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कल्याणकारी योजनाएँ

उत्तराखंड: शिक्षा संबंधी योजनाएँ

  • उत्तराखंड में शिक्षा के विकास और अवसरों की समानता को बढ़ावा देने के लिए शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) 2009 प्रभावी रूप से लागू है।
  • राज्य में प्रारंभिक और माध्यमिक शिक्षा को सुदृढ़ करने के लिए केंद्र प्रायोजित ‘समग्र शिक्षा अभियान’ एक मुख्य एकीकृत योजना के रूप में संचालित है।
  • इस अभियान के तहत पूर्व-प्राथमिक से लेकर कक्षा 12वीं तक की शिक्षा, शिक्षक प्रशिक्षण और स्कूलों के बुनियादी ढांचे का विकास किया जाता है।
  • वर्ष 2021 में शुरू की गई ‘उत्तराखंड अटल उत्कृष्ट विद्यालय योजना’ के तहत प्रत्येक ब्लॉक में दो मॉडल स्कूल विकसित किए जा रहे हैं।
  • इस योजना का मुख्य लक्ष्य कुल 189 राजकीय विद्यालयों को उत्कृष्ट केंद्र बनाकर सीबीएसई (CBSE) पैटर्न पर अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा देना है।
  • मेधावी छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करने तथा बोर्ड परीक्षाओं में शानदार प्रदर्शन पर ‘मुख्यमंत्री प्रतिभा प्रोत्साहन योजना’ के तहत वित्तीय सहायता दी जाती है।
  • ‘उत्तराखंड ज्ञानकोष योजना’ (2020) के अंतर्गत छात्रों के लिए ई-कंटेंट, वीडियो लेक्चर और डिजिटल लर्निंग संसाधनों का ऑनलाइन भंडार तैयार किया गया है।
  • बालिकाओं के जन्म और शिक्षा को बढ़ावा देने तथा लिंगानुपात में सुधार के लिए राज्य में ‘नंदा गौरा योजना’ संचालित की जा रही है।
  • दूरस्थ क्षेत्रों की छात्राओं को स्कूल आने-जाने की सुविधा प्रदान करने के उद्देश्य से सरकार द्वारा ‘साइकिल योजना’ भी चलाई जा रही है।
  • स्कूलों में बच्चों का नामांकन बढ़ाने और बीच में पढ़ाई छोड़ने (ड्रॉपआउट) की दर को कम करने के लिए ‘स्कूल चलो अभियान’ चलाया जाता है।
  • प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में बच्चों के पोषण और उपस्थिति को सुनिश्चित करने के लिए ‘मिड-डे मील योजना’ लागू है।
  • शिक्षा की गुणवत्ता, छात्रों के प्रदर्शन और स्कूल प्रबंधन की डेटा-आधारित निगरानी के लिए ‘उत्तराखंड विद्या समीक्षा केंद्र’ की स्थापना की गई है।
  • उच्च शिक्षा के क्षेत्र में आर्थिक रूप से कमजोर और मेधावी छात्रों के लिए ‘मुख्यमंत्री उच्च शिक्षा प्रोत्साहन छात्रवृत्ति योजना’ संचालित है।
  • राज्य के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के बुनियादी ढांचे तथा शोध की गुणवत्ता में सुधार के लिए केंद्रीय योजना ‘रूसा’ (RUSA) कार्यरत है।
  • उच्च शिक्षण संस्थानों में शोध एवं अनुसंधान को गति देने के लिए ‘उत्तराखंड विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद्’ (UCOST) द्वारा अनुदान दिए जाते हैं।
  • राज्य सरकार द्वारा उच्च शिक्षा में आधुनिक सुधारों को लागू करने के लिए ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020’ (NEP) का प्रभावी क्रियान्वयन किया जा रहा है।
  • युवाओं को विभिन्न क्षेत्रों में लघु और दीर्घकालिक प्रशिक्षण देकर रोजगार योग्य बनाने हेतु ‘उत्तराखंड कौशल विकास मिशन’ (UKSDM) सक्रिय है।
  • तकनीकी शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए राज्य के पॉलिटेक्निक और आईटीआई (ITI) संस्थानों का निरंतर उन्नयन किया जा रहा है।
  • पारंपरिक शिल्पों और कलाओं में युवाओं तथा स्थानीय कारीगरों को प्रशिक्षित कर आत्मनिर्भर बनाने के लिए ‘मुख्यमंत्री हुनर योजना’ चलाई जा रही है।
  • निष्कर्षतः, ये सभी योजनाएं उत्तराखंड के मानव संसाधन को समृद्ध बनाने और सुदूर पर्वतीय क्षेत्रों में बेहतर शैक्षिक भविष्य तैयार करने में महत्वपूर्ण हैं।

