प्रमुख किसान आंदोलन और बारडोली सत्याग्रह (Peasant Movements)
नील विद्रोह (1859-60): बंगाल में दिगंबर और विष्णु बिस्वास के नेतृत्व में किसानों ने जबरन नील खेती के खिलाफ सफल आंदोलन किया।
पावना विद्रोह (1870-80): बंगाल के किसानों ने जमींदारों द्वारा अत्यधिक कर वृद्धि और बेदखली के खिलाफ कानूनी संघर्ष लड़ा।
दक्कन दंगे (1875): महाराष्ट्र में किसानों ने साहूकारों द्वारा ऋण जाल और शोषण के खिलाफ भारी विरोध प्रदर्शन किया।
अवध किसान आंदोलन (1920): बाबा रामचंद्र के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में किसानों ने जमींदारी उत्पीड़न और गैर-कानूनी करों का कड़ा विरोध किया।
बारडोली सत्याग्रह (1928): गुजरात में 30% लगान वृद्धि के खिलाफ वल्लभभाई पटेल ने किसानों का सफल अहिंसक आंदोलन चलाया।
‘सरदार‘ की उपाधि: बारडोली सत्याग्रह की अभूतपूर्व सफलता पर वहां की महिलाओं की ओर से गांधीजी ने पटेल को ‘सरदार’ उपाधि दी।
अखिल भारतीय किसान सभा (1936): स्वामी सहजानंद सरस्वती (अध्यक्ष) और एन.जी. रंगा (सचिव) ने लखनऊ में इसका गठन किया।
अखिल भारतीय किसान घोषणापत्र: किसान सभा ने जमींदारी उन्मूलन, ऋण माफी और किसानों के लिए न्यूनतम भूमि अधिकारों की मांग उठाई।
जनजातीय/आदिवासी विद्रोह (Tribal Uprisings)
संथाल विद्रोह (1855-56): सिद्धू और कान्हू के नेतृत्व में झारखंड के संथालों ने ब्रिटिश शोषण और महाजनों के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह किया।
मुंडा उलगुलान (1899-1900): बिरसा मुंडा के नेतृत्व में छोटानागपुर में ‘खुंटकट्टी’ (सामूहिक खेती) व्यवस्था की रक्षा हेतु ऐतिहासिक विद्रोह हुआ।
मोपला विद्रोह (1921): मालाबार (केरल) में मुस्लिम पट्टेदार किसानों (मोपला) ने हिंदू जमींदारों और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ हिंसक आंदोलन किया।
रामपा विद्रोह (1922-24): आंध्र प्रदेश में अल्लूरी सीताराम राजू के नेतृत्व में आदिवासियों ने मद्रास वन कानून के खिलाफ छापामार युद्ध लड़ा।
ताना भगत आंदोलन (1914): जतरा भगत के नेतृत्व में छोटानागपुर में उरांव आदिवासियों ने अहिंसक सांस्कृतिक और राजनीतिक सुधार आंदोलन चलाया।
रॉंगमेई/नागा आंदोलन (1930-32): जदोनंग और रानी गाइडिनल्यू ने मणिपुर में ब्रिटिश नीतियों के खिलाफ सशस्त्र आदिवासी राष्ट्रीय आंदोलन का संचालन किया।
स्वतंत्रता पूर्व के उत्तरकालीन आंदोलन (Late Peasant Movements)
तेभागा आंदोलन (1946): बंगाल में बटाईदारों (बर्गादारों) ने जमींदारों से फसल का दो-तिहाई हिस्सा (2/3rd) देने की जोरदार मांग की।
तेलंगाना आंदोलन (1946-51): हैदराबाद रियासत में कम्युनिस्टों के नेतृत्व में किसानों ने निजाम के रजाकारों और देशमुखों के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष किया।
मजदूर आंदोलन और ट्रेड यूनियन (Working-Class Movements)
