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संगठन, संस्थान व संग्रहालय

प्रमुख संगठन

  • उत्तराखंड के सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक उत्थान में विभिन्न स्थानीय व प्रादेशिक संगठनों ने ऐतिहासिक भूमिका निभाई है।
  • वर्ष 1870 में अल्मोड़ा में स्थापित ‘डिबेटिंग क्लब’ को उत्तराखंड में राजनीतिक और सामाजिक चेतना का प्रारंभिक मंच माना जाता है।
  • पंडित गोविंद बल्लभ पंत और हरगोविंद पंत के प्रयासों से वर्ष 1903 में युवाओं को संगठित करने के लिए ‘हैप्पी क्लब’ की स्थापना की गई थी।
  • तारादत्त गैरोला द्वारा वर्ष 1904 में गठित ‘सरोला सभा’ गढ़वाल क्षेत्र की प्रथम जाति-आधारित समाज सुधारक संस्था थी।
  • दलितों और शिल्पकारों के सामाजिक उत्थान तथा अधिकारों के संघर्ष के लिए वर्ष 1905 में ‘टम्टा सुधार सभा’ का गठन किया गया था।
  • मथुरा प्रसाद नैथानी द्वारा वर्ष 1907 में लखनऊ में ‘गढ़वाल भ्रातृमंडल’ की स्थापना की गई, जिसकी पहली बैठक कोटद्वार में हुई थी।
  • स्थानीय समस्याओं को उठाने और स्वतंत्रता संग्राम को गति देने के लिए 30 सितंबर 1916 को ऐतिहासिक ‘कुमाऊँ परिषद्’ की स्थापना हुई।
  • कुमाऊँ परिषद् ने कुली बेगार जैसी दमनकारी प्रथा के उन्मूलन में अग्रणी भूमिका निभाई और अंततः 1926 में इसका विलय कांग्रेस में हो गया।
  • वर्ष 1901 में स्थापित ‘गढ़वाल यूनियन’ (गढ़वाल हितकारिणी सभा) ने गढ़वाल क्षेत्र में शिक्षा और राजनीतिक जागृति का प्रसार किया।
  • श्रीदेव सुमन ने वर्ष 1938 में दिल्ली में ‘गढ़देश सेवा संघ’ की स्थापना की, जिसका मुख्य उद्देश्य राजशाही के विरुद्ध संघर्ष करना था।
  • वर्ष 1967 में रामनगर में दया कृष्ण पांडे की अध्यक्षता में ‘पर्वतीय राज्य परिषद्’ का गठन कर पृथक राज्य की मांग को तेज किया गया।
  • पृथक उत्तराखंड राज्य आंदोलन को पूरी तरह संगठित करने में वर्ष 1979 में मसूरी में गठित ‘उत्तराखण्ड क्रांति दल’ (उक्रांद) की भूमिका केंद्रीय रही।
  • उक्रांद के प्रथम अध्यक्ष डॉ. देवी दत्त पंत थे, जिन्होंने पर्वतीय जिलों को मिलाकर एक अलग राज्य बनाने के आंदोलन का नेतृत्व किया।
  • पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में वर्ष 1964 में चंडी प्रसाद भट्ट द्वारा गोपेश्वर में स्थापित ‘दशोली ग्राम स्वराज्य मंडल’ एक विश्व प्रसिद्ध संगठन है।
  • इस संगठन ने वनों के कटान को रोकने के लिए वर्ष 1973-74 में शुरू हुए ऐतिहासिक ‘चिपको आंदोलन’ की मजबूत नींव रखी थी।
  • राज्य के क्षेत्रीय विकास और पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 1976 में गढ़वाल (GMVN) और कुमाऊँ (KMVN) मंडल विकास निगमों की स्थापना की गई।
  • देहरादून में वर्ष 1906 में स्थापित ‘वन अनुसंधान संस्थान’ (FRI) वानिकी और वन उत्पादों पर अनुसंधान करने वाला देश का प्रमुख संस्थान है।
  • भारत का सबसे पुराना वैज्ञानिक विभाग ‘भारतीय सर्वेक्षण विभाग’ (1767) भी वर्तमान में देहरादून में अपने मुख्य कार्यालय के साथ संचालित है।
  • हिमालयी भूविज्ञान पर उन्नत शोध के लिए देहरादून में ‘वाड़िया हिमालय भूविज्ञान संस्थान’ (1968) एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्वायत्त केंद्र है।
  • निष्कर्षतः, इन सभी सामाजिक, राजनीतिक और अनुसंधान संगठनों ने देवभूमि उत्तराखंड के इतिहास, अस्मिता और आधुनिक विकास को एक मजबूत आकार दिया है।