स्वास्थ्य और कल्याण योजनाएँ

  • उत्तराखंड जैसे विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाले राज्य में सुदूर पर्वतीय क्षेत्रों तक बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं पहुँचाना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है।
  • राज्य में स्वास्थ्य क्षेत्र के व्यापक सुधार के लिए ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन’ (NHM) के तहत विभिन्न स्वास्थ्य उप-केंद्रों और प्राथमिक चिकित्सा केंद्रों को सुदृढ़ किया जा रहा है।
  • ‘आयुष्मान भारत – प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना’ के तहत राज्य के गरीब और वंचित परिवारों को प्रतिवर्ष 5 लाख रुपये तक का मुफ्त इलाज प्रदान किया जाता है।
  • इस योजना के दायरे को बढ़ाते हुए राज्य सरकार ने अपनी महत्वाकांक्षी ‘अटल आयुष्मान उत्तराखंड योजना’ शुरू की, जिसके तहत राज्य के सभी परिवारों को कैशलेस स्वास्थ्य सुरक्षा दी गई है।
  • आयुष्मान योजना के सफल क्रियान्वयन के लिए राज्य में ‘राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण’ (SHA) को नोडल एजेंसी बनाया गया है।
  • मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को कम करने के लिए ‘जननी सुरक्षा योजना’ (JSY) के तहत सरकारी अस्पतालों में सुरक्षित संस्थागत प्रसव को बढ़ावा दिया जा रहा है।
  • ‘जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम’ (JSSK) के अंतर्गत गर्भवती महिलाओं और बीमार नवजात शिशुओं को पूरी तरह से मुफ्त इलाज, दवाइयाँ और भोजन उपलब्ध कराया जाता है।
  • राज्य के दूरस्थ और दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में आपातकालीन चिकित्सा सेवा के लिए ‘108 आपातकालीन सेवा’ (जिसे दीनदयाल उपाध्याय जी के नाम पर शुरू किया गया था) जीवनदायिनी सिद्ध हुई है।
  • गर्भवती महिलाओं को सुरक्षित प्रसव के लिए अस्पताल पहुँचाने और प्रसव के बाद घर छोड़ने के लिए ‘खुशियों की सवारी’ (डोली सेवा) जैसी अभिनव योजनाएं संचालित हैं।
  • महिलाओं और बच्चों में कुपोषण तथा एनीमिया की समस्या को दूर करने के लिए ‘मुख्यमंत्री आंचल अमृत योजना’ के तहत आंगनवाड़ी केंद्रों में बच्चों को हफ्ते में सुगंधित दूध दिया जाता है।
  • नवजात बालिकाओं के संरक्षण और उनकी शिक्षा व सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से राज्य में ‘नंदा गौरा योजना’ के तहत वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।
  • बच्चों में जन्मजात बीमारियों, कमियों और विकास में देरी की जल्द पहचान करने के लिए ‘राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम’ (RBSK) के तहत स्कूलों और आंगनवाड़ियों में स्वास्थ्य जांच की जाती है।
  • राज्य के वरिष्ठ नागरिकों, विधवाओं और दिव्यांगजनों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से समाज कल्याण विभाग द्वारा मासिक पेंशन योजनाएं संचालित की जा रही हैं।
  • ग्रामीण और सुदूर क्षेत्रों में स्वास्थ्य विशेषज्ञों की कमी को पूरा करने के लिए ‘टेली-मेडिसिन’ और ‘ई-संजीवनी’ जैसी डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं को तेजी से बढ़ावा दिया जा रहा है।
  • ‘मुख्यमंत्री वात्सल्य योजना’ के तहत कोविड-19 महामारी के दौरान अपने माता-पिता को खोने वाले अनाथ बच्चों को भरण-पोषण भत्ता और मुफ्त शिक्षा दी जा रही है।
  • राज्य में आम जनता को सस्ती और उच्च गुणवत्ता वाली जेनेरिक दवाइयाँ उपलब्ध कराने के लिए ‘प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि केंद्र’ स्थापित किए गए हैं।
  • गंभीर बीमारियों जैसे कैंसर, किडनी फेलियर और हृदय रोगों के इलाज के लिए वित्तीय रूप से कमजोर मरीजों को ‘राज्य लोक सेवा कल्याण कोष’ से आर्थिक मदद दी जाती है।
  • पर्वतीय क्षेत्रों में डॉक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए सरकार द्वारा चिकित्सा शिक्षा प्राप्त कर रहे छात्रों के लिए अनिवार्य बांड नीति लागू की गई है।
  • ‘मुख्यमंत्री स्वास्थ्य बीमा योजना’ और अन्य क्षेत्रीय कल्याणकारी पहलों के माध्यम से समाज के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति तक चिकित्सा सुरक्षा पहुँचाई जा रही है।
  • संक्षेप में, ये सभी स्वास्थ्य और कल्याणकारी योजनाएं उत्तराखंड में एक स्वस्थ, आत्मनिर्भर और सामाजिक रूप से सुरक्षित समाज के निर्माण का मुख्य आधार हैं।

