1991 का गंभीर संकट: भारत के पास केवल 2 सप्ताह के आयात का विदेशी मुद्रा भंडार बचा था, राजकोषीय घाटा चरम पर था और देश दिवालिया होने की कगार पर था।
ऐतिहासिक नीतिगत मोड़: तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव और वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने जुलाई 1991 में नई आर्थिक नीति (NEP) पेश की।
LPG मॉडल की शुरुआत: इस सुधार पैकेज के तीन मुख्य स्तंभ थे— उदारीकरण (Liberalization), निजीकरण (Privatization) और वैश्वीकरण (Globalization)।
उदारीकरण: लाइसेंस राज का अंत: उद्योगों पर लगे अनावश्यक सरकारी प्रतिबंधों, आयात नियंत्रण और औद्योगिक लाइसेंसिंग प्रणाली को लगभग पूरी तरह समाप्त कर दिया गया।
निजीकरण: विनिवेश की शुरुआत: घाटे में चल रहे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) के शेयरों को बेचना और निजी कंपनियों के लिए बंद क्षेत्रों को खोलना शुरू हुआ।
वैश्वीकरण: वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ाव: आयात शुल्कों में भारी कटौती कर और रुपये का अवमूल्यन करके भारतीय अर्थव्यवस्था को दुनिया के बाजारों के लिए खोल दिया गया।
FDI और FII का आगमन: विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) और विदेशी संस्थागत निवेश को आकर्षित करने के लिए नियमों को बेहद सरल और स्वचालित बनाया गया।
बैंकिंग सुधार (नरसिम्हम समिति): ब्याज दरों को बाजार आधारित बनाया गया, निजी बैंकों (जैसे HDFC, ICICI) को लाइसेंस मिले और बैंकों की स्वायत्तता बढ़ी।
पूंजी बाजार और SEBI: शेयर बाजार में निवेशकों के हितों की रक्षा और पारदर्शी ट्रेडिंग के लिए 1992 में सेबी (SEBI) को संवैधानिक/सांविधिक दर्जा दिया गया।
कर सुधार (Tax Reforms): राजा चेलैया समिति की सिफारिशों पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों की दरों को तर्कसंगत और सरल बनाकर कर संग्रह बढ़ाया गया।
विदेशी मुद्रा प्रबंधन (FEMA): पुराने कठोर फेरा (FERA) कानून को समाप्त कर अधिक व्यापार-अनुकूल विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA 1999) लागू किया गया।
उच्च आर्थिक विकास दर: इन सुधारों के परिणामस्वरूप भारत की GDP विकास दर ‘हिंदू ग्रोथ रेट’ (3.5%) से उछलकर 7-8% प्रतिवर्ष के उच्च स्तर पर पहुंच गई।
सेवा क्षेत्र की क्रांति: IT, सॉफ्टवेयर, दूरसंचार और BPO जैसे सेवा क्षेत्रों में भारत एक वैश्विक महाशक्ति और आउटसोर्सिंग हब बनकर उभरा।
बढ़ती आर्थिक असमानता: LPG का लाभ बड़े शहरों और कॉर्पोरेट जगत को अधिक मिला, जिससे अमीर-गरीब और ग्रामीण-शहरी खाई चौड़ी होने की आलोचना भी हुई।
वैश्विक पहचान: 1991 के सुधारों ने भारत को एक बंद, नियंत्रित अर्थव्यवस्था से बदलकर दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती आर्थिक महाशक्तियों की कतार में खड़ा कर दिया।