rankersnotes.com

मगध का उत्थान

  • छठी शताब्दी ईसा पूर्व में सोलह महाजनपदों के उदय के बाद, मगध एक शक्तिशाली राज्य के रूप में उभरा और संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप पर प्रभुत्व स्थापित किया।
  • प्राचीन मगध राज्य वर्तमान बिहार के पटना और गया जिलों के क्षेत्रों में विस्तृत था और यह गंगा नदी के दक्षिण में स्थित था।
  • छठी शताब्दी ईसा पूर्व से चौथी शताब्दी ईसा पूर्व के दौरान मगध ने क्रमिक रूप से अन्य महाजनपदों को जीतकर एक विशाल साम्राज्य की मजबूत नींव रखी।
  • मगध के इस अभूतपूर्व उत्थान के पीछे कई महत्वपूर्ण भौगोलिक, आर्थिक, सैन्य और राजनीतिक कारण उत्तरदायी थे।
  • भौगोलिक दृष्टि से मगध गंगा के मैदानी भाग में स्थित था, जहाँ की भूमि अत्यंत उपजाऊ होने से कृषि उत्पादन में भारी वृद्धि हुई।
  • प्रचुर कृषि उत्पादन के परिणामस्वरूप राज्य को पर्याप्त मात्रा में खाद्य अधिशेष (Surplus) और भारी राजस्व प्राप्त हुआ।
  • मगध क्षेत्र के पास लौह अयस्क के समृद्ध भंडार मौजूद थे, जिसने मगध को सैन्य और आर्थिक रूप से अत्यधिक शक्तिशाली बनाया।
  • इन लौह भंडारों की मदद से बेहतर कृषि औजार (जैसे लोहे के हल) और युद्ध के लिए उच्च श्रेणी के अचूक हथियार बनाए गए।
  • आसपास के घने जंगलों से प्रचुर मात्रा में लकड़ी और बहुमूल्य हाथी प्राप्त होते थे, जिनका उपयोग मगध की सेना में प्रमुखता से किया जाता था।
  • युद्ध में हाथियों का बड़े पैमाने पर कुशल उपयोग मगध की सैन्य शक्ति का एक बेहद महत्वपूर्ण और विशिष्ट हिस्सा था।
  • मगध की प्रारंभिक राजधानी ‘राजगृह’ (गिरिव्रज) थी, जो पाँच पहाड़ियों से घिरी होने के कारण प्राकृतिक रूप से सुरक्षित और अभेद्य थी।
  • बाद में बनी नई राजधानी ‘पाटलिपुत्र’ गंगा, सोन और गंडक नदियों के संगम पर स्थित होने के कारण एक सुरक्षित जलदुर्ग के समान थी।
  • इन नदी मार्गों ने मगध को न केवल प्राकृतिक सुरक्षा दी, बल्कि व्यापार, वाणिज्य और परिवहन के लिए उत्कृष्ट भौगोलिक सुविधाएँ भी प्रदान कीं।
  • लौह अयस्क के खनन और कुशल धातु कर्म उद्योगों ने राज्य की आर्थिक स्थिति को अन्य महाजनपदों की तुलना में अधिक सुदृढ़ किया।
  • मगध के इस महान उत्थान में यहाँ के अत्यंत महत्वाकांक्षी, दूरदर्शी और कुशल शासकों की भूमिका भी सबसे प्रमुख रही।
  • हर्यक वंश के प्रतापी राजा बिंबिसार ने वैवाहिक संबंधों और आक्रामक युद्ध नीतियों के माध्यम से मगध साम्राज्य का पहला बड़ा विस्तार किया।
  • बिंबिसार के पुत्र अजातशत्रु ने अपने पिता की विस्तारवादी नीतियों को जारी रखते हुए वज्जि संघ (वैशाली) और काशी को मगध में मिला लिया।
  • इसके बाद शिशुनाग वंश के शासकों ने अवंती जैसे शक्तिशाली प्रतिद्वंदी महाजनपद को पराजित कर मगध का वर्चस्व और मजबूत किया।
  • नंद वंश के क्रूर और शक्तिशाली राजा महापद्मनंद ने उत्तर भारत के अधिकांश हिस्सों को जीतकर मगध को एक अखिल भारतीय साम्राज्य का रूप दिया।
  • संक्षेप में, इन्हीं सभी अनुकूल कारकों के संकलन के कारण मगध का यह उत्थान आगे चलकर चंद्रगुप्त मौर्य के अधीन मौर्य साम्राज्य के रूप में अपने चरम पर पहुँचा।

