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नदी तंत्र
- उत्तराखंड को जल संसाधनों की प्रचुरता के कारण नदियों का मायका माना जाता है, जहाँ से उत्तर भारत की कई बारहमासी नदियाँ निकलती हैं।
- राज्य की नदी प्रणालियों को मुख्य रूप से तीन प्रमुख अपवाह तंत्रों—गंगा तंत्र, यमुना तंत्र और काली (शारदा) तंत्र में विभाजित किया गया है।
- यमुना नदी तंत्र राज्य के सबसे पश्चिमी भाग में विस्तृत है, जिसका मुख्य स्रोत उत्तरकाशी जिले में स्थित यमुनोत्री हिमनद (बंदरपूंछ चोटी) है।
- टोंस (तमसा) नदी यमुना की सबसे प्रमुख सहायक नदी है, जो उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा बनाते हुए डाकरानी के पास यमुना में मिलती है।
- यमुना नदी तंत्र की अन्य प्रमुख सहायक नदियों में आसन, गिरि और ऋषिगंगा जैसी छोटी पहाड़ी नदियाँ शामिल हैं।
- गंगा नदी अपवाह तंत्र उत्तराखंड का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण नदी तंत्र है, जो विशाल भू-भाग को सिंचित करता है।
- भागीरथी नदी का उद्गम उत्तरकाशी जिले में गंगोत्री ग्लेशियर के समीप स्थित ‘गौमुख’ नामक स्थान से होता है।
- टिहरी में भागीरथी और भिलंगना नदी के संगम पर एशिया का सबसे ऊँचा और प्रसिद्ध ‘टिहरी बांध’ निर्मित किया गया है।
- अलकनंदा नदी का उद्गम चमोली जिले में स्थित सतोपंथ हिमनद और अलकापुरी बांक ग्लेशियर से होता है।
- अलकनंदा नदी अपने प्रवाह मार्ग में विभिन्न सहायक नदियों से मिलकर प्रसिद्ध ‘पंच प्रयाग’ का निर्माण करती है।
- प्रथम प्रयाग ‘विष्णुप्रयाग’ में अलकनंदा से धौलीगंगा (पश्चिमी), जबकि ‘नंदप्रयाग’ में नंदाकिनी नदी आकर मिलती है।
- तृतीय प्रयाग ‘कर्णप्रयाग’ में पिंडर नदी और चतुर्थ प्रयाग ‘रुद्रप्रयाग’ में केदारनाथ से आने वाली मंदाकिनी नदी अलकनंदा में विलीन होती है।
- पांचवें और अंतिम प्रयाग ‘देवप्रयाग’ में जब भागीरथी (सास) और अलकनंदा (बहू) का संगम होता है, तो यहाँ से इसका नाम ‘गंगा’ पड़ता है।
- गंगा नदी हरिद्वार के मैदानी भाग में प्रवेश करने से पहले ऋषिकेश के पर्वतीय मार्गों से होकर गुजरती है।
- नयार और पश्चिमी रामगंगा नदियाँ भी गंगा अपवाह तंत्र का हिस्सा हैं, जो पौड़ी और कुमाऊं की पहाड़ियों से जल लेकर आगे बढ़ती हैं।
- काली (शारदा) नदी तंत्र उत्तराखंड के सबसे पूर्वी हिस्से में स्थित है, जो भारत और नेपाल के बीच प्राकृतिक अंतरराष्ट्रीय सीमा बनाता है।
- काली नदी का उद्गम पिथौरागढ़ जिले के लिपुलेख दर्रे के समीप स्थित कालापानी नामक स्थान से होता है।
- कुटी यांग्ती, पूर्वी धौलीगंगा, गोरीगंगा और सरयू नदी काली नदी की प्रमुख और शक्तिशाली सहायक नदियाँ हैं।
- सरयू नदी बागेश्वर से बहती हुई ‘पंचेश्वर’ नामक स्थान पर काली नदी से मिलती है, जहाँ दोनों का विशाल संगम होता है।
