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रेडिकल आर्थिक बदलाव (1960 के दशक के उत्तरार्ध से 1970 के दशक तक)

प्रमुख वाणिज्यिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण (1969)

  • बैंक राष्ट्रीयकरण (1969): इंदिरा गांधी सरकार ने 19 जुलाई 1969 को 50 करोड़ से अधिक जमा वाले 14 प्रमुख निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया।
  • बैंकिंग का उदारीकरण: बैंकिंग सेवा को केवल बड़े उद्योगपतियों से हटाकर कृषि, लघु उद्योग और ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुँचाना मुख्य लक्ष्य था।
  • सामाजिक बैंकिंग की शुरुआत: राष्ट्रीयकरण से ‘प्रॉफिट बैंकिंग’ की जगह ‘मास बैंकिंग’ (Mass Banking) और प्राथमिक क्षेत्र ऋण (Priority Sector Lending) की नींव पड़ी।
  • ग्रामीण शाखाओं का विस्तार: देश के सुदूर और ग्रामीण क्षेत्रों में वाणिज्यिक बैंकों की हजारों नई शाखाएं खोली गईं।
  • द्वितीय चरण (1980): अप्रैल 1980 में 200 करोड़ से अधिक जमा वाले 6 अन्य निजी बैंकों का भी राष्ट्रीयकरण कर दिया गया।

प्रिवी पर्स का उन्मूलन (Abolition of Privy Purses – 1971)

  • प्रिवी पर्स की पृष्ठभूमि: स्वतंत्रता के समय देशी रियासतों के शासकों को विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने के एवज में दिया जाने वाला विशेष भत्ता।
  • संवैधानिक समानता की मांग: लोकतांत्रिक व्यवस्था में पूर्व राजा-महाराजाओं के विशेषाधिकारों और कर-मुक्त भत्तों को समतावादी मूल्यों के विपरीत माना गया।
  • 26वाँ संविधान संशोधन (1971): इंदिरा गांधी सरकार ने 26वें संशोधन अधिनियम 1971 द्वारा पूर्व राजाओं के प्रिवी पर्स और विशेषाधिकार समाप्त कर दिए।
  • राजकोषीय बोझ में कमी: इस ऐतिहासिक कदम से सरकार को भारी वित्तीय बचत हुई और लोक कल्याणकारी योजनाओं हेतु धन उपलब्ध हुआ।
  • संवैधानिक अखंडता की पुष्टि: इसने भारतीय नागरिकों के बीच किसी भी प्रकार के कुलीन विशेषाधिकार को समाप्त कर समतामूलक समाज की नींव रखी।

कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण (Nationalization of Coal Mines – 1971-73)

  • निजी खदानों में कुप्रबंधन: 1970 के दशक से पहले निजी कोयला खदान मालिक खनिकों का भीषण शोषण करते थे और सुरक्षा मानकों की अनदेखी करते थे।
  • कोकिंग कोल राष्ट्रीयकरण अधिनियम (1972): इस्पात उद्योग की सुरक्षा हेतु पहले 1971-72 में कोकिंग कोयला खदानों का सरकारी नियंत्रण में अधिग्रहण किया गया।
  • गैर-कोकिंग कोयला राष्ट्रीयकरण (1973): मई 1973 में सभी गैर-कोकिंग कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण कर उद्योग को पूरी तरह राज्य के अधीन किया गया।
  • कोल इंडिया लिमिटेड (CIL – 1975): देश में कोयला निष्कर्षण और प्रबंधन को सुव्यवस्थित करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की सार्वजनिक कंपनी CIL बनी।
  • श्रमिक कल्याण व बुनियादी ढांचा: राष्ट्रीयकरण से खनिकों को बेहतर वेतन, सामाजिक सुरक्षा और ऊर्जा क्षेत्र को निर्बाध कोयला आपूर्ति सुनिश्चित हुई।

गरीबी हटाओनीतियां और समाजवाद का प्रसार (Garibi Hatao & Socialist Tilt)

