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नेहरूवादी विदेश नीति का युग (The Nehruvian Foreign Policy Era)

गुटनिरपेक्ष आंदोलन का निर्माण (Formulation of NAM)

  • शीत युद्ध में तटस्थता: अमेरिका और सोवियत संघ के सैन्य गुटों में शामिल न होकर स्वतंत्र विदेश नीति का पालन करना मुख्य उद्देश्य था।
  • बांडुंग सम्मेलन (1955): इंडोनेशिया के बांडुंग सम्मेलन ने एशियाई-अफ़्रीकी एकजुटता और गुटनिरपेक्ष आंदोलन की मजबूत वैचारिक नींव रखी।
  • NAM के संस्थापक नेता: नेहरू, टीटो (युगोस्लाविया), नासिर (मिस्र), सुकर्णो (इंडोनेशिया) और नक्रमा (घाना) ने मिलकर गुटनिरपेक्ष आंदोलन की स्थापना की।
  • बेलग्रेड शिखर सम्मेलन (1961): 1961 के बेलग्रेड सम्मेलन में गुटनिरपेक्ष आंदोलन का पहला औपचारिक शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ, जिसमें 25 देश शामिल हुए।
  • उपनिवेशवाद विरोधी रुख: नेहरू की विदेश नीति ने अफ्रीका और एशिया में साम्राज्यवाद, रंगभेद और नस्लवाद का कड़ा विरोध किया।
  • साम्राज्यवादी दबाव से मुक्ति: दोनों महाशक्तियों से वित्तीय व तकनीकी सहायता प्राप्त करते हुए अपनी राजनीतिक संप्रभुता बनाए रखने की नीति अपनाई।

पंचशील समझौता – 1954 (Panchsheel Agreement)

  • ऐतिहासिक संधि (1954): 29 अप्रैल 1954 को भारत (नेहरू) और चीन (चाउ एन-लाई) के बीच तिब्बत व्यापार समझौते पर पंचशील हस्ताक्षर हुए।
  • अनाक्रमण व गैर-हस्तक्षेप: इसमें एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान, अनाक्रमण और एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में अहस्तक्षेप के सिद्धांत थे।
  • शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व: पंचशील का पाँचवाँ सिद्धांत ‘शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व’ था, जिसका उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय शांति और सहयोगात्मक वैश्विक व्यवस्था बनाना था।
  • हिंदी-चीनी भाई-भाई”: इस समझौते के बाद भारत में “हिंदी-चीनी भाई-भाई” का लोकप्रिय नारा गुँजायमान हुआ, जिसने कूटनीतिक संबंधों को प्रगाढ़ किया।
  • तिब्बत पर चीन की संप्रभुता: भारत ने रणनीतिक लाभ और शांति की उम्मीद में तिब्बत पर चीनी संप्रभुता को औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया।

1962 के भारत-चीन युद्ध के रणनीतिक परिणाम (Sino-Indian War 1962)

  • सीमा विवाद और दलाई लामा: अक्साई चिन में सड़क निर्माण और 1959 में दलाई लामा को भारत में शरण देने से चीन के साथ संबंध बिगड़े।
  • फॉरवर्ड पॉलिसीका दांव: सीमावर्ती क्षेत्रों में भारतीय चौकियाँ स्थापित करने की ‘फॉरवर्ड पॉलिसी’ ने चीनी आक्रामकता को और अधिक उत्तेजित किया।
  • चीन का अचानक हमला (1962): अक्टूबर 1962 में चीन ने नेफा (अरुणाचल प्रदेश) और लद्दाख में भारत पर एक साथ अचानक सैन्य आक्रमण कर दिया।
  • सामरिक और सैन्य पराजय: अपर्याप्त हथियारों, गर्म कपड़ों की कमी और खराब सैन्य योजना के कारण भारतीय सेना को भारी क्षति झेलनी पड़ी।
  • अक्साई चिन पर अवैध कब्जा: युद्ध विराम के बाद चीन ने लद्दाख के लगभग 38,000 वर्ग किमी अक्साई चिन क्षेत्र पर अवैध कब्जा बनाए रखा।
  • गुटनिरपेक्षता को झटका: संकट के समय भारत को अमेरिका और ब्रिटेन से सैन्य सहायता मांगनी पड़ी, जिससे गुटनिरपेक्षता की सीमाएं उजागर हुईं।
  • अविश्वास प्रस्ताव और रक्षा मंत्री का इस्तीफा: संसद में पहली बार अविश्वास प्रस्ताव लाया गया और रक्षा मंत्री वी.के. कृष्ण मेनन को इस्तीफा देना पड़ा।
  • रक्षा आधुनिकीकरण पर ध्यान: युद्ध के बाद भारतीय सैन्य बुनियादी ढांचे, खुफिया एजेंसियों और रक्षा बजट के तेजी से आधुनिकीकरण की शुरुआत हुई।
  • चीन-पाकिस्तान धुरी का निर्माण: इस युद्ध ने चीन और पाकिस्तान को करीब ला दिया, जिससे भारत के सामने ‘द्वि-स्तरीय रणनीतिक चुनौती’ उत्पन्न हुई।