महिला सशक्तिकरण और कल्याण

  • उत्तराखंड के पर्वतीय समाज और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भूमिका हमेशा से रीढ़ की हड्डी के समान रही है।
  • महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने और उनके अधिकारों के संरक्षण के लिए राज्य में महिला अधिकारिता और बाल विकास विभाग नोडल एजेंसी के रूप में कार्य करता है।
  • राज्य में बालिकाओं के जन्म, संरक्षण और उनकी उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए ‘नंदा गौरा योजना’ एक अत्यंत महत्वाकांक्षी पहल है।
  • इस योजना के तहत पात्र बालिकाओं को जन्म के समय और स्नातक या 12वीं कक्षा उत्तीर्ण करने पर दो अलग-अलग चरणों में वित्तीय सहायता दी जाती है।
  • महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए ‘मुख्यमंत्री महिला सतत आजीविका योजना’ और स्वयं सहायता समूहों (SHGs) को बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया जा रहा है।
  • ग्रामीण महिलाओं को स्थानीय उत्पादों के विपणन और स्वरोजगार से जोड़ने के लिए ‘उत्तराखंड आजीविका मिशन’ प्रभावी ढंग से कार्य कर रहा है।
  • ‘मुख्यमंत्री आंचल अमृत योजना’ के माध्यम से गर्भवती महिलाओं और धात्री माताओं के साथ-साथ आंगनवाड़ी के बच्चों को पोषण युक्त आहार दिया जाता है।
  • संकटग्रस्त, निराश्रित और घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं को तत्काल आश्रय, कानूनी सहायता और परामर्श देने के लिए ‘वन स्टॉप सेंटर’ स्थापित किए गए हैं।
  • संकट के समय महिलाओं की त्वरित सहायता और आपातकालीन सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ‘181 महिला हेल्पलाइन’ सेवा चौबीसों घंटे संचालित है।
  • महिलाओं को पारंपरिक और आधुनिक व्यवसायों में प्रशिक्षित कर उन्हें रोजगार योग्य बनाने के लिए विशेष कौशल विकास कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं (आशा बहुओं) को उनके सराहनीय योगदान के लिए विशेष प्रोत्साहन और वित्तीय लाभ दिए जाते हैं।
  • उत्तराखंड सरकार ने महिलाओं को राजनीतिक रूप से सशक्त करने के लिए पंचायती राज संस्थाओं में 50 प्रतिशत आरक्षण का ऐतिहासिक प्रावधान किया है।
  • इस 50% राजनीतिक आरक्षण के कारण ग्रामीण स्तर पर नीति-निर्माण और निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में महिलाओं की भागीदारी अभूतपूर्व रूप से बढ़ी है।
  • राज्य की सरकारी नौकरियों में स्थानीय महिलाओं को 30 प्रतिशत क्षैतिज (Horizontal) आरक्षण प्रदान करने के लिए विशेष कानून लागू किया गया है।
  • ‘पति की पैतृक संपत्ति में पत्नी को सह-खातेदार (Co-owner)’ बनाने का अधिकार देने वाला उत्तराखंड देश का पहला राज्य बना है।
  • इस भूमि सुधार अधिकार के जरिए ग्रामीण महिलाओं को बैंक ऋण प्राप्त करने और आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने में बड़ी मदद मिल रही है।
  • कामकाजी महिलाओं के बच्चों की सुरक्षित देखरेख के लिए प्रमुख शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों में क्रैच (पालना घर) सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है।
  • विधवा महिलाओं को सम्मानजनक जीवन जीने और सामाजिक सुरक्षा देने के लिए समाज कल्याण विभाग द्वारा मासिक विधवा पेंशन योजना संचालित है।
  • ‘मुख्यमंत्री महालक्ष्मी किट योजना’ के तहत प्रसव के बाद माता और नवजात शिशु के उचित पालन-पोषण के लिए आवश्यक सामग्रियों की किट दी जाती है।
  • निष्कर्षतः, ये सभी कल्याणकारी और कानूनी कदम उत्तराखंड की महिलाओं को सामाजिक बंधनों से मुक्त कर उन्हें राज्य के विकास में समान भागीदार बना रहे हैं।

