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रोलट एक्ट, जलियांवाला बाग और खिलाफत आंदोलन (1919–1934)

मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार / भारत सरकार अधिनियम 1919

  • प्रांतों में द्वैध शासन (Dyarchy): प्रांतीय विषयों को ‘आरक्षित’ (Reserved) और ‘हस्तांतरित’ (Transferred) वर्गों में बांटकर द्वैध शासन लागू किया गया।
  • द्विसदनीय विधायिका: केंद्र में पहली बार द्विसदनीय विधायिका (राज्य परिषद और केंद्रीय विधानसभा) का गठन किया गया।
  • पृथक निर्वाचन का विस्तार: साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली का विस्तार कर सिखों, ईसाइयों, एंग्लो-इंडियन्स और यूरोपियों को भी शामिल किया गया।
  • प्रत्यक्ष मताधिकार: पहली बार सीमित प्रत्यक्ष मताधिकार दिया गया, जो संपत्ति, कर और शिक्षा की अर्हता पर आधारित था।

रोलट एक्ट और रोलट सत्याग्रह (1919)

  • रोलट एक्ट (काला कानून): सर सिडनी रोलट की सिफारिश पर पारित कानून, जिसमें बिना मुकदमे के दो साल जेल का प्रावधान था।
  • न अपील, न दलील, न वकील”: इस दमनकारी कानून को भारतीयों ने नागरिक स्वतंत्रता पर हमला मानकर इसका तीव्र विरोध किया।
  • रोलट सत्याग्रह: महात्मा गांधी ने इस कानून के खिलाफ 6 अप्रैल 1919 को देशव्यापी हड़ताल और सत्याग्रह का आह्वान किया।
  • अखिल भारतीय विरोध: यह गांधीजी द्वारा पूरे देश के स्तर पर आयोजित पहला संगठित जन-आंदोलन साबित हुआ।

जलियांवाला बाग हत्याकांड (13 अप्रैल 1919)

  • नेताओं की गिरफ्तारी: पंजाब के लोकप्रिय नेताओं डॉ. सैफुद्दीन किचलू और डॉ. सत्यपाल की गिरफ्तारी के विरोध में तनाव बढ़ा।
  • बैसाखी के दिन सभा: 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में शांतिपूर्ण जनसभा का आयोजन किया गया था।
  • जनरल डायर का बर्बर कृत्य: ब्रिगेडियर जनरल रेजिनॉल्ड डायर ने बाग के एकमात्र निकास मार्ग को रोककर निहत्थी भीड़ पर गोलियां चलवाईं।
  • सरकारी बनाम वास्तविक आंकड़े: सरकारी हंटर कमेटी ने 379 मौतें बताईं, जबकि कांग्रेस जांच समिति के अनुसार 1000 से अधिक लोग शहीद हुए।
  • उपाधियों का त्याग: इस बर्बरता के विरोध में रवींद्रनाथ टैगोर ने अपनी ‘नाइटहुड’ और गांधीजी ने ‘कैसर-ए-हिंद’ उपाधि लौटा दी।
  • हंटर आयोग की विफलता: ब्रिटिश सरकार के हंटर आयोग द्वारा जनरल डायर का बचाव करने से भारतीयों का गुस्सा और बढ़ गया।

खिलाफत आंदोलन और राष्ट्रीय धारा में विलय (1919–1920)

  • ओटोमन साम्राज्य और खलीफा: प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की की हार के बाद खलीफा के पद को समाप्त करने का संकट उत्पन्न हुआ।
  • अली बंधु और खिलाफत कमेटी: शौकत अली और मोहम्मद अली (अली बंधुओं) ने भारत में खिलाफत आंदोलन की कमान संभाली।
  • अखिल भारतीय खिलाफत सम्मेलन (1919): दिल्ली में हुए सम्मेलन के अध्यक्ष महात्मा गांधी चुने गए, जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ असहयोग का सुझाव दिया।
  • हिंदू-मुस्लिम एकता का अवसर: गांधीजी ने खिलाफत मुद्दे को ब्रिटिश शासन के खिलाफ हिंदू-मुस्लिम एकता कायम करने का स्वर्णिम अवसर माना।
  • असहयोग आंदोलन में विलय: अगस्त 1920 में खिलाफत आंदोलन को औपचारिक रूप से कांग्रेस के असहयोग आंदोलन से जोड़ दिया गया।
  • ऐतिहासिक प्रभाव: इस घटनाक्रम ने औपनिवेशिक शासन के खिलाफ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक अभूतपूर्व जन-आंदोलन में बदल दिया।

