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महाद्वीपीय प्रवाह (Continental Drift)

महाद्वीपीय प्रवाह की अवधारणा और इतिहास

  • महाद्वीपीय विस्थापन से तात्पर्य पृथ्वी के महाद्वीपों का एक-दूसरे के सापेक्ष धीरे-धीरे स्थान परिवर्तन करना है।
  • भूवैज्ञानिक दृष्टि से करोड़ों वर्षों में महाद्वीप समुद्र तल पर स्थित विवर्तनिक प्लेटों के साथ विभिन्न दिशाओं में गतिशील रहे हैं।
  • महाद्वीपों के बहने (Continental Drift) की अवधारणा सबसे पहले 1596 ई. में डच मानचित्रकार एवं वैज्ञानिक अब्राहम ओर्टेलियस (Abraham Ortelius) ने प्रस्तुत की।
  • 1912 ई. में जर्मन भू-वैज्ञानिक अल्फ्रेड वेगेनर (Alfred Wegener) ने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत को वैज्ञानिक रूप से विकसित और व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया।
  • बाद में विकसित प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत (Plate Tectonic Theory) ने महाद्वीपों की गति की अधिक वैज्ञानिक और स्वीकार्य व्याख्या प्रदान की।

ओर्टेलियस से पहले और बाद में अनेक विद्वानों ने भी महाद्वीपों की समानता पर ध्यान दिया, जिनमें प्रमुख हैं—

    • अब्राहम ओर्टेलियस (1596)
    • थियोडोर क्रिस्टोफ लिलीएन्थाल (1756)
    • अलेक्जेंडर वॉन हम्बोल्ट (1801 एवं 1845)
    • एंटोनियो स्नाइडर-पेलेग्रिनी (1858)

इन वैज्ञानिकों ने विशेष रूप से अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के तटों की आकृति में उल्लेखनीय समानता का वर्णन किया।

  • महाद्वीपीय विस्थापन की अवधारणा को बल 1492 ई. में क्रिस्टोफर कोलंबस की अमेरिका यात्रा के बाद प्राप्त समुद्री एवं मानचित्रीय जानकारियों से मिला।
  • कोलंबस की बाद की यात्राओं में अटलांटिक महासागर के पश्चिमी तट का विस्तृत मानचित्रण किया गया।
  • 16वीं शताब्दी में पुर्तगाली नाविकों ने केप ऑफ गुड होप (आशा अंतरीप) तक अटलांटिक तटों का मानचित्रण किया।
  • 1620 ई. में अंग्रेज़ वैज्ञानिक फ्रांसिस बेकन (Francis Bacon) ने अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के तटों की समानता का अध्ययन कर यह निष्कर्ष दिया कि दोनों महाद्वीप कभी आपस में जुड़े हुए रहे होंगे।
  • 1596 ई. में ओर्टेलियस ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “Thesaurus Geographicus” में महाद्वीपों की तटरेखाओं की समानता का उल्लेख किया।
  • 1668 ई. में फ्रांसीसी विद्वान पी. प्लासेट (P. Placet) ने भी महाद्वीपों की समरूपता के पक्ष में अपने विचार प्रस्तुत किए।
  • इन सभी प्रारम्भिक अध्ययनों ने महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धांत की नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • बाद में अल्फ्रेड वेगेनर ने इन्हीं पूर्ववर्ती अध्ययनों, भूगर्भीय तथ्यों, जीवाश्मों तथा जलवायु संबंधी प्रमाणों के आधार पर महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत को वैज्ञानिक रूप दिया।

महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धांत का विकास (टेलर का योगदान)

  • महाद्वीपीय प्रवाह संबंधी विचारों का बीजारोपण 17वीं शताब्दी में महासागरों के मानचित्रों एवं तटीय संरचनाओं के अध्ययन से हुआ।
  • प्रारंभिक वैज्ञानिकों ने विभिन्न महाद्वीपों की तटरेखाओं में समानता का अवलोकन किया।