भारत-पाक युद्ध एवं भू-राजनीतिक बदलाव (Indo-Pak Wars & Geopolitical Shifts)

1965 का भारत-पाकिस्तान युद्ध और ताशकंद घोषणापत्र

  • ऑपरेशन गिब्रार्टर (1965): पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर में अशांति फैलाने के उद्देश्य से हजारों गुप्त घुसपैठियों को भारतीय क्षेत्र में भेजा।
  • भारतीय जवाबी कार्रवाई: लाल बहादुर शास्त्री के नेतृत्व में भारतीय सेना ने लाहौर और सियालकोट क्षेत्र में दूसरा मोर्चा खोल दिया।
  • जय जवान, जय किसानका नारा: शास्त्रीजी के इस अमर नारे ने युद्ध के दौरान देश की सेना और किसानों में अभूतपूर्व ऊर्जा भरी।
  • संयुक्त राष्ट्र का युद्धविराम: सितंबर 1965 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के हस्तक्षेप के बाद दोनों देशों के मध्य युद्धविराम लागू हुआ।
  • ताशकंद सम्मेलन (1966): सोवियत संघ की मध्यस्थता में ताशकंद में लाल बहादुर शास्त्री और अय्यूब खान के बीच ऐतिहासिक वार्ता हुई।
  • ताशकंद घोषणापत्र (10 जनवरी 1966): दोनों देश जीती हुई ज़मीन वापस लौटाने और विवादों को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने पर सहमत हुए।
  • शास्त्रीजी का असामयिक निधन: ताशकंद समझौते पर हस्ताक्षर करने के कुछ ही घंटों बाद ताशकंद में शास्त्रीजी का रहस्यमय निधन हो गया।

1971 का युद्ध और बांग्लादेश की मुक्ति (Liberation of Bangladesh)

  • पूर्वी पाकिस्तान में संकट: मुजीबुर रहमान की अवामी लीग की चुनावी जीत को खारिज करने पर पूर्वी पाकिस्तान में भारी असंतोष फैला।
  • ऑपरेशन सर्चलाइट: पाकिस्तानी सेना ने पूर्वी पाकिस्तान में भयंकर नरसंहार किया, जिससे लगभग 1 करोड़ शरणार्थी भारत भागकर आ गए।
  • मुक्ति वाहिनी का सहयोग: भारत ने पूर्वी पाकिस्तान के स्वतंत्रता सेनानियों ‘मुक्ति वाहिनी’ को सैन्य प्रशिक्षण और कूटनीतिक सहायता प्रदान की।
  • भारत-सोवियत शांति संधि (1971): अमेरिका-चीन-पाक धुरी का मुकाबला करने हेतु भारत ने सोवियत संघ के साथ 20-वर्षीय ऐतिहासिक संधि की।
  • पाकिस्तान का पूर्व-खाली हमला: 3 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान ने भारतीय हवाई अड्डों पर अचानक हमला कर औपचारिक युद्ध की शुरुआत की।
  • मानकशॉ का कुशल नेतृत्व: सैम मानकशॉ के नेतृत्व में भारतीय थल, जल और वायु सेना ने दोतरफा मोर्चे पर शानदार रणनीति बनाई।
  • ऐतिहासिक आत्मसमर्पण (16 दिसंबर 1971): ढाका में जनरल नियाजी ने 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों के साथ भारतीय सेना के सामने बिना शर्त आत्मसमर्पण किया।
  • बांग्लादेश का उदय: 13 दिनों के इस युद्ध के बाद पूर्वी पाकिस्तान आजाद हुआ और एक नया राष्ट्र ‘बांग्लादेश’ मानचित्र पर उभरा।