असहयोग आंदोलन (1920–1922) और स्वराज्यवादी चरण

असहयोग आंदोलन की रणनीति और प्रसार (Mass Mobilization & Boycott)

  • नागपुर अधिवेशन (1920): सी. विजयराघवाचारी की अध्यक्षता में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में असहयोग आंदोलन के प्रस्ताव को ऐतिहासिक स्वीकृति मिली।
  • लक्ष्य में बदलाव: कांग्रेस ने अपने संविधान में संशोधन कर ‘संवैधानिक साधनों से स्वशासन’ के स्थान पर ‘शांतिपूर्ण तरीकों से स्वराज’ का लक्ष्य रखा।
  • उपाधियों का समर्पण: गांधीजी ने ‘कैसर-ए-हिंद’ और जमुनालाल बजाज ने ‘रायबहादुर’ जैसी ब्रिटिश उपाधियां व पदक सरकार को वापस लौटा दिए।
  • सरकारी संस्थानों का बहिष्कार: विद्यार्थियों ने ब्रिटिश स्कूल-कॉलेज छोड़े तथा वकीलों (नेहरू, पटेल, सी.आर. दास) ने अदालतों का बहिष्कार किया।
  • विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार: विदेशी कपड़ों की सार्वजनिक होली जलाई गई तथा ताड़ी-शराब की दुकानों पर महिलाओं द्वारा धरना दिया गया।
  • स्वदेशी और रचनात्मक कार्य: राष्ट्रीय विद्यापीठों (काशी, बिहार विद्यापीठ) की स्थापना, चरखे का प्रचार और तिलक स्वराज फंड (1 करोड़ रु.) बनाया गया।
  • प्रिंस ऑफ वेल्स का विरोध (1921): नवंबर 1921 में प्रिंस ऑफ वेल्स के भारत आगमन पर देशव्यापी हड़ताल और काले झंडे दिखाकर विरोध हुआ।
  • अभूतपूर्व जन-भागीदारी: पहली बार किसान, मजदूर, महिलाएं, छात्र और व्यापारी एक साथ मिलकर किसी राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हुए।
  • असम और चाय बागान हड़ताल: असहयोग का असर फैला; असम के चाय बागान मजदूरों तथा रेलवे कर्मचारियों ने बड़े पैमाने पर हड़तालें कीं।
  • अवध और मोपला किसान आंदोलन: यूपी में बाबा रामचंद्र के नेतृत्व में अवध किसान आंदोलन और केरल में मोपला विद्रोह इसी दौरान हुए।

चौरी-चौरा कांड और आंदोलन का स्थगन (Chauri Chaura & Suspension)

  • चौरी-चौरा की घटना (5 फरवरी 1922): गोरखपुर के चौरी-चौरा में उग्र भीड़ ने पुलिस की बर्बरता के जवाब में थाने में आग लगाकर 22 पुलिसकर्मी मार दिए।
  • बारडोली प्रस्ताव (12 फरवरी 1922): हिंसा से दुखी होकर गांधीजी ने कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में असहयोग आंदोलन को तुरंत स्थगित करने की घोषणा की।
  • गांधीजी की गिरफ्तारी: मार्च 1922 में गांधीजी को गिरफ्तार कर 6 साल की सजा सुनाई गई; न्यायाधीश ब्रूमफील्ड ने सम्मानजनक टिप्पणी की थी।
  • नेताओं में निराशा: आंदोलन वापस लेने से सुभाष चंद्र बोस, जवाहरलाल नेहरू और मोतीलाल नेहरू जैसे नेताओं में भारी निराशा और आक्रोश फैला।

स्वराज पार्टी और स्वराज्यवादी चरण (Swarajist Phase)