इस अवधारणा को विकसित करने में कई विद्वानों का योगदान रहा, जिनमें प्रमुख हैं—

    • फ्रांसिस प्लासेट (Francis Placet)
    • फ्रांसिस बेकन (Francis Bacon)
    • एंटोनियो स्नाइडर-पेलेग्रिनी (Antonio Snider-Pellegrini)
    • एफ. बी. टेलर (F. B. Taylor)

एंटोनियो स्नाइडर-पेलेग्रिनी का योगदान

  • एंटोनियो स्नाइडर एक फ्रांसीसी विद्वान थे।
  • उन्होंने महाद्वीपीय प्रवाह की अवधारणा पर सबसे पहले विस्तृत एवं वैज्ञानिक विचार प्रस्तुत किए।
  • अपनी पुस्तक “Creation and its Mysteries Revealed” में उन्होंने बताया कि वर्तमान महाद्वीप पहले एक-दूसरे से जुड़े हुए थे।
  • उन्होंने “Carboniferous Geography” नामक मानचित्र में संयुक्त महाद्वीपों का चित्रण किया।
  • उत्तरी अमेरिका और यूरोप से प्राप्त समान जीवाश्मों के आधार पर उन्होंने महाद्वीपों के पूर्व में जुड़े होने का प्रमाण प्रस्तुत किया।
  • वे महाद्वीपों के प्रवाह का वैज्ञानिक कारण स्पष्ट नहीं कर सके।
  • पर्याप्त वैज्ञानिक आधार के अभाव में उनका सिद्धांत व्यापक रूप से स्वीकार नहीं किया गया।

एफ. बी. टेलर (Frank B. Taylor) का योगदान

  • अमेरिकी भू-वैज्ञानिक एफ. बी. टेलर ने 1908 में महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धांत प्रस्तुत किया।
  • उनका सिद्धांत 1910 में प्रकाशित हुआ।
  • उन्होंने महाद्वीपीय प्रवाह को पहली बार व्यवस्थित वैज्ञानिक आधार प्रदान किया।
  • टेलर ने अपने सिद्धांत को “स्थापन सिद्धांत (Translation Theory)” कहा।
  • उनके अनुसार महाद्वीपों का क्षैतिज (Horizontal) स्थानांतरण हुआ था।

वेगनर का महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत (Wegener’s Theory)

प्रसिद्ध जर्मन जलवायुविद अल्फ्रेड लोथर वेगनर (1880-1930) ने 1915 में ‘महाद्वीप तथा महासागरों की उत्पत्ति’ (Origin of Continents and Oceans) नामक पुस्तक में बताया कि वर्तमान में वितरित समस्त महाद्वीप पुराने वक्त में एक वृहद महाद्वीप के रूप में परस्पर संयोजित थे। वेगनर की इस पुस्तक का 1920 तक अंग्रेजी अनुवाद नहीं होने से इस विचार का अधिक प्रसार नहीं हो सका। वेगनर की इस संकल्पना के प्रमुख आधार महाद्वीपों की आकृति व भू-गर्भिक प्रमाण रहे थे। वेगनर एक जलवायु वैज्ञानिक थे, जिनका प्रमुख ध्येय यह समझना था कि विश्व की जलवायु में मुख्य रूप से क्या भिन्नताएं हैं व इनके क्या कारण रहे हैं? उन्हें पृथ्वी के कई जगहों पर ऐसे प्रमाण मिले, जिनके आधार पर जलवायु परिवर्तन संबंधी परिकल्पना को आधार मिले। इस समस्या के समाधान हेतु उन्होंने कई प्रमाण एकत्रित किए। उन्होंने अफ्रीका तथा ब्राजील से जीवाश्म प्राप्त किए और महाद्वीपों की विभिन्न अवस्थाओं का मानचित्रण किया।

वेगनर के दिमाग में पृथ्वी की पुरानी जलवायु के अध्ययन के दौरान कुछ सवाल आए जिनके आधार पर उन्होंने अपना प्रवाह सिद्धांत प्रस्तुत किया। ये प्रश्न निम्नलिखित थे:

  1. लंदन, पेरिस व ग्रीनलैंड में उष्णकटिबंधीय फर्न (Fern) कैसे विकसित हुए?

