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राज्य वित्त आयोग (State Finance Commission – SFC)

संवैधानिक अधिदेश: 73वें और 74वें संशोधन द्वारा संविधान में क्रमशः अनुच्छेद 243-I (पंचायतों के लिए) और अनुच्छेद 243-Y (नगरपालिकाओं के लिए) के तहत SFC का गठन हुआ।

गठन और प्राधिकारी: प्रत्येक राज्य का राज्यपाल प्रत्येक 5 वर्ष के अंतराल पर राज्य वित्त आयोग का विधिवत गठन करने के लिए संवैधानिक रूप से बाध्य है।

संरचना और सेवा शर्तें: आयोग की संरचना, अध्यक्ष और सदस्यों की योग्यता तथा उनके चयन की प्रक्रिया तय करने का अधिकार राज्य विधानमंडल को है।

प्राथमिक उद्देश्य: राज्य और स्थानीय स्वशासन संस्थाओं (पंचायतों और नगरपालिकाओं) के बीच वित्तीय संसाधनों के न्यायसंगत और पारदर्शी बंटवारे की सिफारिश करना।

करों का शुद्ध वितरण: राज्य सरकार द्वारा वसूले जाने वाले कुल करों, शुल्कों, पथकरों (Tolls) और उपकरों के शुद्ध आगमों का राज्य और स्थानीय निकायों में विभाजन तय करना।

करों का आवंटन: यह सिफारिश करता है कि कौन-से विशिष्ट स्थानीय कर, शुल्क और फीस सीधे पंचायतों और नगरपालिकाओं द्वारा वसूले और उपयोग किए जाएंगे।

राज्य की संचित निधि से सहायता: राज्य की संचित निधि (Consolidated Fund of the State) से स्थानीय निकायों को दिए जाने वाले सहायता अनुदान (Grants-in-aid) के सिद्धांत तय करना।

स्थानीय वित्तीय स्थिति सुधारना: पंचायतों और नगर पालिकाओं की समग्र वित्तीय स्थिति को मजबूत करने और उनके राजस्व के आंतरिक स्रोत बढ़ाने के उपाय सुझाना।

राज्यपाल को रिपोर्ट सौंपना: आयोग अपनी विस्तृत सिफारिशों और रिपोर्ट को राज्य के राज्यपाल को सौंपता है, जो इसे आवश्यक कार्रवाई ज्ञापन के साथ विधानमंडल में रखवाते हैं।

केंद्रीय वित्त आयोग से संबंध: अनुच्छेद 280(3)(bb) और (c) के तहत केंद्रीय वित्त आयोग, राज्य वित्त आयोग की रिपोर्ट के आधार पर राज्यों के स्थानीय निकायों हेतु केंद्रीय फंड तय करता है।

सलाहकारी प्रकृति: राज्य वित्त आयोग की सिफारिशें पूरी तरह सलाहकारी होती हैं; राज्य सरकार इन्हें मानने, आंशिक रूप से लागू करने या अस्वीकार करने के लिए स्वतंत्र है।

आंकड़ों का संग्रह: यह राज्य के सभी जिलों में स्थानीय निकायों के आय-व्यय, संपत्ति रिकॉर्ड और वित्तीय घाटे से संबंधित विस्तृत डेटा का संकलन और विश्लेषण करता है।

वित्तीय विकेंद्रीकरण का साधन: SFC तीसरे स्तर की सरकार को वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर बनाकर भारत में वास्तविक वित्तीय संघवाद (Fiscal Federalism) को मजबूत करता है।

राज्यों की लापरवाही और देरी: कई राज्यों में SFC का गठन समय पर न होना, रिपोर्ट में देरी और सरकार द्वारा सिफारिशें लागू न करना इसकी मुख्य कमजोरियां हैं।

जवाबदेही और ऑडिटिंग: यह स्थानीय निकायों द्वारा प्राप्त सरकारी अनुदानों के उचित उपयोग और पारदर्शी वित्तीय ऑडिटिंग प्रणाली विकसित करने पर भी जोर देता है।

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