अपक्षय की परिभाषा: तापमान, वायुमंडलीय तत्वों और जीवों के संपर्क से चट्टानों का बिना किसी बड़े विस्थापन के अपने ही स्थान पर टूटना-फूटना (In-situ प्रक्रिया) है।
भौतिक/यांत्रिक अपक्षय: बिना किसी रासायनिक बदलाव के केवल यांत्रिक बलों (तापमान, तुषार, दबाव मुक्ति) के कारण चट्टानों का छोटे-छोटे टुकड़ों में विखंडित होना।
तुषार क्रिया (Frost Wedging): चट्टानों की संकरी दरारों में जमा जल जमने पर 9% फैलता है; यह तीव्र आंतरिक दबाव डालकर चट्टानों को तोड़ देता है।
अपदलन (Exfoliation): मरुस्थलीय क्षेत्रों में अत्यधिक दैनिक तापांतर के कारण चट्टानों की बाहरी परतें गर्म होकर फैलती और सिकुड़ती हैं, जिससे प्याज के छिलके जैसी परतें उतरती हैं।
रासायनिक अपक्षय: वायुमंडलीय जल और गैसों के संपर्क से चट्टानों के मूल खनिजों का घुलना, सड़ना और नए गौण खनिजों में परिवर्तित होना रासायनिक अपक्षय है।
ऑक्सीकरण (Oxidation): ऑक्सीजन और नमी के संपर्क से चट्टानों में मौजूद लोहे के खनिजों में जंग लगना, जिससे चट्टानें कमजोर होकर भुरभुरी हो जाती हैं।
कार्बोनेशन (Carbonation): वर्षा जल में घुली कार्बन डाइऑक्साइड दुर्बल कार्बोनिक अम्ल बनाती है, जो चूना पत्थर (Limestone) चट्टानों को घोलकर कार्स्ट आकृतियां बनाती है।
जलयोजन (Hydration): खनिजों द्वारा रासायनिक रूप से जल को सोखने पर उनका आयतन बढ़ता है; लगातार फूलने और सूखने से चट्टानें विखंडित हो जाती हैं।
जैविक अपक्षय (Biological): वृक्षों की जड़ों के दरारों में घुसने से या बिल खोदने वाले जीवों और सड़ते कार्बनिक अम्लों द्वारा शैलों का विघटन होना।
मृदा निर्माण में महत्व: अपक्षय अत्यंत कठोर आधारभूत चट्टानों को बारीक रेगोलिथ (Regolith) और खनिजों में तोड़ता है, जो उपजाऊ मिट्टी के निर्माण का प्राथमिक आधार है।