  • गरीबी हटाओका नारा: 1971 के लोकसभा चुनावों में इंदिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ का लोकप्रिय राजनीतिक और आर्थिक नारा दिया।
  • 20 सूत्रीय कार्यक्रम (1975): भूमि सुधार, ग्रामीण ऋण-माफी, आवास और न्यूनतम मजदूरी सुनिश्चित करने हेतु ऐतिहासिक 20 सूत्रीय कार्यक्रम शुरू हुआ।
  • एमआरटीपी एक्ट (MRTP Act 1969): एकाधिकार और प्रतिबंधात्मक व्यापार व्यवहार अधिनियम लागू कर बड़े व्यापारिक घरानों के अनियंत्रित विस्तार पर रोक लगाई गई।
  • फेरा अधिनियम (FERA 1973): विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम द्वारा विदेशी कंपनियों के स्वामित्व और विदेशी पूंजी प्रवाह पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए।
  • 42वाँ संविधान संशोधन (1976): संविधान की प्रस्तावना में औपचारिक रूप से ‘समाजवादी’ (Socialist) शब्द जोड़कर राज्य के आर्थिक दर्शन को कानूनी रूप दिया गया।

1991 का भुगतान संतुलन संकट और LPG सुधार (1991 BoP Crisis & Liberalization, Privatization, and Globalization (LPG) Reforms)

1991 के भुगतान संतुलन (BoP) संकट के कारण और स्वरूप

  • राजकोषीय घाटा और खाड़ी युद्ध: 1980 के दशक के उच्च राजकोषीय घाटे और 1990 के खाड़ी युद्ध से कच्चे तेल के दाम बढ़ने से संकट गहराया।
  • विदेशी मुद्रा भंडार में भारी गिरावट: जून 1991 तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार गिरकर मात्र 3 सप्ताह के आयात के योग्य (लगभग $1.2 बिलियन) बचा था।
  • एनआरआई (NRI) जमा की निकासी: आर्थिक अस्थिरता के कारण प्रवासी भारतीयों (NRIs) ने भारतीय बैंकों से तेजी से अपनी जमा राशियाँ वापस निकालीं।
  • अंतरराष्ट्रीय साख में गिरावट: वैश्विक क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों द्वारा भारत की साख घटाने से अंतर्राष्ट्रीय बाजारों से ऋण मिलना बंद हो गया।
  • स्वर्ण भंडार को गिरवी रखना: डिफॉल्ट से बचने के लिए भारत को बैंक ऑफ इंग्लैंड और बैंक ऑफ स्विट्जरलैंड में 47 टन सोना गिरवी रखना पड़ा।

संकट मोचन और IMF/विश्व बैंक की शर्तें

  • राव-मनमोहन की जोड़ी: प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव और वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने साहसिक राजनीतिक व आर्थिक फैसलों का नेतृत्व किया।
  • IMF और विश्व बैंक से आपातकालीन ऋण: भारत ने संकट से उबरने के लिए IMF और विश्व बैंक से $5-6 बिलियन का आपातकालीन वित्तीय पैकेज लिया।
  • संरचनात्मक समायोजन कार्यक्रम (SAP): अंतर्राष्ट्रीय निकायों की शर्तों के तहत भारत को अपनी बंद अर्थव्यवस्था को खोलकर बाजार-संचालित सुधार लागू करने पड़े।

लाइसेंस राज का अंत और उदारीकरण (Liberalisation)

  • नई औद्योगिक नीति (1991): 24 जुलाई 1991 को घोषित नीति ने उद्योगों के लिए अनिवार्य लाइसेंसिंग और कोटा व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त किया।
  • लाइसेंस राज की समाप्ति: केवल 18 रणनीतिक उद्योगों को छोड़कर अन्य सभी क्षेत्रों के लिए औद्योगिक लाइसेंस (Industrial Licensing) की बाध्यता खत्म कर दी गई।
  • MRTP सीमा का उन्मूलन: एमआरटीपी (MRTP) अधिनियम के तहत बड़े व्यापारिक घरानों पर निवेश और विस्तार के लिए लगी संपत्ति सीमा खत्म की गई।
  • रुपये का अवमूल्यन (Devaluation): जुलाई 1991 में दो चरणों में भारतीय रुपये का लगभग 18-19% अवमूल्यन कर निर्यात को बढ़ावा दिया गया।
  • व्यापार नीति में सुधार: आयात शुल्कों (Tariffs) में भारी कटौती की गई और मात्रात्मक प्रतिबंधों (Import Quotas) को धीरे-धीरे समाप्त कर दिया गया।