प्रारंभिक मजदूर संगठन (1890): एन.एम. लोखंडे ने ‘बॉम्बे मिलहैन्ड्स एसोसिएशन’ बनाई; इन्हें भारत में मजदूर आंदोलन का जनक माना जाता है।
AITUC की स्थापना (1920): एन.एम. जोशी और लाला लाजपत राय ने ‘ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस’ का गठन किया; राय इसके पहले अध्यक्ष बने।
मेरठ और कानपुर षड्यंत्र केस: ब्रिटिश सरकार ने भारत में बढ़ते कम्युनिस्ट और मजदूर नेताओं के दमन हेतु ये चर्चित मुकदमे चलाए।
राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ाव: मजदूर और किसान आंदोलनों ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को व्यापक जन-आधार प्रदान कर स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी।
भारत सरकार अधिनियम 1935 और कांग्रेस मंत्रिमंडल (1937–1939)
भारत सरकार अधिनियम 1935 के मुख्य प्रावधान (Government of India Act 1935)
अखिल भारतीय संघ का प्रस्ताव: ब्रिटिश प्रांतों और देशी रियासतों को मिलाकर एक संघ बनाने का प्रस्ताव रखा गया, जो लागू न हो सका।
प्रांतों में द्वैध शासन का अंत: 1919 का प्रांतीय द्वैध शासन समाप्त कर प्रांतों में पूर्ण ‘प्रांतीय स्वायत्तता’ (Provincial Autonomy) लागू की गई।
केंद्र में द्वैध शासन लागू: केंद्र स्तर पर हस्तांतरित और आरक्षित विषयों में विभाजन कर द्वैध शासन (Dyarchy) स्थापित किया गया।
शक्तियों का त्रि-स्तरीय विभाजन: संघ सूची (59 विषय), प्रांतीय सूची (54 विषय) और समवर्ती सूची (36 विषय) द्वारा शक्तियों का बंटवारा हुआ।
अवशिष्ट शक्तियां वायसराय के पास: किसी भी सूची में शामिल न होने वाली अवशिष्ट शक्तियां (Residuary Powers) केवल वायसराय को सौंपी गईं।
संघीय न्यायालय (Federal Court): दिल्ली में एक संघीय न्यायालय की स्थापना हुई, जिसके खिलाफ अंतिम अपील लंदन की प्रिवी काउंसिल में होती थी।
रिजर्व बैंक की स्थापना: देश में मुद्रा और साख के नियंत्रण हेतु भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की स्थापना का प्रावधान किया गया।
द्विसदनीय विधायिका का विस्तार: 11 ब्रिटिश प्रांतों में से 6 प्रांतों (जैसे बंगाल, बॉम्बे, मद्रास, यूपी) में द्विसदनीय विधायिका बनाई गई।
सांप्रदायिक निर्वाचन का विस्तार: पृथक निर्वाचन प्रणाली का विस्तार कर दलित वर्गों, महिलाओं और श्रमिकों को भी इसमें शामिल किया गया।
बर्मा का पृथक्करण: इस अधिनियम के तहत बर्मा (म्यांमार) को भारत के औपनिवेशिक शासन से औपचारिक रूप से अलग कर दिया गया।
1937 के प्रांतीय चुनाव और कांग्रेस मंत्रिमंडल (1937 Elections & Ministries)
1937 के प्रांतीय चुनाव: 1935 के अधिनियम के तहत 11 प्रांतों में चुनाव हुए; कांग्रेस ने व्यापक राजनीतिक भागीदारी दर्ज की।
कांग्रेस को भारी सफलता: कांग्रेस ने 11 में से 5 प्रांतों में पूर्ण बहुमत हासिल किया और कुल 8 प्रांतों में अपनी सरकारें बनाईं।
मुस्लिम लीग का निराशाजनक प्रदर्शन: मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में भी मुस्लिम लीग का प्रदर्शन काफी खराब रहा, जिससे जिन्ना में असुरक्षा बढ़ी।
