सम्राट अशोक की शांतिवादी नीतियां: अशोक द्वारा कलिंग युद्ध के बाद हिंसा त्यागने और बौद्ध धर्म अपनाने से सेना की आक्रामकता और साम्राज्यवादी जोश में भारी कमी आई थी।
अशोक की अहिंसक नीतियां: बौद्ध धर्म के प्रभाव के कारण अशोक की अत्यधिक अहिंसक और शांतिकाल की प्रशासनिक नीतियों ने मौर्य साम्राज्य की सैन्य शक्ति और प्रभाव को कमजोर कर दिया था।
अयोग्य और कमजोर उत्तराधिकारी: अशोक की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारी अत्यधिक कमजोर, अक्षम और दूरदर्शी साबित हुए, जो इतने विशाल और जटिल साम्राज्य को संभालने में पूरी तरह असफल रहे।
विशाल साम्राज्य का विभाजन: प्रशासनिक अक्षमता और उत्तराधिकारियों के आपसी गृहयुद्ध के कारण महान मौर्य साम्राज्य जल्द ही पश्चिमी और पूर्वी दो मुख्य भागों में विभाजित हो गया था।
अत्यधिक केंद्रीयकृत प्रशासन: मौर्य शासन व्यवस्था अत्यधिक रूप से केंद्रीयकृत थी, जहाँ राजा की दुर्बलता या अयोग्यता के कारण पूरी प्रशासनिक व्यवस्था और नियंत्रण तेजी से चरमरा गया था।
आर्थिक संकट और खजाने का रिक्त होना: विशाल सेना, भारी-भरकम नौकरशाही और दान-पुण्य के कार्यों के कारण राजकीय राजकोष खाली होने लगा, जिससे साम्राज्य को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा।
चांदी के सिक्कों में खोट: आर्थिक तंगी और मुद्रास्फीति के कारण बाद के मौर्य शासकों को सिक्कों में धातु की शुद्धता घटानी पड़ी, जिससे व्यापार और अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई।
अशोक के उत्तराधिकारियों का कमजोर शासन: कुणाल, संप्रत, दशरथ और बृहद्रथ जैसे बाद के राजाओं में साम्राज्य को एकजुट रखने की प्रशासनिक क्षमता और राजनीतिक कौशल का भारी अभाव था।
अंतिम शासक बृहद्रथ की कमजोरी: मौर्य वंश का अंतिम शासक बृहद्रथ एक बेहद अयोग्य और अकुशल राजा था, जिसके शासनकाल में साम्राज्य का प्रभाव केवल मगध तक सिमट कर रह गया था।
सेनापति पुष्यमित्र शुंग का विद्रोह: अंतिम मौर्य सम्राट बृहद्रथ की कमजोरियों से असंतुष्ट होकर उसके महत्त्वाकांक्षी सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने उसकी हत्या कर मौर्य वंश का अंत कर दिया।
प्रांतीय गवर्नरों का अत्याचार: केंद्रीय नियंत्रण कमजोर होने के कारण दूरदराज के प्रांतों में नियुक्त महामात्रों और गवर्नरों ने जनता पर अत्याचार करना शुरू कर दिया, जिससे विद्रोह भड़क उठे।
तक्षशिला का प्रसिद्ध विद्रोह: मौर्य काल में बिंदुसार और अशोक के शासनकाल के दौरान तक्षशिला प्रांत में शासकीय कुप्रशासन और अधिकारियों के विरुद्ध बड़े पैमाने पर भयंकर विद्रोह हुए थे।
ब्राह्मणों की असंतोषजनक प्रतिक्रिया: अशोक द्वारा यज्ञों में पशुबलि पर प्रतिबंध लगाने और ब्राह्मणों के पारंपरिक विशेषाधिकारों को सीमित करने से रूढ़िवादी वर्ग और ब्राह्मणों में गहरा असंतोष फैल गया था।
क्षेत्रीय ताकतों का स्वतंत्र होना: केंद्रीय सत्ता की कमजोरी का फायदा उठाकर सातवाहन, चेदि और अन्य क्षेत्रीय राजवंशों ने खुद को स्वतंत्र घोषित कर मौर्य साम्राज्य की सीमाएं छोटी कर दीं।
विदेशी आक्रमणों का दबाव: उत्तर-पश्चिम सीमांत क्षेत्रों की सुरक्षा व्यवस्था कमजोर होने के कारण बैक्ट्रियन यूनानी और अन्य विदेशी आक्रांताओं ने लगातार आक्रमण कर साम्राज्य को खोखला कर दिया।
