फ्रांसीसी बस्तियों (French Enclaves) का कूटनीतिक विलय
फ्रांसीसी बस्तियों का दायरा: स्वतंत्रता के समय फ्रांस के पास पुदुचेरी, कराइकल, माहे, यनम और चंद्रनगर (बंगाल) की बस्तियां मौजूद थीं।
नेहरू-रामदियर संयुक्त घोषणा (1948): भारत और फ्रांस ने सहमति व्यक्त की कि इन बस्तियों का भविष्य लोकतांत्रिक जनमत संग्रह से तय होगा।
चंद्रनगर का विलय (1949–1952): जून 1949 के जनमत संग्रह में भारी मतों से पक्ष में वोट मिलने पर चंद्रनगर 1952 में औपचारिक रूप से भारत में मिला।
कीजूर जनमत संग्रह (1954): 18 अक्टूबर 1954 को कीजूर में चुने गए प्रतिनिधियों ने सर्वसम्मति से भारत में विलय का ऐतिहासिक निर्णय लिया।
डी-फैक्टो (प्रशासनिक) हस्तांतरण: 1 नवंबर 1954 को फ्रांस ने पुदुचेरी, कराइकल, माहे और यनम का प्रशासनिक नियंत्रण भारत को सौंप दिया।
डी-ज्यूर (कानूनी) हस्तांतरण (1962): फ्रांसीसी संसद की मंजूरी के बाद 16 अगस्त 1962 को संधि के संप्रभु हस्तांतरण की प्रक्रिया पूर्ण हुई।
14वां संविधान संशोधन (1962): 14वें संवैधानिक संशोधन द्वारा इन फ्रांसीसी क्षेत्रों को मिलाकर केंद्र शासित प्रदेश ‘पुदुचेरी’ का गठन किया गया।
शांतिपूर्ण कूटनीति का उदाहरण: फ्रांसीसी बस्तियों का एकीकरण पुर्तगाली बस्तियों के विपरीत पूरी तरह से शांतिपूर्ण कूटनीति और द्विपक्षीय वार्ताओं से हुआ।
दादरा और नगर हवेली का एकीकरण (Dadra & Nagar Haveli – 1954)
पुर्तगाली तानाशाही का अड़ियल रुख: पुर्तगाल के तानाशाह एंटोनियो सालाजार ने गोवा और अन्य बस्तियों को भारत को सौंपने से साफ इनकार कर दिया।
स्थानीय जन-विद्रोह (1954): यूनाइटेड फ्रंट ऑफ गोअन्स और आजाद गोमंतक दल के स्वयंसेवकों ने पुर्तगाली अधिकारियों को खदेड़ दिया।
स्वतंत्र प्रशासन (1954–1961): 1954 में आजाद होने के बाद 1961 तक दादरा और नगर हवेली का प्रशासन एक स्वशासी वरिष्ठ परिषद ने चलाया।
10वां संविधान संशोधन (1961): 10वें संशोधन अधिनियम 1961 द्वारा दादरा और नगर हवेली को भारत का केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया।
गोवा, दमन और दीव का सैन्य एकीकरण (Goa, Daman & Diu – Operation Vijay)
गोवा सत्याग्रह (1955): भारत के विभिन्न हिस्सों से आए अहिंसक सत्याग्रहियों पर पुर्तगाली पुलिस ने गोलियां चलाईं, जिससे कई शहीद हुए।
अंतरराष्ट्रीय न्याय अदालत (ICJ): पुर्तगाल ने भारत के खिलाफ द हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय अदालत का रुख किया, लेकिन वहां भी भारत का पलड़ा भारी रहा।
नाटो (NATO) का कूटनीतिक दबाव: पुर्तगाल ने अपने नाटो गठबंधन का हवाला देकर भारत को डराने की कोशिश की, जिसे नेहरू ने खारिज कर दिया।
ऑपरेशन विजय (दिसंबर 1961): राजनयिक विफलता के बाद 17-18 दिसंबर 1961 को भारतीय सशस्त्र बलों ने ‘ऑपरेशन विजय’ (सैन्य कार्रवाई) शुरू किया।
पुर्तगाली सेना का समर्पण: 36 घंटे से भी कम समय में पुर्तगाली गवर्नर-जनरल मैनुअल वासालो ए सिल्वा ने 19 दिसंबर 1961 को आत्मसमर्पण किया।
गोवा मुक्ति दिवस (19 दिसंबर): 19 दिसंबर 1961 को गोवा, दमन और दीव पूरी तरह से आजाद होकर भारतीय संघ का हिस्सा बने।
12वां संविधान संशोधन (1962): 12वें संविधान संशोधन द्वारा गोवा, दमन और दीव को मिलाकर एक केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया।
गोवा को पूर्ण राज्यत्व (1987): मई 1987 में गोवा को भारत का 25वां पूर्ण राज्य बनाया गया, जबकि दमन और दीव केंद्र शासित प्रदेश बने रहे।
राजभाषा विवाद और क्षेत्रीय आंदोलन (The Official Language Controversy)