  • गया अधिवेशन (1922): विधान परिषदों में प्रवेश को लेकर कांग्रेस ‘परिवर्तनवादी’ (Pro-changers) और ‘अपरिवर्तनवादी’ (No-changers) गुटों में बंट गई।
  • स्वराज पार्टी की स्थापना (1 जनवरी 1923): सी.आर. दास (अध्यक्ष) और मोतीलाल नेहरू (सचिव) ने मिलकर ‘कांग्रेस-खिलाफत स्वराज पार्टी’ का गठन किया।
  • परिवर्तनवादी (Pro-changers) का तर्क: परिषदों के भीतर प्रवेश कर ब्रिटिश नीतियों का गतिरोध करना और औपनिवेशिक तंत्र को बेनकाब करना मुख्य उद्देश्य था।
  • अपरिवर्तनवादी (No-changers) का रुख: पटेल, राजेंद्र प्रसाद और राजाजी ने परिषदों का विरोध कर गांधीवादी रचनात्मक कार्यों पर ध्यान केंद्रित करने की वकालत की।
  • 1923 चुनावों में सफलता: स्वराजियों ने केंद्रीय विधान परिषद की 101 में से 42 सीटों पर शानदार जीत हासिल कर सरकार को चौंका दिया।
  • विठ्ठलभाई पटेल का चुनाव (1925): विठ्ठलभाई पटेल केंद्रीय विधान परिषद के पहले भारतीय अध्यक्ष (स्पीकर) चुने गए, जो स्वराजियों की बड़ी सफलता थी।

1920 और 1930 के दशक में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद

HRA (हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन) और HSRA (हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन) का गठन और वैचारिक परिवर्तन

  • HRA की स्थापना (1924): राम प्रसाद बिस्मिल, सचिंद्रनाथ सान्याल और योगेश चंद्र चटर्जी ने कानपुर में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का गठन किया।
  • HRA का उद्देश्य: सशस्त्र क्रांति द्वारा औपनिवेशिक शासन को उखाड़ फेंकना और ‘संयुक्त राज्य भारत’ (United States of India) की स्थापना करना था।
  • HSRA का गठन (1928): दिल्ली के फिरोजशाह कोटला में चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह ने संगठन का नाम बदलकर ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ किया।
  • समाजवादी विचारधारा का समावेश: HSRA ने क्रांति का लक्ष्य केवल राजनीतिक स्वतंत्रता ही नहीं, बल्कि समाजवाद और शोषणविहीन समाज की स्थापना को माना।
  • भगत सिंह और नौजवान भारत सभा (1926): भगत सिंह ने लाहौर में युवाओं को संगठित कर उनमें धर्मनिरपेक्ष और क्रांतिकारी विचारों का प्रचार किया।

काकोरी ट्रेन एक्शन और मुकदमे (Kakori Train Action)

  • काकोरी घटना (9 अगस्त 1925): HRA क्रांतिकारियों ने लखनऊ के पास काकोरी में 8-डाउन ट्रेन से सरकारी खजाना सफलतापूर्वक लूटा।
  • काकोरी के शहीद: राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, रोशन सिंह और राजेंद्र लाहिड़ी को काकोरी कांड के तहत फांसी की सजा दी गई।
  • अशफाक उल्ला खान का बलिदान: अशफाक उल्ला खान HRA के पहले रिकॉर्डेड मुस्लिम क्रांतिकारी बने जिन्होंने हंसते-हंसते देश के लिए फांसी का फंदा चूमा।

सॉन्डर्स वध एवं असेंबली बम कांड (Saunders Murder & Assembly Bombing)

  • लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला (1928): साइमन कमीशन विरोध के दौरान लाठीचार्ज में घायल लालजी की मृत्यु पर भगत सिंह, राजगुरु और आजाद ने सॉन्डर्स को मारा।
  • केंद्रीय असेंबली बम कांड (8 अप्रैल 1929): ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल और पब्लिक सेफ्टी बिल के विरोध में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने बम फेंका।
  • बधिरों को सुनाने के लिए”: असेंबली में पर्चे फेंककर भगत सिंह ने कहा कि बम का उद्देश्य किसी की जान लेना नहीं बल्कि बहरे कानों को सुनाना है।
  • इंकलाब जिंदाबाद का नारा: असेंबली कांड के दौरान भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारों से पूरे देश में राष्ट्रीय चेतना जगाई।