साम्राज्य की विशालता और संचार की कमी: उस युग में परिवहन और संचार के साधनों के अभाव के कारण इतने विशाल भारतीय उपमहाद्वीप पर केंद्र से प्रभावी नियंत्रण रखना लगभग असंभव था।
नौकरशाही का भ्रष्टाचार: केंद्रीय नियंत्रण ढीला होते ही मौर्य साम्राज्य की प्रशासनिक नौकरशाही और अधिकारी वर्ग में भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और जनता का शोषण अत्यधिक मात्रा में बढ़ गया था।
बौद्ध धर्म का अतिरेक प्रभाव: आलोचकों के अनुसार राज्य स्तर पर बौद्ध धर्म और भिक्षु संघों को अत्यधिक राजकीय संरक्षण मिलने से राजकाज की प्रशासनिक और व्यावहारिक प्राथमिकताएं पीछे छूट गईं।
आंतरिक गृहयुद्ध की स्थिति: सत्ता प्राप्ति के लिए मौर्य राजवंश के राजकुमारों और शाही परिवार के सदस्यों के बीच लगातार खूनी संघर्ष और आंतरिक षड्यंत्र चलते रहे थे।
राजकीय सेना का अवमूल्यन: लंबे समय तक युद्ध न होने और शांतिप्रिय नीतियों के पालन से मौर्य साम्राज्य की प्रशिक्षित और विशाल सेना का युद्ध कौशल तथा अनुशासन कमजोर पड़ गया था।
राजस्व वसूली में भारी गिरावट: प्रांतीय विद्रोहों, प्रशासनिक ढिलाई और व्यापारिक मार्गों के बाधित होने से राज्य की कर एवं राजस्व वसूली में भारी गिरावट दर्ज की गई थी।
उत्तर-पश्चिम की उपेक्षा: सम्राट अशोक के बाद के शासक देश के उत्तर-पश्चिमी सीमांत क्षेत्रों की सुरक्षा और रणनीतिक किलेबंदी पर विशेष ध्यान देने में पूरी तरह विफल रहे थे।
व्यापारिक मार्गों का क्षरण: आंतरिक अशांति और क्षेत्रीय राजाओं के स्वतंत्र होने से देश के प्रमुख व्यापारिक मार्ग असुरक्षित हो गए, जिससे आर्थिक समृद्धि को बहुत बड़ा आघात लगा।
जनता का मोहभंग: उच्च करों, प्रशासनिक भ्रष्टाचार और कमजोर कानून-व्यवस्था के कारण आम जनता और किसानों का मौर्य शासन व्यवस्था से पूरी तरह मोहभंग हो चुका था।
गुप्तचर तंत्र का पतन: राज्य की सुरक्षा की रीढ़ माना जाने वाला गुप्तचर विभाग राजाओं की अयोग्यता और भ्रष्टाचार के कारण पूरी तरह निष्क्रिय और प्रभावहीन हो गया था।
सांस्कृतिक और वैचारिक असंतुलन: समाज के विभिन्न वर्गों के बीच धार्मिक और वैचारिक मतभेद बढ़ने लगे थे, जिसे संभालने में कमजोर केंद्रीय प्रशासन पूरी तरह असमर्थ साबित हुआ।
वंशवादी महत्वाकांक्षाएं: मौर्य दरबार के भीतर मंत्रियों, सेनापतियों और सामंतों की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं बढ़ने लगी थीं, जो अवसर मिलते ही साम्राज्य को पाटने के लिए तैयार थे।
बाहरी व्यापार का ह्रास: आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता के कारण पश्चिमी देशों और रोम के साथ होने वाला भारत का समृद्ध अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार काफी हद तक प्रभावित हुआ था।
इतिहास का अनिवार्य मोड़: राजनीतिक अयोग्यता, आर्थिक बदहाली, और आंतरिक विद्रोहों के इन मिले-जुले कारणों ने प्राचीन भारत के इस प्रथम महान साम्राज्य के पतन का मार्ग प्रशस्त किया।
मौर्य साम्राज्य का अंत: अंततः 185 ईसा पूर्व के आसपास मौर्य साम्राज्य का गौरवशाली इतिहास समाप्त हो गया और भारत की राजनीति में नए क्षेत्रीय राजवंशों का उदय हुआ।