  2. टुंड्रा जलवायु के ठंडे प्रदेशों में कोयला कैसे पाया जाता है?

  3. ब्राजील, प्रायद्वीपीय ऑस्ट्रेलिया, भारत व कांगो बेसिन में हिमावरण (Glaciation) क्यों पाया गया?

इस प्रकार उन्हें पृथ्वी पर वनस्पति के ऐसे प्रमाण मिले, जिनसे उन स्थानों पर परिवर्तन में विकसित होने में उल्टी दशाएं पायी जाती हैं। इसी प्रकार कई संसाधनों (कोयला) का वितरण भी पृथक क्षेत्रों में मिलता है, जिनका वर्तमान दशाओं में वहाँ मिलना संभव नहीं है। इन सभी प्रश्नों पर विस्तार से चिंतन करने के उपरांत वेगनर महोदय के मस्तिष्क में दो परिकल्पनाएं पैदा हुईं, जो हैं:

  1. समस्त महाद्वीप वर्तमान स्थानों पर स्थायी रहे हों व जलवायु कटिबंधों का एक जगह से दूसरी जगह पर स्थानांतरण हुआ हो। ज्ञातव्य है कि जलवायु कटिबंधों का स्थानांतरण पृथ्वी पर सूर्य की किरणों के चमकने पर आश्रित होता है अर्थात् पृथ्वी एवं सूर्य के संबंध परिवर्तित हुए हों। सूर्य का अपनी सीमाओं पर नियंत्रण खोना वेगनर को असंभव प्रतीत हुआ व इस संदर्भ में उन्हें प्रत्यक्ष प्रमाण भी नहीं मिले।

  2. समस्त जलवायु कटिबंध स्थायी रहे होंगे, व स्थल खंडों (महाद्वीप) का स्थानांतरण हुआ होगा। इस संभावना ने वेगनर महोदय को सबसे ज्यादा प्रभावित किया और उन्होंने महाद्वीपों के प्रवाह संबंधी सिद्धांत प्रस्तुत किया।

सिद्धांत का स्वरूप: पैंजिया और पैंथालसा

  • वेगनर ने पुराजलवायु, पुरावनस्पति एवं भूवैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धांत प्रस्तुत किया।
  • उनके अनुसार कार्बोनिफेरस काल में सभी महाद्वीप एक विशाल स्थलखंड के रूप में जुड़े हुए थे।
  • इस संयुक्त स्थलखंड को पैंजिया (Pangaea) कहा गया।
  • Pangaea शब्द Pan (सभी) + Gaea (पृथ्वी) से मिलकर बना है, जिसका अर्थ “संपूर्ण पृथ्वी” है।
  • वेगनर के अनुसार पैंजिया के चारों ओर एक विशाल महासागर था, जिसे पैंथालासा (Panthalassa) कहा गया।
  • Panthalassa शब्द Pan (सभी) + Thalassa (महासागर) से मिलकर बना है, जिसका अर्थ “संपूर्ण महासागर” है।
  • पैंजिया का उत्तरी भाग लॉरेशिया (Laurasia/Angaraland) कहलाता था।
  • लॉरेशिया में उत्तरी अमेरिका, ग्रीनलैंड तथा यूरेशिया शामिल थे।
  • पैंजिया का दक्षिणी भाग गोंडवानालैंड (Gondwanaland) कहलाता था।
  • गोंडवानालैंड में दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका, मेडागास्कर, भारत, ऑस्ट्रेलिया एवं अंटार्कटिका शामिल थे।
  • लॉरेशिया और गोंडवानालैंड के बीच टेथिस भू-अभिनति (Tethys Geosyncline) स्थित थी।
  • कार्बोनिफेरस काल में दक्षिणी ध्रुव अफ्रीका के नैटाल (डर्बन) के पास तथा उत्तरी ध्रुव प्रशांत महासागर में स्थित माना गया।
  • वेगनर के अनुसार पृथ्वी की संरचना सियाल (SIAL), सीमा (SIMA) और निफे (NIFE) तीन परतों से बनी है।
  • उनके अनुसार महाद्वीप सियाल तथा महासागरीय तल सीमा से निर्मित हैं।
  • वेगनर का मानना था कि सियाल, सीमा पर तैरते हुए महाद्वीपों का निर्माण करता है।
  • लगभग 300 मिलियन वर्ष पूर्व पैंजिया का विखंडन प्रारंभ हुआ।
  • इसी विखंडन के परिणामस्वरूप वर्तमान महाद्वीपों एवं महासागरों का निर्माण हुआ।
  • वेगनर ने महाद्वीपीय प्रवाह की दो प्रमुख दिशाएँ बताई— विषुवत रेखा की ओर प्रवाह तथा पश्चिम की ओर प्रवाह।
  • विषुवत रेखा (भूमध्य रेखा) की ओर: महाद्वीपों के भूमध्य रेखा की ओर प्रवाहित होने का कारण गुरुत्वाकर्षण व प्लवनशीलता का बल (Force of Buoyancy) का पारस्परिक संबंध रहा था। भूमध्य रेखा की ओर विस्थापन से अफ्रीका एवं यूरीशिया परस्पर निकट आये जिसके कारण टेथिस सागर में निक्षेपित तलछट वलित होकर ऊपर उठी व अल्पाइन पर्वतों (हिमालय, आल्प्स व एटलस) का सृजन हुआ। विषुवतीय प्रवाह के कारण ही प्रायद्वीपीय भारत व ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका व अंटार्कटिका से पृथक हुए।