- उत्तराखंड की ये सभी नदियाँ न केवल सिंचाई और जलविद्युत उत्पादन का मुख्य स्रोत हैं, बल्कि देश की धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना का आधार भी हैं।
प्रमुख झीलें
- उत्तराखंड अपनी प्राकृतिक और सुरम्य झीलों के लिए प्रसिद्ध है, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘ताल’ कहा जाता है।
- भौगोलिक दृष्टि से कुमाऊं क्षेत्र को झीलों की प्रचुरता के कारण ‘लेक डिस्ट्रिक्ट’ (झील जिला) के रूप में भी जाना जाता है।
- नैनीताल जिला अपनी सुंदर प्राकृतिक झीलों के कारण पूरे भारत में पर्यटकों के आकर्षण का मुख्य केंद्र है।
- नैनीताल झील (नैनी ताल) चारों ओर से सात पहाड़ियों (सप्त-श्रृंग) से घिरी एक बेहद खूबसूरत और कटोरे के आकार की झील है।
- कुमाऊं क्षेत्र की ‘भीमताल’ सबसे बड़ी झील है, जिसके बीच में एक सुंदर टापू (आईलैंड) स्थित है।
- अपनी विशिष्ट नौ कोनों वाली बनावट के लिए प्रसिद्ध ‘नौकुचियाताल’ कुमाऊं क्षेत्र की सबसे गहरी झील मानी जाती है।
- ‘सातताल’ सात छोटी झीलों का एक समूह है, जो अपनी प्राकृतिक शांति और प्रवासी पक्षियों के लिए जाना जाता है।
- चंपावत जिले में स्थित ‘श्यामलताल’ के तट पर सुप्रसिद्ध विवेकानंद आश्रम और सफेद कमल के फूल पाए जाते हैं।
- ऊधम सिंह नगर जिले में स्थित ‘द्रोण सागर’ और ‘गिरी ताल’ ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व के प्रमुख जलाशय हैं।
- गढ़वाल क्षेत्र के चमोली जिले में स्थित ‘रूपकुंड’ को इसके रहस्यों के कारण ‘कंकाल झील’ (Skeleton Lake) कहा जाता है।
- रूपकुंड के बर्फीले पानी और उसके चारों ओर आज भी प्राचीन मानव कंकाल और खोपड़ियाँ बिखरी हुई मिलती हैं।
- चमोली जिले में ही स्थित ‘सतोपंथ ताल’ एक त्रिकोणीय झील है, जिसे हिंदू पौराणिक कथाओं में बेहद पवित्र माना गया है।
- ऐसा माना जाता है कि सतोपंथ ताल के तीन कोनों पर ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने तपस्या की थी।
- उत्तरकाशी जिले में स्थित ‘डोडीताल’ अपने छह कोनों और अत्यंत दुर्लभ ‘ब्राउन ट्राउट’ मछलियों के लिए प्रसिद्ध है।
- उत्तरकाशी का ‘नचिकेता ताल’ घने जंगलों के बीच स्थित एक शांत और छोटा तालाब है, जिसका संबंध पौराणिक नचिकेता से है।
- टिहरी गढ़वाल जिले में स्थित ‘सहस्रताल’ और ‘यमताल’ गढ़वाल क्षेत्र के सबसे बड़े और गहरे झीलों के समूह में गिने जाते हैं।
- रुद्रप्रयाग जिले में केदारनाथ धाम के समीप स्थित ‘चोराबाड़ी ताल’ को ‘गांधी सरोवर’ के नाम से भी संबोधित किया जाता है।
- इसी चोराबाड़ी ताल के टूटने और ग्लेशियर पिघलने के कारण वर्ष 2013 में केदारनाथ में भीषण फ्लैश फ्लड (बाढ़) आई थी।
- रुद्रप्रयाग का ‘देवरिया ताल’ ऊंचे पहाड़ों पर स्थित है, जिसके शांत पानी में चौखंबा चोटी का स्पष्ट प्रतिबिंब दिखाई देता है।
- उत्तराखंड की ये सभी झीलें राज्य के पारिस्थितिकी तंत्र, स्थानीय जल स्रोतों और पर्यटन अर्थव्यवस्था की मुख्य जीवन रेखा हैं।
