वर्धन वंश की स्थापना: गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद छठी शताब्दी के अंत में थानेश्वर में पुष्यभूति या वर्धन वंश की स्थापना हुई, जिसके संस्थापक पुष्यभूति थे।
प्रभाकरवर्धन का उदय: इस वंश के वास्तविक शक्तिशाली शासक प्रभाकरवर्धन थे, जिन्होंने ‘महाराजाधिराज’ और ‘परमभट्टारक’ की उपाधियाँ धारण कर अपनी स्थिति मजबूत की।
राज्यवर्धन का उत्तराधिकार: प्रभाकरवर्धन की मृत्यु के बाद उनके बड़े पुत्र राज्यवर्धन गद्दी पर बैठे, जिन्हें मालवा और गौड़ के राजाओं के षड्यंत्र का सामना करना पड़ा।
सम्राट हर्षवर्धन का राज्यारोहण: वर्ष 606 ईस्वी में मात्र 16 वर्ष की आयु में हर्षवर्धन (हर्ष) थानेश्वर के सिंहासन पर बैठे और एक विशाल साम्राज्य की नींव रखी।
हर्ष की प्रारंभिक चुनौतियाँ: हर्ष के सामने अपने भाई राज्यवर्धन की हत्या का बदला लेने, अपनी बहन राज्यश्री को सुरक्षित छुड़ाने और साम्राज्य को बचाने की बड़ी चुनौती थी।
कन्नौज को राजधानी बनाना: हर्ष ने अपनी बहन राज्यश्री के अनुरोध पर कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया, जो आगे चलकर उत्तर भारत की राजनीतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन गया।
‘शिलादित्य‘ की उपाधि: सम्राट हर्षवर्धन ने अपनी विजयों और पराक्रम के कारण ‘शिलादित्य’ की उपाधि धारण की, जिसका उल्लेख बाणभट्ट और ह्वेनसांग के साहित्यों में मिलता है।
साम्राज्य का विस्तार: हर्ष ने अपनी कुशल सैन्य शक्ति के बल पर उत्तर भारत के एक बड़े भू-भाग, जिसमें पंजाब, कन्नौज, बंगाल, बिहार और उड़ीसा शामिल थे, पर अधिकार किया।
पुलकेशिन द्वितीय से संघर्ष: नर्मदा नदी के तट पर चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय के साथ हुए युद्ध में हर्ष को पराजय का सामना करना पड़ा, जिससे उनकी दक्षिण विजय रुक गई।
प्रशासनिक व्यवस्था: हर्ष का प्रशासन काफी हद तक गुप्त काल जैसा था, जिसमें राजा सर्वोच्च होता था, लेकिन विकेंद्रीकरण और सामंतवाद का प्रभाव इस काल में काफी बढ़ गया था।
राजस्व और कर प्रणाली: किसानों से कुल उपज का छठा हिस्सा ‘भाग’ के रूप में कर लिया जाता था, और राज्य की आय का बड़ा हिस्सा सेना और धर्मार्थ कार्यों में खर्च होता था।
चीनी यात्री ह्वेनसांग का आगमन: हर्ष के शासनकाल में प्रसिद्ध चीनी बौद्ध यात्री ह्वेनसांग (यात्रियों का राजकुमार) भारत आया और कई वर्षों तक नालंदा विश्वविद्यालय में अध्ययन किया।
ह्वेनसांग का विवरण (सी-यू-की): ह्वेनसांग ने अपने यात्रा वृत्तांत ‘सी-यू-की’ में हर्ष के प्रशासन, कानून-व्यवस्था, कर प्रणाली और भारतीय समाज का बहुत ही सजीव और विस्तृत वर्णन किया।
कन्नौज की धर्मसभा: हर्ष ने महायान बौद्ध धर्म के प्रचार और ह्वेनसांग के सम्मान में 643 ईस्वी में कन्नौज में एक भव्य और विशाल सर्वधर्म महासभा का आयोजन किया था।
प्रयाग की महामोक्ष परिषद: हर्ष प्रत्येक पाँचवें वर्ष प्रयाग (इलाहाबाद) में ‘महामोक्ष परिषद’ का आयोजन करते थे, जहाँ वे अपना सारा खजाना और आभूषण दान कर देते थे।