  • पश्चिम की ओर: पश्चिम में प्रवाहित होने की वजह सूर्य व चंद्रमा की ज्वारीय शक्ति (Tidal Force) को माना है। पश्चिमी दिशा में विस्थापन के परिणामस्वरूप उत्तरी अमेरिका व दक्षिणी अमेरिका, यूरोप व अफ्रीका से पृथक हुए व अटलांटिक महासागर का उद्भव हुआ। वेगनर महोदय ने विस्थापन के माध्यम से महाद्वीपों एवं महासागरों के प्रादुर्भाव के साथ ही पर्वत सृजन को भी स्पष्ट किया है। उनके अनुसार विषुवत रेखीय विस्थापन के कारण टर्शियरी काल में अल्पाइन पर्वत बने जबकि पश्चिम में विस्थापित होने से रॉकी व एंडीज पर्वतों का सृजन हुआ।

महाद्वीपीय प्रवाह के पक्ष में प्रमाण

वेगनर ने अपने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के पक्ष में कई प्रमाण एकत्रित किए, जिनका संक्षिप्त विवरण नीचे दिया गया है:

  1. पर्वत पट्टी: भू-वैज्ञानिक क्रियाओं के फलस्वरूप 47 करोड़ से 35 करोड़ वर्ष पुरानी पर्वत पट्टी का निर्माण एक अविच्छिन्न कटिबंध के रूप में हुआ था। ये पर्वत अब अटलांटिक महासागर द्वारा पृथक कर दिए गए हैं।

  2. जीवाश्म: वेगनर ने अपने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत को जीवाश्मों के वितरण के आधार पर स्पष्ट करने का प्रयास किया। उदाहरणार्थ, ग्लॉसॉप्टेरिस (Glossopteris) नामक पौधे तथा मेसोसॉरस (Mesosaurus) एवं लिस्ट्रोसॉरस (Lystrosaurus) नामक जंतुओं के जीवाश्म भारत, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिणी अफ्रीका, दक्षिणी अमेरिका, फ़ॉकलैंड द्वीप, अंटार्कटिक महाद्वीप आदि में पाये जाते हैं। वर्तमान समय में ये सभी प्रदेश एक-दूसरे से बहुत दूर स्थित हैं और इस प्रकार का वितरण महाद्वीपों के विस्थापन द्वारा ही स्पष्ट हो सकता है।