उत्तराखंड के प्रमुख ग्लेशियर (हिमनद)
- उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में विशाल और बारहमासी हिमनद पाए जाते हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘बामक’ या ‘हिमानी’ कहा जाता है।
- ये ग्लेशियर उत्तर भारत की विशाल और पवित्र नदी प्रणालियों के मुख्य जल स्रोत और उद्गम स्थल हैं।
- उत्तरकाशी जिले में स्थित ‘गंगोत्री ग्लेशियर’ उत्तराखंड का सबसे बड़ा हिमनद (ग्लेशियर) है।
- गंगोत्री ग्लेशियर की कुल लंबाई लगभग 30 किलोमीटर और चौड़ाई लगभग 2 से 4 किलोमीटर के बीच विस्तृत है।
- इसी गंगोत्री ग्लेशियर के निचले छोर पर स्थित ‘गौमुख’ नामक स्थान से पवित्र भागीरथी (गंगा) नदी का उद्गम होता है।
- उत्तरकाशी जिले में ही स्थित ‘बंदरपूंछ ग्लेशियर’ लगभग 12 किलोमीटर लंबा है, जिससे यमुना नदी को निरंतर जल मिलता है।
- कुमाऊं क्षेत्र का सबसे बड़ा और प्रमुख हिमनद ‘पिंडारी ग्लेशियर’ है, जो बागेश्वर, चमोली और पिथौरागढ़ जिलों की सीमाओं पर फैला है।
- पिंडारी ग्लेशियर से ही प्रसिद्ध ‘पिंडर नदी’ (कर्णप्रयाग में अलकनंदा की सहायक) का जन्म होता है।
- पिथौरागढ़ जिले में स्थित ‘मिलम ग्लेशियर’ कुमाऊं मंडल का दूसरा सबसे बड़ा और पूरी तरह से शुद्ध कुमाऊं क्षेत्र का हिमनद है।
- मिलम ग्लेशियर से ‘गोरी गंगा’ नदी का उद्गम होता है, जो आगे चलकर जौलजीबी में काली नदी में मिल जाती है।
- पिथौरागढ़ जनपद में ही अन्य महत्वपूर्ण हिमनद जैसे काली, नामिक, हीरामणि, रालम और पिनोरा ग्लेशियर स्थित हैं।
- चमोली जिले में स्थित ‘सतोपंथ और अलकापुरी ग्लेशियर’ से अलकनंदा नदी का पावन उद्गम होता है।
- चमोली का ‘दूनागिरी ग्लेशियर’ और ‘बद्रीनाथ ग्लेशियर’ भी अलकनंदा नदी तंत्र को जल प्रवाह प्रदान करने में मुख्य भूमिका निभाते हैं।
- रुद्रप्रयाग जिले में स्थित ‘चोराबाड़ी ग्लेशियर’ केदारनाथ मंदिर के ठीक पीछे ऊपरी पहाड़ी ढलान पर स्थित है।
- इसी चोराबाड़ी हिमनद के पिघलने से अलकनंदा की सहायक ‘मंदाकिनी नदी’ का उद्गम होता है।
- चोराबाड़ी ग्लेशियर के पास ही ‘चोराबाड़ी ताल’ (गांधी सरोवर) स्थित है, जो वर्ष 2013 की भीषण केदारनाथ आपदा का मुख्य कारण बना था।
- टिहरी और रुद्रप्रयाग की सीमाओं पर स्थित ‘खतलिंग ग्लेशियर’ से भिलंगना नदी का उद्गम होता है।
- खतलिंग हिमनद को अनेक छोटे-छोटे हिमनदों का समूह माना जाता है और यह साहसिक ट्रैकर्स के बीच काफी लोकप्रिय है।
- भौगोलिक दृष्टि से उत्तराखंड के अधिकांश ग्लेशियर वैश्विक तापमान (ग्लोबल वार्मिंग) के कारण तेजी से पीछे खिसक (Recede) रहे हैं।
- उत्तराखंड के ये बर्फ के विशाल भंडार न केवल पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखते हैं, बल्कि करोड़ों लोगों की जलापूर्ति सुनिश्चित करते हैं।
कुण्ड और प्रपात