धार्मिक सहिष्णुता की नीति: हर्ष व्यक्तिगत रूप से पहले शिव और सूर्य के उपासक थे, बाद में महायान बौद्ध धर्म के अनुयायी बने, लेकिन वे सभी धर्मों का समान रूप से आदर करते थे।
साहित्य के संरक्षक हर्ष: सम्राट हर्षवर्धन स्वयं एक उच्च कोटि के विद्वान और नाटककार थे, जिन्होंने संस्कृत में ‘रत्नावली’, ‘प्रियदर्शिका’ और ‘नागानंद’ जैसे प्रसिद्ध नाटकों की रचना की।
बाणभट्ट और उनकी कृतियाँ: हर्ष के राजकवि बाणभट्ट ने हर्ष की जीवनी ‘हर्षचरित’ और संस्कृत के पहले गद्य उपन्यास ‘कादंबरी’ की रचना कर साहित्य को अमर बना दिया।
अन्य दरबारी विद्वान: हर्ष के दरबार में मयूर (मयूरशतक के रचयिता), भर्तृहरि और मातंग दिवाकर जैसे प्रख्यात संस्कृत कवि और विद्वान निवास करते थे।
शिक्षा का महान केंद्र (ना नालंदा): हर्ष के संरक्षण में नालंदा विश्वविद्यालय अपने स्वर्णकाल में था, जहाँ हजारों विद्यार्थियों को बौद्ध दर्शन, वेद और चिकित्सा की मुफ्त शिक्षा दी जाती थी।
सामाजिक स्थिति और जातियाँ: इस काल में समाज चार वर्णों के अलावा कठोर जातियों और उपजातियों में विभाजित होने लगा था, और छुआछूत की कुप्रथा समाज में गहरी होती गई।
महिलाओं की स्थिति: महिलाओं की स्वतंत्रता में गिरावट आई थी; पर्दा प्रथा, बाल विवाह और सती प्रथा के प्रचलन के संकेत इस काल के साहित्य में मिलने लगे थे।
कानून और दंड व्यवस्था: हर्ष के शासनकाल में दंड व्यवस्था बहुत कठोर थी, राजद्रोह या गंभीर अपराधों के लिए अंगभंग या आजीवन कारावास जैसे कड़े प्रावधान थे।
आर्थिक स्थिति और व्यापार: अंतरराष्ट्रीय व्यापार में कमी के कारण अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि और स्थानीय बाजारों पर निर्भर हो गई थी, फिर भी नगरों में समृद्धि बनी हुई थी।
संचार और सुरक्षा व्यवस्था: साम्राज्य के विभिन्न हिस्सों में संदेश भेजने और सुरक्षा के लिए कुशल डाक व्यवस्था और सुदृढ़ गुप्तचर तंत्र (दूतो व अधिकारियों का जाल) सक्रिय था।
हर्ष की मृत्यु (647 ईस्वी): वर्ष 647 ईस्वी में बिना किसी उत्तराधिकारी के हर्षवर्धन की मृत्यु हो गई, जिसके बाद उनका विशाल साम्राज्य तेजी से बिखर गया और पतन के गर्त में समा गया।
अरुण अस्वा की अराजकता: हर्ष की मृत्यु के बाद उनके मंत्री अरुण अस्वा ने तख्त पर कब्जा करने की कोशिश की, जिससे देश में राजनीतिक उथल-पुथल और अराजकता फैल गई।
उत्तर भारत का पुनः विखंडन: हर्ष के निधन के साथ ही उत्तर भारत की राजनीतिक एकता समाप्त हो गई और क्षेत्र पुनः छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्यों और राजवंशों में विभाजित हो गया।
राजपूत काल का मार्ग प्रशस्त: वर्धन वंश के पतन और राजनीतिक शून्यता के गर्भ से ही उत्तर भारत में नौवीं शताब्दी तक राजपूत राजवंशों के उदय की पृष्ठभूमि तैयार हुई।
ऐतिहासिक महत्त्व: सम्राट हर्षवर्धन का काल प्राचीन भारतीय इतिहास का अंतिम महान साम्राज्यवादी दौर माना जाता है, जिसके बाद मध्यकालीन भारतीय इतिहास की शुरुआत होती है।