  3. भू-वैज्ञानिक अनुरूपता: अफ्रीका के घाना तट पर नदी जलोढ़ में स्वर्ण निक्षेपों (Gold Placers) की उपस्थिति तथा उसी क्षेत्र में इन निक्षेपों की उद्गम शैलों (Source Rocks) की अनुपस्थिति एक महत्वपूर्ण तथ्य है। लगभग 5,000 किमी चौड़े अटलांटिक महासागर के पार दक्षिणी अमेरिका में ब्राजील के बेलेम साओ में स्वर्ण-युक्त शिराओं वाले शैल मिलते हैं, परंतु निकटवर्ती तटीय पट्टी के जोन्स में सोने के निक्षेप नहीं हैं। इतने दूर स्थित क्षेत्रों में इतनी समानताएं महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के अनुरूप हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि दक्षिणी अमेरिका तथा अफ्रीका पैंजिया के भाग थे, जो बाद में एक-दूसरे से दूर चले गए। इस तथ्य की पुष्टि अफ्रीका तथा दक्षिणी अमेरिका के मानचित्रों को एक साथ व्यवस्थित (Jigsaw-fit) करके की जा सकती है। ब्राजील में सोना युक्त अवसाद इसका उत्तम उदाहरण है।

सिद्धांत की आलोचनाएँ

वेगनर के सिद्धांत की कई आधारों पर गंभीर आलोचना की गई:

  • ज्वारीय बल की कमजोरी: वेगनर ने पैंजिया के विभाजन का कारण चंद्रमा का ज्वारीय बल बताया, जबकि यह महाद्वीपों को खिसकाने के लिए पर्याप्त नहीं था।
  • सियाल–सीमा का विरोधाभास: वेगनर ने महाद्वीपों को सीमा (SIMA) पर तैरता बताया, लेकिन पर्वत निर्माण के लिए उसी सीमा को कठोर अवरोध माना, जो विरोधाभासी है।
  • पर्वत निर्माण की अपूर्ण व्याख्या: वेगनर केवल महाद्वीपों के किनारों के वलित पर्वतों की व्याख्या कर सके, मध्यवर्ती पर्वतों की नहीं।
  • भूकंपों की अधूरी व्याख्या: उन्होंने भूकंपों को महाद्वीपों के अवरोध से जोड़ा, लेकिन प्लेटों के मध्य होने वाले भूकंपों का स्पष्टीकरण नहीं दिया।
  • ज्वालामुखीय गतिविधियों का अभाव: वेगनर महाद्वीपीय ज्वालामुखियों की व्याख्या तो करते हैं, लेकिन महासागरीय ज्वालामुखीय गतिविधियों को स्पष्ट नहीं कर सके।
  • ग्लॉसॉप्टेरिस जीवाश्म पर आपत्ति: ग्लॉसॉप्टेरिस के जीवाश्म दक्षिणी गोलार्ध के अलावा अफगानिस्तान और साइबेरिया में भी मिले, जिससे उनका वितरण सिद्धांत कमजोर पड़ता है।
  • हिमानीकरण संबंधी विरोधाभास: जिन क्षेत्रों में हिमानीकरण के प्रमाण मिले, वहीं उष्णकटिबंधीय वनस्पतियों के जीवाश्म भी मिले, जिससे उनके जलवायु संबंधी तर्क पर प्रश्न उठे।
  • महाद्वीपों की सीमित गति: वेगनर ने महाद्वीपों की गति केवल उत्तर और पश्चिम दिशा में मानी, जबकि बाद के वैज्ञानिकों ने सभी दिशाओं में गति को स्वीकार किया।