चटगांव शस्त्रागार छापा एवं महिला क्रांतिकारी (Chattogram Armoury Raid)

  • सूर्य सेन (मास्टर दा): बंगाल में इंडियन रिपब्लिकन आर्मी का गठन कर मास्टर दा सूर्य सेन ने क्रांतिकारी गतिविधियों का नेतृत्व किया।
  • चटगांव शस्त्रागार छापा (18 अप्रैल 1930): सूर्य सेन के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने चटगांव के दो ब्रिटिश शस्त्रागारों पर कब्जा कर अस्थाई क्रांतिकारी सरकार घोषित की।
  • जलालाबाद पहाड़ी का युद्ध: ब्रिटिश सेना से मुकाबला करते हुए दर्जनों क्रांतिकारी शहीद हुए; सूर्य सेन को 1934 में फांसी दे दी गई।
  • महिला क्रांतिकारियों का योगदान: प्रीतिलता वाद्देदार (पहाड़तली क्लब हमला), कल्पना दत्त, बीना दास (गवर्नर पर गोली) और सुहासिनी गांगुली ने अभूतपूर्व वीरता दिखाई।

जेल हड़ताल, शहादत और ऐतिहासिक प्रभाव (Jail Strike & Executions)

  • जतिन दास का बलिदान (1929): राजनीतिक बंदियों के अधिकारों के लिए लाहौर जेल में 63 दिनों की लंबी भूख हड़ताल के बाद जतिन दास शहीद हुए।
  • अल्फ्रेड पार्क में चंद्रशेखर आजाद (1931): 27 फरवरी 1931 को प्रयागराज के अल्फ्रेड पार्क में पुलिस से लोहा लेते हुए आजाद ने अंतिम गोली खुद को मारी।
  • भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत: 23 मार्च 1931 को लाहौर षड्यंत्र केस के तहत तीनों महान नायकों को समय से पूर्व फांसी दे दी गई।
  • ऐतिहासिक प्रभाव: 1920-30 के क्रांतिकारियों के आत्मबलिदान ने भारतीय युवाओं में औपनिवेशिक सत्ता के प्रति अभूतपूर्व भयमुक्ति और राष्ट्रभक्ति का संचार किया।

साइमन कमीशन, नेहरू रिपोर्ट और पूर्ण स्वराज की घोषणा (1927–1929)

साइमन कमीशन और देशव्यापी बहिष्कार (Simon Commission Boycott)

  • साइमन कमीशन का गठन (1927): 1919 के भारत सरकार अधिनियम के संवैधानिक सुधारों की समीक्षा हेतु सर जॉन साइमन के नेतृत्व में आयोग बना।
  • श्वेत आयोग” (All-White Commission): इस आयोग के सभी सात सदस्य अंग्रेज थे; किसी भी भारतीय को शामिल न करने पर तीखा विरोध हुआ।
  • कांग्रेस द्वारा बहिष्कार का निर्णय: 1927 के मद्रास अधिवेशन (अध्यक्ष: एम.ए. अंसारी) में कांग्रेस ने साइमन कमीशन के पूर्ण बहिष्कार का प्रस्ताव पारित किया।
  • साइमन गो बैक” के नारे: 1928 में भारत आगमन पर काले झंडे, हड़तालों और “साइमन वापस जाओ” (Simon Go Back) के नारों से विरोध किया गया।
  • लाला लाजपत राय की शहादत: लाहौर में प्रदर्शन के दौरान पुलिस लाठीचार्ज में गंभीर रूप से घायल होने के बाद पंजाब केसरी लाला लाजपत राय शहीद हुए।

सर्वदलीय सम्मेलन और नेहरू रिपोर्ट (Nehru Report 1928)