निजीकरण और वैश्वीकरण (Privatisation & Globalisation)

  • सार्वजनिक क्षेत्र का विनिवेश (Disinvestment): सार्वजनिक उपक्रमों (PSUs) में सरकारी शेयर बेचने और उनकी दक्षता बढ़ाने के लिए निजी भागीदारी शुरू की गई।
  • आरक्षित क्षेत्रों में कमी: सार्वजनिक क्षेत्र के लिए सुरक्षित उद्योगों की संख्या 17 से घटाकर केवल 8 (वर्तमान में केवल 2- परमाणु ऊर्जा और रेल) कर दी गई।
  • प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की अनुमति: कई प्रमुख क्षेत्रों में स्वचालित मार्ग (Automatic Route) से 51% तक FDI की स्वतः स्वीकृति दी जाने लगी।
  • वित्तीय क्षेत्र में सुधार: नरसिम्हम समिति (1991) की सिफारिशों पर निजी व विदेशी बैंकों को भारत में शाखाएं खोलने की अनुमति मिली।
  • SEBI को वैधानिक दर्जा (1992): पूंजी बाजार को विनियमित करने और निवेशकों के हितों की रक्षा हेतु सेबी (SEBI) को वैधानिक शक्तियां प्रदान की गईं।
  • वित्तीय समावेशन और चालू खाता परिवर्तनीयता: 1994 में भारतीय रुपये को व्यापार के लिए चालू खाते (Current Account) पर पूरी तरह परिवर्तनीय बनाया गया।
  • भारतीय अर्थव्यवस्था का वैश्विक एकीकरण: इन सुधारों ने भारत को विश्व अर्थव्यवस्था से जोड़ा, जिससे उच्च जीडीपी वृद्धि दर और आईटी क्रांति की नींव पड़ी।

योजना आयोग से नीति आयोग में संक्रमण (Transition from Planning Commission to NITI Aayog)

संस्थागत परिवर्तन और वैचारिक बदलाव (Institutional Shift)

  • नीति आयोग की स्थापना: 1 जनवरी 2015 को योजना आयोग को प्रतिस्थापित कर ‘नीति आयोग’ (NITI Aayog) का गठन मंत्रिमंडल प्रस्ताव द्वारा किया गया।
  • पूरा नाम और दर्शन: नीति आयोग का पूर्ण रूप ‘नेशनल इंस्टीट्यूशन फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया’ है, जो ‘न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन’ पर आधारित है।
  • शीर्ष-से-नीचे (Top-Down) मॉडल का अंत: योजना आयोग की केन्द्रीकृत ‘एक ही आकार सब पर लागू’ (One Size Fits All) नीति को समाप्त किया गया।
  • नीचे-से-ऊपर (Bottom-Up) दृष्टिकोण: गाँव स्तर पर व्यावहारिक योजनाएं बनाकर उन्हें उच्च स्तरों तक एकीकृत करने कीBottom-Up रणनीति अपनाई गई।
  • पंचवर्षीय योजनाओं की समाप्ति: 12वीं पंचवर्षीय योजना (2012-17) के बाद कठोर पंचवर्षीय योजनाओं की 65 वर्ष पुरानी व्यवस्था समाप्त कर दी गई।
  • नया योजना ढांचा: नीति आयोग ने 15-वर्षीय ‘विज़न’, 7-वर्षीय ‘रणनीति’ और 3-वर्षीय ‘कार्य एजेंडा’ (Action Agenda) का खाका पेश किया।

सहयोगात्मक और प्रतिस्पर्धात्मक संघवाद (Cooperative & Competitive Federalism)