शिमला समझौता – 1972 (Shimla Agreement)

  • शिमला सम्मेलन (जुलाई 1972): प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तानी राष्ट्रपति ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो के बीच शिमला में शिखर वार्ता आयोजित हुई।
  • द्विपक्षीयता का सिद्धांत: दोनों देश इस बात पर सहमत हुए कि सभी विवाद (कश्मीर सहित) केवल द्विपक्षीय बातचीत से सुलझाए जाएंगे।
  • नियंत्रण रेखा (LoC) का निर्धारण: 17 दिसंबर 1971 की युद्धविराम रेखा को दोनों देशों ने ‘नियंत्रण रेखा’ (LoC) के रूप में स्वीकार किया।
  • युद्धबंदियों की रिहाई: भारत ने सद्भावना के तौर पर पाकिस्तान के 93,000 युद्धबंदियों (PoWs) और विजित क्षेत्र को वापस लौटा दिया।
  • दक्षिण एशिया में भू-राजनीतिक बदलाव: 1971 की जीत ने भारत को दक्षिण एशिया की निर्विवाद और प्रमुख क्षेत्रीय शक्ति (Regional Power) बना दिया।

आपातकाल (1975-1977): पृष्ठभूमि, जेपी आंदोलन और लोकतंत्र की वापसी

संवैधानिक, राजनीतिक और सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि

  • आर्थिक संकट व मुद्रास्फीति: 1971 के युद्ध, शरणार्थी संकट और 1973 के तेल संकट से देश में भयंकर महंगाई व बेरोजगारी फैली।
  • गुजरात का नवनिर्माण आंदोलन (1974): भ्रष्टाचार और खाद्यान्न संकट के खिलाफ छात्रों के उग्र आंदोलन ने राज्य सरकार को गिराने पर मजबूर किया।
  • बिहार छात्र आंदोलन: गुजरात से प्रेरित होकर बिहार के छात्रों ने भ्रष्टाचार और शिक्षा प्रणाली में सुधार हेतु व्यापक विरोध प्रदर्शन शुरू किया।
  • रेल हड़ताल (1974): जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में 21 दिनों की राष्ट्रव्यापी रेल हड़ताल ने देश की अर्थव्यवस्था को ठप कर दिया।
  • संवैधानिक प्रावधान (अनुच्छेद 352): 25 जून 1975 की रात ‘आंतरिक अशांति’ के आधार पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने आपातकाल घोषित किया।

न्यायपालिका बनाम संसद और संवैधानिक विवाद

  • बैंक राष्ट्रीयकरण व प्रिवी पर्स मामले: आर.सी. कूपर और माधवराव सिंधिया मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार के फैसलों को रद्द किया।
  • केशवानंद भारती मामला (1973): उच्चतम न्यायालय ने ऐतिहासिक निर्णय देते हुए ‘संविधान के मूल ढांचे’ (Basic Structure) का सिद्धांत प्रतिपादित किया।
  • मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति विवाद: 1973 में तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों की अनदेखी कर ए.एन. राय को भारत का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया।
  • इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला (1975): न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी के 1971 के रायबरेली चुनाव को अवैध घोषित कर दिया।
  • एडीएम जबलपुर मामला (1976): सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि आपातकाल के दौरान नागरिकों का ‘जीवन का अधिकार’ (अनुच्छेद 21) भी निलंबित रहता है।
  • 42वां संविधान संशोधन (1976): इसे ‘मिनी संविधान’ कहा गया, जिसने संसद की शक्तियां बढ़ाईं और न्यायपालिका के अधिकारों में भारी कटौती की।

