पुनरुत्थान के कारण: असहयोग आंदोलन के अचानक वापस लिए जाने से निराश युवाओं ने एक बार फिर सशस्त्र क्रांति का मार्ग चुना।
एचआरए की स्थापना (1924): सचिंद्रनाथ सान्याल और रामप्रसाद बिस्मिल ने कानपुर में ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ (HRA) का गठन किया।
काकोरी ट्रेन डकैती (1925): एचआरए के क्रांतिकारियों ने हथियारों के लिए सरकारी खजाना ले जा रही ट्रेन को काकोरी में लूटा था।
शहादत और फांसी: काकोरी कांड के आरोप में रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, रोशन सिंह और राजेंद्र लाहिड़ी को फांसी दी गई।
एचएसआरए का गठन (1928): चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में दिल्ली के फिरोजशाह कोटला में संस्था का नाम ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ रखा गया।
समाजवादी लक्ष्य: एचएसआरए ने केवल अंग्रेजों को भगाना नहीं, बल्कि भारत में समाजवाद और शोषणविहीन व्यवस्था स्थापित करने का लक्ष्य चुना।
सौंडर्स की हत्या (1928): लाला लाजपत राय पर लाठीचार्ज का बदला लेने के लिए भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने पुलिस अधिकारी सौंडर्स को गोली मारी।
सेंट्रल असेंबली बम कांड (1929): भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने बहरे अंग्रेजों को अपनी बात सुनाने के लिए दिल्ली असेंबली में खाली जगह पर बम फेंके।
इंकलाब जिंदाबाद: असेंबली में बम फेंकने के बाद दोनों क्रांतिकारियों ने भागने के बजाय ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारे लगाते हुए गिरफ्तारी दी।
जतिन दास की शहादत: राजनीतिक कैदियों के अधिकारों के लिए जेल में लगातार 63 दिनों तक भूख हड़ताल करने के बाद जतिन दास शहीद हो गए।
लाहौर षड्यंत्र केस: सौंडर्स की हत्या और असेंबली बम कांड के मुकदमे के बाद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी की सजा सुनाई गई।
23 मार्च 1931: इस ऐतिहासिक दिन भारत के इन तीनों महान सपूतों को लाहौर जेल में हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर लटका दिया गया।
चंद्रशेखर आजाद का अंत: 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में पुलिस से अकेले लड़ते हुए आजाद ने खुद को आखिरी गोली मार ली।
बंगाल में क्रांतिकारी गतिविधियां
सूर्य सेन (मास्टर दा): बंगाल के चटगांव में एक शिक्षक सूर्य सेन ने ‘इंडियन रिपब्लिकन आर्मी’ बनाकर क्रांतिकारी आंदोलन का नेतृत्व किया।
चटगांव शस्त्रागार छापा (1930): सूर्य सेन और उनके साथियों ने ब्रिटिश शस्त्रागार पर सफलतापूर्वक छापा मारकर हथियारों पर कब्जा कर लिया था।
सशस्त्र संघर्ष: क्रांतिकारियों ने चटगांव में कुछ दिनों के लिए ब्रिटिश शासन को उखाड़कर वहां एक अस्थायी क्रांतिकारी सरकार की स्थापना की थी।
महिला क्रांतिकारियों की भूमिका: इस चरण में प्रीतिलता वाडेदार और कल्पना दत्त जैसी साहसी महिलाओं ने सीधे हथियार उठाकर युद्ध में भाग लिया।
युवा छात्राओं का साहस: स्कूल की छात्राओं बीना दास ने दीक्षांत समारोह में गवर्नर पर और शांति व सुनीति ने जिला मजिस्ट्रेट को गोली मारी।
साइमन कमीशन और अन्य राजनैतिक घटनाक्रम (Others)
साइमन कमीशन (1927): ब्रिटिश सरकार ने 1919 के सुधारों की समीक्षा के लिए सात सदस्यीय जॉन साइमन कमीशन का गठन किया।