  • लॉर्ड बर्कनहेड की चुनौती: भारत सचिव बर्कनहेड ने भारतीयों को एक सर्वसम्मत संविधान तैयार करने की खुली चुनौती दी थी।
  • नेहरू समिति का गठन: बर्कनहेड की चुनौती को स्वीकार करते हुए पंडित मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक सर्वदलीय समिति गठित की गई।
  • डोमिनियन स्टेट्स की मांग: नेहरू रिपोर्ट ने भारत के लिए ‘पूर्ण स्वतंत्रता’ के बजाय ‘डोमिनियन स्टेटस’ (अधिराज्य का दर्जा) की सिफारिश की।
  • मौलिक अधिकारों का प्रावधान: रिपोर्ट में वयस्क मताधिकार, महिलाओं के समान अधिकार और 19 मौलिक अधिकारों की स्पष्ट सिफारिश की गई।
  • संसदीय प्रणाली व धर्मनिरपेक्षता: केंद्र और प्रांतों में उत्तरदायी सरकार, कार्यपालिका का विधायिका के प्रति उत्तरदायित्व तथा धर्मनिरपेक्ष राज्य की वकालत की।
  • पृथक निर्वाचन का विरोध: नेहरू रिपोर्ट ने साम्प्रदायिक पृथक निर्वाचन को खारिज कर संयुक्त निर्वाचन व अल्पसंख्यकों हेतु सीट आरक्षण की सिफारिश की।
  • युवा नेताओं की आपत्ति: जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस ने ‘डोमिनियन स्टेटस’ का विरोध कर पूर्ण स्वतंत्रता की मांग पर जोर दिया।

जिन्ना के 14 सूत्र और मुस्लिम लीग का रुख (Jinnah’s 14 Points)

  • नेहरू रिपोर्ट पर असहमति: मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा के कड़े रुख के कारण नेहरू रिपोर्ट पर सर्वसम्मति नहीं बन सकी।
  • जिन्ना के 14 सूत्र (1929): मोहम्मद अली जिन्ना ने नेहरू रिपोर्ट को खारिज कर मुसलमानों के राजनीतिक अधिकारों हेतु 14 सूत्रीय मांगें रखीं।
  • साम्प्रदायिक विभाजन गहराया: 14 सूत्रीय मांगों में पृथक निर्वाचन और प्रांतीय स्वायत्तता पर जोर देने से साम्प्रदायिक दरार और चौड़ी हो गई।

लाहौर अधिवेशन और पूर्ण स्वराज (Lahore Session & Poorna Swaraj 1929)

  • ऐतिहासिक लाहौर अधिवेशन (1929): रावी नदी के तट पर जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस का ऐतिहासिक अधिवेशन आयोजित हुआ।
  • पूर्ण स्वराजका प्रस्ताव: कांग्रेस ने ‘डोमिनियन स्टेटस’ के लक्ष्य को त्यागकर ‘पूर्ण स्वराज’ (पूर्ण स्वतंत्रता) को अपना मुख्य उद्देश्य घोषित किया।
  • रावी तट पर तिरंगा फहराया: 31 दिसंबर 1929 की मध्यरात्रि को जवाहरलाल नेहरू ने रावी नदी के तट पर नव-गृहीत तिरंगा झंडा फहराया।
  • पहला स्वतंत्रता दिवस (26 जनवरी 1930): 26 जनवरी 1930 को पूरे देश में पहली बार ‘पूर्ण स्वतंत्रता दिवस’ के रूप में मनाने का शपथ पत्र लिया गया।
  • सविनय अवज्ञा का मार्ग प्रशस्त: लाहौर अधिवेशन ने महात्मा गांधी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने का पूर्ण अधिकार प्रदान किया।

सविनय अवज्ञा आंदोलन और गोलमेज सम्मेलन (1930–1934)

दांडी मार्च और सविनय अवज्ञा आंदोलन (Salt Satyagraha)

