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भारतीय भाषा और साहित्य (Indian Literature and Language)

भाषाई वर्गीकरण और मूल आधार (Language Families)

  • इंडो-आर्यन भाषा परिवार: भारत की लगभग 74% आबादी इस परिवार की भाषाएं (जैसे हिंदी, बंगाली, पंजाबी, गुजराती, मराठी) बोलती है, जिसका मूल स्रोत प्राचीन संस्कृत है।
  • द्रविड़ भाषा परिवार: इस परिवार में दक्षिण भारत की चार प्रमुख भाषाएं—तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम शामिल हैं, जो इंडो-आर्यन परिवार से पूरी तरह स्वतंत्र हैं।
  • आस्ट्रो-एशियाटिक और तिब्बती-बर्मी: मध्य भारत की जनजातीय भाषाएं (जैसे संथाली, मुंडा) आस्ट्रो-एशियाटिक परिवार में और पूर्वोत्तर की भाषाएं तिब्बती-बर्मी परिवार के अंतर्गत आती हैं।
  • शास्त्रीय भाषाएँ (Classical Languages): भारत सरकार ने उच्च प्राचीनता और स्वतंत्र साहित्यिक परंपरा वाली ग्यारह भाषाओं (जैसे तमिल, संस्कृत, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, ओडिया) को शास्त्रीय दर्जा दिया है।

वैदिक एवं संस्कृत साहित्य (Vedic & Sanskrit Literature)

  • ऋग्वेद साहित्य: यह दुनिया का सबसे प्राचीन लिखित ग्रंथ है, जिसमें देवताओं की स्तुति में रचे गए 1025 से अधिक सूक्त और 10 मंडल शामिल हैं।
  • यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद: यजुर्वेद में यज्ञों के नियम, सामवेद में गायन के स्वर और अथर्ववेद में दैनिक जीवन के तंत्र-मंत्र तथा चिकित्सा का विवरण मिलता है।
  • ब्राह्मण ग्रंथ और आरण्यक: वेदों के कर्मकांडों को गद्य रूप में समझाने के लिए ‘ब्राह्मण ग्रंथ’ और वनों में ऋषियों द्वारा लिखे गए दार्शनिक ग्रंथ ‘आरण्यक’ कहलाए।
  • उपनिषद (वेदांत): इनकी संख्या 108 है, जो आत्मा, ब्रह्म, सृष्टि और मोक्ष से जुड़े गहन दार्शनिक विचारों को संवाद के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
  • अष्टाध्यायी (पाणिनि): ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में पाणिनि द्वारा रचित यह ग्रंथ संस्कृत व्याकरण का दुनिया का सबसे व्यवस्थित और वैज्ञानिक आधार माना जाता है।
  • रामायण और महाभारत: महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण और वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत भारत के दो महान महाकाव्य हैं, जो सामाजिक और नैतिक आदर्श तय करते हैं।
  • कालिदास की कृतियाँ: गुप्त काल के महाकवि कालिदास ने ‘अभिज्ञानशाकुंतलम’ जैसे नाटक और ‘मेघदूतम’ तथा ‘रघुवंशम’ जैसे कालजयी महाकाव्यों की रचना संस्कृत भाषा में की।
  • महाभाष्य और प्रसिद्ध नाटक: पतंजलि ने व्याकरण पर ‘महाभाष्य’ लिखा; वहीं शूद्रक का ‘मृच्छकटिकम’ और विशाखदत्त का ‘मुद्राराक्षस’ प्राचीन काल के अत्यंत प्रसिद्ध और यथार्थवादी नाटक हैं।

बौद्ध एवं जैन साहित्य (Buddhist & Jain Literature)

  • पालि भाषा और त्रिपिटक: बौद्ध धर्म का प्रारंभिक साहित्य जनभाषा ‘पालि’ में लिखा गया, जिसमें बुद्ध के उपदेशों को सुत्तपिटक, विनयपिटक और अभिधम्मपिटक में संकलित किया गया।
  • जातक कथाएँ: पालि भाषा में रचित इन कथाओं में महात्मा बुद्ध के पूर्व जन्मों की काल्पनिक और नैतिक कहानियों का सुंदर संग्रह देखने को मिलता है।
  • महायान संस्कृत साहित्य: बाद के बौद्ध विद्वानों ने संस्कृत को अपनाया; अश्वघोष द्वारा रचित ‘बुद्धचरित’ बुद्ध के जीवन पर लिखा गया पहला महाकाव्य है।
  • प्राकृत भाषा और जैन आगम: जैन धर्म के प्रारंभिक उपदेश ‘अर्धमागधी’ (प्राकृत) भाषा में लिखे गए; इनके पवित्र ग्रंथों को ‘आगम’ या ‘अंग’ कहा जाता है।