नागरिक स्वतंत्रताओं की बहाली: कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने प्रेस पर लगे प्रतिबंध हटाए, राजनीतिक बंदियों को रिहा किया और आपातकालीन शक्तियां वापस लीं।
कृषि और ऋण सुधार: किसानों को राहत देने के लिए ऋण-माफी कानून बनाए और काश्तकारी अधिकारों की सुरक्षा हेतु विधेयक पारित किए।
शिक्षा और समाज सुधार: वर्धा शिक्षा योजना (बुनियादी शिक्षा) को बढ़ावा दिया, मद्रास में मंदिर प्रवेश और नशाबंदी लागू की।
मजदूर सुधार नीतियां: कारखानों में काम करने की स्थितियों में सुधार किया तथा ट्रेड यूनियनों को सशर्त कानूनी मान्यताएं प्रदान कीं।
द्वितीया विश्व युद्ध और कांग्रेस मंत्रिमंडलों का इस्तीफा (Resignation of Congress Ministries)
द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत (1939): 3 सितंबर 1939 को द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ और ब्रिटेन ने भारत को युद्ध में झोंक दिया।
भारतीयों की सहमति का अभाव: वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने भारतीय जन-प्रतिनिधियों की सहमति के बिना भारत को युद्धरत देश घोषित कर दिया।
मंत्रिमंडलों का इस्तीफा व धन्यवाद दिवस: विरोध में 28 माह शासन के बाद कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने इस्तीफा दिया; लीग ने 22 दिसंबर 1939 को ‘मुक्ति दिवस’ मनाया।
व्यक्तिगत सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन (1940–1942)
अगस्त प्रस्ताव, क्रिप्स मिशन और पृष्ठभूमि (August Offer & Cripps Mission)
अगस्त प्रस्ताव (1940): द्वितीय विश्व युद्ध में भारतीयों का सहयोग पाने हेतु वायसराय लिनलिथगो ने औपनिवेशिक स्वराज्य (Dominion Status) का प्रस्ताव रखा।
अगस्त प्रस्ताव की विफलता: पूर्ण स्वतंत्रता की मांग कर रही कांग्रेस और पृथक देश चाह रही मुस्लिम लीग दोनों ने इसे खारिज कर दिया।
क्रिप्स मिशन (मार्च 1942): सर स्टेफोर्ड क्रिप्स के नेतृत्व में आए मिशन ने युद्ध के बाद डोमिनियन स्टेटस और संविधान सभा का वादा किया।
“उत्तर-तिथि का चेक” (Post-Dated Cheque): गांधीजी ने दिवालिया हो रहे बैंक के नाम क्रिप्स मिशन को ‘उत्तर-तिथि का चेक’ कहकर ठुकरा दिया।
व्यक्तिगत सत्याग्रह – 1940 (Individual Satyagraha)
सत्याग्रह का उद्देश्य: यह आंदोलन युद्ध विरोधी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को बनाए रखने के लिए गांधीजी द्वारा शुरू किया गया।
प्रथम और द्वितीय सत्याग्रही: विनोबा भावे पहले व्यक्तिगत सत्याग्रही बने तथा पंडित जवाहरलाल नेहरू को दूसरे सत्याग्रही के रूप में चुना गया।
“दिल्ली चलो” सत्याग्रह: सत्याग्रही भाषण देकर गिरफ्तारी देते थे; गिरफ्तार न होने पर दिल्ली की ओर मार्च करते थे, इसलिए इसे ‘दिल्ली चलो’ कहा गया।
भारत छोड़ो आंदोलन और ‘करो या मरो‘ (Quit India Movement & “Do or Die”)