सागर-नितल प्रसरण (Sea-Floor Spreading) और सिद्धांत की पुनस्र्थापना

  • वेगनर के सिद्धांत की आलोचनाओं के बावजूद, उनके मूल विचारों को बाद में सागर-नितल प्रसरण एवं प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत ने वैज्ञानिक आधार प्रदान किया।
  • सागर-नितल प्रसरण (Sea-Floor Spreading) महाद्वीपीय प्रवाह की वैज्ञानिक व्याख्या करने वाला एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है।
  • इस सिद्धांत का प्रतिपादन हैरी हेस (Harry Hess) और रॉबर्ट डीट्ज (Robert Dietz) ने 1960 में किया।
  • यह सिद्धांत सागरीय भू-वैज्ञानिकों एवं भू-भौतिकविदों के संयुक्त अनुसंधानों पर आधारित है।
  • इस सिद्धांत के विकास में मॉरिस एविंग (Maurice Ewing) और उनके सहयोगी वैज्ञानिकों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा।
  • हेस के अनुसार सागर-तल का प्रसरण (Sea-Floor Spreading) महाद्वीपों के संचलन का प्रमुख कारण है।
  • मध्य महासागरीय कटक (Mid-Oceanic Ridge) समुद्र तल पर नए भूपटल के निर्माण का प्रमुख क्षेत्र है।
  • मेंटल के संवहन प्रवाह (Convection Currents) के कारण गर्म मैग्मा ऊपर उठता है।
  • ऊपर उठता हुआ मैग्मा महासागरीय भूपटल में दरारें उत्पन्न करता है।
  • मैग्मा ठंडा होकर नए महासागरीय नितल (New Ocean Floor) का निर्माण करता है।
  • नए नितल के बनने से पुराना महासागरीय तल दोनों ओर खिसकने लगता है।
  • इस सतत प्रक्रिया के परिणामस्वरूप महासागरों का विस्तार तथा महाद्वीपों का संचलन होता है।
  • सागर-नितल प्रसरण सिद्धांत ने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • आगे चलकर यही अवधारणा प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics) सिद्धांत का आधार बनी।

निष्कर्ष

महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धांत भूगोल एवं भू-विज्ञान के इतिहास में एक क्रांतिकारी अवधारणा सिद्ध हुआ। यद्यपि अल्फ्रेड वेगनर अपने समय में महाद्वीपों के संचलन का वैज्ञानिक कारण स्पष्ट नहीं कर सके, फिर भी उन्होंने महाद्वीपों की समान तटरेखाओं, जीवाश्मों, चट्टानों तथा पुराजलवायु संबंधी प्रमाणों के आधार पर यह स्थापित किया कि सभी महाद्वीप कभी पैंजिया नामक एक विशाल स्थलखंड का भाग थे। प्रारंभ में उनके सिद्धांत को अनेक आलोचनाओं का सामना करना पड़ा, क्योंकि महाद्वीपों के संचलन के लिए प्रस्तुत ध्रुवीय फ्लीइंग बल एवं ज्वारीय बल पर्याप्त नहीं थे।

आज महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धांत केवल महाद्वीपों की उत्पत्ति और उनकी वर्तमान स्थिति को समझाने तक सीमित नहीं है, बल्कि पर्वत निर्माण, भूकंप, ज्वालामुखी, महासागरीय नितल के विकास, जीवाश्मों के वितरण तथा पृथ्वी के भू-वैज्ञानिक इतिहास की व्याख्या करने में भी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धांत आधुनिक भू-आकृति विज्ञान (Geomorphology) एवं प्लेट विवर्तनिकी का मूल आधार माना जाता है और भूगोल, भू-विज्ञान तथा प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है।

बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

1. अल्फ्रेड वेगनर ने कार्बोनिफेरस युग के उस विशाल स्थलखंड को क्या नाम दिया था, जिससे सभी महाद्वीप आपस में जुड़े हुए थे?

क) पैंथालसा (Panthalassa)

ख) लॉरेशिया (Laurasia)

ग) पैंजिया (Pangaea)

घ) गोंडवाना लैंड (Gondwana Land)

सही उत्तर: ग) पैंजिया (Pangaea)

व्याख्या: वेगनर के अनुसार पुराने समय में सभी महाद्वीप एक ही बड़े स्थलखंड के रूप में जुड़े थे, जिसे उन्होंने ‘पैंजिया’ ($Pan = \text{All}$, $Gaea = \text{Earth}$) कहा था। इसके चारों ओर फैले विशाल महासागर को ‘पैंथालसा’ कहा गया।

2. वेगनर के सिद्धांत के अनुसार, महाद्वीपों का ‘पश्चिम दिशा’ की ओर विस्थापन (प्रवाह) मुख्य रूप से किस बल के कारण हुआ?

क) पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल

ख) सूर्य और चंद्रमा की ज्वारीय शक्ति (Tidal Force)

ग) प्लवनशीलता का बल (Buoyancy Force)

घ) मेंटल की संवहन तरंगें

सही उत्तर: ख) सूर्य और चंद्रमा की ज्वारीय शक्ति (Tidal Force)

व्याख्या: वेगनर ने महाद्वीपों के प्रवाह की दो दिशाएं बताई थीं। भूमध्य रेखा की ओर प्रवाह का कारण गुरुत्वाकर्षण और प्लवनशीलता का बल था, जबकि पश्चिम की ओर प्रवाह का कारण सूर्य और चंद्रमा का ज्वारीय बल माना गया था।

3. निम्नलिखित में से कौन सा जीव या वनस्पति का जीवाश्म (Fossil) वेगनर द्वारा महाद्वीपीय विस्थापन के पक्ष में साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया गया था?

क) ग्लॉसॉप्टेरिस (Glossopteris)

ख) मेसोसॉरस (Mesosaurus)

ग) लिस्ट्रोसॉरस (Lystrosaurus)

घ) उपर्युक्त सभी

सही उत्तर: घ) उपर्युक्त सभी

व्याख्या: ग्लॉसॉप्टेरिस नाम के पौधे और मेसोसॉरस व लिस्ट्रोसॉरस जैसे जंतुओं के जीवाश्म भारत, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और अंटार्कटिका जैसे दूरस्थ क्षेत्रों में समान रूप से पाए जाते हैं, जो यह साबित करते हैं कि ये कभी एक ही भूभाग (पैंजिया) का हिस्सा थे।

4. वेगनर के महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत की सबसे गंभीर आलोचना किस आधार पर की गई थी?

क) महाद्वीपों के बीच जीवाश्मों की कोई समानता नहीं थी।

ख) उनके द्वारा प्रवाह के लिए बताया गया बल (ज्वारीय बल) अत्यंत अपर्याप्त और असंभव था।

ग) अटलांटिक महासागर के दोनों तटों का आकार आपस में मेल नहीं खाता था।

घ) उन्होंने पर्वतों के निर्माण की कोई व्याख्या नहीं की थी।

सही उत्तर: ख) उनके द्वारा प्रवाह के लिए बताया गया बल (ज्वारीय बल) अत्यंत अपर्याप्त और असंभव था।

व्याख्या: वैज्ञानिकों ने इस आधार पर आलोचना की कि चंद्रमा और सूर्य का ज्वारीय बल महाद्वीपों जैसे विशाल भूभागों को खिसकाने के लिए पूरी तरह अक्षम है। यदि यह बल इतना शक्तिशाली होता, तो पृथ्वी का घूमना ही रुक जाता।

5. वर्ष 1960 में ‘सागर-नितल प्रसरण’ (Sea-Floor Spreading) का सिद्धांत संयुक्त रूप से किसके द्वारा प्रतिपादित किया गया था, जिसने वेगनर के विचारों को वैज्ञानिक आधार दिया?

क) एफ.बी. टेलर और फ्रांसिस बेकन

ख) अल्फ्रेड वेगनर और अलेक्जेंडर वॉन हम्बोल्ट

ग) प्रो. हैरी हेस और रॉबर्ट डीट्ज

घ) मॉरिस एविंग और एंटोनियो स्नाइडर

सही उत्तर: ग) प्रो. हैरी हेस और रॉबर्ट डीट्ज

व्याख्या: प्रिंसटन विश्वविद्यालय के प्रो. हैरी हेस और रॉबर्ट डीट्ज ने 1960 में सागर-नितल प्रसरण का सिद्धांत दिया। उन्होंने बताया कि मध्य महासागरीय कटकों से मैग्मा निकलने के कारण नया समुद्री फर्श बनता है, जिससे महाद्वीपों को गति मिलती है।

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