जेपी आंदोलन और सम्पूर्ण क्रांति (JP Movement)

  • जयप्रकाश नारायण का नेतृत्व: स्वतंत्रता सेनानी जेपी ने सक्रिय राजनीति में वापसी कर छात्र आंदोलन की कमान अपने हाथों में ली।
  • सम्पूर्ण क्रांति का आह्वान: जेपी ने पटना के गांधी मैदान में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था बदलने हेतु ‘सम्पूर्ण क्रांति’ का नारा दिया।
  • सत्याग्रह और नागरिक असंतोष: जेपी ने सेना, पुलिस और सरकारी कर्मचारियों से सरकार के गैर-कानूनी आदेश न मानने का आह्वान किया।
  • विपक्षी दलों की लामबंदी: जनसंघ, कांग्रेस (ओ), सोशलिस्ट पार्टी और लोकदल जैसे गैर-साम्यवादी दल जेपी के मंच पर एकजुट हुए।

आपातकाल के प्रभाव और 1977 में लोकतंत्र की वापसी

  • नागरिक अधिकारों का निलंबन: मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए; मीसा (MISA) कानून के तहत शीर्ष विपक्षी नेताओं को जेल भेजा गया।
  • प्रेस पर सेंसरशिप: समाचार पत्रों पर कड़ी पूर्व-सेंसरशिप (Pre-censorship) थोपी गई और सरकार विरोधी आवाजों का दमन किया गया।
  • संजय गांधी का 5-सूत्रीय कार्यक्रम: जबरन नसबंदी अभियान और दिल्ली के तुर्कमान गेट पर अंधाधुंध बुलडोजर कार्रवाई से भारी जन-आक्रोश फैला।
  • जनता पार्टी का गठन (1977): चुनाव की घोषणा होते ही प्रमुख विपक्षी दलों ने विलय कर ‘जनता पार्टी’ का ऐतिहासिक गठन किया।
  • 1977 के चुनाव और लोकतंत्र की जीत: जनता पार्टी ने प्रचंड जीत हासिल की; मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनी।

क्षेत्रीय असंतोष और समझौता राजनीति (Regional Unrest and Accord Politics)

पंजाब संकट और ऑपरेशन ब्लू स्टार (Punjab Crisis & Operation Blue Star)

  • आनंदपुर साहिब प्रस्ताव (1973): अकाली दल ने पंजाब के लिए अधिक स्वायत्तता और केंद्र-राज्य संबंधों के पुनर्गठन की मांग प्रस्तुत की।
  • उग्रवाद का अभ्युदय: जरनैल सिंह भिंडरावाले के नेतृत्व में कट्टरपंथी ताकतों के उभार से पंजाब में हिंसक उग्रवाद शुरू हुआ।
  • धर्म युद्ध मोर्चा (1982): अकालियों और भिंडरावाले के गुट ने स्वायत्तता मांगों के समर्थन में राज्यव्यापी व्यापक आंदोलन छेड़ा।
  • स्वर्ण मंदिर पर कब्जा: उग्रवादियों ने अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर परिसर को सशस्त्र किले में तब्दील कर अपनी गतिविधियों का केंद्र बनाया।
  • ऑपरेशन ब्लू स्टार (जून 1984): मंदिर परिसर से सशस्त्र उग्रवादियों को बाहर निकालने हेतु भारतीय सेना ने सैन्य कार्रवाई की।
  • अकाल तख्त को क्षति: सैन्य कार्रवाई के दौरान स्वर्ण मंदिर परिसर और अकाल तख्त को भारी नुकसान पहुँचा, जिससे सिख समुदाय आहत हुआ।
  • इंदिरा गांधी की हत्या (अक्टूबर 1984): ऑपरेशन ब्लू स्टार के प्रतिशोध में उनके सिख अंगरक्षकों द्वारा प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई।
  • 1984 के सिख विरोधी दंगे: हत्या के बाद दिल्ली और उत्तरी भारत के कई शहरों में भीषण सिख विरोधी दंगे भड़क उठे।

