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भारतीय प्रेस का इतिहास (Indian Press)

  • शुरुआती प्रयास: भारत का पहला समाचार पत्र ‘बंगाल गजट’ 1780 में जेम्स ऑगस्टस हिकी द्वारा शुरू किया गया था।
  • राजा राममोहन राय का योगदान: उन्होंने ‘संवाद कौमुदी’ और ‘मिरात-उल-अखबार’ के माध्यम से सामाजिक सुधारों और प्रेस की स्वतंत्रता की वकालत की।
  • सेंसरशिप एक्ट 1799: लॉर्ड वेलेजली ने फ्रांसीसी आक्रमण के डर से अखबारों पर युद्धकालीन सेंसरशिप और सख्त नियंत्रण लागू कर दिया था।
  • लाइसेंसिंग रेगुलेशन 1823: जॉन एडम्स ने बिना लाइसेंस के प्रेस चलाने पर जुर्माना लगाया, जिससे कई राष्ट्रवादी अखबार बंद हो गए।
  • प्रेस का मुक्तिदाता: लॉर्ड मेटकाफ ने 1835 के अधिनियम द्वारा सख्त प्रतिबंधों को हटाकर भारतीय प्रेस को बड़ी राहत प्रदान की।
  • वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट 1878: लॉर्ड लिटन ने भारतीय भाषाई समाचार पत्रों को दबाने के लिए यह दमनकारी “मुंह बंद करने वाला” कानून बनाया।
  • अमृत बाजार पत्रिका: वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट से बचने के लिए इस अखबार ने रातों-रात खुद को बंगाली से अंग्रेजी में बदल लिया।
  • तिलक और प्रेस: बाल गंगाधर तिलक ने ‘केसरी’ और ‘मराठा’ के जरिए जनता में देशभक्ति और राजनीतिक चेतना जगाई।
  • अखबारों पर मुकदमों का दौर: सरकार विरोधी लेख लिखने के कारण तिलक सहित कई संपादकों पर राजद्रोह का मुकदमा चलाकर जेल भेजा गया।
  • प्रेस एक्ट 1910: क्रांतिकारी विचारों को कुचलने के लिए स्थानीय सरकारों को अखबारों से भारी जमानत राशि मांगने का अधिकार दिया गया।
  • प्रेस जांच समिति 1947: स्वतंत्रता के ठीक पहले प्रेस कानूनों की समीक्षा करने और प्रतिबंधों को कम करने के लिए समिति बनी।
  • राष्ट्रवाद का माध्यम: दमन के बावजूद, भारतीय प्रेस ने स्वतंत्रता आंदोलन में जनमत तैयार करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

भारतीय शिक्षा का विकास (Indian Education Evolution)

  • शुरुआती ब्रिटिश नीति: प्रारंभ में ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारतीयों की पारंपरिक शिक्षा प्रणाली में कोई रुचि नहीं दिखाई।
  • 1813 का चार्टर एक्ट: इस अधिनियम में पहली बार भारतीयों की शिक्षा पर प्रतिवर्ष ₹1 लाख खर्च करने का प्रावधान किया गया।
  • प्राच्य-आंग्ल विवाद: शिक्षा का माध्यम भारतीय भाषाएं (प्राच्य) हों या अंग्रेजी (आंग्ल), इसे लेकर लंबे समय तक विवाद चला।
  • मैकाले का मिनट (1835): लॉर्ड मैकाले ने अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम बनाया, जिसका उद्देश्य क्लर्क तैयार करना था।
  • अधोगामी निष्पंदन सिद्धांत (Downward Filtration): इसके तहत केवल उच्च वर्ग को शिक्षित करना था, ताकि शिक्षा छनकर आम जनता तक पहुंचे।
  • वुड्स डिस्पैच (1854): इसे भारतीय शिक्षा का ‘मैग्नाकार्टा’ कहा जाता है, जिसने प्राथमिक से विश्वविद्यालय स्तर तक का खाका खींचा।
  • विश्वविद्यालयों की स्थापना: वुड्स डिस्पैच की सिफारिश पर 1857 में कलकत्ता, बॉम्बे और मद्रास में नए विश्वविद्यालयों का गठन हुआ।
  • हंटर शिक्षा आयोग (1882): इस आयोग ने प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के विकास और स्थानीय भाषाओं के उपयोग पर जोर दिया।
  • भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम 1904: लॉर्ड कर्जन ने विश्वविद्यालयों पर सरकारी नियंत्रण बढ़ाने और राष्ट्रवाद को दबाने के लिए यह कानून लाया।
  • सैडलर विश्वविद्यालय आयोग (1917): इसने स्कूली शिक्षा को 12 वर्ष करने और महिला शिक्षा को बढ़ावा देने की सिफारिश की थी।
  • वर्धा शिक्षा योजना (1937): महात्मा गांधी ने बुनियादी शिक्षा (नाई तालीम) का प्रस्ताव दिया, जो व्यावहारिक और हस्तशिल्प पर आधारित थी।
  • सार्जेंट योजना (1944): इसने भारत में 40 वर्षों के भीतर पूर्ण साक्षरता हासिल करने का एक व्यापक लक्ष्य निर्धारित किया था।