  • गांधीजी की 11 सूत्रीय मांगें: गांधीजी ने वायसराय इरविन के समक्ष 11 मांगें रखीं; अस्वीकार होने पर सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया।
  • ऐतिहासिक दांडी मार्च: 12 मार्च 1930 को गांधीजी ने 78 अनुयायियों के साथ साबरमती आश्रम से दांडी तक पैदल यात्रा शुरू की।
  • नमक कानून का उल्लंघन: 6 अप्रैल 1930 को दांडी पहुंचकर गांधीजी ने हाथ में नमक उठाकर ब्रिटिश नमक कानून को तोड़ा।
  • आंदोलन की व्यापकता: पूरे देश में नमक कानून तोड़ा गया; तमिलनाडु में राजाजी और केरल में के. केलप्पन ने नमक यात्राएं निकालीं।
  • धरासणा नमक सत्याग्रह: सरोजिनी नायडू और इमाम साहब के नेतृत्व में सत्याग्रहियों ने पुलिस की बर्बर लाठियों का अहिंसक सामना किया।
  • उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत: खान अब्दुल गफ्फार खान (‘सीमांत गांधी’) ने ‘खुदाई खिदमतगार’ (लाल कुर्ती दल) के जरिए अहिंसक आंदोलन चलाया।
  • पूर्वोत्तर भारत का योगदान: नागालैंड की रानी गाइडिनल्यू ने 13 वर्ष की आयु में ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व किया।
  • व्यापक सरकारी बहिष्कार: महिलाओं ने शराब-विदेशी कपड़ों की दुकानों पर धरना दिया; किसानों ने चौकीदारी कर देने से इनकार कर दिया।

गांधी-इरविन समझौता और प्रथम/द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (Gandhi-Irwin Pact & RTC)

  • प्रथम गोलमेज सम्मेलन (1930): लंदन में आयोजित; कांग्रेस ने बहिष्कार किया, जिससे बिना मुख्य प्रतिनिधि के यह सम्मेलन पूरी तरह असफल रहा।
  • गांधी-इरविन समझौता (5 मार्च 1931): कांग्रेस ने आंदोलन स्थगित किया और गांधीजी द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने हेतु सहमत हुए।
  • कराची अधिवेशन (1931): सरदार पटेल की अध्यक्षता में गांधी-इरविन समझौते को मंजूरी मिली तथा मौलिक अधिकारों का प्रस्ताव पारित हुआ।
  • द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (1931): महात्मा गांधी कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में लंदन गए, लेकिन साम्प्रदायिक गतिरोध से वार्ता टूट गई।
  • आंदोलन का दूसरा चरण (1932–1934): लंदन से लौटने पर गांधीजी ने आंदोलन पुनः शुरू किया, पर अंग्रेजों के दमन चक्र से यह धीमा पड़ा।

कम्युनल अवॉर्ड, पूना पैक्ट और तृतीय गोलमेज सम्मेलन (Poona Pact)

  • कम्युनल अवॉर्ड (16 अगस्त 1932): ब्रिटिश पीएम रैमसे मैक्डोनाल्ड ने दलित वर्गों (Depressed Classes) को भी पृथक निर्वाचन क्षेत्र प्रदान किया।
  • गांधीजी का आमरण अनशन: यरवदा जेल में बंद गांधीजी ने हिंदू समाज को बांटने वाले कम्युनल अवॉर्ड के खिलाफ अनशन शुरू किया।
  • ऐतिहासिक पूना पैक्ट (24 सितंबर 1932): गांधीजी और डॉ. बी.आर. आंबेडकर के मध्य समझौता हुआ; पृथक निर्वाचन की मांग वापस ली गई।
  • सीटों में आरक्षण: पूना पैक्ट के तहत प्रांतीय परिषदों में दलितों के लिए सुरक्षित सीटें 71 से बढ़ाकर 147 कर दी गईं।
  • हरिजन कल्याण कार्य: पूना पैक्ट के बाद गांधीजी ने आंदोलन छोड़कर ‘अखिल भारतीय अस्पृश्यता विरोधी लीग’ बनाई और ‘हरिजन’ पत्र निकाला।
  • तृतीय गोलमेज सम्मेलन (1932): कांग्रेस के बिना आयोजित हुआ; डॉ. आंबेडकर और तेजबहादुर सप्रू ने तीनों गोलमेज सम्मेलनों में भाग लिया।
  • संवैधानिक परिणति: तीनों गोलमेज सम्मेलनों की सिफारिशों के आधार पर ही आगे चलकर ‘भारत सरकार अधिनियम 1935’ तैयार किया गया।

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