उत्तराखंड के प्रमुख संग्रहालय

  • उत्तराखंड के संग्रहालय राज्य की समृद्ध ऐतिहासिक विरासत, लोक संस्कृति, कला और प्राकृतिक विविधता को संरक्षित करने वाले प्रमुख केंद्र हैं।
  • अल्मोड़ा जिले में स्थित ‘पंडित गोविंद बल्लभ पंत राजकीय संग्रहालय’ (1979) कुमाऊं क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर को प्रदर्शित करने वाला एक महत्वपूर्ण स्थल है।
  • इस संग्रहालय में कत्यूरी और चंद राजवंशों के काल की प्राचीन मूर्तियां, सिक्के, पारंपरिक परिधान और दुर्लभ चित्र संरक्षित किए गए हैं।
  • देहरादून में स्थित ‘वन अनुसंधान संस्थान (FRI) संग्रहालय’ वानिकी, लकड़ी के नमूनों और वन कीटों पर आधारित देश का एक अनूठा और ऐतिहासिक संग्रहालय है।
  • एफआरआई के इस विशाल परिसर में मुख्य रूप से छह अलग-अलग विषयगत दीर्घाएं (जैसे पैथोलॉजी, सोशल फॉरेस्ट्री, टिंबर आदि) संचालित हैं।
  • श्रीनगर (पौड़ी गढ़वाल) में स्थित ‘गढ़वाल विश्वविद्यालय संग्रहालय’ के अंतर्गत प्राचीन पुरातात्विक उत्खनन से प्राप्त दुर्लभ कलाकृतियां रखी गई हैं।
  • देहरादून के जौलीग्रांट मार्ग पर स्थित ‘हिमालयन सांस्कृतिक केंद्र संग्रहालय’ राज्य की जनजातीय संस्कृति और लोक कलाओं को जीवंत रूप में दिखाता है।
  • पिथौरागढ़ में स्थित ‘राजकीय संग्रहालय’ भारत-तिब्बत व्यापार, शौका संस्कृति और सीमांत क्षेत्र के ऐतिहासिक हथियारों के संरक्षण के लिए जाना जाता है।
  • पौड़ी गढ़वाल के लैंसडाउन में स्थित ‘दरवान सिंह नेगी सैन्य संग्रहालय’ (1983) गढ़वाल राइफल्स के शौर्य और गौरवशाली इतिहास को समर्पित है।
  • इस सैन्य संग्रहालय में प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के समय के हथियार, पदक, दुर्लभ तस्वीरें और ऐतिहासिक दस्तावेज सुरक्षित रखे गए हैं।
  • देहरादून के गढ़ी कैंट में स्थित ‘वाड़िया हिमालय भूविज्ञान संस्थान संग्रहालय’ चट्टानों, खनिजों और हिमालय की उत्पत्ति से जुड़े जीवाश्मों का प्रमुख केंद्र है।
  • टिहरी गढ़वाल के चम्बा के निकट स्थित ‘गब्बर सिंह नेगी स्मारक संग्रहालय’ प्रथम विश्व युद्ध के विक्टोरिया क्रॉस विजेता वीर सैनिक की स्मृति में बना है।
  • नैनीताल के भीमताल में स्थित ‘तितली संग्रहालय’ (बटरफ्लाई म्यूजियम) फ्रेडरिक स्यमेटा द्वारा स्थापित किया गया था, जिसमें हजारों प्रजातियों की तितलियां हैं।
  • अल्मोड़ा के कौसानी में स्थित ‘सुमित्रानंदन पंत वीथिका’ महान छायावादी कवि की जन्मस्थली है, जहां उनकी पांडुलिपियां और निजी वस्तुएं संरक्षित हैं।
  • चमोली जिले के गोपेश्वर में स्थित ‘जड़ी-बूटी अनुसंधान एवं विकास संस्थान संग्रहालय’ दुर्लभ हिमालयी औषधीय पौधों के नमूनों के लिए प्रसिद्ध है।
  • उत्तरकाशी जिले में स्थित ‘नेहरू पर्वतारोहण संस्थान (NIM) संग्रहालय’ पर्वतारोहण के इतिहास, उपकरणों और साहसिक अभियानों के रिकॉर्ड को प्रदर्शित करता है।
  • ऋषिकेश के परमार्थ निकेतन परिसर में स्थित ‘गंगा संग्रहालय’ नदी के वैज्ञानिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व को चित्रों के माध्यम से दर्शाता है।
  • हरिद्वार में स्थित ‘गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय संग्रहालय’ प्राचीन भारतीय इतिहास, पुरातत्व, आयुर्वेद और वेदों से जुड़े दुर्लभ ग्रंथों का संग्रह प्रस्तुत करता है।
  • ये सभी संग्रहालय शोधकर्ताओं, इतिहासकारों और सिविल सेवा परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों के लिए ज्ञानवर्धन का एक अत्यंत प्रामाणिक स्रोत हैं।
  • निष्कर्षतः, अपनी विशिष्ट विषय-वस्तु के दम पर ये संग्रहालय उत्तराखंड के ऐतिहासिक गौरव और प्राकृतिक संपदा को भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित बनाए हुए हैं।

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