  • शासी परिषद (Governing Council): सभी राज्यों के मुख्यमंत्री व UTs के उपराज्यपालों को शासी परिषद में सीधा सदस्य बनाकर बराबर स्थान दिया गया।
  • टीम इंडिया हब (Team India Hub): राज्य और केंद्र सरकार के बीच निरंतर संवाद सेतु के रूप में कार्य कर सहयोगात्मक संघवाद को मजबूत करता है।
  • क्षेत्रीय परिषदें (Regional Councils): दो या अधिक राज्यों से जुड़े विशिष्ट साझा मुद्दों व विवादों का त्वरित समाधान करने हेतु गठित की जाती हैं।
  • प्रतिस्पर्धात्मक संघवाद (Competitive Federalism): राज्यों के बीच स्वास्थ्य, शिक्षा, जल और नवाचार में बेहतर प्रदर्शन हेतु स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दिया जाता है।

थिंक-टैंक मॉडल और विशेषज्ञता (Knowledge & Innovation Hub)

  • संसाधन आवंटन शक्ति की समाप्ति: नीति आयोग के पास योजना आयोग की तरह मंत्रालयों व राज्यों को धन आवंटित करने की शक्ति नहीं है।
  • ज्ञान और अनुसंधान हब (Knowledge & Innovation Hub): नीति आयोग सरकार के मुख्य थिंक-टैंक के रूप में रणनीतिक और दीर्घकालिक नीतिगत सलाह देता है।
  • अटल इनोवेशन मिशन (AIM): देश में स्कूल स्तर पर ‘अटल टिंकरिंग लैब’ और स्टार्ट-अप्स हेतु नवाचार संस्कृति को बढ़ावा देने की प्रमुख पहल।
  • बाहरी विशेषज्ञों का समावेशन: शिक्षाविदों, विषय-विशेषज्ञों, निजी विशेषज्ञों और सिविल सोसाइटी को नीति निर्माण में सक्रिय रूप से जोड़ा गया है।
  • विकास अनुश्रवण और मूल्यांकन (DMEO): सरकारी योजनाओं व कार्यक्रमों के प्रभाव का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन और वास्तविक डेटा निगरानी करने वाला ढांचा।

समकालीन विकास सूचकांक और आकांक्षी जिला कार्यक्रम (Indexes & Programs)

  • SDG इंडिया इंडेक्स: संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को प्राप्त करने में राज्यों की प्रगति को मापने वाला अग्रणी सूचकांक।
  • आकांक्षी जिला कार्यक्रम (Aspirational Districts Programme): देश के 112 सबसे पिछड़े जिलों के तेजी से कायाकल्प हेतु डेटा-संचालित नवाचार कार्यक्रम।
  • समग्र जल प्रबंधन सूचकांक (CWMI): राज्यों में जल संसाधनों के कुशल उपयोग और संरक्षण का पारदर्शी मूल्यांकन करने वाला रैंकिंग ढांचा।
  • राज्य स्वास्थ्य व नवाचार सूचकांक: स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता मापने हेतु ‘हेल्थ इंडेक्स’ और राज्यों की अनुसंधान क्षमता हेतु ‘इंडिया इनोवेशन इंडेक्स’।
  • सहयोगात्मक विकास का केंद्र: नीति आयोग आधुनिक भारत में साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण (Evidence-based Policymaking) का प्रमुख संवाहक बन चुका है।

चुनावी लोकतंत्र की स्थापना (Establishment of Electoral Democracy)

संविधान का अंगीकरण और लोकतांत्रिक नींव (Adoption of the Constitution)

  • संविधान सभा का संकल्प: संविधान सभा ने 26 नवंबर 1949 को भारत के संविधान को अंगीकृत किया, जो 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ।
  • सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार: बिना किसी संपत्ति, शिक्षा या लैंगिक भेदभाव के 21 वर्ष (वर्तमान 18 वर्ष) से ऊपर सभी को वोट का अधिकार दिया गया।
  • संसदीय व्यवस्था का चयन: पश्चिमी मॉडलों से सीख लेते हुए भारत ने प्रतिनिधि लोकतंत्र हेतु उत्तरदायी वेस्टमिंस्टर संसदीय प्रणाली को अपनाया।
  • अनुच्छेद 324 और चुनाव आयोग: निष्पक्ष व स्वतंत्र चुनाव कराने हेतु संवैधानिक निकाय के रूप में 25 जनवरी 1950 को चुनाव आयोग बना।