वर्धा प्रस्ताव (जुलाई 1942): कांग्रेस कार्यसमिति ने वर्धा बैठक में अंग्रेजों से तत्काल भारत छोड़ने की मांग वाला ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया।
ग्वालिया टैंक मैदान (8 अगस्त 1942): बॉम्बे के ग्वालिया टैंक मैदान में कांग्रेस ने औपचारिक रूप से ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का प्रस्ताव पास किया।
“करो या मरो” का नारा: महात्मा गांधी ने अपने ऐतिहासिक भाषण में राष्ट्र को ‘करो या मरो’ (Do or Die) का अमर मंत्र दिया।
ऑपरेशन जीरो आवर (9 अगस्त 1942): आंदोलन शुरू होते ही ब्रिटिश सरकार ने रातों-रात गांधीजी और पूरे शीर्ष कांग्रेस नेतृत्व को गिरफ्तार कर लिया।
स्वतःस्फूर्त जन-क्रांति: नेतृत्वविहीन होने के बाद भी जनता ने डाकघरों, रेलवे स्टेशनों और सरकारी इमारतों पर हमले कर स्वतःस्फूर्त आंदोलन चलाया।
गुप्त प्रतिरोध और भूमिगत नेटवर्क (Mass Underground Resistance)
अरुणा आसफ अली की वीरता: अरुणा आसफ अली ने ग्वालिया टैंक मैदान में तिरंगा फहराया और भूमिगत होकर आंदोलन की कमान संभाली।
सीक्रेट कांग्रेस रेडियो: उषा मेहता ने राममनोहर लोहिया के साथ मिलकर गुप्त ‘कांग्रेस रेडियो’ चलाकर स्वतंत्रता संग्राम की खबरें प्रसारित कीं।
केंद्रीय भूमिगत नेटवर्क: जयप्रकाश नारायण, अच्युत पटवर्धन और सुचेता कृपलानी ने हजारीबाग जेल से भागकर भूमिगत प्रतिरोध का संचालन किया।
समानांतर सरकारें (Parallel Governments)
बलिया में चित्तू पांडे: उत्तर प्रदेश के बलिया में चित्तू पांडे के नेतृत्व में पहली समानांतर सरकार बनी तथा कई अधिकारी रिहा कराए।
तामलुक (बंगाल) की जातीय सरकार: मिदनापुर के तामलुक में ‘जातीय सरकार’ बनी, जिसने सशस्त्र ‘विद्युत वाहिनी’ और राहत कार्यों की व्यवस्था की।
सतारा की ‘प्रति सरकार‘: महाराष्ट्र के सतारा में नाना पाटिल और वाई.बी. चव्हाण के नेतृत्व में सबसे लंबी चलने वाली समानांतर सरकार बनी।
न्यायदान मंडल और जन-अदालतें: सतारा की ‘प्रति सरकार’ ने अपनी जन-अदालतें (न्यायदान मंडल) और बाजार व्यवस्था चलाकर ब्रिटिश सत्ता को पूरी चुनौती दी।
ऐतिहासिक महत्व (Significance)
अंतिम प्रहार: इस आंदोलन ने सिद्ध कर दिया कि अब भारतीय जनता पर ब्रिटिश हुकूमत का शासन चलाना नामुमकिन हो चुका है।
सुभाष चंद्र बोस, आजाद हिंद फौज और शाही नौसेना विद्रोह (1939–1946)
फॉरवर्ड ब्लॉक का गठन और विदेश यात्रा (Forward Bloc & Escape)
त्रिपुरी संकट (1939): गांधीजी से वैचारिक मतभेदों के कारण कांग्रेस अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देकर सुभाष चंद्र बोस ने नया गुट बनाया।
फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना (1939): वामपंथी और उग्रवादी तत्वों को संगठित करने हेतु बोस ने कांग्रेस के भीतर ‘फॉरवर्ड ब्लॉक’ का गठन किया।
गृह नजरबंदी से पलायन (1941): पुलिस की सख्त निगरानी के बावजूद जियाउद्दीन के छद्म वेश में बोस गुप्त रूप से कोलकाता से जर्मनी निकल गए।