राजीव-लौंगोवाल समझौता / पंजाब समझौता (Punjab Accord – 1985)

  • पंजाब समझौता (जुलाई 1985): प्रधानमंत्री राजीव गांधी और अकाली दल के संत हरचंद सिंह लौंगोवाल के बीच शांति समझौता हुआ।
  • चंडीगढ़ का हस्तांतरण: समझौते में चंडीगढ़ को पंजाब को सौंपने और हरियाणा के लिए नई राजधानी हेतु धनराशि देने का वादा था।
  • नदी जल बंटवारा: रावी-ब्यास नदियों के पानी के बंटवारे के विवादित मुद्दे को न्यायाधिकरण (Tribunal) को सौंपने पर सहमति बनी।
  • दंगों की जाँच व राहत: 1984 के दंगों की पीड़ितों को पुनर्वास देने और घटनाओं की निष्पक्ष न्यायिक जाँच कराने का वादा किया गया।

असम आंदोलन और असम समझौता (Assam Movement & Accord – 1985)

  • असम आंदोलन (1979-1985): ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) ने बांग्लादेशी अवैध घुसपैठियों की पहचान व निर्वासन हेतु विशाल आंदोलन चलाया।
  • नेल्ली नरसंहार (1983): चुनाव के दौरान नेल्ली क्षेत्र में हुई भीषण सांप्रदायिक हिंसा ने राज्य को भारी अशांति में ढकेल दिया।
  • असम समझौता (अगस्त 1985): केंद्र सरकार, असम सरकार और AASU नेताओं के बीच ऐतिहासिक समझौते पर औपचारिक दस्तखत किए गए।
  • 1971 की कट-ऑफ तारीख: तय हुआ कि 25 मार्च 1971 के बाद आए अवैध अप्रवासियों की पहचान कर उन्हें निर्वासित किया जाएगा।

मिजोरम संकट और मिजो शांति समझौता (Mizoram Accord – 1986)

  • MNF का विद्रोह (1966): लालडेंगा के नेतृत्व में मिजो नेशनल फ्रंट (MNF) ने भारत से अलग होने हेतु सशस्त्र विद्रोह छेड़ा था।
  • मिजोरम शांति समझौता (जून 1986): केंद्र सरकार और लालडेंगा के बीच दो दशक लंबे उग्रवाद को समाप्त करने वाला ऐतिहासिक समझौता हुआ।
  • उग्रवाद का समर्पण: MNF ने हिंसा का मार्ग त्याग कर हथियारों के साथ भारतीय संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ ली।
  • पूर्ण राज्यत्व (1987): समझौते के तहत 1987 में मिजोरम को भारत का 23वाँ पूर्ण राज्य बनाकर शांति बहाल की गई।

केंद्र-राज्य संबंध और संस्थागत विकास (Centre-State Relations & Institutional Evolution)

अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) का दुरुपयोग और न्यायिक नियंत्रण

  • अनुच्छेद 356 का मूल स्वरूप: डॉ. अंबेडकर ने इसे ‘मृत पत्र’ (Dead Letter) कहा था, जिसका प्रयोग केवल अंतिम विकल्प के रूप में होना था।
  • राजनीतिक दुरुपयोग का इतिहास: 1950 से 1990 के बीच केंद्र में सत्तारूढ़ सरकारों द्वारा विपक्षी दलों की राज्य सरकारों को गिराने हेतु 100 से अधिक बार प्रयोग हुआ।
  • 1977 और 1980 की बर्खास्तगियाँ: 1977 में जनता पार्टी और 1980 में कांग्रेस सरकार ने राजनीतिक बदले के तहत एक साथ 9-9 राज्यों की सरकारें बर्खास्त कीं।
  • एस.आर. बोम्मई मामला (1994): उच्चतम न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसला देकर राष्ट्रपति शासन को ‘न्यायिक समीक्षा’ (Judicial Review) के अधीन लाया।
  • विधानसभा में बहुमत का परीक्षण: बोम्मई निर्णय ने तय किया कि सरकार के बहुमत का परीक्षण केवल ‘विधानसभा के पटल’ (Floor Test) पर ही होगा।
  • धर्मनिरपेक्षता और संवैधानिक तंत्र: बोम्मई फैसले में धर्मनिरपेक्षता को संविधान का ‘मूल ढांचा’ माना गया, जिसके उल्लंघन पर अनुच्छेद 356 वैध ठहराया गया।

