज होता है, जिससे उपजाऊ मिट्टी बहकर नदियों में गाद (सिल्ट) की मात्रा बढ़ाती है।
  • खदानों से निकलने वाला रासायनिक अपशिष्ट जल (Acid Mine Drainage) आस-पास के प्राकृतिक जल स्रोतों और नदियों को दूषित कर रहा है।
  • यह प्रदूषित जल न केवल स्थानीय मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, बल्कि जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को भी पूरी तरह नष्ट कर देता है।
  • ड्रिलिंग, ब्लास्टिंग और खनिजों के परिवहन के दौरान उड़ने वाली धूल के सूक्ष्म कण स्थानीय वायु गुणवत्ता को गंभीर रूप से खराब करते हैं।
  • इस वायु प्रदूषण के कारण खनन क्षेत्रों के आस-पास रहने वाले नागरिकों में श्वसन और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियाँ तेजी से बढ़ रही हैं।
  • भारी मशीनरी, स्टोन क्रशरों और विस्फोटों से होने वाला ध्वनि प्रदूषण स्थानीय निवासियों और वन्यजीवों के प्राकृतिक व्यवहार को बाधित करता है।
  • अयस्क प्रसंस्करण (Ore Processing) जैसी खनन प्रक्रियाओं में भारी मात्रा में जल की खपत होने से स्थानीय जल संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।
  • अवैज्ञानिक खनन के कारण कई क्षेत्रों में पारंपरिक जल स्रोत (धारे और नौले) सूख रहे हैं, जिससे पहाड़ी गांवों में पेयजल संकट गहरा गया है।
  • इन समस्याओं के समाधान हेतु पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) के नियमों का सख्ती से पालन करना और पर्यावरण अनुकूल तकनीकों को अपनाना जरूरी है।
  • पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ खनिज संपदा का सीमित एवं नियंत्रित दोहन ही उत्तराखंड के सुरक्षित और सतत भविष्य को सुनिश्चित कर सकता है।

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