श्वेत कमीशन: इस कमीशन में एक भी भारतीय सदस्य शामिल नहीं था, जिसे भारतीयों ने अपना बहुत बड़ा राष्ट्रीय अपमान माना।
साइमन गो बैक: 1928 में जब कमीशन भारत पहुंचा, तो पूरे देश में ‘साइमन गो बैक’ के नारों के साथ काले झंडे दिखाए गए।
लाला जी पर लाठीचार्ज: लाहौर में साइमन कमीशन का शांतिपूर्ण विरोध कर रहे लाला लाजपत राय पर पुलिस ने बेरहमी से लाठियां बरसाईं।
लाला जी का निधन: लाठीचार्ज की गंभीर चोटों के कारण लाला लाजपत राय का निधन हो गया, जिससे पूरे देश में तीव्र आक्रोश फैल गया।
नेहरू रिपोर्ट (1928): लॉर्ड बर्कनहेड की चुनौती स्वीकार करते हुए मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में भारत का पहला संवैधानिक मसौदा तैयार हुआ।
डोमिनियन स्टेटस का विवाद: नेहरू रिपोर्ट में ‘डोमिनियन स्टेटस’ (औपनिवेशिक स्वराज) की मांग की गई, जिसका युवा नेहरू और सुभाष ने विरोध किया।
बारदोली सत्याग्रह (1928): गुजरात के बारदोली में बढ़े हुए लगान के खिलाफ वल्लभभाई पटेल ने एक बेहद सफल किसान आंदोलन का नेतृत्व किया।
‘सरदार’ की उपाधि: बारदोली सत्याग्रह के सफल होने पर वहां की महिलाओं ने वल्लभभाई पटेल को ‘सरदार’ की ऐतिहासिक उपाधि प्रदान की।
लाहौर अधिवेशन (1929): जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस ने डोमिनियन स्टेटस छोड़कर ऐतिहासिक ‘पूर्ण स्वराज’ (Complete Independence) का प्रस्ताव पास किया।
प्रथम स्वतंत्रता दिवस: निर्णय के अनुसार, 26 जनवरी 1930 को पूरे देश में रावी नदी के तट पर पहली बार तिरंगा फहराकर स्वतंत्रता दिवस मनाया गया।
सविनय अवज्ञा आंदोलन से स्वतंत्रता प्राप्ति
सविनय अवज्ञा आंदोलन और गोलमेज सम्मेलन (Civil Disobedience Movement & RTC)
दांडी मार्च की शुरुआत: महात्मा गांधी ने 12 मार्च 1930 को साबरमती से 78 अनुयायियों के साथ ऐतिहासिक दांडी मार्च की शुरुआत की थी।
नमक कानून का उल्लंघन: 6 अप्रैल 1930 को गांधी जी ने दांडी पहुंचकर समुद्र तट पर नमक बनाकर ब्रिटिश कानून को तोड़ा।
सविनय अवज्ञा आंदोलन: नमक कानून तोड़ने के साथ ही पूरे देश में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ सविनय अवज्ञा आंदोलन का शंखनाद हुआ।
आंदोलन का विस्तार: सी. राजगोपालाचारी ने तमिलनाडु के वेदारण्यम में और के. केलप्पन ने केरल में नमक सत्याग्रह का सफल नेतृत्व किया।
धरासना सत्याग्रह: सरोजिनी नायडू और मणिलाल ने गुजरात के धरासना नमक कारखाने पर शांतिपूर्ण और निडर सत्याग्रह का नेतृत्व किया था।
उत्तर-पश्चिम सीमांत: खान अब्दुल गफ्फार खान (सीमांत गांधी) ने ‘खुदाई खिदमतगार’ या लाल कुर्ती दल के माध्यम से आंदोलन चलाया।
प्रथम गोलमेज सम्मेलन (1930): साइमन कमीशन की रिपोर्ट पर चर्चा के लिए लंदन में पहला सम्मेलन हुआ, जिसका कांग्रेस ने बहिष्कार किया।
गांधी-इरविन समझौता (1931): वायसराय इरविन और गांधी जी के बीच समझौता हुआ, जिसके तहत राजनीतिक कैदियों की रिहाई और आंदोलन स्थगित हुआ।
द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (1931): कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में गांधी जी ने लंदन में इस दूसरे सम्मेलन में भाग लिया था।
सांप्रदायिक पंचाट (1932): ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैमसे मैकडोनाल्ड ने दलितों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की घोषणा कर हिंदुओं को बांटना चाहा।