सरकारीया आयोग (Sarkaria Commission – 1983)

  • आयोग का गठन (1983): केंद्र-राज्य संबंधों की समीक्षा हेतु न्यायमूर्ति रंजीत सिंह सरकारीया की अध्यक्षता में 3-सदस्यीय आयोग गठित हुआ।
  • अनुच्छेद 356 पर सिफारिश: सिफारिश की कि अनुच्छेद 356 का प्रयोग अत्यधिक दुर्लभ परिस्थितियों में केवल ‘अंतिम विकल्प’ के रूप में ही किया जाए।
  • राज्यपाल पद की गरिमा: राज्यपाल के रूप में किसी गैर-राजनीलीय, निष्पक्ष और सम्मानित व्यक्ति को नियुक्त करने की जोरदार वकालत की।
  • मुख्यमंत्री से परामर्श: राज्यपाल की नियुक्ति से पहले संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री से अनिवार्य रूप से परामर्श करने की सलाह दी।
  • अंतर-राज्य परिषद (Article 263): केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय हेतु अनुच्छेद 263 के तहत स्थायी ‘अंतर-राज्य परिषद’ गठित करने का सुझाव दिया।
  • समवर्ती सूची पर परामर्श: समवर्ती सूची (Concurrent List) के विषयों पर कानून बनाने से पहले केंद्र द्वारा राज्यों से परामर्श करना अनिवार्य बताया।

पुंछी आयोग (Punchhi Commission – 2007)

  • आयोग की स्थापना (2007): न्यायमूर्ति मदन मोहन पुंछी की अध्यक्षता में बदलते सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य में केंद्र-राज्य संबंधों पर आयोग बना।
  • स्थानिक आपातकाल (Local Emergency): पूरे राज्य के बजाय केवल उपद्रव ग्रस्त जिले या क्षेत्र में ‘स्थानिक राष्ट्रपति शासन’ लगाने की सिफारिश की।
  • राज्यपाल का महाभियोग: राज्यपालों को राजनीतिक इच्छा से हटाने पर रोक हेतु महाभियोग (Impeachment) जैसी निश्चित संवैधानिक प्रक्रिया का प्रस्ताव रखा।
  • राज्यपाल की 5-वर्षीय समयावधि: राज्यपालों का 5 वर्ष का कार्यकाल सुनिश्चित करने और केंद्रीय मंत्रियों की तरह स्वेच्छा से न हटाने का सुझाव दिया।
  • विश्वविद्यालय के कुलाधिपति का पद: राज्यपालों को राज्य विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति (Chancellor) पद के वैधानिक दायित्वों से मुक्त रखने की सिफारिश की।

सहयोगात्मक और प्रतिस्पर्धी संघवाद का विकास (Cooperative Federalism)

  • जीएसटी परिषद (GST Council): 101वें संविधान संशोधन द्वारा गठित जीएसटी परिषद सहयोगात्मक संघवाद और साझा कर-प्रभुत्व का सबसे बड़ा उदाहरण है।
  • नीति आयोग की शासी परिषद: योजना आयोग के विपरीत नीति आयोग ने मुख्यमंत्रियों को ‘टीम इंडिया’ के रूप में राष्ट्रीय नीति-निर्माण में भागीदार बनाया।
  • सशक्त अंतर-राज्यीय निकाय: अंतर-राज्य परिषद, क्षेत्रीय परिषदों और वित्त आयोग के सुदृढ़ीकरण से भारत ‘सशक्त केंद्र-सशक्त राज्य’ के मॉडल की ओर बढ़ा।

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