भू-आकृति विज्ञान (Geomorphology) शब्द तीन शब्दों—भू (Geo), आकृति (Morpho), एवं विज्ञान (Logy) से मिलकर बना है, जिसका अर्थ हुआ “पृथ्वी की आकृतियों का विज्ञान” अर्थात भू-आकृतियों के अध्ययन का विज्ञान। पृथ्वी के तल पर विभिन्न भू-आकृतियाँ जैसे महाद्वीप, महासागर, पर्वत, पठार, नदी घाटियाँ, सागरीय भृगु (Sea Cliff), निलम्बी घाटी (Hanging Valley) आदि विद्यमान हैं। क्या भू-आकृति विज्ञान उपर्युक्त सभी भू-आकृतियों के अध्ययन की व्यवस्था करता है? नहीं, क्योंकि यह विज्ञान भू-आकृतियों का अध्ययन तो करता है, पर भूतल पर उपलब्ध समस्त भू-आकृतियों का अध्ययन नहीं करता; केवल कुछ ही भू-आकृतियों का अध्ययन करता है। अतः इसका अध्ययन क्षेत्र सीमित है।
सेलिसबरी (Salisbury) का स्थलाकृतिक वर्गीकरण
प्रसिद्ध भूवैज्ञानिक सेलिसबरी ने पृथ्वी पर मौजूद सभी भू-आकृतियों (Landforms) को उनकी उत्पत्ति और आकार के आधार पर तीन प्रमुख श्रेणियों में बांटा है:
1. प्रथम श्रेणी की भू-आकृतियां (First Order Landforms)
प्रथम वर्ग में “प्रथम श्रेणी की भू-आकृतियाँ” आती हैं, जैसे महाद्वीप एवं महासागर। ये पृथ्वी के इतिहास में सबसे पहले बनने वाली और सबसे विशाल आकृतियां हैं।
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उदाहरण: महाद्वीप (Continents) और महासागर (Oceans)।
2. द्वितीय श्रेणी की भू-आकृतियां (Second Order Landforms)
दूसरे वर्ग में “द्वितीय श्रेणी की भू-आकृतियाँ” आती हैं। इस श्रेणी की भू-आकृतियों के अंतर्गत महाद्वीपों पर उपस्थित पर्वत एवं पठारों को सम्मिलित किया गया है, जो पहली श्रेणी की भू-आकृतियों पर आरोपित हैं।
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उदाहरण: पर्वत (Mountains), पठार (Plateaus), और मैदान (Plains)।
3. तृतीय श्रेणी की भू-आकृतियां (Third Order Landforms)
तीसरे वर्ग में “तृतीय श्रेणी की भू-आकृतियाँ” आती हैं। इसके अंतर्गत वे भू-आकृतियाँ सम्मिलित की गई हैं, जो प्रथम एवं द्वितीय श्रेणी की विशाल भू-आकृतियों पर जन्म लेती हैं। उदाहरण के लिए—नदी-घाटियाँ, जल-प्रपात, जलजगतिकाएँ, बाढ़कृत मैदान, नदी वेदिकाएँ, पर्वतीय ढाल, हिमानी घाटियाँ, रुंडित गिरिशृंग (Spurs), हिमतंग्वर (Cirque), हिमोढ़ (Moraine), हिम धौत मैदान (Outwash Plain), अपोढ़ मैदान (Till Plain), सागरीय पुलिन, अलगन स्तंभ, सागरीय मेहराब, रोधिकाएँ, भूजिह्वा, हम्मादा, बजादा, अपवाहन गर्त, बालू टिब्बे, कार्त सेतु, कार्त सुरंग, राजकुंड (Polje), अपक्षय गर्त (Weathering pits), शैलमलबा शंकु (Talus Cone), खंडाश्म पुंज (Felsenmeere) आदि।
प्रथम और द्वितीय श्रेणी को भू-आकृति विज्ञान से बाहर क्यों रखा गया?