सुकुमार सेन और प्रथम आम चुनाव (First General Elections 1951–52)

  • सुकुमार सेन की नियुक्ति: भारत के पहले मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) सुकुमार सेन ने अभूतपूर्व प्रशासनिक चुनौती का कुशलतापूर्वक नेतृत्व किया।
  • निरक्षरता की विशाल चुनौती: कुल 3 करोड़ मतदाताओं में से लगभग 85% आबादी निरक्षर थी, जिसके लिए नवीन मतदान तकनीकों की आवश्यकता थी।
  • चुनावी प्रतीकों की नवाचार व्यवस्था: निरक्षर मतदाताओं की पहचान हेतु बैलेट बॉक्सों पर अलग-अलग राजनीतिक दलों के विशिष्ट चुनाव चिह्न चिपकाए गए।
  • अमिट स्याही (Indelible Ink) का प्रयोग: फर्जी मतदान रोकने हेतु राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला (NPL) द्वारा निर्मित अमिट स्याही का पहली बार इस्तेमाल हुआ।
  • विशाल मतदाता सूची का निर्माण: लाखों शरणार्थियों और महिलाओं का नाम दर्ज कर पारदर्शी मतदाता सूची तैयार करना एक ऐतिहासिक प्रशासनिक उपलब्धि थी।
  • विशाल भौतिक फैलाव: अक्टूबर 1951 से फरवरी 1952 के बीच 4 माह से अधिक चले चुनावों में 2,24,000 मतदान केंद्र बनाए गए थे।
  • लोकतंत्र का सबसे बड़ा जुआ: पश्चिमी पश्चिमी टिप्पणीकारों ने भारत के इस प्रयोग को ‘इतिहास का सबसे बड़ा जुआ’ कहकर संशय जताया था।
  • सफल और शांतिपूर्ण आयोजन: 45% से अधिक मतदान के साथ निष्पक्ष चुनाव संपन्न कराकर भारत ने दुनिया के सामने सफल लोकतंत्र स्थापित किया।

कांग्रेस सिस्टमऔर एक-दल प्रभुत्व का अभ्युदय (The Congress System)

  • रजनी कोठारी की कांग्रेस प्रणाली‘: प्रसिद्ध समाजशास्त्री रजनी कोठारी ने 1950-60 के दशक के भारतीय चुनावी प्रभुत्व को ‘कांग्रेस सिस्टम’ का नाम दिया।
  • कांग्रेस की भारी चुनावी जीत: पहले आम चुनाव में कांग्रेस ने लोकसभा की 489 में से 364 सीटें जीतकर एकतरफा वर्चस्व स्थापित किया।
  • स्वतंत्रता संग्राम की विरासत: राष्ट्रीय आंदोलन का मुख्य चेहरा होने के कारण कांग्रेस को जन-मानस में स्वाभाविक स्वीकार्यता और विश्वसनीयता प्राप्त थी।
  • जवाहरलाल नेहरू का करिश्माई नेतृत्व: पंडित नेहरू के सर्वमान्य, धर्मनिरपेक्ष और आधुनिक व्यक्तित्व ने कांग्रेस को चुनावों में अजेय बढ़त दिलाई।
  • इंद्रधनुषीसामाजिक गठबंधन: कांग्रेस के भीतर सभी वर्गों, जातियों, धर्मों, वामपंथियों और दक्षिणपंथियों का समावेशी सामाजिक व वैचारिक गठबंधन मौजूद था।
  • आंतरिक गुटबाजी (Internal Factionalism): कांग्रेस के भीतर विभिन्न गुटों की मौजूदगी ने ही विपक्ष का काम किया और पार्टी में संतुलन बनाए रखा।
  • कमजोर किंतु जीवंत विपक्ष: सीपीआई (CPI), सोशलिस्ट पार्टी और जनसंघ जैसे विपक्षी दल सीटें कम पाने के बावजूद संसद में प्रभावी रहे।
  • लोकतांत्रिक व्यवस्था की परिपक्वता: इस चुनावी व्यवस्था ने नव-स्वतंत्र भारत में बहुदलीय प्रणाली और लोकतांत्रिक संस्थाओं की जड़ों को गहराई से जमाया।

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