कृषि और ग्रामीण विकास योजनाएँ

  • उत्तराखंड की अधिकांश ग्रामीण आबादी आजीविका के लिए कृषि और उससे संबद्ध क्षेत्रों पर प्रत्यक्ष रूप से निर्भर है।
  • राज्य की विषम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण पारंपरिक खेती के स्थान पर टिकाऊ और नवीन कृषि पद्धतियों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
  • ‘प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना’ (PMKSY) के तहत जल संकट वाले पर्वतीय क्षेत्रों में ड्रिप और स्प्रिंकलर (टपकन और बौछार) सिंचाई प्रणालियों का विस्तार किया जा रहा है।
  • राज्य में मिट्टी की गुणवत्ता और पोषण स्तर की जांच के लिए किसानों को ‘मृदा स्वास्थ्य कार्ड’ (Soil Health Card) वितरित किए जाते हैं।
  • ‘पारंपरिक कृषि विकास योजना’ (PKVY) के अंतर्गत उत्तराखंड को पूरी तरह से एक ‘जैविक राज्य’ (Organic State) के रूप में विकसित करने पर विशेष बल दिया जा रहा है।
  • जैविक कृषि को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार द्वारा रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर केंचुआ खाद (वर्मीकंपोस्ट) के उपयोग को प्रोत्साहित किया जाता है।
  • किसानों को कृषि कार्यों के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से ‘मुख्यमंत्री राज्य कृषि विकास योजना’ संचालित की जा रही है।
  • ‘दीनदयाल उपाध्याय सहकारिता किसान कल्याण योजना’ के तहत किसानों को कृषि, बागवानी और पशुपालन के लिए ब्याज मुक्त (0% ब्याज पर) ऋण दिया जाता है।
  • पर्वतीय क्षेत्रों में बेमौसम सब्जियों, फूलों की खेती और बागवानी को बढ़ावा देने के लिए ‘स्टेट हॉर्टिकल्चर मिशन’ सक्रियता से काम कर रहा है।
  • सेब, कीवी और आड़ू जैसी नकदी फसलों के उत्पादन को बढ़ाने के लिए किसानों को उच्च गुणवत्ता वाले पौधे और तकनीकी प्रशिक्षण दिए जा रहे हैं।
  • आवारा पशुओं और जंगली जानवरों (जैसे बंदर और सुअर) से फसलों की रक्षा के लिए सरकार द्वारा ‘मुख्यमंत्री सौर स्वरोजगार योजना’ के तहत फेंसिंग (बाड़बंदी) के लिए सब्सिडी दी जाती है।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में दूध उत्पादन को बढ़ाने और डेयरी क्षेत्र को मजबूत करने के लिए ‘गंगा गाय महिला डेयरी योजना’ और ‘आंचल डेयरी’ जैसी पहलें लागू हैं।
  • ‘राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन’ (NRLM) के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों (SHGs) से जोड़कर उनके स्थानीय उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराया जा रहा है।
  • ग्रामीण युवाओं को कृषि और संबंधित व्यवसायों में स्वरोजगार शुरू करने के लिए ‘मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना’ (MSY) के तहत ऋण और वित्तीय अनुदान दिया जाता है।
  • सुदूरवर्ती पहाड़ी गांवों को मुख्य मार्गों और विकास केंद्रों से जोड़ने के लिए ‘प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना’ (PMGSY) ग्रामीण विकास की जीवन रेखा बनी हुई है।
  • ‘महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम’ (मनरेगा) ग्रामीण क्षेत्रों में 100 दिनों का सुनिश्चित रोजगार और टिकाऊ संपत्तियों का निर्माण कर रहा है।
  • ग्रामीण आवास सुरक्षा के लिए ‘प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण’ (PMAY-G) के तहत बेघर और कच्चे मकानों में रहने वाले परिवारों को पक्के घर दिए जा रहे हैं।
  • ‘दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना’ के माध्यम से राज्य के शत-प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों और दूरस्थ तोकों (हैमलेट्स) का विद्युतीकरण सुनिश्चित किया गया है।
  • कृषि उत्पादों के बेहतर भंडारण और विपणन के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में कोल्ड स्टोरेज (शीत गृह) और एकीकृत मंडियों का नेटवर्क तैयार किया जा रहा है।
  • संक्षेप में, ये सभी कृषि और ग्रामीण विकास योजनाएं उत्तराखंड के गांवों से होने वाले पलायन को रोकने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाने का मुख्य जरिया हैं।

सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ

  • उत्तराखंड में सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का मुख्य उद्देश्य समाज के अंतिम छोर पर खड़े वंचित और संवेदनशील वर्गों को वित्तीय सहायता प्रदान करना है।
  • राज्य में वृद्धजनों को सम्मानजनक जीवन जीने और आर्थिक संबल देने के लिए ‘वृद्धावस्था पेंशन योजना’ संचालित की जा रही है।
  • इस योजना के तहत 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के पात्र बुजुर्गों को सरकार द्वारा मासिक वित्तीय पेंशन सीधे उनके बैंक खातों में दी जाती है।
  • पति की मृत्यु के बाद बेसहारा और निराश्रित महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए राज्य में ‘विधवा पेंशन योजना’ लागू है।
  • इस योजना का लाभ उन महिलाओं को मिलता है जिनके पास आजीविका का कोई साधन नहीं है और वे गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही हैं।
  • शारीरिक या मानसिक रूप से अक्षम व्यक्तियों को दैनिक जीवन की आवश्यकताओं के लिए ‘दिव्यांग पेंशन योजना’ के माध्यम से सहायता दी जाती है।
  • न्यूनतम 40 प्रतिशत या उससे अधिक की दिव्यांगता से प्रभावित व्यक्ति इस मासिक वित्तीय सहायता योजना के पात्र माने जाते हैं।
  • जन्म से मूक-बधिर या दृष्टिबाधित बच्चों के भरण-पोषण और शिक्षा के लिए भी सरकार द्वारा विशेष आर्थिक भत्ते का प्रावधान किया गया है।
  • अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के गरीब परिवारों की बेटियों के विवाह के लिए ‘गौरा देवी कन्याधन योजना’ (अब नंदा गौरा योजना का हिस्सा) के तहत वित्तीय अनुदान दिया जाता है।
  • सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर (BPL) परिवारों की बेटियों की शादी के लिए ‘राष्ट्रीय पारिवारिक लाभ योजना’ और ‘अन्तरजातीय विवाह प्रोत्साहन योजना’ संचालित हैं।
  • अन्तरजातीय और अन्तरधार्मिक विवाह को बढ़ावा देकर सामाजिक समरसता स्थापित करने के लिए दंपत्तियों को सरकार द्वारा एकमुश्त प्रोत्साहन राशि दी जाती है।
  • गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों के मुख्य कमाऊ सदस्य की प्राकृतिक या दुर्घटना में मृत्यु होने पर परिवार को एकमुश्त सहायता राशि दी जाती है।
  • राज्य के अनाथ, लावारिस और संकटग्रस्त बच्चों के संरक्षण व पुनर्वास के लिए विभिन्न बाल गृहों और शिशु सदनों का संचालन किया जा रहा है।
  • कोविड-19 महामारी के दौरान अपने माता-पिता को खोने वाले अनाथ बच्चों के लिए शुरू की गई ‘मुख्यमंत्री वात्सल्य योजना’ सामाजिक सुरक्षा का एक बड़ा उदाहरण है।
  • वात्सल्य योजना के तहत इन अनाथ बच्चों को 21 वर्ष की आयु तक भरण-पोषण भत्ता, निःशुल्क शिक्षा और नौकरियों में क्षैतिज आरक्षण दिया जाता है।
  • समाज कल्याण विभाग द्वारा अनुसूचित जाति और जनजाति के छात्रों के लिए छात्रवृत्ति योजनाएं चलाई जा रही हैं ताकि वे बिना किसी वित्तीय बाधा के शिक्षा पूरी कर सकें।
  • इन वर्गों के युवाओं को स्वरोजगार और विभिन्न व्यवसायों की स्थापना के लिए बेहद कम ब्याज दरों पर ऋण और तकनीकी प्रशिक्षण भी दिया जाता है।
  • सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में पारदर्शिता लाने और बिचौलियों को समाप्त करने के लिए सभी पेंशनों का भुगतान ‘प्रत्यक्ष लाभ अंतरण’ (DBT) के माध्यम से किया जाता है।
  • इन कल्याणकारी योजनाओं के सुचारू संचालन और आवेदनों के त्वरित निस्तारण के लिए प्रत्येक जिले में जिला समाज कल्याण अधिकारी को नोडल बनाया गया है।
  • संक्षेप में, ये सभी सामाजिक सुरक्षा योजनाएं उत्तराखंड को एक कल्याणकारी और संवेदनशील राज्य बनाने की दिशा में सरकार का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रभावी कदम हैं।