पूना पैक्ट (1932): यरवदा जेल में गांधी जी के आमरण अनशन के बाद डॉ. अंबेडकर और गांधी जी के बीच ऐतिहासिक पूना समझौता हुआ।
आंदोलन का दूसरा चरण: गोलमेज सम्मेलन की विफलता के बाद गांधी जी ने आंदोलन दोबारा शुरू किया, लेकिन 1934 में इसे वापस ले लिया।
सविनय अवज्ञा आंदोलन के बाद का चरण (Post-Civil Disobedience)
रचनात्मक कार्य: आंदोलन की समाप्ति के बाद गांधी जी ने सक्रिय राजनीति से हटकर हरिजन उद्धार और अस्पृश्यता निवारण पर ध्यान दिया।
भारत सरकार अधिनियम 1935: इस महत्वपूर्ण ब्रिटिश कानून द्वारा प्रांतों में द्वैध शासन समाप्त कर ‘प्रांतीय स्वायत्तता’ लागू करने का प्रावधान किया गया।
प्रांतीय चुनाव (1937): 1935 के अधिनियम के तहत हुए प्रांतीय चुनावों में कांग्रेस ने 11 में से 7 प्रांतों में स्पष्ट बहुमत हासिल किया।
कांग्रेस मंत्रालयों का काम: 28 महीनों के शासन के दौरान कांग्रेस सरकारों ने शिक्षा, नागरिक स्वतंत्रता और किसान सुधारों के अनेक कार्य किए।
मंत्रालयों का इस्तीफा (1939): द्वितीय विश्व युद्ध में भारत को जबरन शामिल करने के विरोध में सभी कांग्रेस मंत्रालयों ने सामूहिक इस्तीफा दे दिया।
मुक्ति दिवस: कांग्रेस मंत्रालयों के इस्तीफे पर मुस्लिम लीग के अध्यक्ष मोहम्मद अली जिन्ना ने 22 दिसंबर 1939 को ‘मुक्ति दिवस’ मनाया।
त्रिपुरी संकट (1939): सुभाष चंद्र बोस गांधी जी के उम्मीदवार पट्टाभि सीतारमैया को हराकर दोबारा कांग्रेस अध्यक्ष चुने गए, जिससे विवाद बढ़ा।
फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना: गांधी जी से मतभेदों के बाद सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर ‘फॉरवर्ड ब्लॉक’ बनाया।
पाकिस्तान प्रस्ताव (1940): मुस्लिम लीग के लाहौर अधिवेशन में जिन्ना ने औपचारिक रूप से मुसलमानों के लिए अलग देश ‘पाकिस्तान’ की मांग की।
द्वितीय विश्व युद्ध और राष्ट्रवादी प्रतिक्रिया (World War II & Response)
अगस्त प्रस्ताव (1940): कांग्रेस का सहयोग पाने के लिए वायसराय लिनलिथगो ने युद्ध के बाद ‘डोमिनियन स्टेटस’ देने का वादा किया, जो खारिज हुआ।
व्यक्तिगत सत्याग्रह (1940): अगस्त प्रस्ताव के विरोध में गांधी जी ने सीमित जन-आंदोलन के तौर पर व्यक्तिगत सत्याग्रह की शुरुआत की थी।
प्रथम सत्याग्रही: आचार्य विनोबा भावे देश के पहले व्यक्तिगत सत्याग्रही बने और उनके बाद जवाहरलाल नेहरू दूसरे सत्याग्रही चुने गए थे।
क्रिप्स मिशन (1942): युद्ध में भारतीयों का समर्थन जुटाने ब्रिटिश मंत्री सर स्टैफोर्ड क्रिप्स भारत आए, लेकिन उनके प्रस्ताव अस्पष्ट थे।
‘पोस्ट-डेटेड चेक’: गांधी जी ने क्रिप्स मिशन के खोखले और अनिश्चित वादों को “दिवालिया बैंक का उत्तर-तिथि का चेक” कहा था।
भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement)
वर्धा प्रस्ताव (जुलाई 1942): कांग्रेस कार्यसमिति ने वर्धा की बैठक में अंग्रेजों के खिलाफ एक अंतिम बड़े संघर्ष का प्रस्ताव पारित किया।
ग्वालिया टैंक मैदान: 8 अगस्त 1942 को बंबई के ऐतिहासिक ग्वालिया टैंक मैदान से ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ को मंजूरी दी गई थी।
करो या मरो (Do or Die): गांधी जी ने देशवासियों को अपनी आखिरी सांस तक आजादी के लिए संघर्ष करने का ऐतिहासिक नारा दिया।
ऑपरेशन थंडरबोल्ट: 9 अगस्त की सुबह तड़के ही अंग्रेजों ने ऑपरेशन थंडरबोल्ट चलाकर गांधी जी और सभी शीर्ष नेताओं को गिरफ्तार कर लिया।