औपनिवेशिक भारत में किसान संघर्ष (Peasant Struggle)

  • नील विद्रोह (1859-60): बंगाल के किसानों ने जबरन नील की खेती कराने वाले क्रूर यूरोपीय बागान मालिकों के खिलाफ सफल विद्रोह किया।
  • नील दर्पण’ नाटक: दीनबंधु मित्र ने अपने इस प्रसिद्ध नाटक में नील किसानों पर होने वाले भयानक अत्याचारों को उजागर किया।
  • पाबना विद्रोह (1873-76): बंगाल के किसानों ने जमींदारों द्वारा बढ़ाए गए अवैध लगान और बेदखली के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ी।
  • दक्कन उपद्रव (1875): महाराष्ट्र के किसानों ने गुजराती और मारवाड़ी साहूकारों के खातों को जलाकर उनके शोषण का कड़ा विरोध किया।
  • दक्कन कृषक राहत अधिनियम: इस विद्रोह के बाद किसानों को साहूकारों के चंगुल से बचाने के लिए 1879 में कानून बनाया गया।
  • चंपारण सत्याग्रह (1917): गांधीजी ने तिनकठिया प्रणाली के तहत जबरन नील उगाने वाले बिहार के किसानों को न्याय दिलाया।
  • खेड़ा सत्याग्रह (1918): फसल नष्ट होने के बावजूद कर वसूली के खिलाफ गांधीजी और पटेल ने किसानों का सफल नेतृत्व किया।
  • अवध किसान आंदोलन (1920): बाबा रामचंद्र के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश के किसानों ने अवैध करों और बेदखली के खिलाफ आवाज उठाई।
  • मोपला विद्रोह (1921): केरल के मालाबार में मुस्लिम काश्तकारों ने हिंदू जमींदारों और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ हिंसक आंदोलन किया।
  • बारदोली सत्याग्रह (1928): वल्लभभाई पटेल के नेतृत्व में बढ़े हुए लगान के खिलाफ सफल आंदोलन हुआ, जहाँ उन्हें ‘सरदार’ उपाधि मिली।
  • अखिल भारतीय किसान सभा: 1936 में स्वामी सहजानंद सरस्वती की अध्यक्षता में किसानों के अधिकारों के लिए राष्ट्रीय संगठन बना।
  • तेभागा और तेलंगाना आंदोलन: 1940 के दशक में हुए इन आंदोलनों ने फसल के दो-तिहाई हिस्से और भूमि पुनर्वितरण की मांग की।

भारतीय श्रमिक वर्ग आंदोलन (Indian Working Class Movement)

  • शुरुआती औद्योगिक श्रमिक: 19वीं सदी के उत्तरार्ध में कपड़ा, जूट और रेलवे उद्योगों के बढ़ने से श्रमिक वर्ग का उदय हुआ।
  • प्रारंभिक परोपकारी प्रयास: शशिपद बनर्जी और एन. एम. लोखंडे जैसे सुधारकों ने श्रमिकों की कामकाजी स्थितियों में सुधार के प्रयास किए।
  • दीनबंधु’ पत्रिका: लोखंडे ने इस पत्रिका के माध्यम से मिल मजदूरों की दयनीय स्थिति और उनकी समस्याओं को उठाया।
  • प्रथम कारखाना अधिनियम 1881: बाल श्रमिकों की सुरक्षा और कामकाजी घंटों को सीमित करने के लिए यह पहला कानून लाया गया।
  • द्वितीय कारखाना अधिनियम 1891: इस अधिनियम के जरिए महिलाओं के काम के घंटे तय किए गए और साप्ताहिक छुट्टी दी गई।
  • स्वदेशी आंदोलन का प्रभाव: 1905 के बाद श्रमिकों ने राजनीतिक हड़तालों में भाग लेना शुरू किया, जिससे आंदोलन को नई ताकत मिली।
  • एटक (AITUC) की स्थापना: 1920 में लाला लाजपत राय की अध्यक्षता में पहले केंद्रीय ट्रेड यूनियन संगठन का गठन हुआ।
  • रूसी क्रांति का असर: 1917 की सोशलिस्ट क्रांति के बाद भारतीय मजदूरों में साम्यवादी विचारों और वर्ग चेतना का तेजी से प्रसार हुआ।
  • वर्कर्स एंड पीजेंट्स पार्टी: कम्युनिस्टों ने इस पार्टी के माध्यम से ट्रेड यूनियनों को संगठित किया और ब्रिटिश विरोधी संघर्ष तेज किया।
  • ट्रेड यूनियन अधिनियम 1926: इस कानून ने पंजीकृत ट्रेड यूनियनों को कानूनी मान्यता दी और उनकी गतिविधियों को सुरक्षा प्रदान की।
  • विवाद निवारण अधिनियम 1929: ब्रिटिश सरकार ने राजनीतिक और देशव्यापी हड़तालों को रोकने के लिए दमनकारी कानून लागू किया।
  • स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका: श्रमिक वर्ग ने आर्थिक मांगों के साथ-साथ भारत छोड़ो आंदोलन जैसी राजनीतिक लड़ाइयों में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

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