पर्यटन और सांस्कृतिक संरक्षण

  • उत्तराखंड अपनी अलौकिक प्राकृतिक सुंदरता और पवित्र तीर्थस्थलों के कारण वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर एक विशिष्ट स्थान रखता है।
  • राज्य की अर्थव्यवस्था, रोजगार और क्षेत्रीय पहचान को बनाए रखने में पर्यटन उद्योग सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ माना जाता है।
  • उत्तराखंड को “देवभूमि” कहा जाता है, जहाँ बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री की चारधाम यात्रा पर्यटन का मुख्य केंद्र है।
  • कुमाऊं क्षेत्र में स्थित जागेश्वर धाम, बागनाथ मंदिर और आदि कैलाश यात्रा धार्मिक पर्यटन के अन्य प्रमुख आकर्षण हैं।
  • धार्मिक पर्यटन के साथ-साथ राज्य सरकार पर्यावरण को बिना नुकसान पहुँचाए ‘इको-टूरिज्म’ (पारिस्थितिक पर्यटन) को बड़े पैमाने पर बढ़ावा दे रही है।
  • जैव विविधता के संरक्षण और वन्यजीव पर्यटन के लिए प्रसिद्ध ‘जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क’ और ‘राजाजी नेशनल पार्क’ हर साल लाखों पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।
  • यूनेस्को (UNESCO) की विश्व धरोहर सूची में शामिल ‘फूलों की घाटी’ (वैली ऑफ फ्लावर्स) अपनी दुर्लभ हिमालयी वनस्पतियों के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है।
  • साहसिक पर्यटन (Adventure Tourism) के अंतर्गत ऋषिकेश को भारत की ‘राफ्टिंग कैपिटल’ और औली को शीतकालीन खेलों (स्कीइंग) के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित किया गया है।
  • पर्वतारोहण, ट्रैकिंग और पैराग्लाइडिंग जैसी गतिविधियों के लिए उत्तरकाशी, पिथौरागढ़ और बागेश्वर की उच्च हिमालयी घाटियों में विशेष सुविधाएं तैयार की जा रही हैं।
  • ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और पलायन को रोकने के लिए राज्य सरकार द्वारा ‘होमस्टे योजना’ (Deendayal Upadhyay Homestay Scheme) चलाई जा रही है।
  • इस होमस्टे योजना के माध्यम से पर्यटकों को उत्तराखंड के पारंपरिक ग्रामीण जीवन, संस्कृति और स्थानीय व्यंजनों का सीधा अनुभव मिलता है।
  • राज्य की प्राचीन लोक संस्कृति, पारंपरिक वास्तुकला (जैसे कुमाऊँनी और गढ़वाली शैली के मकान) और काष्ठ कला के संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
  • उत्तराखंड के प्रसिद्ध लोक नृत्यों जैसे छोलिया, झोड़ा, थड्या और चौंफला को वैश्विक मंचों पर प्रदर्शित कर बढ़ावा दिया जा रहा है।
  • ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व वाले ‘कुंभ मेला’ (हरिद्वार) और यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत में शामिल ‘रम्माण उत्सव’ (चमोली) राज्य की धरोहर हैं।
  • नंदा देवी राजजात यात्रा, जो प्रत्येक 12 वर्ष में आयोजित होती है, उत्तराखंड की अनूठी सांस्कृतिक एकता और आस्था का सबसे बड़ा प्रतीक है।
  • स्थानीय त्योहारों जैसे हरेला (कुमाऊं का पर्यावरण उत्सव), इगास बग्वाल और फूलदेई को राजकीय स्तर पर मनाकर नई पीढ़ी को संस्कृति से जोड़ा जा रहा है।
  • पारंपरिक हस्तशिल्प, जैसे भोटिया समुदाय के ऊनी वस्त्र, ऐंपण (पारंपरिक लोक कला) और रिंगाल शिल्प के विपणन के लिए विशेष मंच उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
  • पर्यटन को सुगम और सुरक्षित बनाने के लिए सरकार ‘चारधाम ऑल-वेदर रोड’ और ‘ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना’ जैसे बुनियादी ढांचे का तेजी से विकास कर रही है।
  • संवेदनशील पर्वतीय पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए कचरा प्रबंधन और प्लास्टिक नियंत्रण पर्यटन स्थलों के लिए एक बड़ी चुनौती और प्राथमिकता है।
  • अंततः, आधुनिक सुविधाओं और सांस्कृतिक विरासत के बीच संतुलन बनाकर ही उत्तराखंड एक सतत और जिम्मेदार पर्यटन राज्य के रूप में विकसित हो रहा है।

