संसदीय समितियों का महत्व: संसद के पास समय और तकनीकी ज्ञान की कमी होती है, इसलिए विधायी और वित्तीय कार्यों की गहन जांच के लिए समितियों का गठन होता है।
दो मुख्य प्रकार: संसदीय समितियां मुख्य रूप से दो प्रकार की होती हैं: स्थायी समितियां (जो निरंतर कार्य करती हैं) और तदर्थ समितियां (जो विशेष उद्देश्य के लिए बनती हैं)।
लोक लेखा समिति (PAC): यह सबसे पुरानी वित्तीय समिति है (1921 में गठित)। इसमें कुल 22 सदस्य (15 लोकसभा और 7 राज्यसभा से) होते हैं।
PAC का मुख्य कार्य: यह नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट की जांच करती है और सरकारी खर्चों में अनियमितता को उजागर करती है।
विपक्ष का अध्यक्ष: लोक लेखा समिति (PAC) के अध्यक्ष की नियुक्ति लोकसभा अध्यक्ष करते हैं, जो आमतौर पर मुख्य विपक्षी दल का नेता होता है।
अनुमान समिति (Estimates Committee): यह संसद की सबसे बड़ी स्थायी समिति है, जिसमें सभी 30 सदस्य केवल लोकसभा से चुने जाते हैं (राज्यसभा का प्रतिनिधित्व नहीं)।
अनुमान समिति का कार्य: यह बजट में प्रस्तुत किए गए अनुमानों की जांच करती है और सरकारी खर्चों में मितव्ययिता (बचत) और कार्यकुशलता लाने के सुझाव देती है।
सार्वजनिक उपक्रम समिति: इसमें 22 सदस्य होते हैं। यह सरकारी कंपनियों (जैसे LIC, Air India) के खातों और CAG की उनसे संबंधित रिपोर्टों की जांच करती है।
विभागीय स्थायी समितियां: वर्तमान में 24 विभागीय स्थायी समितियां हैं, जो विभिन्न मंत्रालयों की अनुदान मांगों, विधेयकों और नीतियों की विस्तृत और तकनीकी जांच करती हैं।
कार्यकाल: लोक लेखा समिति, अनुमान समिति और सार्वजनिक उपक्रम समिति के सदस्यों का कार्यकाल सामान्यतः एक वर्ष का होता है और चुनाव एकल संक्रमणीय मत से होता है।
मंत्री सदस्य नहीं बन सकते: किसी भी मंत्री को इन प्रमुख वित्तीय समितियों का सदस्य नहीं चुना जा सकता, ताकि जांच निष्पक्ष और स्वतंत्र रूप से हो सके।
पोस्ट-मॉर्टम कार्य: PAC का कार्य मुख्य रूप से ‘पोस्ट-मॉर्टम’ जैसा है, क्योंकि यह पैसे खर्च हो जाने के बाद उसकी वैधानिकता और औचित्य की जांच करती है।
सलाहकारी प्रकृति: इन संसदीय समितियों की सिफारिशें सरकार के लिए बाध्यकारी नहीं होती हैं, लेकिन उनका अत्यधिक राजनीतिक और नैतिक महत्व होता है।
संसद की आंख और कान: ये समितियां कार्यपालिका की वित्तीय जवाबदेही तय करके संसद की ‘आंख और कान’ के रूप में कार्य करती हैं और पारदर्शिता बढ़ाती हैं।
विशेषज्ञता का लाभ: समितियों की बंद कमरे में होने वाली बैठकों में राजनीतिक दलगत भावना से ऊपर उठकर विषय-विशेषज्ञों और अधिकारियों से विस्तृत पूछताछ की जाती है।