संगम साहित्य – दक्षिण भारत (Sangam Literature)

  • संगम काल का उदय: ईसा पूर्व तीसरी सदी से तीसरी सदी ईस्वी के बीच मदुरै में तमिल कवियों की सभाओं (संगम) में दक्षिण भारत के महान साहित्य की रचना हुई।
  • तोलकाप्पियम (Tolkappiyam): तोलकाप्पियार द्वारा रचित यह ग्रंथ तमिल भाषा का सबसे प्राचीन व्याकरण है, जो उस समय के सामाजिक-आर्थिक जीवन पर भी प्रकाश डालता है।
  • शिल्प्पादिकारम महाकाव्य: इलांगो आदिगल द्वारा रचित यह तमिल साहित्य का पहला और सबसे भव्य महाकाव्य है, जो कोवलन और कण्णगी की दुखांत कहानी पर आधारित है।
  • मणिमेखलाई और जीवक चिंतामणि: सीथले सतनार द्वारा रचित ‘मणिमेखलाई’ बौद्ध दर्शन पर आधारित है, जो शिल्पप्पादिकारम की कहानी को आगे बढ़ाता है; जबकि जीवक चिंतामणि जैन धर्म से प्रेरित है।
  • तिरुक्कुरल (तिरुवल्लुवर): कवि तिरुवल्लुवर द्वारा रचित इस महान ग्रंथ को ‘तमिल भूमि का वेद’ कहा जाता है, जिसमें नैतिकता, राजनीति और प्रेम पर दोहे लिखे गए हैं।

मध्यकालीन एवं विदेशी भाषा साहित्य (Medieval & Persian Art)

  • क्षेत्रीय भाषाओं का विकास: मध्यकाल में भक्ति आंदोलन के प्रभाव से बंगाली, ओडिया, मराठी, गुजराती और असमिया जैसी प्रांतीय भाषाओं के साहित्य में भारी उछाल आया।
  • तेलुगु साहित्य का स्वर्णकाल: विजयनगर के राजा कृष्णदेवराय का काल स्वर्णकाल था; उन्होंने स्वयं ‘अमुक्तमाल्याद’ की रचना की और उनके दरबार में ‘अष्टदिग्गज’ कवि थे।
  • फारसी और अमीर खुसरो: दिल्ली सल्तनत के काल में फारसी राजभाषा बनी; अमीर खुसरो ने फारसी और खड़ी बोली को मिलाकर नई काव्य शैली ‘सबक-ए-हिन्दी’ को जन्म दिया।
  • राजतरंगिणी (कल्हण): 12वीं शताब्दी में कल्हण द्वारा संस्कृत में रचित यह ग्रंथ कश्मीर के इतिहास का पहला प्रामाणिक और वैज्ञानिक ऐतिहासिक विवरण प्रस्तुत करता है।
  • मुगल शाही साहित्य: बाबर ने तुर्की में ‘तुजुक-ए-बाबरी’ लिखी, गुलबदन बेगम ने ‘हुमायूँनामा’ और अबुल फजल ने अकबर के काल का विवरण ‘आइन-ए-अकबरी’ में लिखा।
  • दारा शिकोह का योगदान: शाहजहाँ के पुत्र दारा शिकोह ने हिंदू-मुस्लिम संस्कृतियों को जोड़ने के लिए 50 उपनिषदों का फारसी में ‘सिर्र-ए-अकबर’ नाम से अनुवाद किया।

भक्ति और सूफी काव्यधारा (Bhakti & Sufi Poetry)