पर्यावरण संरक्षण और आपदा प्रबंधन

  • उत्तराखंड अपनी समृद्ध जैव विविधता और हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के कारण पर्यावरण संरक्षण के दृष्टिकोण से अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण राज्य है।
  • राज्य का एक बड़ा हिस्सा वनों से आच्छादित है, जो न केवल स्थानीय पर्यावरण बल्कि पूरे उत्तर भारत की नदी प्रणालियों को नियंत्रित करता है।
  • पर्यावरण संरक्षण की दिशा में उत्तराखंड का इतिहास गौरवशाली रहा है, जहाँ वनों की कटाई रोकने के लिए ऐतिहासिक ‘चिपको आंदोलन’ की शुरुआत हुई थी।
  • वर्तमान में पर्यावरण चेतना को बढ़ावा देने के लिए राज्य में ‘हरेला’ जैसे पारंपरिक त्योहारों को व्यापक वृक्षारोपण अभियान के रूप में मनाया जाता है।
  • इसके साथ ही पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक सरोकार को जोड़ने वाला विशिष्ट ‘मैती आंदोलन’ भी राज्य की एक अनूठी सांस्कृतिक और व्यावहारिक पहल है।
  • उत्तराखंड अपनी भूवैज्ञानिक संरचना के कारण भूकंपीय क्षेत्र (ज़ोन 4 और 5) में आता है, जिससे यह भूकंप के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है।
  • संवेदनशील स्थलाकृति और जलवायु परिवर्तन के कारण राज्य को हर साल भूस्खलन, बादल फटने और आकस्मिक बाढ़ जैसी गंभीर प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ता है।
  • वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा और 2021 की चमोली आपदा ने राज्य में सुदृढ़ आपदा प्रबंधन प्रणाली की आवश्यकता को रेखांकित किया है।
  • आपदाओं के त्वरित और प्रभावी प्रबंधन के लिए राज्य में ‘उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण’ (USDMA) नोडल संस्था के रूप में कार्यरत है।
  • किसी भी आपदा के समय राहत और बचाव कार्यों को तत्काल संचालित करने के लिए ‘राज्य आपदा प्रतिवादन बल’ (SDRF) का गठन किया गया है।
  • सुदूर पर्वतीय क्षेत्रों में आपदा की पूर्व चेतावनी देने के लिए मौसम विभाग के सहयोग से डॉपलर रडार और पूर्व चेतावनी प्रणालियाँ (Early Warning Systems) स्थापित की जा रही हैं।
  • आपदा न्यूनीकरण एवं प्रबंधन केंद्र (DMMC) द्वारा स्थानीय समुदायों और स्कूल-कॉलेजों के छात्रों को आपदा प्रबंधन का नियमित प्रशिक्षण दिया जाता है।
  • पर्वतीय ढलानों पर भूस्खलन को रोकने के लिए जैव-इंजीनियरिंग (Bio-Engineering) तकनीकों और सुरक्षा दीवारों के निर्माण पर विशेष बल दिया जा रहा है।
  • संवेदनशील नदी घाटियों और जलविद्युत परियोजना क्षेत्रों में पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) को कड़ाई से लागू करना राज्य सरकार की प्राथमिकता है।
  • पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ वनों को दावानल (जंगल की आग) से बचाना उत्तराखंड के वन विभाग के सामने एक बहुत बड़ी वार्षिक चुनौती है।
  • जंगल की आग पर नियंत्रण पाने के लिए स्थानीय ग्रामीणों (वन पंचायतों) की भागीदारी और आधुनिक उपग्रह आधारित अलर्ट प्रणाली का उपयोग किया जा रहा है।
  • नदियों को प्रदूषण मुक्त रखने और उनके पारिस्थितिक प्रवाह को बनाए रखने के लिए ‘नमामी गंगे’ जैसी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय योजनाएं सक्रिय हैं।
  • राज्य में बढ़ते शहरीकरण और पर्यटन के दबाव को देखते हुए ठोस अपशिष्ट प्रबंधन और प्लास्टिक पर प्रतिबंध के नियमों को कड़ा किया जा रहा है।
  • ‘इको-सेंसिटिव ज़ोन’ (पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों) की घोषणा के माध्यम से अति-संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों में अनियंत्रित निर्माण कार्यों को रोका जा रहा है।
  • संक्षेप में, सतत विकास नीतियों और मजबूत आपदा प्रबंधन के बीच सही संतुलन बनाकर ही उत्तराखंड अपने बहुमूल्य पर्यावरण और मानव जीवन की रक्षा कर सकता है।