संवैधानिक प्रावधान और शुरुआती गतिरोध (Constitutional Provisions)
अनुच्छेद 343 का प्रावधान: संविधान ने हिंदी को संघ की राजभाषा घोषित किया और अंग्रेजी का प्रयोग 15 वर्षों (1965 तक) के लिए तय किया।
गैर-हिंदी राज्यों में आशंका: दक्षिण और पूर्वी राज्यों को डर था कि 1965 के बाद अंग्रेजी हटने से सरकारी नौकरियों में भेदभाव होगा।
नेहरू का आश्वासन (1959): प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने संसद में आश्वासन दिया कि गैर-हिंदी भाषियों की इच्छा तक अंग्रेजी राजभाषा बनी रहेगी।
आधिकारिक भाषा आयोग (1955): बी.जी. खेर आयोग ने हिंदी के क्रमिक प्रयोग की सिफारिश की, जिससे गैर-हिंदी राज्यों में विरोध और भड़का।
राजभाषा अधिनियम 1963 और 1965 का संकट (Official Languages Act)
राजभाषा अधिनियम 1963: संसद ने कानून बनाया कि 1965 के बाद भी अनिश्चितकाल तक सरकारी कामकाज में अंग्रेजी का प्रयोग जारी रह सकता है।
शब्द ‘May’ पर विवाद: कानून में ‘शैल’ (Shall) के स्थान पर ‘मे’ (May) शब्द होने से गैर-हिंदी राज्यों को सरकारी मंशा पर संशय हुआ।
1965 का हिंदी विरोधी आंदोलन: 26 जनवरी 1965 को हिंदी को एकमात्र राजभाषा बनाने की संवैधानिक समय-सीमा खत्म होते ही तमिलनाडु में हिंसक आंदोलन भड़का।
द्रमुक (DMK) की मुख्य भूमिका: सी.एन. अन्नादुरई और द्रमुक ने ‘हिंदी थोपने’ के विरोध में तमिलनाडु में विशाल छात्र आंदोलनों का नेतृत्व किया।
आत्मदाह और हिंसा: कई तमिल युवाओं ने हिंदी विरोध में आत्मदाह किया; केंद्रीय मंत्रियों (सी. सुब्रमण्यम) ने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया।
शास्त्री सरकार का रुख: लाल बहादुर शास्त्री ने नेहरू के आश्वासन को दोहराया और त्रि-भाषा सूत्र (Three-Language Formula) को सख्ती से लागू करने का निर्णय लिया।
राजभाषा (संशोधन) अधिनियम 1967 (Official Languages Amendment Act)
1967 का संशोधन अधिनियम: इंदिरा गांधी सरकार ने राजभाषा अधिनियम में संशोधन कर नेहरू के वादे को वैधानिक (संवैधानिक) रूप से सुरक्षित कर दिया।
द्वि-भाषी नीति (Bilingualism): व्यवस्था की गई कि जब तक सभी गैर-हिंदी भाषी राज्य सहमत न हों, तब तक अंग्रेजी सह-राजभाषा (Associate Language) बनी रहेगी।
संकल्प (Resolution) 1968: संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की परीक्षाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल सभी भाषाओं में कराने की अनुमति दी।
आठवीं अनुसूची का विकास (Evolution of the Eighth Schedule)
मूल संविधान में 14 भाषाएँ: 1950 में संविधान लागू होने के समय आठवीं अनुसूची में केवल 14 आधिकारिक भाषाएँ शामिल थीं।
21वाँ संशोधन (1967): इस संवैधानिक संशोधन अधिनियम द्वारा ‘सिंधी’ भाषा को आठवीं अनुसूची में 15वीं भाषा के रूप में जोड़ा गया।
71वाँ संशोधन (1992): इस संशोधन द्वारा तीन अन्य भाषाओं—कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया।
92वाँ संशोधन (2003): 92वें संशोधन द्वारा चार भाषाओं—बोडो, डोगरी, मैथिली और संथाली को इसमें जोड़ा गया।
कुल 22 भाषाएँ: इन संशोधनों के बाद वर्तमान में संविधान की आठवीं अनुसूची में सूचीबद्ध भाषाओं की कुल संख्या बढ़कर 22 हो गई है।
शास्त्रीय भाषा (Classical Language) का दर्जा: सरकार ने तमिल (2004), संस्कृत, कन्नड़, तेलुगु, मलयालम, उड़िया, पाली, प्राकृत और मराठी को शास्त्रीय दर्जा दिया।
संसदीय और भाषाई संतुलन: राजभाषा विवाद के समाधान ने भारतीय संघवाद में सांस्कृतिक पहचान की रक्षा करते हुए राष्ट्रीय अखंडता को मजबूत किया।