‘फ्री इंडिया सेंटर‘ (जर्मनी): बर्लिन में ‘फ्री इंडिया सेंटर’ की स्थापना की और ‘नेताजी’ के रूप में जाने गए तथा ‘जय हिंद’ का नारा दिया।
आजाद हिंद फौज और आजाद हिंद सरकार (INA & Azad Hind Government)
INA की मूल अवधारणा: कैप्टन मोहन सिंह और ज्ञानी प्रीतम सिंह ने जापानियों द्वारा बंदी बनाए गए भारतीय सैनिकों से INA बनाने का विचार दिया।
रास बिहारी बोस का योगदान: टोक्यो में ‘इंडियन इंडिपेंडेंस लीग’ की स्थापना की और आगे चलकर INA की कमान नेताजी सुभाष चंद्र बोस को सौंपी।
सिंगापुर में आजाद हिंद सरकार (1943): 21 अक्टूबर 1943 को नेताजी ने सिंगापुर में ‘आरजी हुकुमत-ए-आजाद हिंद’ (अस्थायी सरकार) की स्थापना की।
अंडमान और निकोबार का नामकरण: जापानी सेना द्वारा दिए गए अंडमान और निकोबार द्वीपों का नाम बदलकर क्रमशः ‘शहीद’ और ‘स्वराज’ द्वीप रखा।
ऐतिहासिक आह्वान: “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा” और “दिल्ली चलो” के नारे देकर भारतीयों में अदम्य देशभक्ति जगाई।
रानी झांसी रेजिमेंट: कैप्टन लक्ष्मी स्वामीनाथन के नेतृत्व में आजाद हिंद फौज में महिलाओं की पहली विशेष सैन्य रेजिमेंट गठित की गई।
पूर्वोत्तर सीमा पर सैन्य अभियान: INA की ब्रिगेडों (नेहरू, गांधी, आजाद) ने बर्मा सीमा पार कर कोहिमा और इम्फाल में ब्रिटिश सेना से भीषण युद्ध लड़ा।
लाल किला मुकदमा और जन-आक्रोश (Red Fort INA Trials)
लाल किला मुकदमा (1945): युद्धबंदी बनाए गए INA अधिकारियों—कर्नेल सहगल, कर्नल ढिल्लों और मेजर शाहनवाज खान पर लाल किले में मुकदमा चला।
बचाव पक्ष के बैरिस्टर: भुलाभाई देसाई के नेतृत्व में तेज बहादुर सप्रू, जवाहरलाल नेहरू और असफ अली ने INA सैनिकों की वकालत की।
देशव्यापी जनाक्रोश: “लाल किले को तोड़ दो, आजाद हिंद फौज को छोड़ दो” के नारों के साथ पूरे देश में अभूतपूर्व जन-प्रदर्शन हुए।
सजा माफी का निर्णय: विशाल जन-आक्रोश और सैन्य विद्रोह के डर से वायसराय लॉर्ड वेवेल ने INA अधिकारियों की सजा माफ कर दी।
रॉयल इंडियन नेवी (RIN) विद्रोह और ब्रिटिश सत्ता पर प्रभाव (RIN Mutiny 1946)
नौसेना विद्रोह की शुरुआत (1946): 18 फरवरी 1946 को बॉम्बे में HMS तलवार के नौसैनिकों (‘नाविकों’) ने खराब भोजन और नस्लीय भेदभाव पर हड़ताल की।
विद्रोह का विस्तार: यह विद्रोह कराची, कोलकाता और मद्रास के बंदरगाहों तक फैल गया; नौसैनिकों ने जहाजों पर तिरंगा, हिलाली और लाल झंडा फहराया।
पटेल और जिन्ना का हस्तक्षेप: सरदार पटेल और मोहम्मद अली जिन्ना के आश्वासन और मध्यस्थता के बाद ही नौसैनिकों ने 23 फरवरी को आत्मसमर्पण किया।
शाही वायुसेना (RIAF) का समर्थन: नौसैनिकों के समर्थन में भारतीय वायुसेना के जवानों और थल सेना की कई इकाइयों ने भी हड़ताल की।
ब्रिटिश सैन्य सत्ता का पतन: INA आंदोलन और RIN विद्रोह ने साबित किया कि ब्रिटिश भारतीय सेना पर से अंग्रेजों का एकाधिकार और वफादारी खत्म हो चुकी है।