शहरी विकास और बुनियादी ढाँचा

  • उत्तराखंड में आर्थिक गतिविधियों के बढ़ने और मैदानी क्षेत्रों की ओर जनसांख्यिकीय बदलाव के कारण शहरीकरण की गति अत्यंत तीव्र हुई है।
  • राज्य का शहरी विकास मुख्य रूप से देहरादून, हरिद्वार, रुड़की, हल्द्वानी और रुद्रपुर जैसे मैदानी व तराई क्षेत्रों में केंद्रित है।
  • शहरी क्षेत्रों के योजनाबद्ध और व्यवस्थित विकास के लिए राज्य में ‘शहरी विकास विभाग’ और विभिन्न विकास प्राधिकरण नोडल एजेंसी के रूप में कार्यरत हैं।
  • केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी ‘स्मार्ट सिटी मिशन’ के तहत राज्य की राजधानी देहरादून को एक आधुनिक और सुविधायुक्त शहर के रूप में विकसित किया जा रहा है।
  • देहरादून स्मार्ट सिटी परियोजना के अंतर्गत एकीकृत कमान और नियंत्रण केंद्र (ICCC), स्मार्ट वाटर मैनेजमेंट और ग्रीन मोबिलिटी पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
  • शहरों में बुनियादी ढांचागत सुधारों, जल आपूर्ति और सीवरेज नेटवर्क को मजबूत करने के लिए ‘अमृत’ (AMRUT) योजना प्रभावी रूप से लागू है।
  • शहरी क्षेत्रों को झुग्गी-झोपड़ियों से मुक्त करने और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को पक्के मकान देने के लिए ‘प्रधानमंत्री आवास योजना-शहरी’ (PMAY-U) संचालित है।
  • शहरी बेघरों को आश्रय और बुनियादी सुविधाएं प्रदान करने के लिए प्रमुख नगरों में रैन बसेरों का निर्माण और रखरखाव किया जा रहा है।
  • स्वच्छ भारत मिशन (शहरी) के तहत राज्य के सभी नगर निकायों में ‘ठोस अपशिष्ट प्रबंधन’ (Solid Waste Management) प्रणालियों को आधुनिक बनाया जा रहा है।
  • शहरी क्षेत्रों में सार्वजनिक परिवहन को सुगम और पर्यावरण के अनुकूल बनाने के लिए इलेक्ट्रिक बसों और सीएनजी वाहनों के संचालन को बढ़ावा दिया जा रहा है।
  • देहरादून और ऋषिकेश-हरिद्वार् कॉरिडोर में यातायात के भारी दबाव को कम करने के लिए ‘मेट्रो नियो’ (Metro Neo) और आधुनिक रोपवे प्रणालियों पर काम चल रहा है।
  • राज्य सरकार द्वारा छोटे और मध्यम शहरों के विकास के लिए जिला मुख्यालयों पर बुनियादी सुविधाओं और व्यापारिक केंद्रों का विस्तार किया जा रहा है।
  • पर्वतीय क्षेत्रों के प्रमुख पर्यटन नगरों, जैसे नैनीताल और मसूरी, में बढ़ते वाहनों के दबाव को नियंत्रित करने के लिए बहुमंजिला पार्किंग स्थलों का निर्माण किया जा रहा है।
  • शहरी बुनियादी ढांचे के विकास के लिए सड़कों के चौड़ीकरण, फ्लाईओवर निर्माण और जल निकासी (ड्रेनेज) प्रणालियों के सुदृढ़ीकरण पर विशेष बजटीय आवंटन किया जाता है।
  • तीव्र शहरीकरण के कारण कृषि योग्य भूमि का गैर-कृषि कार्यों में तेजी से परिवर्तन हो रहा है, जो राज्य के लिए एक गंभीर योजनागत चुनौती है।
  • शहरों में बढ़ती आबादी के कारण पेयजल संकट, अनियंत्रित निर्माण और ट्रैफिक जाम जैसी नागरिक समस्याएं लगातार गंभीर रूप ले रही हैं।
  • पर्वतीय शहरों में ढलानों पर बिना वैज्ञानिक जांच के किए जाने वाले भारी निर्माण कार्यों से भू-धंसाव (जैसे जोशीमठ की घटना) का खतरा बढ़ जाता है।
  • इन खतरों को कम करने के लिए राज्य सरकार द्वारा संवेदनशील पहाड़ी क्षेत्रों में नए निर्माण कार्यों के लिए ‘कैरिंग कैपेसिटी’ (वहन क्षमता) का आकलन अनिवार्य किया जा रहा है।
  • शहरी विकास नीतियों में डिजिटल गवर्नेंस को बढ़ावा देने के लिए नगर निकायों की सेवाओं को ऑनलाइन (ई-नगरपालिका) प्लेटफार्मों से जोड़ा गया है।
  • निष्कर्षतः, प्राकृतिक पर्यावरण के संरक्षण और आधुनिक बुनियादी ढांचे के बीच सही संतुलन बनाकर ही उत्तराखंड के शहरों का सतत और सुरक्षित विकास संभव है।