जैन और बौद्ध धर्म का प्रभाव

  • छठी शताब्दी ईसा पूर्व में वैदिक धर्म की बढ़ती जटिलताओं, खर्चीले यज्ञों और रूढ़िवादिता के विरोध में जैन और बौद्ध धर्म का उदय हुआ।
  • इन दोनों धर्मों ने प्राचीन भारतीय समाज को धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से गहराई से प्रभावित किया।
  • वर्धमान महावीर और गौतम बुद्ध, दोनों ही क्षत्रिय कुल के थे और उन्होंने सत्य की खोज के लिए राजसी ठाट-बाठ का त्याग किया था।
  • इन आंदोलनों ने समाज में जन्म के आधार पर तय होने वाली कठोर जाति व्यवस्था (वर्ण व्यवस्था) पर सीधा प्रहार किया।
  • उन्होंने यह प्रतिपादित किया कि किसी भी व्यक्ति की महानता उसके जन्म से नहीं, बल्कि उसके कर्मों और आचरण से तय होती है।
  • जैन और बौद्ध धर्म ने महिलाओं और समाज के निचले पायदान पर मौजूद शूद्रों को अपने संघों में प्रवेश देकर गरिमा प्रदान की।
  • दोनों ही धर्मों ने समाज को ‘अहिंसा’ (Non-violence) का परम संदेश दिया, जिससे जीव हत्या पर रोक लगाने की प्रेरणा मिली।
  • अहिंसा के इस सिद्धांत ने उस दौर में तेजी से विकसित हो रही कृषि अर्थव्यवस्था को मजबूत किया, क्योंकि खेती के लिए बैलों और पशुओं की रक्षा जरूरी थी।
  • जैन धर्म ने पंचमहाव्रत (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य) और ‘स्याद्वाद’ (अनेकांतवाद) का दार्शनिक सिद्धांत दिया।
  • बौद्ध धर्म ने जीवन के दुखों से मुक्ति के लिए ‘चार आर्य सत्य’ और व्यावहारिक ‘अष्टांगिक मार्ग’ (मध्यम मार्ग) की शिक्षा दी।
  • इन धर्मों ने उस समय की जटिल संस्कृत भाषा के स्थान पर आम जनता की लोकभाषाओं जैसे प्राकृत (जैन) और पालि (बौद्ध) को अपनाया।
  • स्थानीय भाषाओं के इस उपयोग के कारण आम लोगों तक ज्ञान का प्रसार हुआ और बड़े पैमाने पर समृद्ध लोक साहित्य की रचना हुई।
  • बौद्ध धर्म के त्रिपिटक (सुत्त, विनय, अभिधम्म) और जैन धर्म के ‘अंग’ ग्रंथ प्राचीन इतिहास को जानने के महत्वपूर्ण साहित्यिक स्रोत हैं।
  • इन मतों के प्रभाव से वास्तुकला के क्षेत्र में स्तूपों, चैत्यों (प्रार्थना गृह) और विहारों (भिक्षुओं के निवास) के निर्माण की भव्य शुरुआत हुई।
  • सांची और अमरावती के स्तूप तथा अजंता-एलोरा की गुफाएं आज भी इनकी अद्वितीय कलात्मक और सांस्कृतिक विरासत की गवाह हैं।
  • शिक्षा के क्षेत्र में इन धर्मों के योगदान से नालंदा, विक्रमशिला और तक्षशिला जैसे विश्व प्रसिद्ध विश्वविद्यालय स्थापित हुए।
  • मौर्य सम्राट अशोक और कुषाण राजा कनिष्क जैसे महान शासकों ने बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया और इसके प्रसार में भूमिका निभाई।
  • राजाओं और व्यापारियों के सहयोग से बौद्ध धर्म भारत की सीमाओं को लांघकर चीन, जापान, श्रीलंका और मध्य एशिया तक फैल गया।
  • जैन धर्म ने भी पश्चिमी और दक्षिणी भारत के कला, साहित्य और व्यापारिक समुदायों को नैतिक रूप से सुदृढ़ करने में अमूल्य योगदान दिया।
  • संक्षेप में, जैन और बौद्ध धर्म की इस ऐतिहासिक भूमिका ने भारतीय उपमहाद्वीप को एक सहिष्णु, तार्किक और समतावादी सांस्कृतिक पहचान दी।

Leave a Comment