  • रामभक्ति साहित्य: गोस्वामी तुलसीदास ने अवधी भाषा में ‘रामचरितमानस’ की रचना कर राम की कथा को उत्तर भारत के जन-जन तक पहुँचाया।
  • कृष्णभक्ति काव्य: सूरदास ने ब्रजभाषा में ‘सूरसागर’ और मीराबाई ने राजस्थानी-मिश्रित भाषा में कृष्ण के प्रति अपने प्रेम को भजनों के माध्यम से अमर कर दिया।
  • संत कबीर की साखियाँ: कबीरदास ने सधुक्कड़ी भाषा में ‘बीजक’ की रचना की, जिसमें साखी, सबद और रमैनी के जरिए सामाजिक कुरीतियों पर तीखा प्रहार किया गया।
  • सूफी प्रेमाख्यान (जायसी): मलिक मोहम्मद जायसी ने अवधी भाषा में ‘पद्मावत’ महाकाव्य लिखा, जो सूफी रहस्यवाद और ऐतिहासिक प्रेम कहानी का अनूठा मिश्रण है।
  • सिख गुरुबाणी: गुरु अर्जुन देव ने सिखों के पवित्र ग्रंथ ‘आदि ग्रंथ’ (गुरु ग्रंथ साहिब) में विभिन्न संतों और गुरुओं की वाणियों को संकलित किया।

आधुनिक एवं औपनिवेशिक साहित्य (Modern Era)

  • भारतेन्दु हरिश्चंद्र: इन्हें आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक कहा जाता है; उन्होंने ‘भारत दुर्दशा’ जैसे नाटकों के जरिए राष्ट्रवाद की नई चेतना जगाई।
  • रवींद्रनाथ टैगोर: इन्होंने बंगाली साहित्य को वैश्विक स्तर पर पहुँचाया; वर्ष 1913 में इनकी काव्य कृति ‘गीतांजलि’ के लिए इन्हें नोबेल पुरस्कार मिला।
  • मुंशी प्रेमचंद: हिंदी और उर्दू के इस महान कथाकार ने ‘गोदान’, ‘गबन’ और ‘कफन’ जैसी रचनाओं में ग्रामीण भारत के यथार्थ को बारीकी से उकेरा।
  • राष्ट्रवादी कविताएँ: मैथिलीशरण गुप्त (‘भारत-भारती’) और माखनलाल चतुर्वेदी ने अपनी ओजस्वी कविताओं से स्वतंत्रता संग्राम के दौरान युवाओं में देशभक्ति का संचार किया।
  • उर्दू साहित्य और ग़ालिब: मिर्ज़ा ग़ालिब ने उर्दू शायरी को दर्शन और नया आयाम दिया; आधुनिक काल में सर मोहम्मद इक़बाल ने उर्दू गद्य-पद्य को समृद्ध किया।

आधुनिक भाषाई विकास (Linguistic Development)

  • संविधान की आठवीं अनुसूची: भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में वर्तमान समय में देश की 22 आधिकारिक भाषाओं को मान्यता प्रदान की गई है।
  • 92वां संविधान संशोधन: इस संशोधन के जरिए वर्ष 2003 में चार नई भाषाओं—बोडो, डोगरी, मैथिली और संथाली को आठवीं अनुसूची में जोड़ा गया था।
  • उपन्यास और आधुनिक गद्य: अंग्रेज़ी शासन के बाद भारतीय लेखकों (जैसे आर.के. नारायण, राजा राव) ने अंग्रेज़ी भाषा में भी विशिष्ट भारतीय साहित्य रचकर वैश्विक पहचान बनाई।

भारत के पारंपरिक रंगमंच और नाट्य रूप (Traditional Theatre Forms)

रंगमंच के मूल आधार और उत्तर भारत के नाट्य रूप (Basics & Northern Forms)

  • नाट्य शास्त्र का उद्गम: भरत मुनि रचित नाट्य शास्त्र भारतीय रंगमंच का आदि ग्रंथ है, जिसे वेदों के ज्ञान और तत्वों से युक्त ‘पंचम वेद’ भी कहा जाता है।
  • भांड पाथर (जम्मू और कश्मीर): यह कश्मीर का पारंपरिक व्यंग्यात्मक रंगमंच है, जिसमें संगीत, नृत्य और अभिनय के साथ समकालीन सामाजिक बुराइयों पर तीखा प्रहार किया जाता है।
  • स्वांग (हरियाणा और पंजाब): यह मुख्य रूप से गीत, संगीत और संवाद प्रधान लोक नाट्य है, जिसमें पुरुष कलाकार ही महिलाओं का स्वांग (वेशभूषा) धारण करते हैं।
  • नौटंकी (उत्तर प्रदेश): कानपुर और हाथरस शैलियों के लिए प्रसिद्ध इस नाट्य रूप में छंद, दोहा और लावणी के साथ नगाड़े की थाप पर प्रदर्शन होता है।
  • रासलीला (उत्तर प्रदेश): ब्रज क्षेत्र का यह धार्मिक और भक्तिपूर्ण रंगमंच पूरी तरह से भगवान कृष्ण, राधा और गोपियों की अलौकिक लीलाओं पर आधारित होता है।
  • रामलीला (उत्तर प्रदेश): दशहरा उत्सव के दौरान पूरे उत्तर भारत में खेला जाने वाला यह भव्य मंचन गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस के प्रसंगों पर आधारित है।