स्वतः स्फूर्त आंदोलन: नेतृत्वविहीन होने के बाद भी जनता ने खुद कमान संभाली और यह स्वतंत्रता संग्राम का सबसे बड़ा जन-विद्रोह बन गया।
भूमिगत आंदोलन: अच्युत पटवर्धन, राममनोहर लोहिया और अरुणा आसफ अली ने गुप्त रूप से आंदोलन को वैचारिक और रणनीतिक दिशा दी।
उषा मेहता का रेडियो: उषा मेहता ने गुप्त ‘कांग्रेस रेडियो’ का संचालन कर आंदोलन की खबरों को देश के कोने-कोने तक पहुंचाया था।
समानांतर सरकारें: बलिया (चित्तू पांडेय), तामलुक और सतारा में क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश सत्ता उखाड़कर अपनी समानांतर सरकारें स्थापित कीं।
आजाद हिंद फौज और युद्ध के बाद का परिदृश्य (Post-War Scenario)
आजाद हिंद फौज (INA): कैप्टन मोहन सिंह ने मलाया में जापानी सेना की मदद से बंदी भारतीय सैनिकों को मिलाकर आईएनए बनाई।
सुभाष चंद्र बोस की कमान: 1943 में सिंगापुर पहुंचकर सुभाष चंद्र बोस ने आईएनए की कमान संभाली और ‘दिल्ली चलो’ का नारा दिया।
आरजी हुकुमत-ए-आजाद हिंद: नेताजी ने सिंगापुर में स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार बनाई, जिसे दुनिया के कई देशों ने मान्यता दी।
तुम मुझे खून दो: नेताजी ने अपनी सेना और जनता में जोश भरते हुए कहा—”तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।”
सी.आर. फॉर्मूला (1944): चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच राजनैतिक गतिरोध सुलझाने के लिए एक साझा योजना प्रस्तुत की।
वेवेल योजना (1945): युद्ध के बाद वायसराय वेवेल ने कार्यकारी परिषद के पुनर्गठन और राजनैतिक गतिरोध को तोड़ने का प्रस्ताव रखा था।
शिमला सम्मेलन (1945): वेवेल योजना पर चर्चा के लिए शिमला में सर्वदलीय बैठक बुलाई गई, लेकिन जिन्ना की हठधर्मिता के कारण विफल रही।
आईएनए का मुकदमा (1945): लाल किले में आजाद हिंद फौज के अफसरों (सहगल, ढिल्लों, शाहनवाज) पर अंग्रेजों ने राजद्रोह का मुकदमा चलाया।
देशव्यापी विरोध: आईएनए के बचाव में नेहरू, तेज बहादुर सप्रू और भूलाभाई देसाई ने वकालत की; जनता सड़कों पर उतर आई।
शाही नौसेना विद्रोह (1946): बंबई में ‘आईएनएस तलवार’ के नौसैनिकों ने नस्लीय भेदभाव और खराब भोजन के खिलाफ ऐतिहासिक सशस्त्र विद्रोह किया।
स्वतंत्रता और विभाजन (Independence & Partition)
कैबिनेट मिशन (1946): ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने तीन ब्रिटिश मंत्रियों को भारत के लिए संवैधानिक योजना तैयार करने हेतु भेजा था।
मिशन के मुख्य प्रस्ताव: कैबिनेट मिशन ने अलग पाकिस्तान की मांग ठुकराकर एक कमजोर केंद्र वाले भारतीय संघ का प्रस्ताव रखा था।
अंतरिम सरकार (सितंबर 1946): जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्रीत्व (उपाध्यक्ष) में देश की पहली राष्ट्रीय अंतरिम सरकार का गठन किया गया था।
प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस: कैबिनेट मिशन से नाराज जिन्ना ने 16 अगस्त 1946 को ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ की घोषणा की, जिससे भयंकर दंगे हुए।
नोआखली के दंगे: बंगाल के नोआखली में हुए भीषण सांप्रदायिक दंगों को शांत करने के लिए गांधी जी अकेले वहां पहुंचे थे।
एटली की घोषणा (फरवरी 1947): ब्रिटिश पीएम क्लीमेंट एटली ने घोषणा की कि अंग्रेज जून 1948 से पहले भारत छोड़ देंगे।