इसके पीछे दो मुख्य कारण और विधाएं (Disciplines) काम करती हैं:
1. भूगर्भीय गतिकी विज्ञान (Geotectonics) और भूविज्ञान (Geology)
प्रथम और द्वितीय श्रेणी की आकृतियां (जैसे महाद्वीप या टेक्टोनिक पर्वत) पृथ्वी के आंतरिक बलों, प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics), और महाद्वीपीय विस्थापन (Continental Drift) का परिणाम हैं। इनका अध्ययन मुख्य रूप से भूविज्ञान (Geology) और जियोटेक्टोनिक्स के अंतर्गत किया जाता है, क्योंकि इनके लिए पृथ्वी की आंतरिक परतों और चट्टानों की गहरी समझ जरूरी है।
2. महासागरीय विज्ञान (Oceanography)
महासागरों के तल की बनावट, उनकी गहराइयों और गर्तों का अध्ययन भूगोल की एक अलग शाखा समुद्र विज्ञान (Oceanography) के तहत अधिक गहराई से किया जाता है।
: यदि भू-आकृति विज्ञान महाद्वीपों की उत्पत्ति से लेकर हवा से उड़ने वाले रेत के कण तक सब कुछ खुद में समेट लेता, तो इसका दायरा असीमित हो जाता। इसलिए, इसने अपना ध्यान मुख्य रूप से इस बात पर केंद्रित किया कि बाहरी कारक (Exogenetic Forces) जैसे नदी, हवा, ग्लेशियर और लहरें पृथ्वी के धरातल को कैसे तराशते हैं।
निष्कर्ष (Conclusion):
उपर्युक्त विवरण से यह स्पष्ट होता है कि शाब्दिक अर्थ में ‘भू-आकृति विज्ञान’ भले ही पूरी पृथ्वी की आकृतियों के अध्ययन का बोध कराता हो, लेकिन व्यावहारिक और वैज्ञानिक रूप से इसका कार्यक्षेत्र सीमित एवं विशिष्ट है। सेलिसबरी द्वारा किए गए त्रिवर्गीय वर्गीकरण में से प्रथम और द्वितीय श्रेणी की विशाल आकृतियों (महाद्वीप, महासागर, पर्वत और पठार) की उत्पत्ति का अध्ययन मुख्य रूप से भूविज्ञान (Geology) और भूगर्भीय गतिकी (Geotectonics) के अंतर्गत किया जाता है। भू-आकृति विज्ञान मुख्य रूप से तृतीय श्रेणी की असंख्य स्थलाकृतियों पर केंद्रित है।
1. व्यावहारिक और वैज्ञानिक रूप से भू-आकृति विज्ञान (Geomorphology) का कार्यक्षेत्र कैसा है?
- पूरी तरह असीमित और व्यापक
- सीमित एवं विशिष्ट
- केवल महासागरों तक केंद्रित
- इसका कोई निश्चित कार्यक्षेत्र नहीं है
सही उत्तर: 2) सीमित एवं विशिष्ट
व्याख्या: शाब्दिक अर्थ में यह पूरी पृथ्वी की आकृतियों का विज्ञान दिखता है, लेकिन व्यावहारिक रूप से इसका दायरा सीमित और विशिष्ट है।
2. महाद्वीप, महासागर, पर्वत और पठार जैसी विशाल आकृतियों की उत्पत्ति का अध्ययन मुख्य रूप से किस शास्त्र के अंतर्गत किया जाता है?
- जलवायु विज्ञान (Climatology)
- मृदा विज्ञान (Pedology)
- भूविज्ञान और भूगर्भीय गतिकी (Geology & Geotectonics)
- मानव भूगोल (Human Geography)
सही उत्तर: 3) भूविज्ञान और भूगर्भीय गतिकी (Geology & Geotectonics)
व्याख्या: प्रथम और द्वितीय श्रेणी की विशाल संरचनाएं पृथ्वी के आंतरिक बलों से जुड़ी हैं, इसलिए इनका मुख्य अध्ययन भूविज्ञान (Geology) में होता है।
3. भू-आकृति विज्ञान का मुख्य ध्यान (Focus) सेलिसबरी के वर्गीकरण की किस श्रेणी पर केंद्रित रहता है?
- प्रथम श्रेणी
- द्वितीय श्रेणी
- तृतीय श्रेणी
- चतुर्थ श्रेणी
सही उत्तर: 3) तृतीय श्रेणी
व्याख्या: भू-आकृति विज्ञान मुख्य रूप से धरातल पर बनने वाली तृतीय श्रेणी की असंख्य और बारीक स्थलाकृतियों पर केंद्रित है।
4. भू-आकृति विज्ञान तृतीय श्रेणी की आकृतियों का अध्ययन करते समय मुख्य रूप से किस बात पर बल देता है?
- केवल उनके नाम रटने पर
- उनके विकास चक्र (Cycle of Development) और बाहरी कारकों पर
- उनकी गहराई और खनिज संपदा पर
- उनके व्यापारिक लाभ पर
सही उत्तर: 2) उनके विकास चक्र (Cycle of Development) और बाहरी कारकों पर
व्याख्या: यह विज्ञान सभी आकृतियों का अंधाधुंध अध्ययन नहीं करता, बल्कि यह देखता है कि बाहरी कारक (जैसे नदी, हवा) कैसे काम करते हैं और आकृतियों का क्रमिक विकास कैसे होता है।