पश्चिमी और मध्य भारत के रंगमंच (Western & Central Forms)

  • भवाई (गुजरात): असीत ठाकर द्वारा शुरू इस नाट्य में कच्छ-सौराष्ट्र की सामाजिक समस्याओं को चेहरे के अनूठे भावों और ‘भूंगल’ वाद्य यंत्र के साथ दर्शाते हैं।
  • माच (मध्य प्रदेश): मालवा क्षेत्र का यह पारंपरिक संगीतमय रंगमंच है, जिसका नाम ‘मंच’ से प्रभावित है और इसमें गीतों को संवाद के रूप में गाते हैं।
  • तमाशा (महाराष्ट्र): कोल्हाटी समुदाय द्वारा विकसित इस ऊर्जावान रंगमंच में पारंपरिक लावणी नृत्य, ढोलक की तीव्र थाप और कामुक संवादों की प्रधानता देखने को मिलती है।

पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत के नाट्य रूप (Eastern & Northeastern Forms)

  • जात्रा (पश्चिम बंगाल): कृष्ण भक्ति आंदोलन से उपजा यह संगीतमय थियेटर है, जो खुले मैदानों में बिना किसी स्थापित मंच या पर्दे के खेला जाता है।
  • अंकिया नाट और भावना (असम): 15वीं सदी में संत शंकरदेव द्वारा शुरू इस अंकिया नाट के मंचन रूप को ‘भावना’ कहते हैं, जिसमें ब्रजावली भाषा प्रयुक्त होती है।
  • दशअवतार (गोवा और कोंकण): सिंधुदुर्ग और गोवा क्षेत्र के इस धार्मिक नाट्य में लकड़ी के मुखौटों का प्रयोग कर भगवान विष्णु के दस अवतारों की कथाएं दिखाई जाती हैं।

दक्षिण भारत की समृद्ध नाट्य परंपरा (Southern Theatre Forms)

  • यक्षगान (कर्नाटक): महाकाव्यों पर आधारित इस समृद्ध नाट्य में कलाकारों की भारी वेशभूषा, चेहरे का विशिष्ट मेकअप और ऊंचे सुरों का संगीत मुख्य आकर्षण होता है।
  • कुरुवंजी (तमिलनाडु): यह मुख्य रूप से प्रेम और भक्ति रस प्रधान नृत्य-नाटक है, जिसका विकास देवदासी परंपरा से हुआ है और इसमें लास्य भाव प्रमुख है।
  • थैय्यम (केरल): उत्तरी मालाबार का यह अनुष्ठानिक रंगमंच है, जिसमें कलाकार विशाल मुकुट पहनकर अद्भुत नृत्य करते हैं और उन्हें साक्षात देवता का रूप मानते हैं।
  • कुट्टियाट्टम (केरल): यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत में शामिल यह भारत का इकलौता जीवित संस्कृत रंगमंच है, जो चाक्यार और नम्ब्यार समुदायों द्वारा किया जाता है।
  • मुडियेट्टू (केरल): यह भी यूनेस्को द्वारा मान्यता प्राप्त अनुष्ठानिक थियेटर है, जिसमें देवी काली और दानव दारिका के बीच हुए भीषण युद्ध की पौराणिक कथा दर्शाते हैं।
  • तेरुक्कूठु (तमिलनाडु): इसका शाब्दिक अर्थ ‘सड़क पर नाटक’ है, जो मुख्य रूप से द्रौपदी और महाभारत के प्रसंगों पर गांवों के चौराहों पर प्रदर्शित किया जाता है।
  • पेरिनी तांडवम (तेलंगाना): काकतीय राजवंश के समय विकसित इस ऐतिहासिक योद्धा-नाट्य में सैनिक युद्ध पर जाने से पहले भगवान शिव की आराधना में उग्र प्रदर्शन करते थे।
  • वीथी नाटकम (आंध्र प्रदेश): यह खुले आसमान के नीचे गली-मोहल्लों में किया जाने वाला लोक नाटक है, जिसका मुख्य उद्देश्य सामाजिक और धार्मिक चेतना जगाना है।

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