लॉर्ड माउंटबेटन का आगमन: भारत के अंतिम ब्रिटिश वायसराय बनकर आए माउंटबेटन को सत्ता के शीघ्र हस्तांतरण की जिम्मेदारी दी गई थी।
माउंटबेटन योजना (3 जून 1947): इस योजना के तहत भारत के दो हिस्सों (भारत और पाकिस्तान) में विभाजन को आधिकारिक रूप से स्वीकार किया गया।
विभाजन की मजबूरी: दंगों की विभीषिका और गृहयुद्ध से देश को बचाने के लिए कांग्रेस नेताओं ने भारी मन से विभाजन स्वीकार किया।
रेडक्लिफ रेखा: सर सिरिल रेडक्लिफ की अध्यक्षता में भारत और पाकिस्तान के बीच की भौगोलिक सीमाओं का निर्धारण किया गया था।
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947: ब्रिटिश संसद ने जुलाई 1947 में यह कानून पास कर दोनों देशों को संप्रभु डोमिनियन का दर्जा दिया।
रियासतों का विलय: सरदार वल्लभभाई पटेल ने अपनी दृढ़ कूटनीति से 500 से अधिक देसी रियासतों का भारतीय संघ में ऐतिहासिक विलय कराया।
15 अगस्त 1947: सदियों की गुलामी और अनगिनत बलिदानों के बाद भारत ने एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र के रूप में जन्म लिया।
नियति से साक्षात्कार (Tryst with Destiny): आधी रात को संसद को संबोधित करते हुए जवाहरलाल नेहरू ने अपना प्रसिद्ध ऐतिहासिक भाषण दिया था।
नेहरू पहले प्रधानमंत्री: स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू बने और गवर्नर जनरल के रूप में माउंटबेटन को बनाए रखा गया।
अधूरी खुशी: स्वतंत्रता की यह महान खुशी विभाजन की त्रासदी, लाखों शरणार्थियों के विस्थापन और सांप्रदायिक दंगों के दर्द के साथ आई।
स्वतंत्रता और विभाजन:
क्लीमेंट एटली की घोषणा (1947): ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने 20 फरवरी 1947 को घोषणा की कि अंग्रेज जून 1948 तक भारत छोड़ देंगे।
माउंटबेटन का आगमन: लॉर्ड वेवेल के स्थान पर लॉर्ड माउंटबेटन को भारत का अंतिम वायसराय बनाकर सत्ता हस्तांतरण के लिए भेजा गया।
सांप्रदायिक दंगों की विभीषिका: मुस्लिम लीग की ‘प्रत्यक्ष कार्यवाही’ के कारण पूरे देश में भीषण दंगे और गृहयुद्ध की स्थिति पैदा हो गई थी।
माउंटबेटन योजना (3 जून 1947): माउंटबेटन ने देश के विभाजन और दो अलग डोमिनियन (भारत-पाकिस्तान) के निर्माण की अंतिम योजना प्रस्तुत की।
विभाजन की स्वीकृति: दंगों को रोकने और पूर्ण अराजकता से बचने के लिए कांग्रेस ने अनिवार्य बुराई मानकर विभाजन स्वीकार किया।
पंजाब और बंगाल का विभाजन: इन दोनों बड़े प्रांतों को धार्मिक बहुलता के आधार पर विभाजित करने के लिए जनमत और विधानसभाओं की मदद ली गई।
उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत: एनडब्ल्यूएफपी (NWFP) और असम के सिलहट जिले में भारत या पाकिस्तान में शामिल होने के लिए जनमत संग्रह कराया गया।
खान अब्दुल गफ्फार खान का विरोध: सीमांत गांधी ने जनमत संग्रह का बहिष्कार किया, क्योंकि वे ‘पख्तूनिस्तान’ या अखंड भारत के प्रबल समर्थक थे।
रेडक्लिफ आयोग: भारत और पाकिस्तान की भौगोलिक सीमाओं को तय करने के लिए सर सिरिल रेडक्लिफ की अध्यक्षता में सीमा आयोग बना।
देसी रियासतों को विकल्प: माउंटबेटन योजना के तहत रियासतों को भारत या पाकिस्तान में शामिल होने या स्वतंत्र रहने की छूट दी गई।
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947: ब्रिटिश संसद ने जुलाई 1947 में यह अधिनियम पारित कर विभाजन और स्वतंत्रता को कानूनी रूप दिया।
