rankersnotes.com

सिंधु घाटी सभ्यता का पतन

  • सिंधु घाटी सभ्यता जो अपने उत्कृष्ट नगर नियोजन और समृद्ध जीवन के लिए जानी जाती थी, लगभग 1900 ईसा पूर्व के आसपास पतन की ओर अग्रसर होने लगी।
  • इतिहासकारों और विद्वानों के बीच इस महान सभ्यता के पतन के सटीक कारणों को लेकर आज भी एक लंबी बहस जारी है।
  • अधिकांश विद्वान मानते हैं कि इस सभ्यता का अंत किसी एक कारण से नहीं, बल्कि कई अलग-अलग कारकों के संयोजन का परिणाम था।
  • सभ्यता के पतन की यह प्रक्रिया अचानक से घटित नहीं हुई थी, बल्कि यह एक क्रमिक और धीमी प्रक्रिया थी।
  • लगभग 1900 ईसा पूर्व के बाद मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसे प्रमुख शहरी केंद्रों में धीरे-धीरे गिरावट के स्पष्ट संकेत मिलने लगे थे।
  • इस गिरावट के दौरान नगर नियोजन में कमी आने लगी और घरों के निर्माण की गुणवत्ता में भी भारी गिरावट देखी गई।
  • सार्वजनिक भवनों पर अतिक्रमण होने लगा, जल निकासी प्रणाली की उपेक्षा की गई और मानकीकृत ईंटों का उपयोग बंद हो गया।
  • इसके अलावा, पतन के अंतिम चरणों में विशिष्ट मुहरों, लिपि और पारंपरिक नाप-तौल प्रणाली का पूरी तरह से अभाव देखा गया।
  • कई मुख्य शहरी स्थल पूरी तरह छोड़ दिए गए और वहाँ की आबादी धीरे-धीरे ग्रामीण क्षेत्रों की ओर पलायन कर गई।
  • शहरी चरण के बाद की कम जटिल और ग्रामीण प्रकृति की इन संस्कृतियों को ‘उत्तर-हड़प्पा’ (Late Harappan) चरण कहा जाता है।
  • पतन के सिद्धांतों में मार्टिमर व्हीलर द्वारा प्रतिपादित ‘आर्य आक्रमण का सिद्धांत’ एक समय काफी चर्चा में रहा था।
  • व्हीलर ने ऋग्वेद में इंद्र को ‘पुरंदर’ कहे जाने और मोहनजोदड़ो में मिले कुछ मानव कंकालों के आधार पर यह तर्क दिया था।
  • आधुनिक शोधकर्ताओं ने इस आक्रमण के सिद्धांत को खारिज कर दिया है क्योंकि वे कंकाल किसी नरसंहार के नहीं बल्कि बीमारी के थे।
  • पतन का एक अन्य प्रमुख कारण ‘जलवायु परिवर्तन और शुष्कता’ को माना जाता है, जिसका समर्थन राइकस और गुडे जैसे विद्वान करते हैं।
  • इस सिद्धांत के अनुसार वर्षा में अत्यधिक कमी आने से क्षेत्र में शुष्कता बढ़ी, जिससे कृषि उत्पादन पूरी तरह ठप हो गया।
  • इसके अतिरिक्त, सिंधु और उसकी सहायक नदियों के मार्गों में परिवर्तन तथा सरस्वती जैसी नदियों का सूखना भी पतन का कारण बना।
  • मोहनजोदड़ो में मिली बाढ़ की कई परतें यह साबित करती हैं कि बार-बार आने वाली विनाशकारी बाढ़ों ने भी शहरों को नष्ट किया।
  • अत्यधिक जनसंख्या वृद्धि, वनों की कटाई और अति-चराई के कारण पैदा हुए पारिस्थितिक असंतुलन ने भी इस संकट को और बढ़ा दिया।
  • कुछ इतिहासकारों का मानना है कि एक कमजोर और अक्षम केंद्रीय प्रशासन के कारण पैदा हुई प्रशासनिक शिथिलता भी इसके अंत के लिए जिम्मेदार थी।

संक्षेप में, सिंधु सभ्यता का पूरी तरह अंत नहीं हुआ बल्कि इसका केवल शहरी ढांचा समाप्त हुआ और लोग ग्रामीण समुदायों में बिखर गए।

Leave a Comment