Skip to content
राष्ट्रवाद के उदय के कारण (Factors Prompting Nationalism)
- ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियां: अंग्रेजों के आर्थिक शोषण और भारत को केवल कच्चा माल उत्पादक बनाने की नीति ने भारतीय हितों को एकजुट किया।
- राजनैतिक और प्रशासनिक एकीकरण: अंग्रेजों द्वारा पूरे देश में एक समान कानून, न्याय प्रणाली और प्रशासनिक ढांचा लागू करने से एकता आई।
- यातायात और संचार का विकास: रेलवे, टेलीग्राम और आधुनिक डाक व्यवस्था ने देश के विभिन्न हिस्सों के लोगों को एक-दूसरे के करीब लाया।
- पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार: अंग्रेजी शिक्षा ने भारतीयों को स्वतंत्रता, समानता, लोकतंत्र और यूरोपीय राष्ट्रवाद के आधुनिक विचारों से परिचित कराया।
- मध्यम वर्ग का उदय: अंग्रेजी पढ़े-लिखे नए मध्यम वर्ग (वकील, डॉक्टर, शिक्षक) ने ही राष्ट्रवाद को वैचारिक नेतृत्व प्रदान किया।
- प्रेस और साहित्य की भूमिका: भारतीय समाचार पत्रों और देशभक्ति कविताओं ने ब्रिटिश विरोधी चेतना जगाने में सबसे महत्वपूर्ण योगदान दिया।
- प्राचीन गौरव की खोज: विलियम जोंस और मैक्समूलर जैसे विद्वानों द्वारा भारतीय इतिहास के शोध ने भारतीयों में आत्मसम्मान जगाया।
- सामाजिक-धार्मिक सुधार: राजा राममोहन राय, स्वामी विवेकानंद और दयानंद सरस्वती के आंदोलनों ने सामाजिक रूढ़ियों को तोड़कर एकता बढ़ाई।
- लिटन और रिपन की नीतियां (Lytton and Ripon’s Policies)
- लॉर्ड लिटन की दमनकारी नीतियां: वायसराय लिटन की साम्राज्यवादी और जनविरोधी नीतियों ने भारतीयों के असंतोष को चरम पर पहुंचा दिया।
- दिल्ली दरबार (1877): जब पूरा दक्षिण भारत भयंकर अकाल से जूझ रहा था, तब लिटन ने दिल्ली में भव्य राजसी दरबार आयोजित किया।
- वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट (1878): इस दमनकारी कानून का मुख्य उद्देश्य भारतीय भाषा के समाचार पत्रों की स्वतंत्रता को पूरी तरह कुचलना था।
- आर्म्स एक्ट (1878): इस नस्लीय कानून के तहत भारतीयों के लिए हथियार रखना अपराध बना दिया गया, जबकि गोरों को छूट थी।
- सिविल सेवा आयु में कटौती: लिटन ने आईसीएस (ICS) परीक्षा की अधिकतम आयु 21 वर्ष से घटाकर 19 वर्ष कर दी थी।
- इल्बर्ट बिल विवाद (1883): वायसराय लॉर्ड रिपन के समय आए इस बिल ने भारतीय न्यायाधीशों को यूरोपीय अपराधियों के मुकदमे सुनने का अधिकार दिया।
- श्वेत विद्रोह और नस्लवाद: अंग्रेजों के भारी विरोध के कारण इल्बर्ट बिल वापस लेना पड़ा, जिससे भारतीयों को ब्रिटिश नस्लवाद का पता चला।
- संगठन का महत्व: इल्बर्ट बिल विवाद से भारतीयों ने सीखा कि संगठित होकर ही ब्रिटिश सरकार पर दबाव बनाया जा सकता है।
कांग्रेस-पूर्व राजनैतिक संस्थाएं (Pre-Congress Associations)
- बंगाल में शुरुआती संस्थाएं: राजा राममोहन राय के सहयोगियों ने 1836 में ‘बंगाभाषा प्रकाशिका सभा’ बनाकर पहले राजनैतिक प्रयास की शुरुआत की थी।
- लैंडहोल्डर्स सोसाइटी (1838): द्वारकानाथ टैगोर द्वारा स्थापित यह संस्था मुख्य रूप से जमींदारों के हितों की रक्षा के लिए काम करती थी।
- बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी (1843): इसका उद्देश्य वास्तविक भारतीय परिस्थितियों की जानकारी एकत्र कर ब्रिटिश सरकार तक शांतिपूर्वक पहुंचाना था।
- ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन (1851): यह लैंडहोल्डर्स सोसाइटी और बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी को मिलाकर बनी एक प्रभावशाली संस्था थी।
- ईस्ट इंडिया एसोसिएशन (1866): दादाभाई नौरोजी ने लंदन में इसकी स्थापना कर ब्रिटिश जनता को भारतीय समस्याओं से अवगत कराया।
- पुणे सार्वजनिक सभा (1870): एम. जी. रानाडे ने महाराष्ट्र में जनता और सरकार के बीच सेतु के रूप में इसकी स्थापना की।
- इंडियन एसोसिएशन ऑफ कलकत्ता (1876): सुरेंद्रनाथ बनर्जी और आनंदमोहन बोस द्वारा स्थापित यह संस्था कांग्रेस-पूर्व की सबसे महत्वपूर्ण संस्था थी।
- सिविल सेवा आंदोलन: इंडियन एसोसिएशन ने आईसीएस परीक्षा की आयु घटाने के खिलाफ देशव्यापी नागरिक आंदोलन का नेतृत्व किया था।
- बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन (1885): बंबई में बदरुद्दीन तैयबजी, फिरोजशाह मेहता और के.टी. तैलंग के प्रयासों से इस संस्था का गठन हुआ।
- मद्रास महाजन सभा (1884): दक्षिण भारत में एम. वीरराघवाचारी और जी. सुब्रमण्यम अय्यर ने राजनैतिक चेतना फैलाने हेतु इसे बनाया।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना (Formation of INC)
- दिसंबर 1885: भारत के विभिन्न क्षेत्रों के राजनैतिक नेता एक अखिल भारतीय संगठन बनाने के लिए पूरी तरह सहमत हुए।
- प्रथम अधिवेशन: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का पहला ऐतिहासिक अधिवेशन 28 दिसंबर 1885 को बंबई में आयोजित किया गया था।
- स्थान और प्रतिनिधि: गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज में हुए इस पहले अधिवेशन में देश भर के 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
- ए. ओ. ह्यूम ( O. Hume): एक सेवानिवृत्त ब्रिटिश प्रशासनिक अधिकारी (ICS) ने कांग्रेस की स्थापना में मुख्य सूत्रधार की भूमिका निभाई।
- व्योमेश चंद्र बनर्जी: कोंग्रेस के इस प्रथम बंबई अधिवेशन की अध्यक्षता प्रसिद्ध बंगाली बैरिस्टर डब्ल्यू. सी. बनर्जी ने की थी।
- लॉर्ड डफरिन: कांग्रेस की स्थापना के समय भारत का वायसराय डफरिन था, जिसने बाद में इसे ‘अल्पसंख्यक जनता की संस्था’ कहा।
- सेफ्टी वाल्व सिद्धांत: लाला लाजपत राय के अनुसार, ह्यूम ने ब्रिटिश शासन को जन-असंतोष से बचाने के लिए कांग्रेस को ‘सेफ्टी वाल्व’ बनाया।
- लाइटनिंग कंडक्टर सिद्धांत: गोपाल कृष्ण गोखले के अनुसार, भारतीय नेताओं ने सरकारी दमन से बचने के लिए ह्यूम का उपयोग किया।
कांग्रेस के शुरुआती उद्देश्य (Early Objectives of INC)
- अखिल भारतीय पहचान: देश के विभिन्न हिस्सों के राजनैतिक कार्यकर्ताओं के बीच मित्रता और सौहार्दपूर्ण संबंध स्थापित करना मुख्य लक्ष्य था।
- राष्ट्रीय एकता की भावना: जाति, धर्म और प्रांतीयता के भेदों को भुलाकर एक मजबूत भारतीय राष्ट्रीय एकता की भावना विकसित करना।
- लोकप्रिय मांगें: देश की महत्वपूर्ण राजनीतिक, आर्थिक और प्रशासनिक समस्याओं पर विचार विमर्श कर सरकार के सामने मांगें रखना।
- राजनैतिक शिक्षा: देश की जनता को राजनीतिक रूप से जागरूक करना और राष्ट्रीय आंदोलनों के लिए प्रशिक्षित करना।
- प्रशासनिक सुधारों की मांग: विधान परिषदों का विस्तार, सेना के खर्च में कमी और सिविल सेवा परीक्षाओं का भारत में आयोजन।
- मजबूत नींव: शुरुआती कमजोरियों के बावजूद, इस आंदोलन ने भारत के भावी विशाल स्वतंत्रता संग्राम की एक मजबूत नींव तैयार की।