- उत्तराखंड अपनी विशिष्ट भौगोलिक संरचना के कारण अनगिनत प्राकृतिक जलप्रपातों (झरनों) और पवित्र कुंडों से समृद्ध है।
- स्थानीय स्तर पर पहाड़ों से गिरने वाले पानी के झरनों को ‘प्रपात’ या ‘धार’ और प्राकृतिक जलाशयों को ‘कुंड’ कहा जाता है।
- राज्य के चमोली जिले में स्थित ‘वैतरणी कुंड’ को धार्मिक दृष्टि से अत्यंत पवित्र और पौराणिक महत्व का माना जाता है।
- चमोली के बद्रीनाथ धाम में स्थित ‘तप्त कुंड’ अपने औषधीय और गर्म पानी (सल्फर युक्त) के लिए देश भर में प्रसिद्ध है।
- मान्यता के अनुसार, बद्रीनाथ मंदिर के दर्शन से पहले श्रद्धालु इस प्राकृतिक गर्म पानी के तप्त कुंड में स्नान करते हैं।
- चमोली में ही स्थित ‘नारद कुंड’ से आदि गुरु शंकराचार्य ने भगवान बद्रीविशाल की मूर्ति को निकालकर मंदिर में स्थापित किया था।
- पिथौरागढ़ जिले में स्थित ‘थामरी कुंड’ घने वनों के बीच एक सुरम्य स्थल है, जो कस्तूरी मृगों के लिए भी जाना जाता है।
- पिथौरागढ़ का ‘महेश्वर कुंड’ (मशियर ताल) मुनस्यारी के समीप स्थित एक प्राचीन और बेहद खूबसूरत जलाशय है।
- रुद्रप्रयाग के केदारनाथ धाम में स्थित ‘हंस कुंड’ और ‘रेतस कुंड’ पितृ तर्पण और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए महत्वपूर्ण हैं।
- देहरादून जिले के प्रसिद्ध हिल स्टेशन मसूरी के समीप स्थित ‘केम्प्टी फॉल’ (Kempty Fall) राज्य का सबसे लोकप्रिय पर्यटक झरना है।
- देहरादून के चकराता में स्थित ‘टाइगर फॉल’ (Tiger Fall) लगभग 50 मीटर की ऊंचाई से गिरने वाला एक विशाल और मनमोहक जलप्रपात है।
- देहरादून का ‘सहस्रधारा’ (Sahastradhara) गंधक (सल्फर) युक्त पानी की सैकड़ों छोटी धाराओं और गुफाओं के लिए प्रसिद्ध है।
- सहस्रधारा के औषधीय गुणों वाले पानी में स्नान करने से त्वचा से संबंधित रोग दूर होने की लोक मान्यता है।
- ऋषिकेश के समीप स्थित ‘नीर गढ़ प्रपात’ (Neer Garh Waterfall) और ‘पटना प्रपात’ प्रकृति प्रेमियों और ट्रैकर्स को आकर्षित करते हैं।
- पिथौरागढ़ के धारचूला मार्ग पर स्थित ‘बरथी फॉल’ (Birthi Fall) लगभग 126 मीटर की ऊंचाई के साथ राज्य के सबसे ऊंचे झरनों में गिना जाता है।
- चमोली के जोशीमठ के पास स्थित ‘वसुधारा प्रपात’ अलकनंदा नदी की एक सहायक धारा है, जो करीब 145 मीटर ऊंचाई से गिरती है।
- पौराणिक मान्यता है कि वसुधारा प्रपात की बूंदें केवल पुण्यात्माओं या पवित्र मन वाले व्यक्तियों के ऊपर ही गिरती हैं।
- अल्मोड़ा जिले में स्थित ‘धोकाने फॉल’ और नैनीताल का ‘वुडलैंड वाटरफॉल’ कुमाऊं मंडल के शांत और सुरम्य प्राकृतिक प्रपात हैं।
- ये सभी कुंड और प्रपात राज्य के विभिन्न हिस्सों में जल संरक्षण और स्थानीय भूजल स्तर को बनाए रखने में सहायक हैं।
- उत्तराखंड के ये प्राकृतिक जलस्रोत न केवल पर्यावरण संतुलन बनाए रखते हैं, बल्कि राज्य के पर्यटन उद्योग की रीढ़ भी हैं।