विशेष योजनाएँ और पहलें

  • उत्तराखंड सरकार द्वारा लागू की गई विशेष योजनाएं मुख्य रूप से सुदूर पर्वतीय क्षेत्रों के विकास और क्षेत्रीय विषमताओं को दूर करने पर केंद्रित हैं।
  • कोविड-19 महामारी के दौरान घर लौटे प्रवासियों और स्थानीय युवाओं को गांव में ही रोजगार देने के लिए ‘मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना’ (MSY) शुरू की गई थी।
  • इस योजना के तहत विनिर्माण (Manufacturing) और सेवा क्षेत्र में व्यवसाय शुरू करने के लिए सरकार द्वारा भारी सब्सिडी और आसान ऋण दिया जाता है।
  • सौर ऊर्जा उत्पादन के साथ-साथ स्वरोजगार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से ‘मुख्यमंत्री सौर स्वरोजगार योजना’ संचालित की जा रही है।
  • इस सौर पहल के अंतर्गत राज्य के युवाओं और प्रवासियों को अपनी बंजर भूमि पर 25 किलोवाट के छोटे सौर ऊर्जा प्लांट लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
  • उत्पादित बिजली को उत्तराखंड पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (UPCL) द्वारा सीधे खरीदा जाता है, जिससे लाभार्थियों को एक निश्चित मासिक आय प्राप्त होती है।
  • सीमावर्ती गांवों से होने वाले पलायन को रोकने और वहां बुनियादी ढांचा मजबूत करने के लिए ‘मुख्यमंत्री सीमांत क्षेत्र विकास योजना’ चलाई जा रही है।
  • इस योजना के तहत चीन और नेपाल सीमा से लगे जनपदों के सीमांत ब्लॉकों में बुनियादी सुविधाओं, सड़कों और आजीविका के साधनों का विकास किया जाता है।
  • राज्य के सुदूर और दुर्गम गांवों को मुख्यधारा से जोड़ने तथा वहां आजीविका के अवसर बढ़ाने के लिए ‘मुख्यमंत्री पलायन रोकथाम योजना’ भी सक्रिय है।
  • स्थानीय स्तर पर पारंपरिक शिल्पों, हथकरघा और कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए ‘एक जनपद दो उत्पाद’ (One District Two Products) योजना लागू की गई है।
  • इस अनूठी योजना के माध्यम से प्रत्येक जिले के दो विशिष्ट स्थानीय उत्पादों की पहचान कर उन्हें राष्ट्रीय और वैश्विक बाजारों तक पहुँचाया जाता है।
  • महिला स्वयं सहायता समूहों को आर्थिक रूप से सुदृढ़ करने के लिए ‘मुख्यमंत्री महिला स्वयं सहायता समूह सशक्तिकरण योजना’ के तहत रिवॉल्विंग फंड दिया जाता है।
  • शासकीय कार्यों में पारदर्शिता लाने और आम जनता को त्वरित नागरिक सेवाएं देने के लिए ‘अपणी सरकार पोर्टल’ (Apuni Sarkar Portal) की शुरुआत की गई है।
  • इस एकीकृत डिजिटल पोर्टल के माध्यम से नागरिक घर बैठे ही जाति, मूल निवास, आय जैसे महत्वपूर्ण प्रमाण पत्रों के लिए ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं।
  • जन शिकायतों के समयबद्ध और पारदर्शी निवारण के लिए मुख्यमंत्री आवास में संचालित ‘मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 1905’ एक अत्यंत प्रभावी तंत्र बन चुकी है।
  • राज्य के होनहार खिलाड़ियों को खेल के क्षेत्र में आगे बढ़ने और वित्तीय बाधाओं को दूर करने के लिए ‘मुख्यमंत्री उदीयमान खिलाड़ी उन्नयन योजना’ चलाई जा रही है।
  • इसके तहत 8 से 14 वर्ष तक के उभरते हुए खिलाड़ियों को प्रति माह एक निश्चित खेल छात्रवृत्ति प्रदान की जाती है।
  • राज्य में अनाथ और बेसहारा बच्चों के भरण-पोषण, सुरक्षा और शिक्षा के लिए ‘मुख्यमंत्री वात्सल्य योजना’ के अंतर्गत आर्थिक सहायता दी जा रही है।
  • इन सभी विशेष पहलों में वित्तीय गड़बड़ियों को रोकने और सीधा लाभ पहुँचाने के लिए ‘प्रत्यक्ष लाभ अंतरण’ (DBT) का कड़ाई से पालन किया जाता है।
  • निष्कर्षतः, ये सभी विशिष्ट योजनाएं और नवीन पहलें उत्तराखंड की आत्मनिर्भरता, ग्रामीण विकास और सुशासन (Good Governance) को सुदृढ़ करने के मुख्य आधार हैं।

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