15 अगस्त 1947 की तिथि: सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया को तेज करने के लिए माउंटबेटन ने जानबूझकर 15 अगस्त की तारीख तय की थी।
संपत्ति और सेना का बंटवारा: दोनों नए देशों के बीच सरकारी खजाने, सेना, हथियारों और रेल संपत्तियों का भी आनुपातिक विभाजन किया गया।
पाकिस्तान का जन्म: 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान एक नए संप्रभु देश के रूप में अस्तित्व में आया और जिन्ना गवर्नर जनरल बने।
स्वतंत्र भारत का उदय: 15 अगस्त 1947 को भारत ने सदियों की गुलामी के बाद एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में सांस ली।
नेहरू का ऐतिहासिक भाषण: आधी रात को जवाहरलाल नेहरू ने ‘नियति से साक्षात्कार’ (Tryst with Destiny) नामक अपना अमर और प्रसिद्ध भाषण दिया।
प्रथम प्रधानमंत्री: स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू बने, जबकि लॉर्ड माउंटबेटन को प्रथम गवर्नर जनरल बनाए रखा गया।
विस्थापन की त्रासदी: विभाजन के कारण इतिहास का सबसे बड़ा विस्थापन हुआ, जिसमें करोड़ों लोगों को अपनी मातृभूमि छोड़नी पड़ी थी।
महात्मा गांधी का मौन: देश की स्वतंत्रता के समय गांधी जी दिल्ली के जश्न में शामिल न होकर नोआखली में दंगे शांत कर रहे थे।
अधूरी खुशी: भारत को स्वतंत्रता तो मिली, लेकिन विभाजन के दर्द, लाखों निर्दोषों की मौत और शरणार्थी समस्या की गहरी टीस के साथ।
ब्रिटिश शासन का प्रभाव
ब्रिटिश शासन का आर्थिक प्रभाव (Economic Impact of British Rule)
वि-औद्योगीकरण (De-industrialization): ब्रिटिश नीतियों के कारण पारंपरिक भारतीय हस्तशिल्प और कपड़ा उद्योग पूरी तरह नष्ट हो गए, जिससे करोड़ों बुनकर बेरोजगार हो गए।
धन का निष्कासन (Drain of Wealth): दादाभाई नौरोजी के अनुसार, भारत का पैसा करों और वेतनों के रूप में बिना किसी प्रतिफल के ब्रिटेन भेजा गया।
कृषि का व्यवसायीकरण: खाद्यान्न के बजाय नील, कपास और अफीम जैसी नकदी फसलों को उगाने के लिए किसानों पर भारी दबाव डाला गया।
जमींदारी व्यवस्था (स्थायी बंदोबस्त): 1793 में लागू इस व्यवस्था ने किसानों को जमींदारों की दया पर छोड़ दिया और उनका भयंकर शोषण किया।
रैयतवाड़ी व्यवस्था: मद्रास और बॉम्बे में लागू इस व्यवस्था में सीधे किसानों से अत्यधिक लगान वसूला गया, जिससे कर्जदारी बढ़ी।
महालवाड़ी व्यवस्था: पंजाब और मध्य भारत में पूरे गांव (महाल) को कर देने की इकाई बनाया गया, जो अत्यधिक दमनकारी साबित हुई।
अकाल की बारंबारता: अंग्रेजों की निर्दयी कर नीतियों और खाद्यान्न निर्यात के कारण बंगाल सहित देश में कई विनाशकारी अकाल पड़े।
कृषि का पिछड़ापन: मुनाफे का कोई भी हिस्सा कृषि के आधुनिकीकरण या सिंचाई पर खर्च नहीं किया गया, जिससे उत्पादकता घटती गई।
ग्रामीण कर्जदारी: अत्यधिक लगान चुकाने के लिए किसान साहूकारों के चंगुल में फंस गए और अपनी जमीनें गंवा बैठे।
एकतरफा मुक्त व्यापार: ब्रिटेन के तैयार माल के लिए भारतीय बाजार खोल दिए गए, जबकि भारतीय वस्तुओं पर भारी आयात शुल्क लगाया गया।
आधुनिक उद्योगों का धीमा विकास: भारत में रेलवे और बागान उद्योगों का विकास केवल ब्रिटिश पूंजीपतियों के मुनाफे के लिए किया गया था।
गरीबी का बढ़ना: ब्रिटिश आर्थिक नीतियों ने समृद्ध भारत को कच्चे माल का निर्यातक और दुनिया का सबसे गरीब देश बना दिया।